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संस्कार

संस्कार

कुमार ने कभी नही सोचा, कि यह दिन भी देखना होगा। उम्र के चौथेपन में बेटे ने ख़ुशी देने की बजाय स्तब्ध कर दिया।
कहने-सुनने को कुछ बाकी नही रहा था। विजातीय धर्म की लड़की से यदि प्रेम-विवाह करना ही था तो, हमे पहले ही बता दिया होता, हमारी जबान तो नही जाती!
क्या सोचेगा हमारा बचपन का मित्र, रमेश जिसकी होनहार लड़की के साथ इस तरह रिश्ता टूटने का दर्द जुड़ जायेगा।

उसका तो कोई कुसूर ही नही इन सबमे| सबकुछ दोनों की मर्जी जानकर ही तय हुआ था| अभी-अभी तो नीरा बिटिया ने स्कूल व्याख्याता की परीक्षा पास की है,घर में सब कितने खुश है, उत्सव का सा माहौल है घर में पिछले दो दिनों से बधाई और शुभ कामना देने वालो का ताँता लगा हुआ है| अब ऐसे में मै उनको यह बुरी खबर कैसे और किस मुहँ से दूँ |

पत्नी माया ,जो बहुत देर से कुमार साहब के मुख-मंडल पर आ-जा रहे भावो को देख रही थी.उनकी मनोदशा से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ थी. वो जानती थी कि कुमार साहब के लिए उनका मित्र उतना ही अजीज था जितना अपना बेटा देवेश. देवेश ने उनको विचित्र अवस्था में लाकर खड़ा कर दिया है.

माया चाय का कप ले कर कुमार साहब के पास जाती है और चाय के साथ उनके मन को भी शांत करने की चेष्टा करती है .’’ देखो जी अब जो हुआ सो हुआ, मै तो कहती हूँ बेटे की ख़ुशी के लिए सब कुछ भूल जाओ| उसके बिना न आप रह सकते न मै ! इससे पहले हमारे देवेश ने कभी हमारा दिल न दुखाया और मै तो कहती हूँ इसमें उसके सामने जरुर कोई गंभीर समस्या आई होगी तभी उसने ऐसा करने का निर्णय किया है|,

पत्नी की बातो को चुप-चाप सुनते हुए कुमार साहब ने चाय पीकर प्याला टेबल पर रख कर की ओर मुखातिब हुए ‘ तुम बिलकुल सही कह रही हो माया, पर सोचो क्या हमे नही अवगत करा सकता था.जो भी घटित हुआ. हो सकता है हम कोई और रास्ता निकाल लेते उसकी समस्या का जिससे आज मुझे अपने मित्र के सामने लज्जित न होना पड़ता|,

तभी रामू ने आकर बताया ‘साहब रमेश साहब आपसे मिलना चाहते है. कलेजा धक से रह गया कुमार साहब जडवत हो गये रमेश को क्या कहेंगे.माया में रामू को कहा ‘ भेज दो उन्हें अंदर?

नमस्कार भाभी जी,कैसे हो रमेश इतने उदास क्यों लग रहे हो ?, रमेश ने अंदर प्रविष्ट होते हुए कहा |

नमस्कार भाई साहब, कैसे हो आप ? इनकी कुछ दिनों से तबियत ठीक नही है माया ने कहा. आप सुनाओ|

अरे ! कुमार तुम्हे पता नही है क्या नीरा बिटिया का स्कूल व्याख्याता के पद पर चयन हुआ है अगले महीने शहर के किसी भी सीनियर सेकैंडरी स्कूल में पदस्थापित हो जाएगी.उसी ख़ुशी में कल हमने एक बहुत बड़ी पार्टी का आयोजन रखा है, तुम सब सपरिवार आमंत्रित हो. समय से पहुंच जाना. और हाँ देवेश को भी जरुर लाना कोई बहाना नही चलेगा उसके न नुकुर का हाँ.

कुमार साहब के पास कोई शब्द नही बोलने को तो रमेश ने कहा ‘’तुम मुझसे कुछ छिपा रहा है जरुर कोई बात है जो तुझे परेशान कर रही है! अपने दोस्त को नही बतायेगा तो फिर कैसा दोस्त,कैसी दोस्ती.इतना सुनते ही कुमार साहब भावुक हो गये और देवेश के निर्मला के साथ शादी करने का ब्यौरा रख दिया| यह सब सुनकर रमेश एक बारगी तो सन्न रह गया. मुहँ से कुछ भी शब्द नही निकला. क्षण भर बाद अपने को सयंत हुए बोला ‘’ कुछ नही कुमार जो हुआ सो हुआ जरुर कोई बात हुई है तभी हमारे देवेश ने यह कदम उठाया है वरना ऐसा कभी नही करता तुम्हारा इसमें कोई दोष नही है तुम अपने आप को जरा भी कष्ट मत दो ,मै अपने घर वालो को और नीरा को किसी भी तरह समझा लूँगा.इतना कह कर रमेश जी उठ कर अपने घर चले गये |


इस तरह के विचारो में डूबते उतरते कुमार साहब को पता ही नही चला था कि ' कब देवेश उनका बेटा, अपनी नव विवाहिता पत्नी को लेकर उनके सामने विनीत मुद्रा में खड़ा है। कुमार साहब से न कुछ बोलते बना न चुप रहते ,तभी उनकी पत्नी ने आकर कहा" आओ बहू को साथ मिलकर आशीर्वाद देते है।,
बेटे देवेश को माँ की बातो से कुछ तो राहत मिली।
उसमें अब हिम्मत का संचार होने लगा और बोला" माँ-पिता जी , प्रथम तो क्षमाप्रार्थी हूँ , आपसे बिना पूछे निर्मला से शादी कर ली। पर इसके पीछे बहुत बड़ा कारण था जिसे सुनकर आप भी शायद मुझे माफ़ करके निर्मला को बहू स्वीकार लो!
देवेश ने कहना जारी रखा, बोला ' निर्मला मेरी ऑफिस में स्टेनो के पद पर कार्यरत थी, ऑफिस के एक कर्मचारी से निर्मला ने पिता के इलाज के लिए रुपये उधार लिए हुए थे, उसने निर्मला पर रुपये के एवज में शादी करने का प्रस्ताव रखा जबकि वो पहले से ही अपनी पत्नी को तलाक देने की प्रक्रिया से गुजर रहा था । निर्मला के शादी के प्रस्ताव को ठुकराते ही वो उसे तरह-तरह से तंग करने लगा था | तभी निर्मला ने मुझसे उसकी शिकायत की तो मैंने उसे उसके चंगुल से छुडाने का आश्वाशन दिया| निर्मला एक बहुत ही नेक लडकी थी निर्मला के पिता जी ने जब यह सब सुना तो उन्हें हार्ट अटैक हुआ। मैंने उन्हें सरकारी अस्पताल से निकाल कर शहर के सबसे बड़े हार्ट होस्पिटल में एडमिट कराया| मेरे अंदर आपके दिए संस्कार को देख कर वो मुझसे प्रभावित हुए थे इसी दौरान मेरा उनके घर आना-जाना हुआ। एक दिन अस्पताल में निर्मला के पिता जी ने अपने अंतिम समय के क्षण में मुझे निर्मला का हाथ देकर। बोले ' बेटा आज से निर्मला तुम्हारी , मै स्तब्ध था। कुछ ही क्षणों बाद उनका देहांत हो गया , आपके दिए संस्कारो के कारण मरते हुए इंसान की इच्छा रखना मेरी प्रथम प्राथमिकता बन गयी ,क्या मैं गलत हूँ?' कुमार साहब ने बेटे को गले से लगाया बहू को आशीष दिया।
शान्ति पुरोहित

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