याज्ञवल्क्योपनिषद GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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याज्ञवल्क्योपनिषद

याज्ञवल्क्य उपनिषद --यह उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से सम्बंधित है। यह शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी शाखा का उपनिषद है। यह 108 उपनिषदों की मुक्तिक-सूची में इसका क्रम 97 वां है।  इसे 20 संन्यास उपनिषदों में गिना जाता है। इसमें कुल 32 श्लोक हैं, जो 4 अध्यायों में बंटे हैं।अध्याय 1-3 = संन्यास की विधि, शिखा-सूत्र त्याग, परमहंस के लक्षण। अध्याय 4 = 24 श्लोक, जिसमें समदर्शन, वैराग्य और क्रोध-त्याग का उपदेश है।शांति पाठसंस्कृत:ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥अर्थ: वह ब्रह्म पूर्ण है, यह जगत भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निकलता है। पूर्ण का पूर्ण लेकर भी पूर्ण ही बचता है।खंड 1 - संन्यास का अधिकारसंस्कृत:अथ जनको ह वैदेहो याज्ञवल्क्यमुपसमेत्योवाच भगवन्संन्यासमनुब्रूहीति। स होवाच याज्ञवल्क्यो ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद्वा। अथ पुनर् व्रती वाऽव्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वा उत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्॥अर्थ: विदेह के राजा जनक ने याज्ञवल्क्य से कहा - संन्यास बताइये। याज्ञवल्क्य बोले - ब्रह्मचर्य पूरा कर गृहस्थ, गृहस्थ से वानप्रस्थ, फिर संन्यास। पर यही क्रम जरूरी नहीं। जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन - चाहे ब्रह्मचर्य से, गृहस्थ से या वानप्रस्थ से, चाहे व्रती हो या नहीं, स्नातक हो या नहीं - उसी दिन संन्यास ले ले।संस्कृत:तदेके प्राजापत्यामेवेष्टिं कुर्वन्ति। अथ वा न कुर्यादाग्नेय्यामेव कुर्यात्। अग्निर्हि प्राणः। त्रैधातवीयामेव कुर्यात्। अयं ते योनिरृत्विजो यतो जातो अरोचथाः। तं जानन्नग्न आरोहाथानो वर्धया रयिमित्यनेन मन्त्रेणाग्निमाजिघ्रेत्। एष वा अग्नेर्योनिः। गच्छ स्वां योनिं स्वाहा। आपो वै सर्वा देवताः। सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहा। शिखां यज्ञोपवीतं छित्त्वा संन्यस्तं मयेति त्रिवारमुच्चरेत्॥  अर्थ: --कुछ प्राजापत्य यज्ञ कहते हैं, पर तुम मत करो। केवल आग्नेयी करो - अग्नि ही प्राण है। त्रैधातवीय से सत्व-रज-तम शुद्ध होते हैं। मंत्र से अग्नि को सूंघो। न मिले तो जल में हवन करो - जल ही सब देवता है। फिर शिखा-जनेऊ काटकर तीन बार कहो - "मैंने संन्यास ले लिया"।खंड 2 - यज्ञोपवीत क्या है?संस्कृत:अथ हैनमत्रिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्यं यज्ञोपवीती कथं ब्राह्मण इति। स होवाच इदं प्रणवमेवास्य तद्यज्ञोपवीतं य आत्मा॥अर्थ: अत्रि ने पूछा - बिना जनेऊ के ब्राह्मण कैसे? याज्ञवल्क्य बोले - प्रणव (ॐ) और आत्मा ही उसका जनेऊ है।संस्कृत:परिव्राड् विवर्णवासा मुण्डोऽपरिग्रहः शुचिरद्रोही भैक्षमाणो ब्रह्म भूयाय भवति। एष पन्थाः परिव्राजकानां। वीराध्वनि वाऽनाशके वापां प्रवेशे वाग्निप्रवेशे वा महाप्रस्थाने वा। एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तः॥अर्थ: संन्यासी फीके रंग के वस्त्र वाला, मुंडा, अपरिग्रही, पवित्र, किसी से द्रोह न करने वाला, भिक्षा पर जीने वाला - वही ब्रह्ममय होता है।खंड 3 - परमहंससंस्कृत:तत्र परमहंसा नाम संवर्तकारुणि श्वेतकेतुदूर्वासऋभुनिदाघदत्तात्रेयशुकवामदेवहारीतकप्रभृतयोऽव्यक्तलिङ्गाऽव्यक्ताचारा अनुन्मत्ता उन्मत्तवदाचरन्तः॥ यथा जातरूपधरा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः तत्त्वब्रह्ममार्गे सम्यक्सम्पन्नाः॥ शून्यागारदेवगृह तृणकूटवल्मीकवृक्षमूलकुलालशालाग्निहोत्रशालानदीपुलिनगिरिकुहरकोटरकन्दरनिर्झरस्थण्डिलेष्वनिकेतनिवास्य प्रयत्नः शुभाशुभकर्मनिर्मूलनपरः संन्यासेन देहत्यागं करोति स परमहंसो नाम॥  अर्थ: संवर्तक, आरुणि, श्वेतकेतु, दुर्वासा, ऋभु, निदाघ, दत्तात्रेय, शुकदेव, वामदेव जैसे परमहंस हुए - जिनका कोई चिन्ह नहीं, जो पागल जैसे दिखते हुए भी ज्ञानी थे। वे नवजात जैसे दिगम्बर, द्वंद्वों से परे, ब्रह्म-मार्ग में स्थित होते हैं। सूने घर, मंदिर, घास की ढेरी, बांबी, पेड़ की जड़, कुम्हार की शाला, नदी किनारा, पहाड़ की गुफा, झरने के पास - कहीं भी बिना घर के रहते हुए शुभ-अशुभ कर्मों को जड़ से मिटाकर देह त्यागते हैं, वही परमहंस है।खंड 4 - वैराग्य और अंतिम उपदेश (24 श्लोक)यो भवेत्पूर्वसंन्यासी तुल्यो वै धर्मतो यदि। तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतराय कदाचन॥१॥प्रमादिनो बहिश्चित्ताः पिशुनाः कलहोत्सुकाः। संन्यासिनोऽपि दृश्यन्ते देवसंदूषिताशयाः॥२॥नामादिभ्यः परे भूम्नि स्वाराज्ये चेत्स्थितोऽद्वये। प्रणमेत्कं तदात्मज्ञो न कार्यं कर्मणा तदा॥३॥ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति। प्रणमेद्दण्डवद्भूमावाश्वचण्डालगोखरम्॥४॥  अर्थ 1-4: पहले के समान धर्म वाले संन्यासी को ही प्रणाम करे। कई संन्यासी प्रमादी, चुगलखोर, झगड़ालू होते हैं। जो नाम-रूप से परे ब्रह्म में स्थित है वह किसे प्रणाम करे? वह तो कुत्ते, चांडाल, गाय, गधे में भी भगवान को जीव रूप में देखकर उन्हें भी दंडवत कर सकता है।मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोकेऽङ्गपञ्जरे। स्नाय्वस्थिग्रन्थिशालिन्यः स्त्रियः किमिव शोभनम्॥५॥त्वङ्मांसरक्तबाष्पाम्बु पृथक्कृत्वा विलोचने। समालोकय रम्यं चेत्किं मुधा परिमुह्यसि॥६॥श्मशानेषु दिगन्तेषु स एव ललनास्तनः। श्वभिरास्वाद्यते काले लघुपिण्ड इवान्धसः॥८॥केशकज्जलधारिण्यो दुःस्पर्शा लोचनप्रियाः। दुष्कृताग्निशिखा नार्यो दहन्ति तृणवन्नरम्॥९॥ज्वलना अतिदूरेऽपि सरसा अपि नीरसाः। स्त्रियो हि नरकाग्नीनामिन्धनं चारु दारुणम्॥१०॥  अर्थ 5-10: स्त्री क्या है? हड्डी-मांस-नसों के पिंजरे में मशीन से चलने वाली गुड़िया। चमड़ी-मांस-खून-आंसू अलग करके देखो तो क्या सुंदर है? वही स्तन श्मशान में कुत्ते खाते हैं। काजल-केश वाली स्त्रियां देखने में प्रिय पर पाप की आग की लपटें हैं जो तिनके जैसे पुरुष को जला देती हैं।कामनाम्ना किरातेन विकीर्णा मुग्धचेतसः। नार्यो नरविहङ्गानामङ्गबन्धनवागुराः॥११॥सर्वेषां दोषरत्नानां सुसमुद्गिकयानया। दुःखशृङ्खलया नित्यमलमस्तु मम स्त्रिया॥१३॥यस्य स्त्री तस्य भोगेच्छा निस्त्रीकस्य क्व भोगभूः। स्त्रियं त्यक्त्वा जगत्त्यक्तं जगत्त्यक्त्वा सुखी भवेत्॥१४॥  अर्थ 11-14: कामदेव रूपी शिकारी ने पक्षी रूपी पुरुषों को फंसाने के लिए स्त्री रूपी जाल बिछाया है। स्त्री सब दोष-रूपी रत्नों की पिटारी और दुःख की जंजीर है। जिसकी स्त्री है उसे भोगेच्छा है, बिना स्त्री के भोग कहाँ? स्त्री छोड़ना ही जगत छोड़ना है।अलभ्यमानस्तनयः पितरौ क्लेशयेच्चिरम्। लब्धो हि गर्भपातेन प्रसवेन च बाधते॥१५॥जातस्य ग्रहरोगादि कुमारस्य च धूर्तता। उपनीतेऽप्यविद्यत्वमनुद्वाहश्च पण्डिते॥१६॥यूनश्च परदारादि दारिद्र्यं च कुटुम्बिनः। पुत्रदुःखस्य नास्त्यन्तो धनी चेन्म्रियते तदा॥१७॥  अर्थ 15-17: पुत्र न होने पर चिंता, होने पर गर्भपात-प्रसव की पीड़ा, जन्म पर ग्रह-रोग, बचपन में धूर्तता, जनेऊ पर न पढ़ना, पढ़ने पर विवाह न करना, जवानी में परस्त्रीगमन, परिवार होने पर गरीबी - पुत्र के दुख का अंत नहीं, और धनवान होने पर वह मर भी जाए तो।न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलो यतिः। न च वाक्चपलश्चैव ब्रह्मभूतो जितेन्द्रियः॥१८॥रिपौ बद्धे स्वदेहे च समैकात्म्यं प्रपश्यतः। विवेकिनः कुतः कोपः स्वदेहावयवेष्विव॥१९॥अपकारिणि कोपश्चेत्कोपे कोपः कथं न ते। धर्मार्थकाममोक्षाणां प्रसह्य परिपन्थिनि॥२०॥नमोऽस्तु मम कोपाय स्वाश्रयज्वालिने भृशम्। कोपस्य मम वैराग्यदायिने दोषबोधिने॥२१॥  अर्थ 18-21: यति हाथ-पैर-आँख-वाणी से चंचल न हो, जितेन्द्रिय हो। जो शत्रु, बंदी और अपने शरीर में एक ही आत्मा देखता है उसे क्रोध कैसे? यदि दोषी पर क्रोध है तो उस क्रोध पर क्रोध क्यों नहीं जो धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों का शत्रु है? मेरे उस क्रोध को नमस्कार जो अपने आश्रय को ही जलाता है और वैराग्य व दोष-बोध देता है।यत्र सुप्ता जना नित्यं प्रबुद्धस्तत्र संयमी। प्रबुद्धा यत्र ते विद्वान्सुषुप्तिं याति योगिराट्॥२२॥चिदिहास्तीति चिन्मात्रमिदं चिन्मयमेव च। चित्त्वं चिदहमेते च लोकाश्चिदिति भावय॥२३॥यतीनां तदुपादेयं पारहंस्यं परं पदम्। नातः परतरं किञ्चिद्विद्यते मुनिपुङ्गव॥२४॥  अर्थ 22-24: जहाँ लोग सोते हैं वहाँ संयमी जागता है, जहाँ वे जागते हैं वहाँ योगी सोता है। भावना करो - यहाँ सब चैतन्य है, यह सब चिन्मय है, तुम चैतन्य हो, मैं चैतन्य हूँ, ये सब लोक चैतन्य ही हैं। यतियों के लिए यही परमहंस का परम पद ग्रहण योग्य है, इससे परे कुछ नहीं।॥ इति याज्ञवल्क्योपनिषत् समाप्ता ॥+-----×----++×-----/×------