यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई Ramesh Desai द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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यादों की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई

                        : प्रकरण - 29 

उस  क़े बाद दो और बड़ी फ़िल्म कंपनी थी, जिस की बहुत बोलबोला थी.

' राजश्री प्रोडक्शन ' जिस की नीव तारा चंद बड़जात्या ने 60 के दायके में रखी थी, जिसे उन क़े तीन बेटे राज कुमार, अजित कुमार ओर कमल बड़जात्या ने अपने सक्रिय और सामूहिक प्रयासों से 50 साल से भी अधिक समय तक जीवित रखा था. एक से बढ़कर एक फिल्मो का उपहार देकर नया इतिहास रचा था.

पहली ही फिल्म ' आरती ' ने हीं डंका बजा दिया था. जो एक गुजराती नाटक के आधारित थी.

उस क़े बाद उन्होंने अनेकानेक फिल्मों का निर्माण किया था, जिस में ' दोस्ती ' ' तकदीर ' ' मैंने प्यार किया ' ' हम आप क़े हैं कौन? ' ' हम साथ साथ हैं '..इत्यादि इत्यादि पारिवारिक फिल्मों का योगदान था .

सालो बाद तारा चंद बड़जात्या क़े पौत्र सूरज बड़जात्या ने भी फिल्मो में प्रवेश किया था. वह भी अपने आप में एक मिशाल था.

दूसरा नाम एल वी प्रसाद था. जिन्हों ने ' प्रसाद प्रोडक्शन ' क़े बैनर तले फिल्म बनाना शुरू किया था.

पहली फ़िल्म थी ' शारदा '

जिस में राज कपूर और मीना कुमारी ने मुख्य भूमिका निभाई थी. वह दोनों एक दूसरे से प्यार करते थे.

लेकिन शादी उन क़े नसीब में नहीं थी. मीना कुमारी की शादी दूसरे शख्स से हो जाती हैं, जो जोग संजोग से क़ोई और नहीं बल्कि उस क़े पिता ही होते हैं.. मीना कुमारी घर में उस की 'मा' बनकर दाखिल होती हैं.

अब क़ोई भला अपनी प्रेमिका को 'मा ' कैसे कह सकता था? बडे नाजुक हालात थे.

आखिर में कुछ ऐसा होता हैं और उस क़े मुंह से अनायास 'मा ' शब्द निकल जाता हैं.

राज कपूर बीमारी की हालत में अन्य भिखारियों की कतार में मंदिर में बैठा होता हैं. उस वक़्त मीना कुमारी दर्शन क़े लिये वहाँ आती हैं. अनजाने में उस का पैर राज कपूर के हाथ पर पड़ जाता हैं, और दर्द के कारण वह चीख पड़ता हैं .

' मा '

कैसा अंत था?

उस क़े बाद ' छोटी बहन ' फ़िल्म बनी थी, जिस में नंदा ने अंधी लड़की की भूमिका निभाई थी. बलराज साहनी और रहमान उस क़े खून के रिश्ते में सचमुच के भाई थे, जब की महमूद जो उन का चचेरा भाई था जो रिक्शा चलाता था.

उस फ़िल्म का गीत मेरे लिये एक यादगार बन गया था.

" भैया मेरी राखी क़े बंधन को निभाना "

उस क़े बाद ' ससुराल, हमराही, बेटी बेटे, क़े अलावा ढेर सारी एक से बढकर एक फिल्मे उन्हों ने बनाई थी.

नये दौर में कई नये लोग आये थे, जिन्हों ने अपना कसब दिखाया था.

सुभाष घई जो फ़िल्म में काम करने आये थे. उन्हों ने ने गुरुदत्त की फ़िल्म ' उमंग ' में एक समांतर हिरो की भूमिका निभाई थी, जिस ने मुख्य हिरो सतीश को पीछे छोड़ दिया था.

फिर भी उन्हें आगे बढ़ने क़ोई मौका नहीं मिला था. उन्हों ने उस क़े अलावा ' आराधना और दो तीन फिल्मों में छोटी भूमिका - मेहमान भूमिका निभाई थी.

वह हारे नहीं थे और ' मुकता आर्ट्स ' क़े बैनर तले अपनी कंपनी का निर्माण शुरू किया था.

फिर भी फ़िल्म में काम करने उन की इच्छा अधूरी रह गई थी जिसे उस ने अपनी फ़िल्म में एक शोट में हाजिर रहकर पूरी की थी.

' कर्ज' ' हिरो' और' राम लखन ' .. जैसी कई फ़िल्म में उन्हों ने एक सीन में हाजिरी देकर अपनी इच्छा पूर्ण की थी.

शुरुआत क़े दिनों में एक और हस्ती थी जिन्होंने अपनी फिल्मों क़े जरिये लोगो क़े दिल में जगह बना ली थी.

दिलीप कुमार और राज कुमार इंडस्ट्रीज की सब से बड़ी देन थी. दिलीप कुमार की गाड़ी एक नंबर पर चल रही थी. तब जेमिनी क़े बैनर तले निर्माता एस एस वासन ने दोनों को साथ काम करने का मौका ' पैगाम ' में दिया था. उस फ़िल्म में राज कुमार ने बाजी मार ली थी.

तब से दिलीप कुमार ने राज कुमार क़े साथ काम करना बंद कर दिया था. उन को कई फिल्मे मिली थी, जिस में राज कुमार भी काम करने वाले थे, जिस में उन्होंने काम करने क़े लिये मना किया था..तो उन्हें निकालकर कर दूसरे अभिनेता को फ़िल्म में लेना पड़ा था.

' आदमी' और ' संघर्ष' फ़िल्म में दिलीप कुमार क़े साथ राज कुमार को लिया गया था, जिसे उन क़े कहने से फिल्मो से दूर किया था और क्रमशः मनोज कुमार और संजीव कुमार को उस की जगह पर लिया गया था.

दिलीप कुमार अलबत्ता अव्वल दर्जे क़े कलाकार थे.. और राज कपूर की ' जिस देश में गंगा बहती हैं ' क़े मुकाबले में अपने छोटे भाई नासिर खान को लेकर उन्हों ने केवल एक फ़िल्म ' गंगा जमना' फ़िल्म बनाई थी जो राज कपूर की फिल्म से ज्यादा सफल हुई थी.

यह फ़िल्म भोजपुरी भाषा में बनी थी. उस का भाई पुलिस में काम करता था. गांव क़े एक बदमाश जागीरदार के जुल्म से तंग होकर डकैती पर उतर आता हैं..छोटा भाई उसे समझाने की कोशिश करता हैं, लेकिन वह पीछे हटने को तैयार नहीं था. उस हालत में छोटा भाई को अपने कर्तव्य की खातिर अपने ही भागते हुए भाई पर गोली मारकर न्याय करना पड़ता हैं.

और मदर इंडिया का पुनरावर्तन हुआ था.

फ़िल्म क़े गीत में बड़ा सन्देश था.

इंसानियत क़े सर पे इज्जत का ताज रखनातन मन की भेट देकर भारत की लाज रखनाजीवन नया मिलेगा अंतिम चिता में जलकर

उस क़े बाद सुनील दत्त ने भी एक फ़िल्म बनाई थी.

' मुझे जीने दो. '

जिस की कहानी भी डाकुओ की जिंदगी पर आधारित थी

वह भी काफ़ी सफल हुई थी

सालो तक जो नहीं हुआ था. वह सुभाष घाई ने अपनी फ़िल्म 'सौदागर ' में किया था.

वह कई दायके बाद दिलीप कुमार और राज कुमार को एक साथ लेकर आये थे.

                  00000000 ( क्रमशः )