Dand Pushpendra Singh Gautam द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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Dand

दंड

राकेश के पिता का गतवर्ष देहांत हो गया, माताजी तो पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं। पिता के देहांत के बाद घर में राकेश के अलावा उसकी पत्नी, पांच बेटियां, और तेरह वर्ष का छोटा भाई रंजीत ही रह गए। घर के बड़े लोगों में केवल राकेश की ताई शीला ही बची थीं, उनके कोई संतान न थी और संतान न होने के कारण जो भी उनके पास था सब कुछ अंततः राकेश और उसके भाई को ही मिलना तय था, इसलिए राकेश की पत्नी रज्जो उनका अच्छे से ख्याल रखती थी। ताई खाना तो रज्जो के यहां खाती थीं पर रज्जो के घर से सटे हुए अपने घर में अकेली ही रहती थीं।

राकेश स्वभाव से बहुत ही विनम्र था, बहुत मेहनती भी था परंतु उसमें एक अवगुण था, वह कभी कभी शराब पीकर पूरी बस्ती में हंगामा करता था। आस पड़ोस के लोग उसके इस व्यवहार से हैरान होते क्योंकि नशा उतरने के बाद उसका वही पुराना विनम्र स्वभाव दिखाई देता। घर में बड़ा होने के कारण वो घर का मुखिया और इकलौता पालनहार था। पिता भी शराब के वजह से चल बसे, उसी लत का शिकार राकेश हो गया। जितना कमाता सब परिवार के भरण-पोषण और शराब में खर्च हो जाता। बच्चों की पढ़ाई तो दूर उन्हें पहनने को ठीक से कपड़े तक नसीब न होते। पांच बेटियों और एक छोटे भाई को पालना बड़ा मुश्किल काम था। बड़ी बेटी के लिए कभी जो कपड़े ख़रीदे जाते वे तब तक पहने जाते जब तक की जवाब न दे दें, बड़ी के कपडे जब उसे छोटे पड़ जाते तो उस कपडे को उससे छोटी पहनती फिर उससे छोटी पहनती यही क्रम चलता रहता।

मनुष्य के गरीब होने के पीछे अनेक कारण होते हैं, कभी परिस्थितियां ऐसी बनती हैं तो कभी वह स्वयं जाने अनजाने में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करता है। अज्ञानतावश वह स्वयं को इनका दास बना लेता है। संतान को भगवान की देन मानकर बच्चों की लंबी कतार खड़ी कर लेता है, फलस्वरूप परिवार में आश्रितों की संख्या बढ़ने लगती है, फिर मनुष्य का जीवन इन आश्रितों के लिए भोजन खिलाने और फिर उनकी शादियां कराने में ही निकल जाता है, बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। इनका वौद्धिक विकास नहीं हो पता, इनकी शिक्षा बस यहीं तक सीमित रह जाती है, कि यदि लड़का हुआ तो मजदूरी में लगा दिया ताकि कुछ आर्थिक मदद मिल सके और यदि लड़की हुई तो वह बस घर का कामकाज सीखे, आखिर उसे पराये घर जाने के अलावा और करना ही क्या है। यही मानसिकता पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। इसके अतिरिक्त शराब, जुआ और अन्धविश्वास ने समाज के एक बहुत बड़े तबके की आर्थिक रूप से कमर तोड़ रखी है। राकेश का परिवार भी इसी समाज का हिस्सा था।

दोनों भाइयों के हिस्से मिलाकर एक बीघा खेत था जो कि अभी संयुक्त था, राकेश इसी खेत में थोड़ी बहुत फसल उगा लेता तथा बाकी समय में दूसरों के खेतों में मजदूरी करता। जब खेतों में काम न होता तो अनाज के सरकारी गोदाम पर पल्लेदारी का काम भी कर लेता। साल भर में मुश्किल से कोई दिन ऐसा होता होगा जब राकेश घर में खाली बैठता हो, उसके बहुत ही मेहनती और ईमानदार होने की वजह से उसे काम की कोई कमी न थी।

राकेश की पत्नि रज्जो सीधी-सादी थी, जितना कह दिया गया उतना ही कर लिया, अपनी बुद्धि का प्रयोग बहुत ही कम करती थी। पर राकेश की ताई शीला बहुत ही तेज़ थीं, पूरी बस्ती में कोई भी स्त्री ऐसी न थी जिससे उनकी लड़ाई न हुई हो। राकेश की पत्नि से भी कई बार लड़ाई हुई पर वो चुप हो जाती थी इसलिए शीला ताई को भी शांत होना पड़ता। राकेश का छोटा भाई रंजीत ही था जिससे शीला ताई स्नेह का भाव रखती थीं।

रंजीत की आयु अब पंद्रह वर्ष हो चुकी थी, उसकी उम्र के लड़के 'कोल्डस्टोर' में काम करने जाते थे पर वह सारा दिन अपनी उम्र से बड़े आवारा लड़कों के साथ घूमता रहता। ये लड़के छोटी मोटी चोरियों को अंजाम देते थे और रंजीत भी इन चोरियों में शामिल होने लगा। राह चलती लड़कियों को छेड़ना तो इनके लिए मनोरंजन का साधन मात्र था, इस काम में इनको कोई बुराई नज़र नहीं आती थी। एक दिन राजेश ने रंजीत को 'स्कूल' जाती हुई एक लड़की पर अभद्र टिप्पणी करते हुए सुन लिया, उसने वहीं पर रंजीत को पकड़ा और मारते-पीटते हुए घर लाया। उसके घर में पांच बेटियां थीं वो बेटियों का बाप होने का दर्द भलीभांति जानता था। समाज में छिपे हवस के भेड़ियों का डर लड़की के पिता को हमेशा बना रहता है। आज राकेश अपने भाई की इस हरकत से बहुत आहत हुआ और अगले दिन से ही उसको अपने साथ मजदूरी करने ले जाने लगा।

दिन भर परिश्रम करने के कारण रंजीत थक जाता था और फिर घर आकर खाना खाकर सो जाता था। रंजीत ने इससे पहले कभी काम तो किया नही था, एकदम से काम पड़ा तो उसकी सेहत पर असर पड़ने लगा, शरीर पहले से कमजोर हो गया था।अब उसका उन लड़कों से मिलना जुलना भी कम हो गया था। शीला ताई को उसकी ऐसी हालात देखकर तरस आता, उन्होंने एक दिन राकेश से लड़ झगड़कर रंजीत का काम पर जाना बंद करवा दिया। उसके बाद कुछ दिन तक तो सब सही रहा पर कहते हैं न खाली दिमाग शैतान का घर होता है, रंजीत के दिमाग में फिर से खुराफाती विचार आने लगे, और फिर से उसका अपने पुराने दोस्तों के साथ मिलकर चोरी-चकारी और लफंगई का काम शुरू हो गया। पिछली बार पकड़ जाने के बाद से वह सतर्क भी हो गया था। पर छोटे से कस्बे में कोई भी बात देर तक छुपती नहीं है, रंजीत के कारनामों की भनक जक राकेश को लगी तो उसने ताई को ख़ूब खरी-खोटी सुनाई, और रंजीत की शादी कर देने की बात कही।

जल्दी से लड़की देखकर रंजीत का विवाह कर दिया गया। लड़की के माता-पिता तो गरीब और सीधे ही थे, पर उसके मामा पक्ष के लोग राजनीति में सक्रिय थे। लड़की बचपन से ननिहाल में ही रही थी और वहीं के तौर तरीके सीखकर आई थी। विवाह के उपरांत कुछ महीनों तक तो सब सही से चलता रहा पर अब छोटी छोटी बातों पर झगड़े होने लगे। दरअसल झगड़े की शुरुआत हुई रंजीत के दहेज़ में आई भैंस के दूध के कारण। राजेश की पत्नि भैंस की देखभाल करती थी, उसे चारा देना, दुहना, गोबर इकट्ठा करके उसको खलिहान में ले जाकर उपले बनाना। उस बेचारी को यह लालच था कि उसके बच्चों को पीने को दूध मिल जाता है। पर छोटी बहू मंजरी को ये बात पसंद न आई, वह चाहती थी की दूध को बेचकर कुछ पैसे कमाए जाएं तो उसका भला होगा पर भैंस को एक बार चारा डालने में उसकी जान निकलती थी।

छोटी बहू मंजरी को रज्जो और उसके बच्चे फूटी आँख न सुहाते थे, पर उसकी शीला ताई के साथ खूब बनती थी। असल में राकेश की पत्नि की बुराई करना और उपहास करना ही इन दोनों का सबसे प्रिय काम हो गया था। सासु माँ के सानिध्य में रहकर छोटी बहू मंजरी कामचोर होने क साथ ही साथ उद्दण्ड भी हो गयी। पहले शीला ताई अकेली थीं अब उन्हें साथी भी मिल गई पूरी बस्ती में मंजरी प्रसिद्ध हो गई। कभी नाली की सफाई को लेकर तो कभी बच्चों की वजह से आये दिन इन दोनों के सबसे झगड़े होते रहते थे।

अब रंजीत भी काम करने जाने लगा था, एक शाम मंजरी ने रंजीत से कहा, "मैं अब दीदी के साथ साझे में न रह पाऊंगी, इस घर में मेरा दम घुटता है।"

"अरे चाहता तो मै भी यही हूँ, पर हम रहेंगे कहाँ?" रंजीत ने उदास होकर कहा।

"हम ताई के साथ रहेंगे, मैंने उनसे बात कर ली है। वैसे भी हमारे अलावा उनका इस दुनियां में है ही कौन?" मंजरी के इस एक वाक्य में कई सारे स्वार्थ निहित थे।

अगले ही दिन रंजीत ने बड़े भाई राकेश को अपना फैसला सुना दिया। राकेश की आँखों में आंसू आ गए पिता की मृत्यु के पश्चात किस तरह से उसने रंजीत को बेटे की तरह पाला था सारी घटनाएं एक एक करके चलचित्र की भांति नजर आने लगीं पर वह भाई को रोकने तक का साहस नहीं कर पाया। उसी रात राकेश ने बहुत शराब पी और घर आकर अपनी पत्नि को पीटा अपनी बेटियों के भी एक दो थप्पड़ जड़ दिए। आदमी का गुस्सा हमेशा असहाय पर ही बाहर निकलता है फिर चाहे वह पत्नि हो, बच्चे हों या फिर कोई अपने से कमजोर आदमी। बेजुबान पशुओं को मै इस वर्ग में नहीं रखता क्योंकि ये तो अंत में आते हैं सबके कोप भाजन का शिकार ये भोले-भाले पशु ही तो होते हैं। पति से पिटने के बाद रज्जो ने आव देखा न ताव बस पास में पड़ी लाठी उठाकर सारा गुस्सा सामने बंधी हुई रंजीत की भैंस के ऊपर निकाल दिया। ससुराल में लड़की को सबसे प्रिय वे वस्तुएं होती हैं जो उसे मायके से मिलती हैं। जब मंजरी ने भैंस की पिटाई की बात सुनी फिर तो उस रात मंजरी और रज्जो के बीच खूब देर तक मल्लयुद्ध हुआ शीला ताई भी बीच-बीच में मौका मिलते ही रज्जो पर टूट पड़ती थीं, और इस मल्लयुद्ध का सूत्रधार शराब के नशे में चूर, दुनियां से बेखबर, राकेश बाहर सड़क पर पड़ा हुआ उल्टियां मार रहा था।

देर रात को रंजीत जब घर आया तो मंजरी और ताई ने उसके खूब कान भरे, मंजरी बोली,"उस डायन रज्जो और उसकी बेटियों ने मिलकर मुझे बहुत पीटा अगर ताई सही समय पर न पहुंचती तो तुम्हें आज मेरी लाश ही देखने को मिलती"

ताई ने भी मंजरी के सुर में सुर मिलाया, "हाँ बेटा मंजरी के तो बाल ही नोचे डाल रही थी डायन।"

"इसीलिए तो भगवान ने सौत को बेटा नहीं दिया। वंश नहीं चलेगा चुड़ैल का।" मंजरी ने फिर से ज़हर उगला।

रंजीत आग बबूला हो रहा था, रज्जो के घर जाकर जी भरकर गालियां देने लगा परंतु प्रत्युत्तर न मिलने पर वापस आ गया। अगली सुबह जब राजेश को होश आया तो रज्जो ने उसे रात की पूरी कहानी सुना दी। इधर सुबह होते ही रंजीत लड़ने को पहुंच गया पर भाई के तेवर देखकर उसने वापस आने में ही अपनी भलाई समझी। जैसे ही वह वापस जाने लगा तभी राकेश ने उसे बुलाया और अपना पारा नीचे उतारकर उसे बड़े प्यार से समझाने लगा की भाइयों के बीच ऐसी दीवार मत खड़ी होने दे जिससे बाद में हानि हो, भाई का ठंडा दिमाग देखकर रंजीत बोला, "इस घर का हिस्सा बंटवारा कर लो साथ ही जमीन का भी कर लो।"

राकेश बोला, "जमीन का तो ठीक है पर घर का बंटवारा क्यों करना है, तू वो वाला घर ले ले मैं इसे ले लेता हूँ, वैसे भी वो बड़ा घर है फिर भी तू ही रख उसे। सही है न?"

"ठीक है।"

रंजीत बड़ा घर पाकर बहुत खुश था, जल्दी से उठा और मंजरी को खबर सुना दी। पर यह क्या मंजरी तो उस पर बरस पड़ी। माथा ठोकते हुए बोली,

"हे भगवान! मेरी तो किस्मत ही फूटी थी, जो इस मूर्ख के संग फेरे लेने पड़े।"

रंजीत अपनी पत्नि की इस बात में निहित अर्थ को समझने की कोशिश कर रहा था, मंजरी ने पति के मन के भाव को समझा और उसे अपने पास बुलाकर इधर उधर अपनी पैनी नज़र से देखा और सुनिश्चित कर लिया कि शीला ताई पास में तो नहीं हैं, फिर बोली, "तुम इतने मूर्ख हो मैं यह न जानती थी, भला मैं क्या पगली हूँ जो सारा आराम छोड़कर अलग रहने लगी, वो करती तो रहती थी सारा काम, मैंने तो दूर की सोची थी इसलिए अलग हुई।"

"सीधे से बोल मै समझा नहीं।" रंजीत बोला।

"देखो ताई तो कुछ सालों की मेहमान हैं अगर हम ताई के साथ रहेंगे तो उनका सारा माल हमारा होगा, यह घर भी और उनकी जमीन भी।" मंजरी ने समझाने की कोशिश की।

"पर भइया ने तो खुद ही यह घर हमें दे दिया है, तूने कौनसी नई बात कह दी?" रंजीत ने संदेहवश पूछा।

"हां पर यह घर तो ताई का है, वे इसे अपनी मर्जी से हमें देंगी, पर वो घर तो ससुरजी के नाम पर है न? तो उस घर पर भी तो हमारा हक़ बनता है न? सोचो हमारे पास उनसे भी अधिक जमीन होगी बड़ा घर होगा। इसी वजह से मैंने ताई का साथ पकड़ा था। अब समझे?" बुद्धिमत्ता के इस शानदार प्रदर्शन से मंजरी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान बिखर गई।

"सच में आज समझ आया कि तू कितनी समझदार है, मैं अभी भइया से बोलने जा रहा हूँ।" इतना कहकर वहां से भाई के घर चला गया।

राकेश के घर जाकर बोला, "भइया बंटवारा गलत हुआ है, पहले पिता जी की संपत्ति का बंटवारा करो। ताई की संपत्ति से क्या मतलब है, कल को उन्होंने अपना घर किसी और को दे दिया तो मेरा क्या होगा?"

राकेश बड़ा अचंभित हुआ क्योंकि यह तो पहले से ही तय था कि ताई की सारी संपत्ति तो इन दोनों भाइयों को ही मिलनी थी। फिर भी बड़ी ही शालीनता से बोला, "तेरी बात मान लेता हूँ, मैं ताई की जमीन में हिस्सा नहीं लूंगा पर भाई मेरी बात समझ मेरा परिवार बड़ा है, यह घर मेरे पास ही रहने दे।"

पर रंजीत के मन में लालच था, उसने एक न सुनी बोला," कल पूरी बस्ती के सामने बंटवारा होगा, बड़े हो तो क्या मेरा हिस्सा खा जाओगे?" फिर गालियां देते हुए अपने घर चला गया।

छोटे भाई के ऐसे व्यवहार से राकेश आहत था, सारा दिन उसका काम में मन नहीं लगा। शाम होने तक उसका मन बहुत ही अशांत हो चुका था, काम ख़त्म होते ही सीधा शराब के ठेके पर पहुँच गया। आज उसने जितनी शराब पी उतनी कभी न पी थी, पर शराब थी या पानी उसे चढ़ ही नहीं रही थी। जेब के सारे रूपए खर्च हो गए तो उसने लड़खड़ाते हुए क़दमों से घर की ओर रुख किया। घर पहुंचकर उसने कल वाली कहानी को दोहराना शुरू कर दिया। भाई को गालियां देना शुरू कर दिया, उसे लड़ने के लिए ललकारने लगा।

मंजरी बड़ी ही तेज़ थी और आधुनिक युग में 'मोबाईल फ़ोन' के आ जाने से संचार के क्षेत्र में जो क्रांति आई है उसका उसने पूरा लाभ उठाया। राकेश का यह रौद्र रूप देखकर तुरंत अपने मामाओं को बुला लिया। चार-पांच लोग तीन दुपहिया वाहनों पर सवार होकर आए और आते ही बिना देरी किए राकेश पर लिपट पड़े और उसे बहुत पीटा। जब तक बस्ती वाले राकेश को बचाते वे लोग अपना काम कर चुके थे। बस्ती के लोगों को एकत्रित होता देख वे लोग वहां से फरार हो गए।

इधर राकेश की बुरी तरह से पिटाई हो चुकी थी, बस्ती के कुछ सम्मानित व्यक्तियों ने सलाह दी की पुलिस के पास जाकर इन सबके खिलाफ 'रिपोर्ट' लिखवा दे, कुछ लोग साथ चलने को भी तैयार हो गए। राकेश का नशा काफूर हो चूका था, तीन चार लोगों के साथ पैदल ही पुलिस चौकी की ओर चल दिया। वहां पहुंचकर देखा तो वहां का नज़ारा तो दूसरी ही कहानी बयान कर रहा था।

मंजरी कोतवाल के सामने बैठी रो रही थी, उसके बाल खुले हुए थे, कुर्ती की एक बांह का कपड़ा फटा हुआ था, कपडों पर मिट्टी लगी हुई थी और गर्दन पर नाखूनों के निशान थे जो रक्त की लालिमा से लाल होकर स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। राकेश को देखते ही जोर से दहाड़ते हुए बोली,

"यही है वो कमीना जिसने मेरी आबरू लूटने की कोशिश की है, मै इसे आज ज़िंदा नहीं छोडूंगी।"

जब तक कोई उसे पकड़ पाता तब तक तो उसने राकेश के गालों पर दो तीन थप्पड़ मार दिए। सिपाहियों ने मंजरी को पकड़कर शांति से बैठाया।

कोतवाल साहब ने राकेश से कहा, "अच्छा हुआ तू खुद ही यहाँ आ गया वरना घर से पकड़कर लाना पड़ता।"

फिर राकेश के पास खड़े रतनलाल जोशी को देखकर पूछने लगे, "अरे जोशी जी इतनी रात को आपका इस वक़्त कैसे आना हुआ ? कोई खास वजह?"

जोशी जी बड़े ही सम्मानित व्यक्ति थे और पुलिस वालों से उनका बहुत मेलजोल था। कोतवाल साहब को एकांत में बाहर बुलाकर ले गए और पूरा मामला सुना दिया। कोतवाल साहब समझ गए की सारा मामला बंटवारे का है। "पर इस लड़की का क्या करूँ जो झूठे आरोप लगा रही है, मुझे 'एफ आई आर' तो लिखनी ही पड़ेगी।" कोतवाल साहब बोले।

"आप कैसे भी करके दोनों पक्षों में समझौता करवा दो, गरीब आदमी है पांच बेटियां हैं इसकी, इसको तो कुदरत ने ही मार डाला है, अकेला कमाने वाला है, अगर यह 'जेल' चला गया तो पूरा परिवार भूखों मर जाएगा।" जोशी जी ने कोतवाल साहब को राकेश की पारिवारिक स्थिति से अवगत कराया।

"ठीक है। मै समझौता करवाने की कोशिश करता हूँ, पर जोशी जी आप तो जानते ही हो यह काम कितना 'रिस्की' है। अगर ऊपर तक बात पहुंच गयी तो मेरी नौकरी तो खतरे में पड़ जायेगी।" कोतवाल साहब बोले।

"भला समझौता हो जाने के बाद कैसा 'रिस्क'?"

"जोशी जी मान लो कल को इस लड़की ने कह दिया कि मैंने डरा धमका कर ज़बरदस्ती समझौता करवाया है, फिर तो आप जानते ही हैं क्या होगा। हमें ऊपर तक पैसा देना पड़ता है, आप तो खुद ही इतने समझदार हैं।" कोतवाल साहब ने समझाया।

"कितना रुपया लगेगा?" जोशी जी ने पूछा।

"आप बस दस हज़ार ही दिलवा दीजिए।"

"दस तो बहुत अधिक हैं कोतवाल साहब। गरीब आदमी है कहां से देगा इतनी बड़ी रकम। कुछ कम कर देते।"

"आपकी बात का मान रख रहा हूँ, आठ हज़ार से कम न हो पायेगा। आपके कहने पर अपना हिस्सा छोड़ रहा हूँ।"

"कोतवाल साहब किसी और 'केस' में कमी पूरी करवा दूंगा, यह मामला पांच हज़ार में 'फाइनल' करो।"

"ठीक है, अब मै आपसे ऊपर तो हो नहीं जाऊंगा, आपने स्वयं कह दिया तो अब मै कुछ न बोलुंगा।" कोतवाल साहब अच्छे से जानते थे कि जोशी जी की बात टालना अपना नुकसान करना था।

अंदर जाकर कोतवाल साहब ने राकेश को बाहर भेज दिया और मंजरी के पक्ष के लोगों से बात करने लगे। उनको डराया धमकाया और बोले "मै अच्छे से जानता हूँ कि तुम्हारा पूरा 'ड्रामा' झूठा है। तुम सबने उसे घर जाकर पीट लिया,पूरी बस्ती गवाह है, तुम सब के सब, एक व्यक्ति को सामूहिक रूप से मिलकर पीटने, झूठा 'केस' करने और पुलिस को गुमराह करने जैसे अपराधों में 'जेल' की हवा खाओगे।"

"तो अब क्या करें साहब?" रंजीत ने पूछा।

"समझौता कर लो। मै सब संभाल लूंगा, अब तुमने हमें गुमराह करने की कोशिश की है और हमारा समय बर्बाद किया है तो तुम लोगों को दंड तो मिलेगा ही।" कोतवाल साहब ने कहा।

"कितना रुपया लगेगा ?" मंजरी के मामा ने पूछा।

"दस हज़ार।"

"इतनी छोटी सी बात के दस हज़ार ? आप जानते हैं मै कौन हूँ? आपकी वर्दी उतरवा दुंगा।" मंजरी के मामा ने राजनैतिक चाल चलने की कोशिश की।

इतना सुनते ही कोतवाल साहब ने मामा के गाल पर जोर से एक थप्पड़ दिया। त्यौरियां चढ़ाकर बोले "बाकी सब बाद में देखा जाएगा, पहले तुझे ही एक पुलिसकर्मी से अभद्रता और सरकारी काम में रूकावट डालने के 'केस' में अंदर करता हूँ।"

एक ही थप्पड़ में मामा की सारी राजनीति निकल गयी और माफ़ी मांगने लगे। कोतवाल साहब ने मंजरी से कहा, "जा दस हज़ार रूपये ले आ और इन सबको छुड़ाकर ले जा।"

दोनों भाइयों में समझौता हो गया। दोनों ने क़र्ज़ लेकर कोतवाल साहब को दंड स्वरूप पंद्रह हज़ार रूपए दे दिए। उधार भी ब्याज पर लिया था। दैनिक मजदूर के पास धनसंचय कहां हो पाता है, और जब इतना बड़ा परिवार हो तो मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं। दोनों भाई रुपया जमा नहीं कर पा रहे थे और इधर ब्याज भी तेजी से बढ़ता जा रहा था। दोनों के सामने जमीन बेचने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा, तब दोनों ने फैसला किया कि दोनों के हिस्से की जो एक बीघा जमीन है, उसे ही बेचकर उधारी चुकायी जाए। जमीन बिक गई, उधारी भी चुका दी गई। दोनों भाइयों ने आपसी सहमति से बंटवारा कर लिया राकेश के पास पिता जी वाला घर रहा और ताई की जमीन और घर का मालिक रंजीत हुआ।

इस दंड के मिलने से एक बात तो अच्छी हुई, दोनों भाइयों को जीवन का सबसे बड़ा सबक मिल गया। दोनों परिवार भले ही एक न हुए हों पर जो कुछ बदलाव आया वही बहुत था। राकेश की शराब पीने की लत छूट गयी, रंजीत भी सुधर गया, रज्जो तो बेचारी सीधी थी और वैसी ही रही, शीला ताई के शारीरिक रूप से कमजोर हो जाने के कारण लड़ने की ऊर्जा और उत्साह दोनों समाप्त हो चुके थे। अरे हाँ मंजरी के बारे में तो बताना ही भूल गया, उसके व्यवहार में कोई बदलाव न आया। उसने बस्ती में शीला ताई की जगह ले ली, पूरी बस्ती में सब उससे बचकर रहते, क्या पता कब लड़ बैठे। पंद्रह हज़ार के दंड ने अपना काम कर दिया था।

(समाप्त)

पुष्पेंद्र सिंह गौतम