हम विद्यार्थी भूल रहे संस्कृति और संस्कारों को
हम विद्यार्थी भूल रहे,
जीवन के संस्कारों को।
माँ की ममता भूल रहे,
पिता का मान भुलाते हैं,
बड़ों के चरणों में झुकना,
अब हम कहाँ निभाते हैं?
आशीषों की छाँव छोड़कर,
ढूँढ़ रहे हम सहारों को,
हम विद्यार्थी भूल रहे,
संस्कृति के उन प्यारों को।
दादी की मीठी लोरी अब,
कानों में कम आती है,
नानी की प्यारी कहानियाँ,
यादों में रह जाती हैं।
मोबाइल की झिलमिल दुनिया,
खींच रही मन-तारों को,
हम विद्यार्थी भूल रहे,
जीवन के संस्कारों को।
गुरु को पहले देव मानकर,
शीश झुकाया जाता था,
गुरु की हर एक सीख को,
जीवन-मंत्र बनाया था।
अब तो चकाचौंध लुभाती,
भाती झूठी बातों को,
हम विद्यार्थी भूल रहे,
गुरु के उन उपकारों को।
कभी किताबें मित्र थीं अपनी,
ज्ञान हमारा साथी था,
मेहनत ही पहचान हमारी,
सपनों की परछाईं थी।
आज सफलता पाने की धुन में,
भूल गए व्यवहारों को,
हम विद्यार्थी भूल रहे,
जीवन के सच्चे सारों को।
त्योहारों में प्रेम बँटता था,
घर-आँगन मुस्काता था,
दीपों की उजली कतारों से,
अँधियारा मिट जाता था।
होली केवल रंग नहीं थी,
रंगती थी मन-धारों को,
राखी केवल धागा न थी,
जोड़ती थी परिवारों को।
अब त्योहार मनाते ऐसे,
तस्वीरें बस खिंचवाते हैं,
रीति-रिवाजों का अर्थ न समझें,
दिखावे में खो जाते हैं।
आओ फिर से प्रेम जगाएँ,
अपने उन त्योहारों को,
हम विद्यार्थी भूल रहे,
परंपरा के सत्कारों को।
अपनी भाषा, अपनी बोली,
अपनी सच्ची शान है,
माँ की भाषा हिंदी हम सब,
भारत की पहचान है।
हिंदी बोलें, हिंदी लिखें,
हिंदी का सम्मान करें,
मीठे अपने शब्दों से हम,
मन के द्वार महान करें।
आधुनिकता से क्यों घबराएँ?
आगे बढ़ना भी सीखें,
नई तकनीक, नया ज्ञान लें,
लेकिन जड़ों से भी जुड़ें।
ऊँची उड़ान भरें लेकिन,
याद रखें आधारों को,
हम विद्यार्थी भूल रहे,
संस्कृति के उन प्यारों को।
संस्कार नहीं केवल पूजा,
संस्कार नहीं दिखलावा,
सच्चाई के पथ पर चलना,
यही संस्कारों का दावा।
भूखे को भोजन दे देना,
प्यासे को जल दे देना,
गिरते को हाथ पकड़ लेना,
दुख में साथ खड़े रहना।
सत्य कहें और सत्य जिएँ हम,
झूठ कभी न अपनाएँ,
दीन-दुखी के आँसू पोंछें,
सबके चेहरे पर मुस्काएँ।
जाति-भेद की दीवारें तोड़ें,
प्रेम के दीप जलाएँ,
अपने छोटे-छोटे कर्मों से,
भारत को सुंदर बनाएँ।
हम विद्यार्थी आज के हैं,
कल का भारत हमसे है,
हमसे इसकी नई कहानी,
हमसे इसकी आशा है।
हम चाहें तो फिर से जगमग,
हो जाएँ संस्कारों से,
हम चाहें तो फिर महक उठें,
भारत के व्यवहारों से।
आओ मिलकर शपथ ये लें,
जड़ से नाता जोड़ेंगे,
माँ-पिता और गुरु के आगे,
शीश सदा हम मोड़ेंगे।
सत्य, प्रेम और सेवा लेकर,
जीवन-पथ पर चलेंगे,
भारत की संस्कृति की खातिर,
हर संभव प्रयास करेंगे।
अब विद्यार्थी भूल न जाएँ,
अपनी संस्कृति, संस्कारों को,
ज्ञान-विज्ञान संग लेकर चलें,
भारत के आदर्शों को।
नई सुबह का सूरज बनकर,
दूर करें अँधियारों को,
फिर से जीवित कर दें मिलकर,
अपने भूले संस्कारों को।
हम विद्यार्थी भूल रहे—
अब यह भूल न होने दें,
अपने उजले संस्कारों को,
समय की धूल में खोने न दें।
आधुनिक बनें, प्रगतिशील बनें,
पर न छोड़ें आधारों को,
हम विद्यार्थी फिर अपनाएँ,
अपनी संस्कृति, संस्कारों को।
हम विद्यार्थी फिर अपनाएँ,
अपनी संस्कृति, संस्कारों को,
हम विद्यार्थी फिर सँवारें,
भारत के उन विचारों को।
ज्ञान हमारा दीप बने और,
संस्कार बनें उजियारे,
मिलकर हम फिर गर्व से बोलें—
भारत माँ के लाल हैं सारे!
Anugya Mishra