पीपल ड्योढ़ी Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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पीपल ड्योढ़ी

 

                यह वृतांत बीसवीं सदी के साठवें और आठवें दशकों के बीच की एक बीती है।

 

               “आप पिता- पुत्र आज मिठाई बांटो। कुंती मिल गई है,” पत्नी ने मेरे घर लौटते ही मेरे आगे एक पोस्टकार्ड आन लहराया।

                ‘पीपल ड्योढ़ी, गल्ला मंडी, कस्बापुर’ से आए उस कार्ड पर लिखा मेरा पता बाबूजी के हाथ का था, और मूल शब्द मेवालाल के : ‘कुंती आप लोग से मिलना चाहती है। बीमार है।’

                मुझ से तीन साल छोटी,कुंती,मेरी बहन है जो अपने तेरहवें साल में इसी पीपल ड्योढी से गायब हो गई थी और मेवालाल उसी डयोढ़ी का मालिक है जिस की दूसरी मंज़िल के पिछले तीन कमरे बाबूजी ने कस्बापुर में हुई अपनी बदली के तहत दो साल की अपनी टिकान के दौरान ले रखे थे। 

              और जिसे जभी से हर माह की सात तारीख को बाबूजी एक जवाबी कार्ड भेजते रहे थे– हर उस जगह से।जहां- जहां उन की तैनाती होती रही थी। 

               एक ही सवाल के साथ, ‘कुंती का पता चला?’

               एक ही अनुरोध के साथ, ‘पता मिलते ही हमें खबर देना।’

               बिना फल के। पिछले इक्कीस साल से। एक ही जवाब के साथ : नहीं मिली।

                “वह ज़रूर जानती रही हमें आज भी उस का इंतज़ार है,” पोस्टकार्ड पढ़ते ही बाबूजी भावुक हो उठे।

                “आप को हैरानी नहीं हुई कुंती को वहां पहुंचने में इक्कीस साल कैसे लग गए?” सालोंसाल की मेरे दिल में फंसी छटपटी और आशंका बाहर फूट पड़ी।

                 “जहां से बिछुड़ी थी, वहीं तो मिलेगी,” बाबूजी की आवाज़ लरज़ी, “अब हमें कस्बापुर पहुंचने में तनिक देरी नहीं करनी चाहिए….”

                 “आज ही टिकटें लेता हूं। तत्काल….”

                 कुंती को फिर से देख पाने और छू लेने की संभावना मेरे सामने वह दोपहर फिर ले आई,  जिस दिन बाबूजी को अपनी नई तैनाती के अंतर्गत कस्बापुर छोड़ना था। 

                 बिना किसी रिकार्डिंग या चेक- लिस्ट के।

 

             (2)

 

                 हमारा सामान ठेले में चढ़ाया जा चुका है।

                 केवल वही दो बक्से और एक अटैची उस तांगे में लादे जाने बाकी हैं जिस में हमें रेलवे स्टेशन पहुंचना है।

                 “ठेला चलने को तैयार है,” बाबूजी पीपल ड्योढ़ी की सीढ़ियों में खड़े होकर हमें पुकारते हैं, “अब आप तीनों नीचे चले आओ….”

                 “आ रहे हैं,” खाना बांध चुकी मां कुंती को अपने आसपास न पाकर उसे पुकारती हैं।

                 “मैं बुला लाता हूं,” मैं अंदर वाले कमरे की दिशा में चल देता हूं, “ज़रूर अपनी बगली खिड़की से रानी के साथ लगी होगी….”

                 रानी मेवालाल के मृतक भाई की बेटी है और कुंती की हमउम्र और सहपाठिन भी।

                मेवालाल ने अपनी पीपल ड्योढ़ी के चार खंड कर रखे हैं।निचली पूरी मंज़िल उस की आढ़त के लिए चिह्नित है और दूसरी मंज़िल तीन इकाइयों में विभाजित हैं।सब से छोटी इकाई में हम रहते हैं। दूसरी में उस के परिवारजन और तीसरी उसकी मित्र- मंडली के अनन्य प्रयोग हेतु है : उन की ताश के लिए।  गपशप के लिए।  मद्यपान के लिए। 

               हमारे अंदर वाले एक कमरे की बगली खिडक़ी मेवालाल की रिहाइश के समरूप बनी एक बगली खिडक़ी के ऐन सामने खुलती है जहां से कुंती और रानी एक- दूसरी के संग न केवल बतियाती-हंसती ही हैं बल्कि जिन्हें वे एक- दूसरी के घर कूद जाने का संयोजन मार्ग भी बना लिया करती हैं। 

               इस समय मुझे अपनी बगली खिडक़ी तो खुली मिलती है किंतु रानी वाली बंद। 

                “मां,” मैं घबरा कर चिल्लाया हूं।

                “क्या बात है?” मां के साथ बाबूजी भी आन पहुंचे हैं।

                “रानी की खिड़की बंद है,” मैं रो पड़ता हूं। कुंती की संगति में संभावित उस लंबी रेल-यात्रा का कौतुक मुझ से दूर छिटक लिया  

है।

                “कुंती उधर है क्या?” हाथ बढ़ा कर बाबूजी रानी वाली खिड़की थपथपाते हैं। फिर उधर से कोई उत्तर न पाकर अपना हाथ थापी बना लेते हैं।

                “हमारी खिडक़ी कौन पीट रहा है?”  खिड़की मेवालाल खोलता है। कड़कदार अपनी आवाज़ में अपना अभित्रास उतारते हुए। 

                मेवालाल से पूरी गल्ला मंडी त्रस्त रहती है। एक तो वह वहां की सब से बड़ी आढ़त और इमारत का मालिक। तिस पर कद- काठी में हट्टा- कट्टा और मिज़ाज का गरम।

उस के बारे में लोग कहते हैं कि वह जब लताड़ता है तो लज्जा घोल कर पी जाता है। अनुपयुक्त ऐसे शब्द उचरता है कि सुनने वाला ज़मीन खोद कर उस में अपने को गाड़ लेने पर आ जाए।  और जब कहीं पीटने पर आता है तो ऐसी कुटाई करता है कि मार खाने वाले को दिन- दहाड़े तारे दिखाई देने लगते हैं।

              “हम हैं,” लंबाई- चौड़ाई में उस से आधे रहे बाबूजी और सिकुड़ लेते हैं, “नमस्कार, लाला जी….”

              “आप अभी तक गए नहीं?” वह हैरानी जतलाता है।

               “बेटी के साथ जांएगे। उसी को बुला रहे थे….:

                 “इधर से?” मेवालाल गरजता है, “मगर क्यों? वह यहां क्यों होने लगी?”

                 “रानी और वह एक दूसरी के पास अक्सर इस रास्ते से चली आया-जाया करती है….”

                 “मगर आज इधर कहां आई? इधर कहां है?”

                 “फिर भी आप रानी को इधर बुला दीजिए, लाला जी,” बाबूजी रोंआंसे हो लिए हैं, “हम उस से पूछ देखें कुंती कहां गई है….”

                “रानी भी इधर नहीं है। कहीं नहीं है इधर….”

                 “नमस्कार, लाला जी,” दरवाज़े की ओट में खड़ी मां हमारे पास चली आती हैं, “आप अंदर भाभी जी से पूछ देखिए वे लड़कियां कहां गई हैं?”

                 मेवालाल स्वंय विधुर हैं और संतानहीन भी। रानी की मां ही को मां ‘भाभी जी’ पुकारा करती हैं।

                “ठीक है, पूछ देखता हूं। जब तक आप अपना सामान वगैरह लगवाओ-चढ़ाओ।”

                “वह तो सब पूरा हो चुका है। अब तो हमें रेलवे स्टेशन के लिए निकलना भर है,” बाबूजी गहरी सोच में डूब लिए हैं, “परसों तक मेरा कलकत्ते में अपनी ड्यूटी पर हाज़िर होना बहुत ज़रूरी है। सफ़र लंबा है। आज गाड़ी नहीं पकड़ पाए तो मेरी नौकरी छूट जाएगी….”

                “तो आप निकलो न। कौन दिक्कत है? कुंती को हम स्टेशन पहुंचवा देंगे….”

                 “नहीं। हम कुंती के साथ ही स्टेशन जांएगे, अकेले नहीं,” व्यग्र होकर मैं बाबूजी को खिड़की से अलग कर देना चाहता हूं।

                 “चल, बचुआ, चुप कर,” मेवालाल मुझे दबकाता है, “बड़ों के बीच बोलने का तुझ जैसे दबड़ू-घुसड़ू का कोई काम नहीं। जब हम बोल रहे हैं लड़की को हम स्टेशन पहुंचवा देंगे तो बस पहुंचाएंगे ही….”

                  मैं कट कर रह जाता हूं।

                 “मगर लाला जी….”

                 “भई, कह तो दिया। लड़की की चिंता छोड़ दो। हमारे सुपुर्द कर दो। उसे स्टेशन पर छोड़ने की ज़िम्मेदारी हमारी। जब तक आप लोग अपना ठेला और तांगा छोड़ोगे हमारी एंबेसेडर उस के साथ वहां पहुंच लेगी….”

                  गल्ला मंडी में मोटरगाड़ी सिर्फ़ मेवालाल ही के पास है।

                 “आप का एहसान मैं ज़िंदगी-भर नहीं भूलूंगा। मेरी बच्ची बहुत अल्हड़ है। उसे स्टेशन पर ज़रूर पहुंचवा दीजिएगा….”

                 “ज़रूर….”

                  मेवालाल के खिड़की बंद करते ही मां बाबूजी के साथ उलझती हैं, “मैं तो कुंती के बिना कहीं नहीं जाने वाली …..”

                 “मतलब?” बाबूजी ताव खाते हैं, “यहां हाथ पर हाथ धर कर उस का इंतज़ार करें जिस के गाड़ी के समय से पहले लौट आने की कोई गारंटी नहीं? जब कि हमें वहां अपना सामान भी बुक करवाना है?”

                “गारंटी न हो तो ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है क्या?” मां रुष्ट हैं।

                “उस एक ज़िम्मेदारी के पीछे बाकी ज़िम्मेदारियां पिछेल दूं? अपनी नौकरी न बचाऊं? और मेवालाल कह तो गया है कुंती को वह स्टेशन पर पहुंचा ही देगा….”

 

                 मगर मेवालाल हमारी गाड़ी छूटने से कुछ ही पल पहले हमें जब मिलता भी है तो कुंती के बिना ही, “रानी की सभी सहेलियों के घरों पर हम पता लगा लिए हैं। दोनों ही कहीं नहीं मिलीं। ज़रूर वे रास्ता भूल गईं हैं। मगर मिलेंगी ज़रूर।  और जैसे ही मिलेंगी हम आपको खबर ज़रूर देंगे और जब तक आप उसे लेने नहीं आंएगे हम उसे अपने पास रख लेंगे। रानी की तरह।आप बेफ़िक्र होकर अपनी नौकरी उस शहर में जा पकड़ो। इधर हम हैं न!”

 

          (3)

 

                कस्बापुर में रेलगाड़ी रुकी तो उतरते ही बाबूजी ने पीपल ड्योढ़ी का पता दिया : गल्ला मंडी।

                रास्ते की बड़ी रही सड़कें कुछ और बड़ी हो गईं थीं और कुछ बड़ी इमारतें भी कुछ और शीशेदार। 

               किंतु गल्ला मंडी का रास्ता वैसा ही था : खुरदरा और ऊबड़- खाबड़। 

               बल्कि इन इक्कीस सालों में उस की हालत और भी खस्ता हो गई थी। देखने और पूछने पर जाना, हाल भी बेहाल था।      पीपल ड्योढ़ी का रंग बिगड़ चुका था। 

                उस की निचली मंज़िल की आढ़त उठ चुकी थी। ऊपर वाली मंज़िल में रही मेवालाल वाली रिहाइश अब रानी और उस के नए परिवार की सम्पत्ति बन गई थी और मेवालाल स्वंय हमारे वाली इकाई में खिसक लिया था।

                आढ़त की जगह चार दुकानें आन जमी थीं : दो रानी की और दो मेवालाल की।

रानी के पति और बेटे अपनी दुकानों में परचूनी और दवाइयां रखे थे और मेवालाल अपनी दुकानों में आटा- चक्की और धान- कुट्टा।

               “लालाजी?” चक्की के पास बैठे मेवालाल की ओर बाबूजी ही पहले बढ़े।

               “आ गए?” हाथ में थामी लाठी के बावजूद मेवालाल उठते समय लड़खड़ा गया। पहले वाली उस की ठवन पूरी तरह छिन्न- भिन्न हो चुकी थी और अकड़ तितर- बितर।

                “कुंती बीमार है?” बाबूजी अप्रकृतिस्थ हो चले।

                “बीमार वह नहीं, मैं हूं। मेरे फेफड़े मुझे जवाब दे रहे हैं और डाक्टर का कहना है मेरे दिन अब गिने- चुने हैं। ऐसे में जाने से पहले मैं कुंती को आप के हवाले कर देना चाहता हूं ताकि मेरे बाद रानी उस की दुर्गत न कर पाए….”

                “आप की बीमारी की बात सुनकर मुझे बहुत दुख हो रहा है,” बाबूजी मर्यादा बनाए रखने में विश्वास रखते हैं, “लेकिन कुंती वाली बात कुछ समझ में नहीं आई….”

                 “हां, वह आप को कब मिली? कहां मिली?” मैं भी व्यग्र हो उठा।

                 “वह यहीं ऊपर है,” मेवालाल खिसिया गया, “उसी कमरे में जहां हम खिड़की पर आप के शहर छोड़ने वाले दिन मिले थे। उसी से पूछना….”

                 “उस के पास चलें?” उसे लज्जित देख कर बाबूजी ने उसे और उलझाना नहीं चाहा।

                “चलेंगे। मगर इस एक बात का आप ध्यान रखेंगे। उसे मालूम नहीं होना चाहिए मेरे पास ज़्यादा दिन अब बचे नहीं….”

                “ज़्यादा दिन तो मेरे पास भी नहीं,” अपनी आयु के इस सत्तरवें वर्ष में बाबूजी जीवन के प्रति अधिक उत्साहित नहीं।

                “चलें क्या?” बाबूजी का हतोत्साह हमेशा की तरह मुझे व्याकुल कर गया।

                 बिना देरी किए बाबूजी मेरे साथ सीढ़ियां चढ़ने लगे।

                 “रुको भाई। दम लो ज़रा। मानता हूं कुंती के साथ कथा बांचने की आप को जल्दी है। मगर ऐसी हड़बड़ी भी क्या? तेज़ी से उठ रहे हमारे कदमों के साथ कदम मिलाने में मेवालाल अपने को असमर्थ पा रहा था।

“हां….”

“हां….”

 

            (4)

 

                 कुंती को देख कर मेरे अंदर सिहरन दौड़ ली। अपने पैंतीसवें वर्ष ही में पहुंच रही मानो वह केवल अधेड़ावस्था ही नहीं बल्कि वार्द्धक्य में पहुंच चुकी थी। चुचकी हुई गालें, झुर्रीदार गर्दन और सिकुड़े हुए माथे वाली वह स्त्री क्या उसी बालिका में निबद्ध रही थी जिस की बड़ी- बड़ी आंखों की चमक सितारों को मात करती मालूम दिया करती थी और भरी- भरी गालों की उठान पठारों को?

                “देखो,कुंती।कौन लोग आए हैं?” मेवालाल ने हमारे आगमन की घोषणा की।

                “कौन?” रूखे, भावशून्य व अतिशीत स्वर में कुंती ने पूछा।

                “किन्नी,” आगे बढ़ कर मैं ने कुंती को अपने अंक में भर लिया, “हम हैं। बाबूजी और मैं….”

                “अब आएं हैं?” मेरी बाहों में उस का संतुलन डोल- डोल गया।

                “क्या करते?” बाबूजी ने कुंती का कंधा सहलाया, “तुम्हारा पता ही अब मालूम हुआ….”

                 “मां?” कुंती रोने लगी।

                 “चली गई,” बाबूजी भी रो पड़े, “तुम्हें खोने के बाद ऐसी बीमार रहने लगी कि फिर एक ही साल के अंदर खत्म हो गई….”

                  “मैं तो उसी दिन खत्म हो गई थी,बाबा, जब आप मेरे बिना शहर छोड़ दिए,” कुंती सिसकी, “और मैं यहां बंद कर दी गई….”

                  “मतलब?” मेवालाल पर मैं ने आक्रामक हमला बोल दिया, “आप ने कुंती को यहां रखा और हम सालोंसाल अपने जवाबी कार्ड में इस के न मिलने की खबर पाते रहे?”

                   “अब क्या बताएं?” मेवालाल बगलें झांकने लगा, “कुंती को लेकर हमारे मन में शुरू ही से एक चोर था। उस दिन अचानक सामने पड़ गई तो चोर बाहर आ गया। आप वाली खिड़की से इसे चुरा लाया….”

                   “मगर यह तो एकदम बच्ची थी,”  बाबूजी के स्वर में भर्त्सना चली आई, “और आप साठा….”

                  “अब बतावें क्या? आप से माफ़ी ही तो मांग सकते हैं,” मेवालाल ने बाबूजी के सामने हाथ जोड़ दिए। 

                  “माफ़ी तो आप को कई बात की मांगनी चाहिए,लाला जी,” कुंती ने खार निकाली, “लेकिन अब आप के सभी गुनाह माफ़। जो आप ने मुझे बाबा और भाई से मिला दिया….”

                  “ कैसे गुनाह? किन्नी? मुझे बताओ,” कुंती के हाथ मैं ने अपने हाथ में थाम लिए। 

                  “अब क्या क्या बताऊं,भाई? यों समझ लो मैं यहां पिंजरे में रखी रही हूं। रखैल।  बंद की बंद….”

                  “कुंती से आप ने शादी नहीं की क्या?” मैं भौंचक्का रह गया।

                  “आप पर बहुत अफ़सोस है, लालाजी,” बाबूजी ने भी अपने दिल के फफोले फोड़ दिए, “एक महापाप के बाद दूसरा महापाप?”

                  “उन्हीं से मुक्त होने के लिए ही आप को बुलाया है,” मेवालाल का स्वर कातर हो आया।

                  “आपकी पापमुक्ति का फ़ैसला तो अब पुलिस करेगी,” मेरे क्रोध का वारा- पार न रहा।

                  “मुझ से अच्छा पलटा ले रहे हो?” मेवालाल की भृकुटी अकस्मात तन गई और उस के स्वर में उस की पुरानी अकड़ के अवशेष उतर आए, “आप की अमानत आप लोग को लौटाने के लिए आपको इधर बुलाया और आप मुझी पर वार करने लगे? मुझी को धौंसियाने लगे?”

                 “अमानत वह होती है जो किसी के पास इस विश्वास पर रखी गई हो कि जब उस का स्वामी मांगे तब वह वापस उसी हालत में वापस कर दी जाए। हम ने न कभी आप से कुंती को अपने पास रखने के लिए बोला और न ही आपने हमारे हज़ारों बार कुंती को मांगने पर हमें वापस ही किया,” मैं ने भी अपना स्वर चढ़ा लिया।

                “इस बहस का मतलब?” मेवालाल अपना धैर्य खोने लगा।

                “मतलब यह कि कुंती को हम अपने साथ यहां से चुपचाप नहीं ले जाने वाले,” मैं और निर्भीक हो लिया, “या कानून की सलाह लेंगे या फिर पुलिस की….”

                “यह क्या कह रहा है?” मेवालाल बाबूजी की ओर मुड़ लिया, “आप इसे रोकिए। अपनी इस उम्र और हालत में मुझे कोई हार- जीत का फ़ैसला नहीं चाहिए। माफ़ी चाहिए। सिर्फ़ माफ़ी….”

                “क्योंकि आप जानते हैं अवैध रूप से पत्नी बना कर रखे जाने वालों को कानून कड़ी सज़ा देता है या फिर उन स्त्रियों को पत्नी के बराबर के अधिकार….”

                “मुझे कोई अधिकार नहीं चाहिए,भाई,” कुंती रोने लगी, “केवल अपने सगों का साथ चाहिए और कुछ नहीं…..”

                  बदल रहे अपने रंग के साथ मेवालाल ने बाबूजी के घुटने थाम लिए, “आप बोलो। आप क्या कहते हो? क्या चाहते हो?”

                 “इन्हें माफ़ कर दो,बाबूजी,” कुंती की रुलाई बढ़ ली, “मेरी एक ही साध थी। मरने से पहले आप सब मुझे मिलें ज़रूर। लालाजी ने मेरी साध पूरी कर दी। इन्हें माफ़ कर दो….”

                 “और माफ़ी के बदले मैं भरपाई भी करूंगा। अपनी पत्नी का पूरा का पूरा चांदी- सोना कुंती के हाथ सौंप कर। कितनी ही बार मैंने इसे वह पहले भी सब देना चाहा, मगर इस ने न उसे कभी स्वीकारा, न मुझे….”

                  “अब भी नहीं स्वीकार मुझे,” सिसक रही कुंती ने अपना सिर हिलाया।

                  मगर मेवालाल ने उस की सुनी नहीं। अपनी बनियान- नुमा कुर्ती से उस ने चाबियों का एक गुच्छा निकाला और उसी कमरे में खड़ी एक चाबी से आलमारी जा खोली। फिर दूसरी चाबी से उस के अंदर रहे लौकर को खोल कर वहां से एक तिजोरी निकाल लाया। तिजोरी में ताला पड़ा था जो एक तीसरी चाबी से खुला। 

                  तिजोरी में खाने भी रहे और दराज़ भी। सभी में भांत- भांत के गहने थे : गले के, कानों के,हाथों के, कमर के, पैरों के।

                  कुछ सोने के।कुछ चांदी के।

                  कुछ भारी। कुछ हल्के।

                  “मैं कुछ न लूंगी,” अपनी रुलाई के बीच कुंती ने मेवालाल को ललकारा, “ये मेरी माफ़ी के तौल बराबर नहीं।”

                  मैं समझ गया मेवालाल की तिजोरी नकार कर वह उस के अपराध के वज़न में नए बाट जोड़ रही थी।भारी, बहुत भारी।

                  बिना उसे उत्तर दिए मेवालाल ने अपनी चाबियों के गुच्छे से तिजोरी की चाबी अलग की और उसे तिजोरी समेत बाबूजी के पास ले गया, “अब यह कुंती की चीज़ है। आगे आने वाले दिनों में उस का सहारे बनेगी।”

                “न,” बाबूजी ने अपने हाथ अपनी पीठ से चिपका लिए, “हम यहां अपनी कुंती को लेने आए हैं। यह सब नहीं। और सहारे की बात करते हो, लाला जी, तो उस के लिए मेरी पेंशन ही हम पिता- पुत्री के लिए काफ़ी रहेगी….”

                “आप की पेंशन ही क्यों,बाबूजी? कुंती के पास एक कमाऊ भाई भी तो है….”

                 तिजोरी की चाबी अपने गुच्छे में लौटाने व तिजोरी को वापस अपने लौकर में टिकाने में मेवालाल ने तनिक समय न गंवाया।