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Ekta ke Akshar

एकता के अक्षर

औरत की व्यथा
***********

क्यूं बेबस बनाया जाता है
एक लङकी को
जन्म लेने से मरने तक
बचपन में पिता का साया
फिर भाईयों ने दबाया
जवान होते होते
कर देते है उसे पराया
पति को संरक्षक बनाकर
ये आभास कराते है
अभी भी तुम स्वतंत्र नही
ये विश्वास दिलाते है
न हो तुम आत्मनिर्भर
मन में सदा रखो ये डर
पंख नही फैला सकती हो
जाना चाहोगी जिधर
न चाहते हुए भी उसे हरदम
भय दिखाया जाता है
इक अनजाना..अनचाहा सा
तय कर दिखाया जाता है
कैसे होगी नारी सशक्त
आत्मविश्वास उसमे जब तक न भरे
कोख मे ही सिखाना पङेगा
कि सामना वो कैसे करे
है भरी दुनिया अगर दरिंदो से
तो उसे भी मजबूत करना होगा
छोड़ दकियानुसी तर्कों को
इक नया संचार भरना होगा
न करो अब निर्बल बेटी को
उसे लङना सिखाओ सब
संघर्ष अपने हक के लिये
करना पङे न जाने कब
न होगी फिर बेटी बोझ किसी पर
ना कोख मे मारी जायेगी
लाचारी और बेबसी मे से
जब ऐसे उबारी जायेगी

मुस्कराहट
*******

एक मुस्कान
बदल देती है
जीवन का आधार
इसलिये इसपर
न करना कोई विचार
मुस्कराता चेहरा
समेट देता है
अपनो का गम
बिखेर देता है खुशियां
आंसू निकलते है कम
एक मुस्कान की किमत
पूछो उस मां से
जो परदेश मे बसे अपने बेटे को
समक्ष देख कर पाती है
जो प्रियसी
अपने प्रीतम के
विरह की दासी है
एक बच्चा सुंकूं मिलता है
मां को करीब देख खिलता है
बहने प्रसन्न हो जाती है
जब भाई की कलाई सजाती है
और भी कितने उदाहरण है
जो मुस्कानो के कारण है
फिर क्यूं मानव तू भटक रहा
हंसने मे क्यू यूं अटक रहा
सुख दुख जीवन के साथी है
उतार चढाव भी सहयात्री है
पर मुस्कान अपनी छोड़ो ना
उलझनो मे खुद को जोङो ना
जीवन यू बीतता जायेगा
प्राणी तू कब हंस पायेगा

करवाचौथ ...
********
क्या ये उपवास
लोटा सकता है ?
उस विधवा के मांग का सिंदूर
जो कुछ दिन पहले
सीमा के पास रह रहे
उस नवेली दुल्हन की
सितारो वाली चुंदङी
उङा कर ले गये
क्या ये उपवास
लोटा सकता है?
उस सुहागन का मांग टीका
जो बिना किसी कारण
शिकार बना
उन दंगो का
जिससे उसका दूर दूर तक
कुछ लेना देना भी न था
क्या ये उपवास
लोटा सकता है?
उस औरत का विश्वास
जो किसी परनारी पर
आंख रख बेठे
अपने पति की वफादारी को
पढ भी नही पाती
क्या ये उपवास
लोटा सकता है
उस बहन का सुहाग
जो गल्ती से पेट की खातिर
सीमा पार कर चल पङे
पर सालो साल
बंदी रहे
बिना किसी अपराध
घुट घुट...तिल तिल कर मरे
क्या ये उपवास
लोटा सकता है?
उस बहन का सिंदूर
जो सीमा पर लङने हेतु भेज गई
अपने सिदूंर को
ताकि महफूज रहै
लाखो बहनो का सिंदूर
करते तो हम सभी है
इस उपवास पर विश्वास
पर ...
क्या ये उपवास
लोटा सकता है?
वो अधूरी आस
जिसके लिये न भूख लगे ना प्यास
बस जिवित रहता है
एक अहसास ...कि
ना छुटे विश्वास

लाज बचालो भारत माँ की
******************

लाज बचालो भारत मां की
अपना कर्तव्य निभाओ
हर तरह से लग रहे कंलक को
पुत्र बनके हटाओ
नही सुरक्षित आज बेटियां
न ही मानव धर्म
बलात्कार और धोखागङी से
भूल रहे हे अपने कर्म
जहां अतिथि माननीय थे
माता पिता थे पूजनीय
वही आजकल दौर चल रहा
कटु और जघन्य
भाई भाई के खून का प्यासा
पङोसियों से न मिलता मन
बाहरी ताकत की न बढे क्यू हिम्मत
जब घर मे ही बढ रहे दुश्मन
भूल चुके हम लोकतंत्र की ताकत
मक्कारों को फतह दिलाते
भय,जातिवाद और लालच मे
अपना मतदान गंवाते
अब भी संभल जा हिन्दुस्तानी
दिखा यहां अपनी मनमानी
समझ अपने कर्तव्यों को
उठा फैंक गंदे द्रव्यों को
कोशिश करे फिर से हम मिलकर
वो सोने की चिङिया बनाने की
हो साख दाख पूरे विश्व मे
उस सतयुगी जमाने की

शादी के बाद का प्रेम
**************

शादी के बाद का प्रेम
मै आज तक समझ नही पाई
यह प्यार है या
जरुरतो और जिम्मेदारियों
मे बंधा रिश्ता
क्यूंकि
पूर्व प्रेम में तो
चाहते कहे बिना ही
पूरी हो जाती थी
सपने देखा बिना ही
सच हो जाते थे
हम तुम सदा
साथ रहने को
तरसते थे
इजहार करने के
हजारो बहाने ढूंढा करते थे
पर शादी के बाद
आज वो प्रेम
आज वो चाहते
खुली आंखों से देखे सपने
साथ बिताने के पलो का समय
सबकुछ होते हुऐ भी पास
कहां खो गया
ये प्यार अब क्यूं
धुंधला हो गया
ये जिम्मेदारियों का असर है
या जरुरतो का उतरता जहर है
सूकूं और तङप के वो पल
न जाने कहां खो गये
क्यू शादी के बाद
हम साथ होकर भी
तन्हा हो गये

काश!अगर तुम कह जाते
*****************

कहा होता अगर
इशारों से
हम वो भाषा भी
समझ जाते
तुम् मेरे हो
सिर्फ मेरे हो
सुनने को कान तरस जाते
रही तङप अब
बाकि मन मे
अधरो से जाम
छलक जाते
होती हे धङकन
तुम बिन मंद
वो खुशी के आंसू
कह जाते
इक बार सनम
बस इक बार
लफ्जों का जादू
चला जाते
हम..हम नही रहते
तेरी कसम
तुम मेरे हो अगर ये
कह जाते

बुजुर्ग
****

घर में बुजुर्ग होना बड़ी किस्मत की बात है
उनके आशीर्वाद में ही खुशियों की सौगात है
उनकी छत्र छाया में जीवन बिताना
उस अद्भुत शक्ति की अपनी करामात है
जहां आदर हो मात पिता का
वहां समृद्धि का बसेरा है
उनकी करनी का ही मानव
इस जहां में फेरा है
जब कभी दिल दुखे उनका हमसे
मानना ईश्वर भी रुठ गया
तजुर्बे और समझदारी का
हमसे नाता टूट गया
करनी गर सफल करनी है तो
न दुखाना कभी उनका मन
पैसा तो कमा लेंगे
पा न सकेंगे अन्तर्धन
माता पिता की सेवा में
जो अपना जीवन बितायेगा
वो प्राणी इस दुनिया में
दौलतमंद कहलायेगा

अनकहे शब्द
*********

नही समझ पाई
उन अनकहे शब्दों को
जो तुम कहना चाहते थे
अपने नयनों की भाषा से
नही जान पाई मैं
हवाओं का वो रुख भी
भेजी थी जो तुमने
मुझतक किसी अभिलाषा से
क्यूं अनजान बनी मे
और नही समझ पाई
उन तथ्यों को
जो तुमने मुझसे जुङकर कहे
ये कोनसी करनी थी मेरी
जो मैँ समझ नही पाई
वो मूक अहसास
जो मन मे थे तुम्हारे
पर पहुच न सके
चाहकर भी दरमियां हमारे
चाहत तो मेरे अंदर भी थी
फिर क्यूं न समझ सकी मैं
तुम्हारी प्रेम भाषा
जो पढ सकती थी
अगर मैँ चाहती

मां
***

मां का गुणगान
करता सारा संसार है
माँ शब्द मे ही
महानता अपार है
अपने असतित्व को
रखकर गिरवी
करती हरदम औलाद की पैरवी
मां के उस रूप को
कहां समझा कोई व्यवहार है
मां शब्द मे ही
महानता अपार है
हर गल्ती को नजरंअदाज कर
बच्चे को इक पल मे ही माफकर
लुटा देती अपना सारा प्यार है
सच कहती हू दोस्तों
मां शब्द मे ही
महानता अपार है

पापा आज भी याद आते है
*****************

आज भी बचपन के
वो लम्है याद दिलाते है
हम उङ रहै हे बेपरवाह
और मजबूत हाथ उठाते है
खुशियों और प्यार भरे
अहसासो मे रहते थे
थे ऊपर से कठोर मगर
दिल मे प्यार रखते थे
अब वो लम्है महज
बस याद बन सताते है
यादों मे रहकर बस गये
पापा आज भी बहुत याद आते है

इंसान बनो
*******

क्यूं तेरी नजर यू गिरती जा रही है
आदमी न बनकर दानवता छा रही है
पराई स्त्री पर नार पर
क्यूं आंख गङाये बेठा है
इंसान कहता है खुद को
पर हेवानियत पर लेटा है
कभी सोचा है इससे नारी
ह्रदय से कितनी आहत होगी
आज जो तू करेगा उस संग्
कल तेरे घर की भी किसी की चाहत होगी
न बन इतना हैवान अब तु
कि नजर न कभी मिला पाये
अपनी बीवी अपनी बेटी की
आंखो से तू गिर जाये
न बना पाये अगर ऐसा तू
तो बस इतना कर लेना
किसी भी औरत को
एक इज्जत की दृष्टि देना
सुधर जा दंभी पुरुष अब
कभी कोई राम तो आयेगा
तेरी इस धृष्टता को
कङवा सबक सिखायेगा

सेंटाक्लोज
*********

इस बार सेंटाक्लाज
तुम लाना ये उपहार
भर देना मानस मन मे
दया भाव और प्यार
झगड़े फसाद को उठाये
वो हर जङ मिटा देना
प्रेम अंहिसा और मैत्री भाव को
हर मन मे बिठा देना
अभी भी चित्कारती है
उन मासूमों की पुकार
जो झगड़े और नफरत से
आतंककियो के हुए शिकार
हर मानव बन बेठा है
अपना दुश्मन खुद ही आज
द्वेष और बदले मे
भूल गया अपने ही काज
जिजस भी आज रो रहा होगा
देख अपनो के हाल बेहाल
शर्मसार कर रहे है
उसके बलिदानो की ढाल
अब बस अपनी पोटली से
निकालना एक ही उपहार
प्यार मोहब्बत से बरसे
हरतरफ भाईचारे की धार

औरत
********

बात बात पर क्यूँ औरत को ताङा जाता है
हर बात पर क्यू
उसकी आत्मा को मारा जाता है
क्यू दागे जाते है
उस पर ही सब सवाल
साध के उसको ही निशाना
क्यू बढाते है बवाल
उसके मां बाप को भी
क्यूं कटघरे मे खङा किया जाता है
तानो मे उनको लेकर
क्यू अपमानित किया जाता है
क्या अपने जिगर के टुकङे को सौंपना
उनकी कोई गल्ती थी
या क्या उनसे अपनी बेटी
खुद से नही पलती थी
असमंजस सी स्थिति है
बङी दुखद परिस्थिति है
औरत के संस्कारो पर
क्यूं सवाल उठता है
सुनाने वाले से पूछो
क्या उसके ये संस्कार पुख्ता है
तरस आता है आज भी मुझे
उन लोगो की इस छोटी सोच पर
दिल को रुला देते है
जो रिश्तो को खरोंच कर
नही समझ पाई अब तक मैं
क्या औरत होना गुनाह है
पति से अपने न जुबां लङाओ
क्यूंकि सिर पर उसकी पनाह है
आखिर कब तक और
औरत को ही सहना होगा
कब तक उसे उन बेतर्क
आसुंओ संग बहना होगा ??

स्वस्थ भारत का निर्माण
****************

आओ मिलकर ढूंढे
हमसब एक सोल्यूशन
स्वच्छ भारत का निर्माण करे
और करे मुक्त प्रदूषण
जन जन की ह्रदय मे
भरे एक अनुशासन
शब्द बनकर न रह जाये
नियम कानून ये भाषण
ट्रेफिक के सिग्नल तोङना
हमारा ही नुकसान
फिर भी ऐसा करके आदमी
बताता खुद को महान
एक आदत ये भी ढाल ले
न तोङेंगे ट्राफिक नियम
चाहे कुछ भी हो जाये
कर्तव्य निभायेंगे हम
मानव शक्ति मिलकर के
दुनिया को दिखा सकती है
है ताकत भाईचारे मे
जो किसी को भी झुका सकती है
धर्म के नाम पर दंगे करके
हम करते अपना नुकसान है
पता नही कैसे मानव समझता
करवा के इसे महान है
हर बहन बेटी को अपना समझकर
करेंगे हम उसका आदर
तो दरिंदगी की मिसाल
झुका देगी अपना सर
माता पिता है परम पूजनीय
उनकी करेंगे हम सेवा
तो ये जन्म क्या ए मनुष्य
हर जन्म सफल हो जायेगा तेरा
बेटी आंगन मे लाती है
लक्ष्मी के कदम
उसके जन्म पर अब
खुशियां मनायेंगे हम
आतिथ्य देवो भव
मानकर
करेंगे सबका सम्मान
देखना भारत विश्व मे
फिर कहलायेगा महान
मान ले कुछ ऐसे तर्क हम
तो सोल्यूशन मिल जायेगा
प्रगतिशील बनने से
फिर हमें कौन रोक पायेगा

पति पत्नि का रिश्ता
*************

बहुत ही खूबसूरत रिश्ता होता हे
इस दुनिया में
पति पत्नी का रिश्ता
जिसमे ना कोइ खून की मिलावट
ना ही किसी चिकनी चुपङी बातो की
सरसराहट
न ही दिखावा
ना ही खुशामदी
बस जैसी है नदियां
वेसे ही बह दी
एक मजबूत धागा
जो जोङे रखता है
अन्तर्मन को अन्तर्मन से
जिसमे झगड़ा भी है प्यार भी
पर जुङे होते है
मन के तार भी
दिल मे उछलते कूदते
किसी द्वंद से
रोज होती है
मुलाकात भी
झगड़े मे प्यार
या प्यार मे झगड़ा
हो जाता है कभी कभी
कुछ ज्यादा ही तगङा
फिर भी
कुछ तो है
जो जोङे रखता है
इक दूजे को
आपसी समझ या नासमझी
कुछ भी कहो
संभाल लेती है इसे

वो रात
******

वो रात कितनी कठिन लगती है
जब नींद आंखो से उङ जाती है
बेबस और बेचारी ये पलके
झपकने को तरस जाती है
व्याकुल सा मन
करता है उथल पुथल
वक्त काटना भी
हो जाता है दुर्बल
मस्तिष्क मे परेशानीया
इतनी जकङ जाती है
कोई बताऐ भला फिर
नींद किसे आती है
असमंजस के भंवर मे 'एकता'
अकेले ही गोते खाते है
परेशानीयो मे दबे
इक झपकी को भी तरस जाते है

नवरात्रे
******

नवरात्रा पर्व मनाते है
देवी को हम रिझाते है
खुद को सर्वश्रेष्ठ दिखा
हवन पूजन कराते है
पर क्या कभी किसी देवी की
मनोस्थिति समझनी चाही
कोख मे ही मारा किसी ने
जब भी वो जन्म नी चाही
या किसी कन्या रूप मे
उसका शोषित हाल हुआ
कर तार तार उसकी इज्जत
इंसानियत बेहाल हुआ
कभी घर कभी बाहर
कहा है कन्या सुरक्षित है
मानवता के न जाने किस रुप मे
छिपे दरिंदे की जीत है
करो भले कितने भी जतन
किसी देवी को मनाने की
हरहाल में रोयेगी वो
इस इंसानियत को खाने की
हटानी पङेगी गंदगी ये
हमको गर उसे मनाना है
एक दो से नही होगा
सबको कदम मिलाना है
नजर को अपनी साफ करके
जो कन्या को देवी समझे
ऐसे सुन्दर अहसास हमे
अब इस धरा पर लाना है
होगा तप पूरा जब ये
ये सोच सुंदर धारण होगी
नवरात्र मनाने की कोशिश
इस बार इसी कारण होगी

स्व्पन से यथार्थ तक
**************

स्व्पन हम सभी देखते है
यथार्थ के भू तल से उठकर
क्यूंकि वो स्व्पन
काल्पनिक होते है
जिसमें वो दुनिया होती है
जो हम चाहते है
जहां कोई दुख ,दर्द नही
बस खुशियां ही खुशियाँ हो
हमारी चाहते हमेँ
जायज लगती है
क्यूंकि हमारी नजर मेँ
वह बिल्कुल सही है
बस यही जिंदगी है जो
हम जीना चाहते है
परन्तु जब जब हम
यथार्थ से टकराते है
खुद को दुखी पाते है
क्यूंकि हमने सिर्फ वही चाहा
जो हमे सही लगा
भूल गये हम कि
जीवन के दो पहलू है
अगर सुख की ख्वाईशेँ है तो
दुख की भी अपनी फरमाईशे है

मुखौटे
******

चेहरे पर मुखोटे
लगाते है वो
कहलाते है अपने
और सताते भी है वो
दिल के करीब रहके
यही नसीब कहके
दिल के जख्म
बढाते है वो
नही जान पाते
कब दूर हो गये
फांसले कब बने
क्यू मजबूर हो गये
वो भ्रम था हमारा
जो चूर हो गया
कल तक था जो अजीज
अब क्यू दूर हो गया
काश इंसा को पहचानने की
गुण हम मे होते
तो आज हम यूं
झर झर लङीया न रोते
किस्मत का देखो होता यही खेल है
अपना केसे होगा
जब नही कोई मेल है
बस ये बात 'एकता'
अब समझ आ गई
अपनो की चाहत खाली
बातो मे समा गई

बाल भ्रूण हत्या
*********

बाल भ्रूण हत्या
कहते है पाप है
फिर क्यूं
किया जाता है
जानबूझकर ये पाप
क्यूं करते हो
उस अजन्मी..असहाय कन्या का
विनाश
क्या प्रकृति से लङने का
भगवान का फैसले बदलने का
सामर्थ्य समझते हो
जो
इस जघन्य कृत्य को
बेधङक करते हो
कभी सोचा है
ये कुकर्म करने से पहले
कि हम क्या करने जा रहै है
उस अलौकिक शक्ति का
फैसला बदलने जा रहै है
खुद की जिंदगी तो सुधरती नही
पर किसी और के जन्म का
निर्णय लिये जा रहै है
भय मिट गया है आज
करनी से मनुष्य अपनी नही आता बाज
खुद को खुदा समझने वाले
सब यहीं धरा रह जायेगा
अपने इन पापों का लेखा
प्राणी तु यहीं पायेगा
मत हो इतना अंधकार मे गुम
न बिगाङो अपनी करनी तुम
जीवन तो खुशी से काट लोगे
पर आखिरी पङाव मे
ए मानव !
तु कहां से मुक्ति पायेगा

सोशल साईट्स की दुनिया
*****************

इस सोशल साईट्स की दुनिया ने
न जाने क्या कर दिया
अन्जानो से दोस्ती तो करवाई
पर अपनो से दूर कर दिया
आज इनके बिना जीवन जैसे
व्यर्थ लगता है
कैसै कहै अब इसमे ही
अर्थ लगता है
वक्त के साथ
रिश्ते खो रहै है
अपने बेगाने और..
बेगाने अपने हो रहै है
बच्चों पर ध्यान नही
घर भी बेहाल रहता है
ना अब सामाजिक रुचियों का
ना ही खाने का ख्याल रहता है
बच्चे हो या बड़े
सभी की नब्ज ये पकङे है
लगभग समाज के हर दायरे
को ये बिमारी जकड़े है
मै भी अछूती नही हू
अब इस रोग से
लगता है शनि जुड़ा है
मेरे भी किसी योग से
पर क्या ये दायरा
यही सिमट रह जायेगा
हर रिश्ते की महत्ता
फिर इंसान कैसे समझ पायेगा
पापा का फोन
मम्मी की चेटिंग
बच्चों की बढ रही है
इससे जो डेटिंग
कही न कही उस पर रोक लगानी होगी
सामाजिक महत्ताऐं
अब वापस पढानी होगी
वर्ना ये ज्ञान न जाने
किस और ले जायेगा
समय की रफ्तार के साथ
दूरी अपनो से तय करायेगा

प्रेम की डोर
********

जब प्रेम की ङोर बढती जाती है
और
बढती जाती है
तो जिंदगी
उलझ सी जाती है
क्यूकि
हमारी अपेक्षाएँ
आकांक्षाए
और...चाहते
भी तो साथ बढती है
हद से ज्यादा
इनका बढना भी
भ्रमित कर देती है
रिश्तों को...
हम आज रिश्तो मे
इतने स्वार्थी हो गये है
कि..
अपने आत्म सम्मान को भी
गिरवी रख छोङा है हमने...
अब इस भंवर से
निकलने के लिये
रिश्तों की ङोरी मे
और बढते जाना
उम्मीदों की आस मे
और छलते जाना
क्या ये सही है ??

बचपन का इतवार
************

आज सुबह सुबह ही
याद आ गया
बचपन का वो इतवार
आराम से उठना
अपनी मनमर्जी के साथ
उठते ही मां को अपनी
पूरी दिनचर्या बताना
क्या क्या मुझे खाना है
और क्या पहनना
आज ना ही कोई पढाई
और ना ही चैनल बदलना
बङे रोब से कहती थी
मां अपने हाथो से खिलाओ
पापा मेरी खातिर आप घोङा बन जाओ
भैया आप मेरा थोङा सा होमवर्क कर दो
दीदी मेरे लिये उस पङोसिन सहेली से लङ दो
दादाजी के साथ
आज घुमने जाऊंगी
ढेर सारी चोकलेटे और आईस्क्रीम खाऊंगी
अपनी सहेलियो पर मै
अपना रोब जमाती थी
हर इतवार उन्है अपने घर बुलाती थी
उस सुहानी सुबह का
स्मरण कर रही थी
तभी सुना मेरी बेटी
कुछ मुझसे कह रही थी
मम्मा आप ने टीवी पर भजन क्यू लगाया
मेरी नींद को समय से
पहले क्यू खुलवाया
अब जल्दी से मेरे लिये
कुछ अच्छा पकाओ
ये दाल चावल और रोटी
किसी और को खिलाओ
पापा को बोलो आज मे
कही बाहर जाऊंगी
अपने दोस्तो के संग
ये संडे मनाऊँगी
दीदी को बोलो
मेरी जासूसी ना करे
दोस्तो के बीच मेरे
अपनी टांग न धरे
भैया अपने काम से काम ही रखे
मुझसे मेरी पढाई का जिक्र ना करे
और मे दादी के संग मे कही नही जाने वाली
मेरी ये मैं छुट्टी नही यूही बिताने वाली
बाते सुन रही थी बेटी की
मै बिना पलक झुकाऐं
ऐसी परवरिश नही थी मेरी
ये गुण कहा से आये
क्या स्वतंत्रता के नाम पर
हम इतने आगे बढ गये
कि अपनी संस्कृति सभ्यता को
यू हीन कर गये
एक वो इतवार था
जिसे हम जीते थे
इक आज ये संडे है
जिसे सिर्फ जी ते है
पुस्तकें
******

पुस्तकें
सच्ची साथी होती है
उम्र भर की
कभी
साथ नही छोङती
कभी हाथ नही छोङती
ये जीवन मे
सही मार्ग दिखाती है
और ज्ञान भी बढाती है
इन्ही पुस्तकों ने
गीता,रामायण रची है
जिससे आज भी
संस्कारों की छवि बसी है
पुस्तकें वो मार्गदर्शक है
जो सही चुनो तो
व्यक्तित्व निखारती है
गलत चुनो तो
भविष्य बिगाङती है
स्वभाव
******

स्वभाव मनुष्य का
व्यक्तित्व दिखाता है
हर इंसान दुनिया मे
अलग स्वभाव पाता है
मदु स्वभाव जहां
आकर्षित करता है
कटु वहां ही विचलित करता है
इंसान जाना जाता है
अपने स्वभाव से
जान पाते हे सभी
उसके हाव भाव से
ये स्वभाव ही है जो
शिखर तक पहुचाता है
और यहीं स्वभाव हमें
मिट्टी मे भी मिलाता है
मधुरता अपने आप मे
एक पहचान देती है
कटुता निर्बलता को
झट से भांप लेती है
स्नैह और संस्कार
जहां अपनी पहचान बताते है
कङवापन वहीं हमारा
देखो मान घटाते है
कोशिश करे स्वभाव मे अपनी
ऐसी शान ले आये
जाते जाते दुनिया को
इक पहचान दे जाये

नाम - एकता सारदा
पता - B-601, रवि दर्शन अपार्टमेंट,
अमीधारा अपार्टमेंट के पास, सिटी लाईट
सूरत (गुजरात)
फोन न.-8905476957
सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन
कई पत्र पत्रिकाओं में रचनाऐं प्रकाशित
प्रकाशित सांझा काव्य संग्रह - स्वप्न सृजन, अपनी-अपनी धरती ,अपना-अपना आसमान ,अपने-अपने सपने ,सहोदरी सोपान -१,सृजन सागर, सिसकियां
'माहेश्वरी एकता' पत्रिका द्वारा साहित्य सम्मान प्राप्त, भाषा सहोदरी हिन्दी द्वारा सम्मानित
ektasarda3333@gmail.com

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