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भुना हुआ गोश्त

भुना हुआ गोश्त

शहर का बाहरी किनारा, जिसके बाद से बरसाती नदी कुंकम जंगल के इलाके में प्रवेश कर जाती है| उसके ठीक पहले एक तरफ पर्यटकों की सैर के लिए एक वन विहार बनाया गया है और दूसरी ओर श्मशान घाट है| दिन भर तो लोगों का आना-जाना लगा रहता है पर शाम आठ बजे के बाद से न तो वन विहार में लोग बचते हैं और न ही श्मशान घाट में| ऐसे वीराने में आज अन्धेरा घिरने के बाद से ही एक पुलिसवाला गश्त कर रहा है – वजह है प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी के एक नामचीन नेता का निधन जिसका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ आज शाम को ही श्मशान घाट पर किया गया है|

सिपाही श्मशान घाट के सामने से टहलते हुए वन विहार के कोने पर पहुँच जाता है और वहाँ रखी पानी की टंकी से पीठ टिका कर बैठ जाता है| रात के ग्यारह बज रहे हैं और दूर-दूर तक न कोई बन्दा और न बन्दे की जात| समय काटने के लिए सिपाही एक सिगरेट सुलगा लेता है| दो-तीन कश ही लिए होंगे कि अचानक पीछे, झाड़ी में कुछ आहट होती है| सिपाही चौंक कर खड़ा हो जाता है और चिल्लाता है, “कौन है वहां?”

थोड़ी और खरखराहट होती है और अँधेरे में दो चमकती हुई आँखें दिखाई पड़ती हैं और फिर एक भेड़िया सामने आकर खड़ा हो जाता है|

“मैं हूँ हुजूर..”, भेड़िया बोला तो सिपाही चौंक पड़ा|

“अबे तू .. और तू तो इंसानों की जबान कैसे बोल रहा है?”

“तो क्या हुआ हुजूर .... मैंने सुना है कि पुलिस के सामने तो गूंगे भी बोलते हैं; मैं तो फिर भी एक नाचीज भेड़िया हूँ...”

“अबे ये डंडा देखा है न, ज्यादा कॉमेडी की तो पूरा डंडा अन्दर डाल दूंगा ... ये बता कि इस समय यहाँ क्या कर रहा है?”

“हुजूर, मैं इधर वन विहार में ही रहता हूँ और कभी-कभार हवा बदली के लिए इस तरफ आ जाता हूँ“

“तुझे हवा बदली के लिए यही मुर्दइहा ही मिला है, जंगल वालों को पता चल गया तो गोली मार देंगे ... सच सच बता, इधर क्या करने आता है बे?”

“हुजूर, सच बताऊं, मैं इधर भुना हुआ गोश्त खाने आता हूँ”

“क्या”, सिपाही जोरों से चीख पड़ता है, “मतलब ... तू साले आदमखोर हो गया है? जली हुई लाशें खाता है?”

“क्या करें हुजूर ... वन विहार में सब साले बेईमान आ गए हैं; पाँच किलो गोश्त की जगह सिर्फ एक किलो गोश्त ही देते हैं .... इसलिए इधर आकर ...”

“हूँ... अब समझा ... लेकिन आज तू इधर नहीं जा सकता ...”

“क्यों हुजूर? एक लाश तो शाम को ही जलते देखी थी?”

“हाँ जली तो थी पर वो किसी ऐसे वैसे आदमी की नहीं एक बहुत बड़े नेता की लाश है .... कैबिनेट स्तर का मंत्री था और साले ने बड़े लोगों का खून पिया था ...”

“खाया पीया आदमी! फिर तो हुजूर मजा आ जाएगा, जाने दो न .... इससे पहले कि लाश पूरी जल जाए ...”

“अबे उसमे अभी भी आग होगी ... तू जल जाएगा ...”

“हुजूर.... मैं एक ठोकर मारता हूँ तो पूरा ढेर बिखर जाता है और फिर मैं अपने काम का टुकड़ा किनारे गिरा लेता हूँ .... लेकिन यह सब आप मुझ पर छोड़ो ... आप बस मुझे जाने दो”, कहते-कहते भेड़िये की लार टपकने लगी|

“नहीं, मैं तुझे नहीं जाने दे सकता ... तुझे क्या लगता है मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ ... मेरी ड्यूटी लगी है यहाँ व्यवस्था बनाए रखने की ...”

“मरने के बाद भी साले को व्यवस्था की जरूरत है? ... जरूर बड़ा वी आई पी होगा ... तो मैं ..“

“अबे फिर से कॉमेडी की .... कल पार्टी के लोग और उसके घरवाले उसकी अस्थियाँ बटोरने आने वाले हैं”

“अरे हुजूर जाने दो न ... इससे पहले कि सारी लाश जल जाए ... खाने लायक एक जांघ तो अभी भी मिल ही जाएगी ... और कौन सा उसके रिश्तेदार गिन के २०६ हड्डियां ले जाने वाले हैं...”

“साले, बड़ी जानकारी है तुझे इंसानों के बारे में ... हड्डियां तक गिन रखी हैं...”, फिर कुछ सोचते हुए “बात तो तेरी ठीक है दो चार हड्डियां कम ही सही .... लेकिन इसमें मेरा क्या फ़ायदा है?”

“फ़ायदा? अब तुझे कैसा फ़ायदा चाहिए?” भेड़िये ने कुछ उखड़ते हुए कहा|

“देख, मैं तुझे नेता का भुना हुआ गोश्त खाने दे सकता हूँ बशर्ते तू मेरे लिए भी भुने हुआ गोश्त का इंतजाम कर दे ...”

“हाँ तो फिर ठीक है न ... तू भी साथ चल.. दोनों भाई मिल के फाड़ेंगे उसको.. वंस इन अ लाइफटाइम अपोर्चुनिटी है ...”

“साले, फिर कॉमेडी की ... मैं आदमी का गोश्त खाऊँगा? अपने जैसा आदमखोर समझा है क्या? तू तो मेरे लिए बस एक तन्दूरी मुर्गे का इंतजाम करा दे, मतलब पैसे दिला दे और फिर जा खा ले...”

कुछ सोच कर भेड़िया चला गया लेकिन जल्द ही वापस लौटा तो उसके मुंह में कुछ नोट फंसे हुए थे ...लाकर उसने सिपाही के आगे डाल दिए|

“अबे तेरी तो ...”, सिपाही के आश्चर्य का ठिकाना न रहा , “ये कहाँ से ले आया .. और वो भी इतनी जल्दी ...”

“भाई, लोग अंतिम संस्कार में रुपये पैसे भी तो चढाते हैं.... लेकिन तू आम खा न ... पेड़ से क्या लेना देना तुझे?”

सिपाही ने लपक कर नोट उठा लिए और गिनने लगा पूरे दो सौ अस्सी रुपये थे| भेड़िये ने दोबारा पूछा, “... तो मैं जाऊं फिर ... नहीं तो कुछ बचेगा नहीं उस साले नेता में ...”

मुड़े-तुड़े नोटो को सीधे कर सिपाही ने उनकी तह लगा कर जेब के हवाले किया और बोला ठीक है जा.. लेकिन सिर्फ एक जांघ खाइयो ... और ज्यादा बिखराना नहीं ... देख मेरी भी नौकरी का सवाल है ...”

“ठीक है ठीक है”, कहते हुए भेड़िया चला गया|

अगले दिन रात में भेड़िया दुबारा आया तो फिर से उसी सिपाही ने उसे उसी जगह पर रोक लिया|

“तू तो कह रहा था कि कल तेरी वी आई पी के कारण ड्यूटी लगी था ... आज क्या हो गया, फिर से यहाँ क्यों भटक रहा है?” भेड़िये ने पूछा|

“अबे, तू इंसानों के बारे में खूब जानता होगा लेकिन पुलिस महकमे के बारे में कुछ नहीं जानता ...”

“जानता हूँ न ... पुलिस वाले मुझ जैसे भेड़िये से भी रिश्वत ले सकते हैं ...”

“फिर कॉमेडी ...अबे, वो बात नहीं... पुलिस महकमे में ड्यूटी एक बार में तीन दिन या सात दिन की लगती है”

“अच्छा ... आज भी दो लाशें जली हैं ... वे तो कोई नेता या वी आई पी नहीं हैं ... तो मैं जाऊं..?”

“हरामखोर, तुझे भुने हुए गोश्त का चस्का लग गया है... कल तुझे खाने को उस नेता की जांघ दी थी न... कैसी थी?”

“कैसी थी? तेरी बातों के चलते देर हो गयी इसलिए ज्यादा कुछ बचा नहीं ... जो कुछ बचा वो भी बड़ा बेस्वाद था| देख आज मत रोक... दो लाशें हैं मेरा काम हो जाएगा ...”

“तेरा काम तो बाद में हो ही जाएगा ... पहले मेरा इंतजाम तो कर...”, सिपाही ने डंडा आगे करते हुए मक्कारी से कहा|

भेड़िया फिर से लपक कर झाड़ियों में गया और पिछली रात की तरह कुछ नोट उठा लाया| इस बार चार सौ दस रुपये थे, सिपाही ने हंसते हुए कहा, “मैं समझ गया, साले तुझे गिनती नहीं आती न, सीख लेता तो फायदे में रहता|”

तीसरे दिन जब भेड़िया आया तो पहले से ही उसने मुंह में नोट दबा रखे थे| सिपाही की बाछें खिल गयीं|

“तू यार है बहुत समझदार ... भेड़िये की जगह अगर इंसान होता तो मस्त ठेकेदार होता ...हम दोनों की खूब जमती”

“तेरा नाम क्या है दोस्त?”, भेड़िये ने पूछा|

“गरज भान ....”

“ये गरज शेर वाली गर्जना जैसा है या मजबूरी वाली गरज है ...”

“सच्ची तू यार है बहुत मजेदार... लेकिन अब तो तू मेरा दोस्त है इसलिए तेरी बात का बुरा नहीं मानूंगा ... तुझे अन्दर की बात समझाता हूँ... हमारे पुलिस महकमें में बराबरी वाली कोई बात नहीं होती है ... या तो आप बाकी लोगों से ऊपर होते हो या फिर लोग आपसे ऊपर होते हैं| तो जिन लोगों के लिए मैं ऊपर हूँ वहां यह शेर की गरज बन जाती है जैसी कि तेरे साथ| और जो मुझसे ऊपर होते हैं उनके सामने यह मजबूरी वाली गरज बन जाती है|”

“तो तेरे अफसर भी तेरे जैसे ही हैं?”

“मुझसे भी ज्यादा, जो जितना ऊपर उसकी उतनी ही बड़ी गरज.... समझ गया न ... अब टाइम वेस्ट मत कर तू जा... और कल फिर नोट लेकर ही आइयो”

सिपाही और भेड़िये की यह व्यवस्था अच्छी चल रही थी कि एक गड़बड़ हो गयी| पुलिस महकमे में ऐसी बाते कहाँ छिपती हैं... खुशी-खुशी श्मशान घाट की ड्यूटी और फिर रोज तंदूरी मुर्गा .... बात उस दीवान तक पहुँच गयी जो सिपाही की ड्यूटी लगाता था| उसने गरज भान को बुलाया और तहकीकात की तो उसने सब सच उगल दिया | दीवान ने गरजते हुए कहा , “अभी ऊपर अगर खबर हो गयी तो तू सीधे सस्पेंड हो जाएगा ... साले मंत्री की लाश भेड़िये को खिला दी .. समझता क्या है अपने आप को ... आज से तेरी श्मशान घाट की ड्यूटी खत्म ... उस भेड़िये को तो मैं देखता हूँ आज| कहाँ मिलेगा?”

बात खुली तो फिर खुलती चली गयी, दीवान से सब इन्स्पेक्टर, सब इन्स्पेक्टर से इन्स्पेक्टर, इन्स्पेक्टर से सर्किल अफसर और फिर ऊपर तक| उस रात जब भेड़िया श्मशान घाट के पास पानी की टंकी पर पहुंचा तो देखा कि जहां उसे सिपाही मिलता था एक नया आदमी ठीक उसी जगह खड़ा है| नए आदमी को देख कर भेड़िया पहले तो ठिठका और फिर वापस जाने को हुआ, तभी वह आदमी जोरों से गरजा, “खबरदार जो भागने की कोशिश की .... मुझे सब पता चल चुका है तुम्हारी धांधली के बारे में ... अगर बचना चाहते हो तो सारे नोट उठा ला .. वरना आज तेरी खैर नहीं ....”

“लेकिन मैं तो ऐसे ही हवा बदली के लिए ...”

“ऐसे ही ... साले आदमखोर ... वन विहार से चोरी छिपे भाग के आता है ... और मुझे क़ानून बताता है ? फौरन जा और जितने नोट हैं सब के सब ले के आ ...”

यह सुन भेड़िये की आँखें इस बार कुछ अलग तरह से चमकीं ...वह बोला, “दरअसल भुना हुआ गोश्त खाने से मेरा पेट खराब हो रहा था इसलिए अब मैंने भुना हुआ गोश्त खाना छोड़ दिया है ... इधर तो मैं ऐसे ही टहलने और गरज भान को ढूँढता आया था| उसे बताना था की मैं कच्चे गोश्त पर वापस आ गया हूँ ...”

“तो...”, उस आदमी ने रिवॉल्वर निकाल लिया|

अगले दिन अख़बार में सबसे ऊपर खबर छपी थी कि बरसाती नदी और वन विहार के बीच पुलिस के एस पी की आधी खाई हुई लाश मिली| सभी का अनुमान था कि किसी खूंखार जंगली जानवर ने उसका शिकार किया था| लेकिन खबर यह भी आम थी की एस पी साहब उस सुनसान में क्या करने गए थे और इसके चलने किसी गहरी साजिश का अंदेशा था | वन विभाग को भी खबर कर दी गयी और वे भी किसी आदमखोर की तलाश कर रहे हैं|

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