: प्रकरण 28 :
मैं राज कपूर की ' मेरा नाम जोकर ' की तरह तीसरी बार प्रेम परीक्षा में फेईल हुआ था.
लेकिन फिल्मों का मुझ पर बड़ा प्रभाव था. क्रिकेट की तरह मेरे काफ़ी चहरीते कलाकार भी थे. जिस मे सब से ऊपर चरित्र अभिनेता राज कुमार का नाम आता था..
उन्हों ने फ़िल्म' मदर इण्डिया' मे छोटा सा रोल निभाया था. उस वक़्त तो मैं उन्हें ज्यादा जानता नहीं था.
लेकिन उन की दो फ़िल्म : ' वक़्त ' और ' काजल ' ने मुझे काफ़ी ओबसेस कर दिया था. मुझ पर बड़ा जादू कर दिया था. मैं उन का भी आशिक हो गया था.
'वक़्त ' फ़िल्म में उन की भूमिका मानो मेरी जिंदगी का आयना बन गई थी. उस में मुझे अपनी खुद की प्रेम कहानी का रिकैप नजर आया था.
वह भी मेरी तरह फ़िल्म की नायिका से एक तरफा प्यार करते थे, जो किसी ओर को चाहती थी. एक कमजोर घड़ी मे उन क़े सिर पर नायिका को पाने का भूत सवार हो जाता हैं. वह उस के लिये ऊस के प्रेमी की हत्या करने पर उतारू हो जाते हैं. तब एक सच्चाई उन क़े सामने आती हैं.
वह लड़का बचपन मे खोया अपना ही छोटा भाई था.
. यह जानकर उन का दिल परिवर्तित हो जाता हैं.
दूसरे दिन नायिका के जन्म दिन पर एक पार्टी आयोजित की जाती हैं. राज कुमार उस में मौजूद होते हैं.. वह नायिका को बड़ी सहजता से सवाल करते हैं.
" मीना! आज तुम बहुत खुश हो ना? "
" हा! राजा साहब! "
फ़िल्म मे उन का नाम राजा था.
" क्या मैं आज तुम से अपना इनाम मांग सकता हूं? "
उस का यह सवाल सुनकर मीना पलभर दिगमूढ़ हो जाती हैं. शायद उसे इल्म हो चूका था . राजा उसे चाहता था..फिर भी वह बड़े इत्मीनान के साथ हकारात्मक सुर में जवाब देती हैं.
तब राज कुमार की बात सुनकर सारा होल अचंबित हो जाता हैं. फ़िल्म का यह दृश्य मुझे बेहद पसंद आया था. इसी लिये मैंने यह फ़िल्म बारबार देखी थी.
" बस रवि को इतनी ख़ुशी देना जो आज तक क़ोई बीवी अपने पति को नहीं दे सकी हैं. "
इतना कहकर वह शपथ क़े तौर पर उस क़े सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद भी देते हैं.
फ़िल्म क़े इस दृश्य ने मुझे गरिमा क़े मुआमले मे मुक प्रेरणा प्रदान की थी.
यह फ़िल्म उस दौर की सर्व श्रेष्ठ फ़िल्म थी.. उस की लंबाई 22 रिल्स की थी और उस मे 22 नामी कलाकारों ने छोटी मोटी भूमिका निभाई थी जिस ने फ़िल्म को सफल करने मे अहम भूमिका निभाई थी.
सुनील दत्त, साधना, राज कुमार, शशि कपूर, शर्मिला टागोर, बलराज सहानी, रहमान, जीवन, मदन पूरी, शशि कला और मोतीलाल ने इस फ़िल्म में एक साथ काम किया था.
यह फ़िल्म मेरे फेवरिट निर्माता- निर्देशक बी आर चोपड़ा ने बनाई थी, जिस का दिग्दर्शन उन क़े छोटे भाई यश चोपड़ा ने किया था. यह उन की पहली रंगीन फ़िल्म थी जहाँ से मल्टी स्टार फिल्मों का नया दौर शुरू हुआ था.
इसी नाम से उन्हों ने कुछ साल पहले अपनी तीसरी फ़िल्म ' नया दौर' बनाई थी.. जिस मे शारीरिक श्रम और मशीनी की लड़ाई को बड़ी बखूबी से फिल्माया गया था..
बस आने से टांगे चलाने वालो का धंधा टूट जाता हैं. उन क़े परिवार का क्या हाल होता हैं, वही दिखाने का उन्हों ने संनिष्ट प्रयास किया था.
किस को चलना होगा? उस का फ़ेंसला करने क़े लिये टांगे वाले और बस क़े बीच रेस का आयोजन किया जाता हैं. जिस मे टांगेवाले की नैतिक जीत होती हैं. और उन को टांगे चलाने का अधिकार वापस मिलता हैं. जो बस क़े आगमन से छिनने वाला था.
उस क़े अलावा विदेशी फ़िल्म ' towering inferno' से प्रेरित होकर उन्हों ने ' the burning train' बनाई थी. वैसी फ़िल्म आज तक अपने देश मे कभी नहीं बनी थी. यह फ़िल्म मे भी मल्टी स्टार की भरमार थी.
उन क़े अलावा कई अभिनेता थे जिन्हों ने अभिनय क़े साथ खुद की फिल्मे बनाई थी..
जिस मे देव आनंद, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, फिरोज खान, प्रदीप कुमार, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र और मनोज कुमार थे जिस ने ' भारत कुमार ' का नाम कमाया था.
अभिनय मे कई तारिका ने फ़िल्म मे अपना योगदान दिया था.
नरगिस, मधुबाला, मीना कुमारी, वैजयंती माला, नूतन, माला सिन्हा, वहिदा रहमान, पद्मिनी, रेखा, राखी, शर्मीला टागोर, माधुरी दीक्षित, श्री देवी जैसी कई अभिनेत्री मौजूद थी जिन्हों ने अपने अभिनय से लोगो क़े दिल मे जगह कायम कर ली थी.
गीत संगीत क़े माध्यम से कई गीतकार, संगीत कारो ने भी बड़ा काम किया था. जिस मे शंकर जयकिशन, कल्याणजी आनंदजी, रोशन, नौशाद, लक्ष्मी कांत प्यारे लाल, इत्यादि हस्तीया शामिल थी.
गीतकारो मैं हसरत जयपूरी, शैलेन्द्र, शकील बदायूनी, आनंद बक्षी, साहिर लुध्यानवी, गुलशन बावरा, प्रेम धवन इत्यादि लोगो का नाम चमकता था.
डिस्ट्रीब्यूटर्स ने भी अपनी भूमिका निभाई थी.. उस मे एक ने अपने बैनर तले फिल्मे बनाना भी शुरू किया था.
जो सही मानो मे एक निर्माता नहीं था. जिस ने अपनी फ़िल्म को पब्लिसिटी देने का प्रयास किया था. उस मे कुछ गलत नहीं था. लेकिन उस ने जो रास्ता अख्तयार किया था. वह सही नहीं था.
उन्हों ने निर्माता राज कपूर की फ़िल्म ' मेरा नाम जोकर ' से क्या प्रोब्लेम था? उस को फ्लॉप करने के लिये उन्हों ने गंदे राजकारण का उपयोग किया था.
टिकट बारी से सभी टिकिट अपने आदमी क़े जरिये खरीद ली थी . और उसे काला बाजार मे आधी किंमत मे बेची थी जिस वजह से ' मेरा नाम जोकर ' फ्लोप हो गई थी. और उन की खुद की फ़िल्मने टिकिट बारी पर धूम मचा दी थी..
भगवान ने उन की इस बदमाशी का बदला लिया था. उस की अगली फ़िल्म बिल्कुल फ्लोप हो गई थी. भारी नुकसान हुआ था.
' जैसा किया हैं तूने वैसा ही तुं भरेगा..'
ऐसी बातें कहने वाले गलत काम करने वाले खूबसूरत अपनी बर्बादी को न्योता देते हैं.
घर बाहर गृह गृहस्थी से हाथ धोना पड़ा था. दाने दाने पर तरस ने की घड़ी आई थी.
अब पछताये क्या होय? ज़ब चिड़िया चुग गई खेत..
बी आर चोपडा की बड़ी शाख थी. उन्हों ने टेलिविज़न क़े लिये 78 एपिसोड की सब से बड़ी और लंबी सीरियल ' महाभारत ' बनाई थी. जिस से उन्हें काफ़ी शौहरत मिली थी.
उस क़े बाद उन्हों ने 'बागबान ', ' बाबुल 'और 'भूतनाथ ' जैसी फिल्मे भी बनाई थी जिस का निर्देशन उन क़े बेटे रवि चोपड़ा ने संभाला था. जिस ने पहले ' जमीर' ' ' बर्निंग ट्रैन ' क़े अलावा कई फिल्मे दिग़दर्शित की थी.
लेकिन बाद मे ' बी आर फिल्म्स ' सितारा विलीन हो गया था.
और रवि चोपड़ा क़े अंत क़े साथ ' बी आर फिल्म्स'को भी ताले लग गये थे.
उस क़े चाचा यश राज चोपड़ा की अलग फ़िल्म कंपनी थी. उन्हों ने ' यश राज फिल्म्स ' क़े बैनर तले कई फिल्मों का निर्माण किया था. प्यार क़े बारे मे उन की सोच सब से अलग थी.
उन्हों ने यश राज फिल्म्स क़े बैनर तले ' दाग' नामक पहली फ़िल्म बनाई थी. कई सालो पहले इसी नाम की फ़िल्म रिलीज हुई थी, जिस मे दिलीप कुमार और निम्मी ने काम किया था.
यश जी की यह फ़िल्म एक लव ट्रायँगल फ़िल्म थी.
उस मे राजेश खन्ना क़े साथ, शर्मिला टागोर और राखी दोनों नायिका ने एक साथ काम किया था. संजोगाधीन फ़िल्म मे राजेश खन्ना की दो शादिया होती हैं. और दोनों बिबिया उस क़े साथ रहती हैं ऐसा दर्शाया था.
जिस क़े जरिये यश चोपडा ने प्रेम की नई परिभाषा को अंजाम दिया था.
उन के बैनर को उस के बेटे आदित्य चोपड़ा ने आज तक जीवित रखा हैं. .
00000000000 ( क्रमशः)