एकांत सारंग Manushi द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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एकांत सारंग

मन्नू मोबाइल

मन्नू कल से ही उदास था। उदास ही नहीं, कुछ गुस्से में भी था। कुछ ही क्यों, वह खूब गुस्सा था। मूड इतना खराब था कि सुबह से नाश्ता तक नहीं किया था। मम्मी किचन से आवाज लगाती रह गयीं लेकिन वह नहीं पहुंचा। आखिरकार, मम्मी अन्य कार्योर्ं में लग गयीं।

मन्नू ने पढ़ाई में मन लगाने का प्रयत्न किया। होमवर्क भी तो कितना मिला था। ये टीचर्स इतना होमवर्क देती ही क्यों हैं? इतना होमवर्क देना ही है तो स्कूल से छुट्टी ही क्यों देती हेैं? दिन—रात स्कूल में ही रोककर सारा होमवर्क एक—साथ ही क्यों नहीं करा लेतीं, टीचर्स? वह खुद से ही प्रश्न पूछने लगा। लेकिन इन प्रश्नों के उत्तर उसके पास नहीं थे। उसे तो होमवर्क करना ही था। चाहे हॅंसकर, चाहे रोकर। लेकिन उसका मूड होमवर्क की वजह से खराब नहीं था।

उसने अभी होमवर्क करना आरम्भ किया ही था कि उसे अपने प्रिय मित्र टीनू की आवाज सुनाई दी। टीनू जितना उसे प्रिय था, उतना ही उससे ईर्ष्या भी करता था। उसे पढ़ता देख उसके प्रश्न प्रारम्भ हो जाते थे। क्या पढ़ रहा है? क्यों पढ़ रहा है? कब से पढ़ रहा है? कब तक पढ़ेगा? वगैराह—वगैराह। प्रश्नों की संख्या बेवजह इतना अधिक होती थी कि मन्नू को अपनी पढ़ाई बंद करनी पड़ती थी। इसलिए जब मम्मी ने मन्नू को आवाज लगायी कि मन्नू, कमरे से बाहर आ जाओ, टीनू आया है तुमसे मिलने, तो प्रतिउत्तर में टीनू कुछ न बोला ताकि बाहर यह संदेश जाये कि मन्नू सो रहा है। और यही हुआ भी। मम्मी की आवाज आयी— टीनू, तुम थोड़ी देर में आना। लगता है, मन्नू सो रहा है।

और टीनू ‘ठीक है, फिर आऊंगा, ऑंटी' कहकर चला गया।

टीनू के जाने के बाद मन्नू ने राहत की सांस ली। अच्छा है कि टीनू चला गया। आजकल अपना नया मोबाइल सभी बच्चों को दिखाता घूम रहा है। ऐसे ऐंठता है कि मानो और कोई बच्चा इतना महंगा मोबाइल खरीद ही न सकता हो। मन्नू सोच रहा था। ‘देख लेना बच्चू, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो इससे भी महंगा मोबाइल खरीद कर दिखा दूंगा।' आखिर, मन्नू की नाराजगी, उसकी बुदबुदाहट के रूप में उसके होंठों पर आ ही गयी।

वह अभी होमवर्क कर ही रहा था कि मम्मी कमरे में आ गयीं।

‘अरे, मेरा बेटा तो पढ़ रहा है। नाश्ता कब करोगे बेटा?' मम्मी ने पूछा।

‘अभी भूख नहीं है।' मन्नू ने होमवर्क में सिर झुकाये ही उत्तर दिया।

‘ठीक है। सीधे लंच कर लेना। तुम्हारी पसंद की डिश बना रही हूॅं।' मम्मी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।

उसने यह भी नहीं पूछा कि मम्मी क्या बना रही हो?

‘यह तो बताओ मन्नू तुम्हें हुआ क्या है?' मम्मी ने पूछा। ‘अभी तुम्हारे पापा का फोन आयेगा और वे पूछेंगे कि मन्नू को भूखा क्यों रखा तो मैं क्या जवाब दूंगी?'

‘पापा कहां गये?' मन्नू ने सोचा।

‘तुम्हारे पापा अपने काम से बाहर गये हैं। कल तक लौटेंगे।' मम्मी ने बतलाया।

‘ओह, तभी पापा कल पूछ रहे थे कि मन्नू क्या लोगे? फिर जब मैंने उन्हें कहा कि मैं मोबाइल लूंगा तो वे चुप क्यों हो गये?' मन्नू के मन में विचार उमड रहे थे।

‘मन्नू, सोचते ही रहोगे या कुछ बोलोगे भी।' मम्मी ने पूछा।

मन्नू तब भी कुछ न बोला।

‘मन्नू, यह तुम्हारा दोस्त टीनू बड़ा अजीब है।' मम्मी बोलीं — ‘अब देखो, सुबह—सुबह चला आया तुम्हारे घर पर। बिना यह सोचे कि तुम अभी सो रहे होंगे। नहा—धो रहे होंगे या फिर नाश्ता कर रहे होंगे। हालांकि तुम नाश्ता नहीं कर रहे हो और कसम खाकर बैठे हो कि कभी नाश्ता नहीं करोगे....जीवन भर नहीं....क्यों?' कहकर मम्मी मुस्कुराईं।

रोकते—रोकते मन्नू के चेहरे पर भी मुस्कान आ ही गयी।

‘......और हाथ में था उसके मोबाइल।' मम्मी ने आगे कहा — ‘मोबाइल क्या था, ऐसा लगता था कि उसके हाथ में गड़ा हुआ खजाना लग गया हो। क्या उसने नया मोबाइल लिया है?' मम्मी ने पूछा।

मन्नू ने स्वीकारोक्ति में सिर को हिलाया। अब वह मम्मी को क्या बतलाता कि टीनू के नये मोबाइल के कारण उसका मूड खराब है।

‘उसका मोबाइल भी महंगा लगता है। उसके मां—बाप ने उसे महंगा मोबाइल दिलाया है। बच्चों को चाहिये कि इसका प्रयोग दूसरे बच्चों को प्रभावित करने के लिए न करें बल्कि अपनी जरूरत के लिए इसका प्रयोग करे। लेकिन एक छोटे बच्चे को कीमती मोबाइल की क्या जरूरत हो सकती है?' मम्मी बोलीें।

‘वह इस पर गेम खेलता है।' मन्नू के मुुंह से काफी समय बाद कुछ निकला।

‘गेम तो सभी मोबाइल में होते है।'

‘इसमे इंटरनेट भी है।' मन्नू ने बतलाया।

‘इंटरनेट के लिए तो सभी के घर में कम्प्यूटर है ही। उसके घर में भी होगा।' कहकर मम्मी ने मन्नू की ओर देखा।

‘इसके पास तो लैपटाप है।'

‘यह तो अच्छी बात है। फिर छोटे बच्चे की जेब में कीमती मोबाइल होना न तो बच्चे के लिए ठीक है और न ही मां—बाप के .....।' मम्मी ने अभी बात पूरी नहीं की थी कि कॉलबेल बज उठी। मम्मी दरवाजा खोलने बाहर चली गयीं।

ल्गता है कि मम्मी ठीक कह रही हैं। कीमती मोबाइल बच्चों के हाथ में नहीं होना चाहिए। उसके पापा ने घर के कम्प्यूटर पर इंटरनेट लगा रखा है जिस पर गेम खेले जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त कॉल करने के लिए घर पर बेसिक फोन है, पापा का मोबाइल है, मम्मी के पास मोबाइल है, तो उसे मोबाइल की क्या जरूरत। वह नाहक ही मूड खराब करके भूख बैठा है।' मन्नू सोचने लगा।

मम्मी ने दरवाजा खोलकर देखा तो टीनू खड़ा था। हाथ में मोबाइल लिए हुए।

‘आओ टीनू। मन्नू उठ गया है। हम तुम्हारे बारे में ही बात कर रहे थे।' मम्मी उसे अन्दर मन्नू के कमरे में ले आयीं— ‘तुमने आने में देर क्यों कर दी?' मम्मी ने पूछा।

‘मैं आ रहा था कि बिल्ली रास्ता काट गयी। इसलिए रूक गया। यह अशुभ होता न।' टीनू ने देर से आने का कारण बतलाया।

‘हमारे यहां तो बच्चों के हाथ में कीमती मोबाइल होने को अशुभ मानते हैंं।' कहकर मन्नू ने मम्मी की ओर देखा।

मन्नू की बात सुनकर मम्मी हैरत में थीं।

‘तुम्हारे पास नहीं है इसलिए कह रहे हो।' टीनू हाथ में मोबाइल नचाते हुए बोला।

‘मन्नू के पापा बाहर गये हैं। कल इसका भी मोबाइल आ जायेगा।' मम्मी ने जैसे रहस्योद्घाटन किया।

‘नहीं, मम्मी। अभी नहीं। अगले साल तक नहीं। मैं पापा को फोन कर दूं कहीं लेकर ही न आ जाएं, मोबाइल।' कहकर मन्नू दूसरे कमरे में भागा।

‘मम्मी जल्दी नाश्ता बनाओ, भूख लगी है। टीनू भी मेरे साथ ही नाश्ता करेगा।' दूसरे कमरे से मन्नू की आवाज आयी।

मम्मी अचरज में थी। और टीनू को अपना मोबाइल भारी लग रहा था। उसके गले से यह भी नहीं निकला — ‘नहीं, धन्यवाद। मैं नाश्ता करके आया हूॅं।'