जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए Anugya Mishra द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...

गोपाल दास नीरज की ये पंक्तियाँ केवल कविता की सुंदर अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि हमारे जीवन और समाज के लिए एक गहरा संदेश हैं। दीपावली आती है तो पूरा देश रोशनी से नहा उठता है। घर-आँगन सजते हैं, बाजार जगमगाते हैं, पटाखों और फुलझड़ियों की आवाज आसमान तक गूँजती है। नए कपड़े, मिठाइयाँ, उपहार और करोड़ों-अरबों का कारोबार त्योहार की रौनक बढ़ाते हैं। हर ओर उल्लास है, उत्सव है, चमक है। लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक सवाल मन को बेचैन करता है—क्या सचमुच अँधेरा मिट रहा है? हर वर्ष दीपावली पर हम अपने घरों के कोने-कोने को रोशन करते हैं, लेकिन क्या कभी अपने भीतर झाँककर देखा है? कितने ही दिल आज भी निराशा और अवसाद के अँधेरे में डूबे हैं। कितने रिश्ते अहंकार, स्वार्थ और गलतफहमियों की भेंट चढ़ चुके हैं। कितने अपने एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। कहीं बुजुर्ग अकेलेपन में जीवन बिता रहे हैं, कहीं बच्चे अभावों में अपना बचपन खो रहे हैं, तो कहीं कोई व्यक्ति केवल इसलिए मुस्कराने का अभिनय कर रहा है क्योंकि उसके पास अपना दर्द बाँटने वाला कोई नहीं है। हम लक्ष्मी के स्वागत में घरों के दरवाजे खोलते हैं, लेकिन क्या जरूरतमंदों के लिए अपने दिल के दरवाजे भी खोलते हैं? हम भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी मनाते हैं, लेकिन क्या उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारते हैं? सत्य, मर्यादा, करुणा और न्याय की बातें करते हैं, मगर व्यवहार में झूठ, फरेब, छल और स्वार्थ को जगह देते जा रहे हैं। विडंबना यह है कि कई बार असत्य की जीत का जश्न मनाया जाता है और सत्य अपनी बेबसी पर आँसू बहाता रह जाता है। आखिर कब तक हम रोशनी का उत्सव केवल बाहरी सजावट तक सीमित रखेंगे? कब तक दीपक जलाकर अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ते रहेंगे? क्या दीपावली का अर्थ केवल महँगे उपहार, पकवान और आतिशबाजी है? क्या एक भूखे को भोजन देना, किसी निराश व्यक्ति को उम्मीद देना, किसी टूटते रिश्ते को जोड़ना और किसी अकेले चेहरे पर मुस्कान लाना दीपावली नहीं है? वास्तव में दीपावली तभी सार्थक होगी, जब एक दीपक हमारे भीतर भी जलेगा। वह दीपक मानवता का हो, संवेदना का हो, ईमानदारी का हो और दूसरों के दुख को समझने की दृष्टि का हो। हमें अँधेरा केवल अमावस्या की रात का नहीं, बल्कि मनुष्य के मन का मिटाना है। हमें उन अँधेरों से लड़ना है जो समाज में असमानता, अन्याय, नफरत, भ्रष्टाचार और अविश्वास के रूप में फैल रहे हैं। आइए, इस दीपावली संकल्प लें कि हम केवल अपने घर को नहीं, किसी और के जीवन को भी रोशन करेंगे। किसी के आँसू पोंछेंगे, किसी के चेहरे पर मुस्कान लाएँगे और अपने व्यवहार से अच्छाई की एक छोटी-सी लौ जलाएँगे। क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि हमने कितने दीपक जलाए, सवाल यह है कि हमारी रोशनी से कितने जीवन जगमगाए। दीप जलें तो ऐसा कि उम्मीद जागे, उजाला फैले तो ऐसा कि इंसानियत मुस्कराए। सचमुच, ध्यान इतना ही रहे कि धरती पर कहीं अँधेरा बाकी न रह जाए।