Khatte Mithe Vyang : Chapter 3 Arunendra Nath Verma द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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Khatte Mithe Vyang : Chapter 3

खट्टे मीठे व्यंग

(3)

व्यंग संकलन

अरुणेन्द्र नाथ वर्मा

  • 11. दान के लिए बने कम्बल
  • 12. बदलता है रंग आसमाँ कैसे कैसे
  • 13. कैसा बसंतोत्सव
  • 14. लेख लिखने का बेकार नुस्खा
  • 15. दागियों के दाग़

    दान के लिए बने कम्बल

    छोटे से फ़्लैट में जाने कितनी पुरानी यादों के साक्षी सामान जमा हैं जिन्हें फेंकने का मन नहीं होता. छोटी सी पेंशन के सहारे महंगाई से लगातार चलती लड़ाई है. कारण तो बहुत हैं पर सबका परिणाम एक है. शोपिंग मेरे लिए मजबूरी है, शौक नहीं. अकबर इलाहाबादी के शब्दों में “दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ , बाज़ार से निकला हूँ खरीदार नहीं हूँ.” फ़िर भी जब बाज़ार दूकानों से बाहर निकल कर फूटपाथों पर हाबी हो जाए तो उन पर सजाये हुए बिकाऊ माल से टकराने, गिरने के डर से ही सही, आँखें खोल कर चलना पड़ता है. तब दीखते हैं आजकल पटरियों पर लगे हुए कम्बलों के ढेर जिनके बेहद सस्ते दामों के साथ घोषणा लगी रहती है ‘दान देने के लिए कम्बल’

    उन रंगबिरंगे कम्बलों पर उंगलियाँ फेरने पर पता चलता है कि सर्दी दूर करने वाला कोई गुण उनमे नहीं है. ऊन से शर्माता हुआ सा सम्बन्ध तो है पर कुछ ‘अवैध’ सम्बन्ध वाला चक्कर लगता है. उनका सूती स्पर्श कुहरे का लबादा ओढ़े हुए इस सर्दी से बस इतनी ही बहादुरी से लड़ सकता है जितना चारों तरफ फ़ैली हुई बेहिसाब गंदगी से अकेले ‘स्वच्छ भारत’ का नारा. कौतूहल के साथ दूकानदार से पूछता हूँ ‘भाई, ऐसे कम्बल से क्या फ़ायदा जिन्हें देख कर सर्दी ठठा कर हंसने लगे.’ वह मुस्करा कर कहता है ‘बाऊजी, ये कम्बल ओढने वाले के शरीर में नहीं बल्कि दान देने वाले के दिल में गर्माहट महसूस कराते हैं. हनुमान मंदिर के बाहर बँटते प्रसाद के लड्डू जैसे भिखारियों की भूख नहीं मिटाते, बस बांटने वाले के लिए स्वर्ग में किसी सीट पर रुमाल बिछा देने का काम करते हैं. वैसे ही ये कम्बल भी हैं.’

    पड़ोसी का मकान बनते समय भूमिपूजन में पंडित जी ने उन्हें नींव में सोने या चांदी का बना हुआ नाग-नागिन का जोड़ा रखने का परामर्श दिया था. इतने महंगे नुस्खे के बावजूद मेरे मध्यमवर्गीय पड़ोसी के चेहरे पर शिकन भी नहीं पडी थी. पूजा के समय देखा फलफूल, अक्षत, रोली के साथ सुई जैसे पतले चांदी के तार को मोड़ कर बनाया हुआ नाग-नागिन का जोड़ा भी पूजा की थाली में बाकायदा था. सच, हम लोग इंसान ही नहीं पशु-पक्षियों, देवी देवताओं तक को भी फुसलाना जानते हैं. चांदी के वे नाग नागिन उस मकान के भावी निवासियों को सर्पदंश से तो क्या बचायेंगे, फिर भी दान में देने के लिए बने ये कम्बल बांटने वालों को जितनी गर्मी देते हैं, उतनी सुरक्षा का एहसास तो शायद दें ही. बहुत कुछ फुलपेज विज्ञापनों में उद्घोषित सरकारी योजनाओं की तरह, जो केवल योजना बनाने वालों का भला करती हैं. इन विज्ञापनों से कभी उनका भला भी हुआ है जिनके लिए वे बनायी जाती हैं?

    बदलता है रंग आसमां कैसे कैसे

    इधर चार पांच दिनों से उनसे भेंट नहीं हुई थी. उस दिन भी वे मिले थे पर सुबह की सैर के लिए रोज़ की तरह साथ नहीं आये. मैंने पूछा ‘क्या दिल्ली के चुनाव में मोदी जी के लिए प्रचार कार्य में व्यस्त हो गए हैं’ तो बोले ‘अरे अब प्रचार करने के लिए बचा ही क्या है. मोदी की सुनामी ने सारे देश को झकझोर कर रख दिया है.दिल्ली देश का दिल है और इसे वह पहले ही से जीते बैठे हैं तभी तो देश पर राज कर रहे हैं. और अब तो सोने में सुहागा मिल गया है. केंद्र में समर्पित मंत्रियों की ज़रुरत को उन्होंने दिल्ली से डाक्टर हर्षवर्धन, सुषमा स्वराज और स्मृति ईरानी जैसे योग्य व्यक्तियों को लेकर पूरा किया. अब दिल्ली को ज़रुरत थी एक कुशल प्रशासक की. भाजपा सरकार के आने पर आप वाले फिर से धरना प्रदर्शन की राजनीति में जुटेंगे. उन्हें संभालने के लिए किरण बेदी जैसी मज़बूत प्रशासक की ही ज़रुरत थी. उन्हें तिहाड़ जेल में एक से बढ़कर एक दबंगों को फिट करने का अनुभव है. एक क्रेन तो वे केवल इस कार्य पर लगा देंगी कि जंतर मंतर जैसी धरने प्रदर्शन वाली जगहों से उस बदनाम नीली वैगन-आर को दूर रखे जो हर धरने पर धरी रहती है. अब देखना सुशासन और प्रशासन मिलकर क्या रंग लाते हैं.’

    मैंने कहा छोडिये, जब आप को चुनाव प्रचार में नहीं लगना है तो आइये हमारे साथ सैर पर चलिए.’ बोले ‘ नहीं भाई, बड़े दिनों से एक मोदी जैकेट सिलवाने की सोच रहा था. अब उसे और टाल नहीं सकता. किरण बेदी के शपथग्रहण समारोह पर वही पहन कर जाऊंगा. कहते कहते उनके हाथ खुद ब खुद उठकर उनकी दाढी पर फिरने लगे. दाढी भी उन्होंने हाल में ही उगाई थी. जीवन भर तो उन्हें क्लीनशेव ही देखा था पर नरेंद्र मोदी की प्रतिछाया बनने के लिए अब दाढी बढ़ाना आवश्यक हो गया था. सीना भी उनका कुल अडतीस इंच का ही है. क्या पता उसे छप्पन इंच का करने के लिए किसी अखाड़े या जिम में भी जाने लगे हों. बहरहाल वे अपनी धुन में मस्त रहे और हम सैर पर उनके बिना ही चले गए.

    आज पूरे पांच दिनों के बाद वे सुबह सैर पर हमारा साथ पाने के लिए अपने घर के सामने मुस्तैद खड़े थे पर बहुत पास आकर ही हम उन्हें पहचान पाए. गले से सर तक मफलर ऐसे लपेट रखा था उन्होंने कि शकल ही नहीं दिख रही थी.पास आये तो हमने कहा ‘अब तो सर्दी जाती रही, ये मफलर क्यूँ लपेट रखा है?’ तो उन्होंने मफलर चेहरे से हटा दिया. पर ये क्या? पिछले कई महीनों से जो दाढी उनके चेहरे की रौनक बढ़ा रही थी वह गायब थी. स्वाभाविक था कि हमारा अगला सवाल उसी के बारे में होता. पर उन्होंने पहले ही सफाई दे डाली. बोले ‘भाई इस कदर बुराई सुन रहा हूँ उनकी वेशभूषा की कि अब मैं किसी कोण से उनके जैसा नहीं दिखना चाहता.’ ये भी एक आश्चर्य की बात थी. कुछ दिन पहले ही राष्ट्रपति ओबामा की अगवानी में प्रधान मंत्री जिन परिधानों में दिखाई पड़े थे उसकी ये सज्जन प्रशंसा करते नहीं अघाते थे. कहते थे ‘बाजारवादी अमरीकियों को प्रभावित करने के लिए ज़रूरी है कि आदमी हमेशा चुस्त दुरुस्त मनभावन वस्त्रों में दिखाई पड़े.राष्ट्रपति ओबामा के काले स्लेटी रंग के परिधान की एकरसता से अमेरिकी नागरिक भी ऊब गए होंगे.’ मैंने पूछ लिया ‘पर आप को तो मोदी जी का वेश विन्यास बहुत पसंद था. अब तक आपकी मोदी जैकेट भी तैयार हो गयी होगी.’ बोले ‘ भले की याद दिलाई तुमने, आज दर्जी के यहाँ से उसे लेना था. अब सोचता हूँ. उसे वहीं पडा रहने दूं. कम से कम सिलाई के पैसे तो बेकार नहीं जायेंगे. भले मुफ्त में किसी प्रशंसक से मिला हो, लाखों रुपयों का सूट सबकी नज़रों में गड़ता है. फिर क्या फायदा महंगे कपडे पहनने से.’

    मेरी जिज्ञासा और बढ़ गयी. पूछा ‘ आप सिर्फ वेश भूषा, शकल सूरत से मोदी जी से अलग हो रहे हैं या उनकी विचारधारा और योजनाओं से भी दूर हो गए हैं. बोले ‘भाई, जहां किरण बेदी जैसे बेकार के लोगों की पूछ हो वहाँ मेरी क्या ज़रुरत. मैं तो कब से कह रहा हूँ दिल्ली डंडा चलाने वाले पुलिसियों को नहीं, विनम्र लोगों को चाहती है. पर मेरी किसी ने न सुनी. पर सच पूछो तो अभी दुविधा में हूँ. बड़े बड़े ‘इल्मी’ भी जल्दबाजी करने से नुक्सान उठा जाते हैं. राजनीति में तुरत निर्णय लेना और कोई निर्णय जल्दी न लेना दोनों ही मुफीद होते हैं. बस वक्त वक्त की बात होती है. तुम्हारे सवाल का जवाब तुरंत देना ठीक नहीं होगा. ज़रा देख लूं बिहार में ऊँट किस करवट बैठता है. स्थिति स्पष्ट होने दो फिर बताता हूँ मेरे क्या विचार हैं.’

    कैसा वसंतोत्सव

    जीवन में अनेकों वसंत देख लेने के बाद भी यदि वसंतोत्सव आकर्षित करता है तो तय नहीं कर पाता हूँ कि इसके लिए अपनी पीठ ठोंकूं या इसे बाजारवाद की विजय समझूं. बहरहाल इतना तो तय है कि चौदह फरवरी आयेगी और यौवन की दहलीज़ पर खड़े लोग हर साल की तरह से पागल हो जाएंगे. उनकी दीवानगी देखकर, कम से कम महानगरों में, बहुतेरे अधेड़ भी उनके रंग में रंग जायेंगे.

    शहरों के कंक्रीट जंगलों में वसंत को खोज पाना तो दुष्कर है पर वसंतोत्सव खूब दीखता है. पंडित भीमसेन जोशी भले अपनी बंदिशों में ‘केतकी, गुलाब ,जूही ,चम्पक बन फूले’ जैसे शब्दों को ढालकर वसंत की मनमोहक तस्वीर बना लें पर वह तस्वीर सजीव तभी हो पाती है जब उनके इस वसंत-अभिनन्दन को बहुत महंगे म्यूज़िक सिस्टम पर आँखें बंद कर के सुना जाए. आँखे बंद करने का अभिप्राय ध्यान लगाने से नहीं है. वे बंद न की जाएँ तो गली में खुलती खिड़की के सामने तन्वंगी डालियों पर लचकते फूलों के गुच्छे नहीं, बिजली और टेलीफोन के तारों की गुंथी हुई वेणी दिखती है.

    इन तंग गलियों से दूर किसी समृद्ध कॉलोनी में किसी अट्टालिका के बीसवें माले के फ़्लैट की खिड़की खोलकर कोई शौक़ीन ‘बसन्ती हवा’ को ढूंढता है तो न तेज़ हवा के झोंके फूली हुई सरसों को गुदगुदाते दीखते हैं, न अल्हड तीसी बत्तीसी दिखाते हुए हवा के साथ थिरकती मिलती है. वे झोंके सिर्फ बेटे की हिन्दी पाठ्यपुस्तक के उन पन्नों को फड़फड़ा देते हैं जिनमे केदारनाथ अग्रवाल की बसन्ती हवा कैद है. उन पन्नो में कैद होने के बावजूद आदत से मजबूर वह शोर मचाती है ‘हवा हूँ हवा, मैं बसन्ती हवा हूँ ‘तो उससे भी ज्यादा जोर से फ़्लैट की मालकिन शोर मचाती है ‘ये खडकी किसने खोल दी. अन्दर सब धूल भर जायेगी, तुरंत खिड़की बंद करो.’ बसन्ती हवा की सारी उमंग समाप्त हो जाती है. फिर वह एयर कंडीशनर के अन्दर गुडी मुडी होकर घुस जाती है. ए सी चलाने के दिन जल्दी ही आनेवाले हैं, तभी हवा बाहर झाँकेगी, सहमी सी कमरे में आ जायेगी. पर चुपचाप चलकर. शोर मचाकर अपने साथ ए सी की भी बदनामी करना उसे अच्छा लगेगा क्या?

    उधर उस संकरी गली वाली खिड़की के अन्दर शायद वैलेंटाइन की लहर नहीं पहुँची है पर इधर बसन्ती हवा चले न चले, उस बीसवें माले के फ़्लैट वाला आशिक अपना क्रेडिट कार्ड संभाले किसी भव्य मॉल की तरफ रुख करेगा. वहाँ पहले इम्पोर्टेड हेयर डाई खरीदेगा. फिर घुसेगा वैलेंटाइन की यशोगाथा सुनाती हुई दुकानों में जहाँ से वह अपनी अधेड़ पत्नी के लिए ए-फोर साइज़ का बड़ा सा कार्ड खरीदेगा जो प्यारा कम और भव्य ज़्यादा होगा. वह कार्ड ही तो चिल्ला चिल्ला कर अंग्रेज़ी में उसकी वैलेंटाइन को वह बात बता सकेगा जो उसे खुद कहनी चाहिए थी, उसके कानों पर बिखरी लटों को हटाते हुए- धीरे से फुसफुसा कर, गुनगुना कर.

    इसके बाद एक महंगी सी भेंट खरीदकर मॉल से बाहर आते हुए उसकी नज़र पड़ेगी अपनी ही बिल्डिंग में रहने वाले किसी नौजवान पर. उससे वह पूछेगा क्या वह भी कोई वैलेंटाइन भेंट खरीदने आया था. बेचारा तरुण घबरा कर कहेगा ‘अरे, कैसी वैलेंटाइन अंकल? अब तो लड़कियों से बात करना तो क्या, उनके पीछे पीछे चलना, उनकी तरफ देखना भी गुनाह हो गया है. मैं तो महीनों पहले से पैसे बचाने शुरू करता था कि अपनी वैलेंटाइन के लिए कोई अच्छी सी भेंट ले सकूँ . पर इस बार जो पैसे बचाए उनसे अपने लिए सन शेड्स खरीद लिए हैं. कम से कम लड़कियों को घूरने के जुर्म में तो नहीं पकड़ा जाउंगा.’

    वह धीरज बंधाते हुए संवेदना के स्वरों में कहेगा ‘ अरे ये तुम लड़कों का नहीं लड़कियों का दुर्भाग्य है बेटा.’ तो वह उच्छ्वास लेकर कहेगा ‘अरे अंकल, दुर्भाग्य लड़के लड़कियों में कोई भेद भाव नहीं करता. हमें तो पिछले साल ही कोर्ट से भी राहत मिल गयी थे कि लड़कियों के चक्कर में परेशान होना बंद कर दें. न सही लडकी, किसी लड़के को ही वैलेंटाइन बना लें. पर सरकार इस प्यार पर जीवन भर के संग-साथ की मुहर लगाने को तैयार नहीं है. अब कहाँ से लायें हर साल नया वैलेंटाइन, कैसे मनाएं वसंतोत्सव?’

    लेख लिखने का बेकार नुस्खा

    बारहवीं कक्षा में ‘हिन्दी मास्साब’ ने लेख लिखने के कुछ सशक्त नुस्खे बताये थे. उन्होंने कई ऐसे वाक्य रटवा दिए थे जिनसे कोई भी लेख आरम्भ हो सकता था. कुछ वाक्य तो ऐसे थे जिनकी बैसाखी लगाकर एक नहीं कई लेख चल पड़ते थे. जैसे ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’ वाले वाक्य से ‘संयुक्त परिवार’’ या ‘परिवार में नारी का महत्व’ जैसे अनेकों विषयों की शुरुआत हो सकती थी.

    देश की किसी भी समस्या पर लेख आरम्भ करने के लिए ‘भारत एक कृषि प्रधान देश है’ मौजूं वाक्य था. कृषि स्वयं एक भारी समस्या थी. फिर कृषकों की समस्याओं की क्या कमी? एक से दूसरी समस्या को जोड़ते हुए कहीं से कहीं पहुंचा जा सकता था. मसलन देश के अनाज भण्डार पंजाब में फसल काटने के बाद बैसाखी के त्यौहार पर जमकर भांगड़ा होता है. कृषिप्रधान होने का ज़िक्र करके लोकनृत्य, लोकसंगीत जिस पर जी चाहे लेख लिख डालिए. फिर जश्न होगा, भांगड़ा होगा तो दारू भी पी जायेगी. लीजिये मदिरापान के दुष्परिणाम पर लेख लिखने का मसाला भी मिल गया. फसल नष्ट हुई और किसानों ने आत्महत्यायें कीं तो उसके भी फायदे थे. ‘आत्महत्या’ विषय पर भी ‘भारत एक कृषिप्रधान देश है’ से लेख का आरम्भ हो सकता है.

    पर अभी बोर्ड परीक्षा की तय्यारी करते एक बच्चे को मैंने ‘भारत एक कृषिप्रधान देश है’ का फार्मूला सुझाया तो उसने पूछा ‘ज़मीन अधिग्रहण कानूनों के चलते भारत कृषिप्रधान रह पायेगा क्या?’

    मैंने कहा, ‘अभी तो है ही. आगे चलकर अधिग्रहित ज़मीन पर नए उद्योग लगेंगे तो नए रास्ते खुल जायेंगे.‘भारत एक उद्योगप्रधान देश है’ से लेख की शुरूआत हो सकेगी.’

    वह कहाँ मानने वाला था. बोला ‘विरोधी दलों के दबाव और अन्ना के आन्दोलन के कारण सारे देश में इसका विरोध होगा तो न उद्योगों के लिए ज़मीन मिलेगी न भारत उद्योगप्रधान बन पायेगा.’

    मैंने झीक कर कहा ‘ठीक है, फिर कृषिप्रधान तो बना रहेगा.’

    वह बोला ‘यही तो मुश्किल है. खेती की आमदनी से तो बड़े किसान, छोटे किसान सब हताश हैं. लगता है भारत न कृषिप्रधान देश रहेगा न उद्योगप्रधान बन पायेगा.’

    मैंने तंग आकर कहा ‘ठीक है, फिर बेकारी का साम्राज्य होगा. बच्चे ‘भारत एक बेकार देश है’ पर लेख लिखेंगे.’ वह मुझे चिढाते हुए बोला ‘आप फिर चूक कर गए. ज़रा सड़कों पर कारों का हुजूम और ट्रैफिक जैम देखिये. भारत “बेकार” कहाँ?’

    मैंने कहा ‘छोडो, तुम्हे लेख लिखना सिखाना मेरे बस का नहीं. उसने कहा ‘ अब जाकर सही बात कही आपने. सोचिये ज़रा, यह ऑब्जेक्टिव पेपर यानी चार में से एक विकल्प चुनने का युग है. जब लेख लिखने के ही दिन लद गए तो सूत्र वाक्य किस काम के?’

    दागियों के “दाग़”

    मुग़लिया सल्तनत के आख़िरी चिराग बहादुर शाह ज़फर, अपने ही शब्दों में, इतने बदनसीब थे कि उन्हें ‘कूए यार’ में आख़िरी वक्त दो ग़ज़ ज़मीन भी नहीं मिल सकी. पर उन्ही के वंश के “दाग़ देहलवी “ इस हताश बादशाह से ऊंचे मनोबल वाले निकले. दिल्ली की सल्तनत, जिसके वे असली कानूनी उत्तराधिकारी थे उनके हाथ नहीं आ सकी. वक्त ने उन्हें इतना झकझोरा कि दिल्ली छोड़कर रामपुर में सरकारी नौकरी करनी पडी. वहां भी टिक नहीं पाए. हैदराबाद दक्षिण जाकर बस जाना पड़ा, जहाँ उनकी शायरी ने ऊंची परवाज़ मारी. पर इस तरह एक जगह से दूसरी जगह भटकने वाले दाग़ शायरी की दुनिया में गुम होकर ज़मीनी सच्चाइयां भूल गए. तभी अपने ऊपर गुज़रते वक्त को पूरी तरह देखने के पहले ही कह बैठे--“और होंगे तेरी बज़्म से उठ जानेवाले, हजरते दाग़ जहां बैठ गए बैठ गए” पर बेचारे दाग़ की घोषणा के पीछे समर्पित प्रेम हिलोरें मार रहा था. यह निष्ठा का उद्घोष था, बेहयाई का नहीं. सौ साल बाद उनकी जिद को गलत लोगों ने थाम लिया.

    आज के दागी मठाधीशों ने “दाग़” तखल्लुस से प्रेरित होकर जीवन में सफलता का मूल मन्त्र मान लिया है कि असली दागी जहां बैठ गए बैठ गए. वे अमानत में खयानत करते हुए पकडे जायेंगे. रेवड़ी बांटते हुए अंधों की तरह अपने ही को (अपनों में बेटे, बेटी, दामाद, सभी शामिल होते हैं )रेवड़ी बांटते हुए दिखाई देंगे. जन गण मंगल के ऊंचे ऊंचे आदर्शों की दुहाई देते हुए किसी संस्था पर कब्ज़ा हासिल करके तबतक शीर्षस्थ बने रहेंगे जब तक उससे हर प्रकार का उचित अनुचित लाभ उठा न लें.ब दनीयती का आरोप लगने पर अपने ही पिछलग्गुओं या स्वयं अपने नियुक्त किये हुए अधीनस्थों को अपनी कारगुजारियों का नीर क्षीर विवेक करने की भारी ज़िम्मेदारी सौंप करके स्वयं समाधिस्थ हो जायेंगे. फिर चाहे सारा देश एक स्वर में मांग करे कि उन्हें वह पद छोड़ देना चाहिए, चाहे अपने सगे भी ये कहने लगें कि अच्छा तब तक के लिए छोड़ दो जब तक जांच में सिद्ध न हो जाए कि तुम स्वयं दूध के धुले हो और तुम्हारे अपने भी कुछ ऐसे बुरे नहीं .पर इनके कानों पर जूँ क्यूँ रेंगने लगी. ’दाग़’ के ही शब्दों में “नतीजा न निकला, थके सब पयामी, वहाँ जाते जाते, यहाँ आते आते’’ और नतीजा निकलता भी कैसे. ये गद्दीनशीं जब होते हैं तो ‘बड़े भाग मानुस तन पाया’ जैसी भावना लेकर सोचते हैं कि अब महापरिनिर्वाण जैसी कोई वस्तु ही गद्दी और उनके बीच आ सकेगी. ’जहां बैठ गए- बैठ गए’ वाली ‘दाग़’ की दी हुई सीख को भला ‘दागियों’ से अधिक कौन मानेगा. जनाब ‘दाग़’ को इसका गुमान होता कि उनकी सोच में आस्था रखने वाले दागी कहलायेंगे तो उन्होंने अपने लिए कोई और तखल्लुस चुन लिया होता .

    मज़े कि बात ये है कि दागियों को विश्वास है कि जो लोग उनकी निष्ठा, ईमानदारी, निष्काम सेवाभावना और त्यागमय जीवन पर शक करते हैं अवश्य ही उन सबका कोई निहित स्वार्थ होगा. तभी उन्हें ख्वाहमख्वाह बदनाम करने के लिए वे जोर जोर से चिल्ला रहे हैं. जोर जोर से चिल्लाना और लोगों का ध्यान किसी भी तरफ आकृष्ट करना उनका धंधा है. जहां समस्या न हो वहाँ समस्या खडी कर देना उनकी व्यावसायिक मजबूरी है. जितनी जोर से चिल्लायेंगे उनकी आवाज़ उतनी ही बिकेगी. फिर चाहे सारे का सारा देश उनकी तरफ इंगित करता हुआ चीत्कार करे कि गद्दी छोड़ दो. दागियों की सोच वही होगी जो दाग़ देहलवी ऐसे ही लोगों के लिए कह गए थे “आइना देखके कहने लगे वो आप ही आप, ऐसे अच्छों की करे कोई बुराई क्यूँकर?”

    पर कभी कभी गद्दी से चिपटकर बैठना दुष्कर हो जाता है. पीढी दर पीढी, गद्दी से चिपके रहना आसान है क्यूंकि इस देश की जनता प्रायः गद्दी को राजगद्दी समझ कर उत्तराधिकारी का जन्मजात अधिकार समझती है. पर जो बेचारे ‘पीढी दर पीढी’ वाली ऊपर से नीचे बहती धारा के प्रवाह में आने की बजाय नीचे से ऊपर ‘सीढी दर सीढी’ चढ़कर सत्ता के द्वार तक पहुंचते हैं वे अक्सर सीढी के सर्वोच्च डंडे की तरफ आती आंच को रोकने के लिए बलि कर दिए जाते हैं .तभी तो छोटे मोटे भ्रष्ट नेताओं और मंत्रियों को पद से अचानक हटा दिए जाने की खबरें भी आने लगी हैं. अब नए नए राजनीति में आये इन पहली पीढी के नेताओं को कितना भी खाएं सब हज़म कर जाने का हुनर कहाँ आता है.एकाध पीढी में इतना दम आता भी नहीं. एक बार फिर बकौल ‘दाग़ देहलवी’ के ही- “नहीं खेल ऐ दाग़, यारों से कह दो, कि आती है उर्दू जुबां आते आते .” उर्दू जुबां की जगह गद्दी से चिपकना कर दीजिये. आशय स्पष्ट हो जाएगा. पर दाग़ की सोच उनकी अपनी शताब्दी तक ही सीमित रह गयी. अगर वाकई दाग़ अपने समय से सौ साल आगे की सोच पाते तो उनका शेर कुछ यूँ होता –“ हजरते दाग जहां बैठ गए बैठ गए, लाख जूते पड़े, ,धक्के मिले पर ऐंठ गए.”