हुक्म और हसरत - 42 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत - 42

🔥♥️ हुक्म और हसरत ♥️🔥

#Arsia

एपिसोड 42: गुलाबी लिबास और अनकही जलन (2752 words)

रायगढ़ पैलेस की सुबह हमेशा की तरह खूबसूरत थी। सूरज की हल्की किरणें महल की ऊँची खिड़कियों से होकर अंदर आ रही थीं। नौकर अपने काम में व्यस्त थे और डाइनिंग हॉल में नाश्ते की मेज सजाई जा चुकी थी।

लेकिन आज सिया के मन में कुछ अलग ही चल रहा था।

आज दोपहर बारह बजे उसकी मुलाकात मिस्टर एस. से होने वाली थी।

वह सुबह उठते ही अपने प्रस्ताव की फाइल एक बार देख चुकी थी। ईमेल भी दोबारा पढ़ लिया था। फिर भी उसके मन में सवालों की कमी नहीं थी।

आखिर वह शख्स कैसा होगा, जो इतना बड़ा बिज़नेस साम्राज्य संभालता है, लेकिन अपनी पहचान को दुनिया से छिपाकर रखता है?

और सबसे बड़ी बात, उसकी आवाज़ इतनी जानी-पहचानी क्यों लगती है?

सिया ने आईने में खुद को देखा और फिर सिर झटक दिया।

“बस, सिया! पहले नाश्ता कर ले। हर वक्त उसी के बारे में सोचती रहेगी तो बाकी काम कौन करेगा?”

उसने खुद को समझाया और डाइनिंग हॉल की ओर चल दी।

---

डाइनिंग हॉल में राजा साहब पहले से मौजूद थे। रानी माँ उनके पास बैठी थीं, जबकि राजमाता अपनी पसंद की चाय पीते हुए अखबार देख रही थीं। रोशनी भी नाश्ते की मेज पर बैठी कुछ पढ़ रही थी।

सिया अंदर आई तो राजा साहब ने मुस्कुराकर उसे अपने पास बैठने का इशारा किया।

“आइए, राजकुमारी। आज तो आप काफी जल्दी तैयार होकर आ गईं।”

सिया कुर्सी पर बैठते हुए मुस्कुराई।

“पापा, मैं रोज समय पर ही उठती हूँ।”

रोशनी ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

“हाँ, दीदी। और रोज सुबह उठते ही सबसे पहले फोन भी देखती हैं।”

सिया ने उसे घूरा।

“रोशनी!”

रोशनी हँस पड़ी।

“मैंने क्या कहा? सच ही तो कहा है।”

रानी माँ ने दोनों को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “सुबह-सुबह तुम दोनों की नोकझोंक शुरू हो गई। पहले नाश्ता कर लो।”

सिया ने चुपचाप अपनी प्लेट अपनी तरफ खींच ली।

राजा साहब ने कुछ देर बाद पूछा, “वैसे, आज आपकी कोई खास मीटिंग है न?”

सिया ने तुरंत उनकी तरफ देखा।

“जी, पापा। आज मिस्टर एस. से मुलाकात है।”

राजा साहब के चेहरे पर हल्की-सी प्रसन्नता आ गई।

“अच्छा! यह तो बहुत अच्छी बात है।”

राजमाता ने अखबार एक तरफ रख दिया।

“यह मिस्टर एस. कौन हैं? पिछले कुछ दिनों से तुम्हारे ऑफिस में उनका नाम बहुत सुनने को मिल रहा है।”

राजा साहब ने जवाब दिया, “राजमाता, वह देश के बड़े उद्योगपतियों में से एक हैं। उनके बिज़नेस का दायरा काफी बड़ा है। कई क्षेत्रों में उनका निवेश है और जिस परियोजना से वह जुड़ते हैं, उसकी सफलता की संभावना बढ़ जाती है।”

रोशनी ने उत्सुकता से पूछा, “लेकिन पापा, वह हमेशा नकाब क्यों पहनते हैं?”

राजा साहब हल्का-सा मुस्कुराए।

“यह बात तो मैं भी नहीं जानता, बेटा। मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुना है, लेकिन उनसे व्यक्तिगत रूप से कभी मुलाकात नहीं हुई। हमारे कुछ व्यावसायिक संपर्कों ने उनके साथ काम किया है और सभी उनकी व्यावसायिक समझ की तारीफ करते हैं।”

सिया ने ध्यान से उनकी बात सुनी।

“तो आपने भी उन्हें कभी नहीं देखा?”

“नहीं, सिया। कम से कम व्यक्तिगत रूप से तो नहीं। उनके बारे में जो जानकारी मिली है, वह उनके काम और उनकी कंपनी से संबंधित है। उनकी निजी जिंदगी के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।”

सिया कुछ सोचने लगी।

राजा साहब ने उसकी ओर देखते हुए कहा, “लेकिन एक बात जरूर कहूँगा। ऐसे व्यक्ति से मिलने का अवसर मिलना अच्छी बात है। तुमने अपने प्रस्ताव पर मेहनत की है। उनसे आत्मविश्वास के साथ बात करना और अपनी योजना स्पष्ट रूप से समझाना।”

“जी, पापा।”

“और याद रखना, किसी बड़े उद्योगपति के सामने अपनी बात रखने का मतलब यह नहीं कि तुम्हें अपनी सोच बदलनी पड़े। अगर तुम्हारी योजना शहर के लोगों के हित में है, तो उसे मजबूती से रखो।”

सिया के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“मैं यही करने वाली हूँ।”

रानी माँ ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा।

“मेरी बेटी अब इतनी बड़ी हो गई है कि खुद अपने फैसले लेने लगी है।”

“माँ, मैं अभी भी आपकी बेटी ही हूँ।”

“और हमेशा रहोगी,” रानी माँ ने प्यार से कहा।

रोशनी ने अपनी प्लेट में से एक फल का टुकड़ा उठाते हुए कहा, “लेकिन दीदी, एक बात बताओ। अगर मिस्टर एस. इतने बड़े बिज़नेसमैन हैं, तो क्या वह सच में हमेशा नकाब पहनकर रहते हैं? मतलब, खाना खाते समय भी?”

सिया हँस पड़ी।

“रोशनी, मुझे कैसे पता होगा? आज पहली बार तो उनसे मिल रही हूँ।”

“तो आज पता करके आना!”

राजमाता ने उसे टोका, “तुम भी न, रोशनी! हर बात में मजाक।”

“दादी माँ, मैं तो बस उत्सुक हूँ।”

राजा साहब भी हँस दिए।

“उत्सुकता होना गलत नहीं है, लेकिन सिया वहाँ किसी की निजी जिंदगी की जानकारी लेने नहीं जा रही। उसे अपने काम पर ध्यान देना है।”

“जी, पापा,” सिया ने मुस्कुराते हुए कहा।

डाइनिंग हॉल के एक ओर अर्जुन खड़ा था। वह रोज की तरह सिया की सुरक्षा और दिनभर की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी लेने के लिए वहाँ मौजूद था।

उसका चेहरा हमेशा की तरह गंभीर और भावहीन था। वह परिवार की बातचीत सुन रहा था, लेकिन उसकी मुद्रा में कोई बदलाव नहीं था।

जब राजा साहब ने मिस्टर एस. की तारीफ की, तो अर्जुन ने अपनी नजरें सामने रखीं।

बड़े उद्योगपति हैं। अच्छा काम करते हैं। सब उनकी तारीफ करते हैं।

उसने मन ही मन सोचा।

तो? इससे राजकुमारी की मीटिंग का उद्देश्य नहीं बदल जाता।

लेकिन तभी रोशनी ने फिर कहा, “दीदी, अगर उनकी आवाज़ भी उतनी ही अच्छी हुई जितनी सब कहते हैं, तो आप तो उनसे प्रभावित हो जाएँगी!”

सिया ने हँसकर उसकी तरफ देखा।

“तुम दोनों बहनों ने मिलकर तय कर लिया है कि मुझे उनसे प्रभावित होना ही है?”

“मैंने तो बस संभावना बताई है,” रोशनी ने मासूमियत से कहा।

काव्या वहाँ मौजूद नहीं थी, फिर भी अर्जुन को सुबह ऑफिस में हुई उसकी बातचीत याद आ गई।

आवाज़ अच्छी है। व्यक्तित्व रहस्यमयी है। बड़े बिज़नेसमैन हैं।

उसके जबड़े की मांसपेशियाँ एक पल के लिए तन गईं।

फिर उसने तुरंत खुद को सामान्य किया।

यह सब बेमतलब की बातें हैं।

राजा साहब ने सिया से कहा, “अच्छा, अब नाश्ता खत्म करो। तुम्हें तैयार भी होना है।”

सिया ने सिर हिलाया।

“जी, पापा।”

नाश्ते के दौरान बातचीत फिर परिवार और महल के दूसरे कामों की ओर मुड़ गई। राजा साहब ने सिया से शहर की विकास योजना के बारे में कुछ सवाल पूछे। सिया ने उन्हें विस्तार से जवाब दिए और बताया कि वह स्थानीय व्यापारियों के हितों को भी ध्यान में रखना चाहती है।

राजा साहब ने संतोष से सिर हिलाया।

“मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। अपने काम को सिर्फ पद की जिम्मेदारी मत समझना, सिया। इसे लोगों के विश्वास की जिम्मेदारी समझना।”

सिया ने मुस्कुराकर उनका हाथ पकड़ लिया।

“आपका विश्वास कभी नहीं तोड़ूँगी, पापा।”

अर्जुन ने यह दृश्य देखा, फिर अपनी नजरें दूसरी ओर कर लीं।

उसके चेहरे पर अब भी कोई भाव नहीं था।

लेकिन उसके मन में एक ही बात बार-बार घूम रही थी।

आज राजकुमारी उस रहस्यमयी आदमी से मिलने जा रही थीं।

और न जाने क्यों, उसे यह मुलाकात सामान्य से ज्यादा महत्वपूर्ण लग रही थी।

---

नाश्ते के बाद सिया अपने कमरे में चली गई।

उसने अलमारी खोली और कपड़ों पर नजर दौड़ाने लगी। कुछ देर तक वह सोचती रही कि मीटिंग के लिए क्या पहने।

एक औपचारिक सूट?

या कोई सादा-सा कुर्ता?

उसने दो-तीन कपड़े निकालकर देखे, लेकिन मन किसी पर नहीं ठहरा।

आखिर उसकी नजर अलमारी में रखे एक खूबसूरत गुलाबी अनारकली सूट पर पड़ी।

वह लंबा, हल्के गुलाबी रंग का अनारकली था। उसका कपड़ा चलते समय खूबसूरती से लहराता था और उसकी कढ़ाई बेहद नाजुक थी। उसके साथ मैचिंग दुपट्टा भी था।

सिया ने उसे बाहर निकाला और अपने सामने रखकर देखा।

“यह ठीक रहेगा।”

उसने मुस्कुराते हुए खुद से कहा।

वह चाहती थी कि वह सलीकेदार और आत्मविश्वासी दिखे। मुलाकात औपचारिक थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उसे अपनी पसंद के कपड़े नहीं पहनने चाहिए।

कुछ देर बाद वह तैयार होने लगी।

गुलाबी अनारकली पहनकर उसने अपने बालों को सलीके से सँवारा। कानों में लंबे झुमके पहने, जिनकी हल्की-सी चमक उसके चेहरे की खूबसूरती बढ़ा रही थी।

उसने आँखों में खूबसूरत काजल लगाया। पलकों को सँवारा और होंठों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक लगा ली। गालों पर स्वाभाविक-सी लाली थी, जो उसकी मुस्कान के साथ और निखर रही थी।

उसने आईने में खुद को देखा।

गुलाबी रंग उसके चेहरे पर खूब जँच रहा था।

वह कुछ पल खुद को देखती रही, फिर दुपट्टा सँभालकर अपना फोन और फाइल लेने लगी।

उसे अंदाजा भी नहीं था कि कमरे से बाहर निकलते ही किसी की नजर उस पर ठहरने वाली थी।

---

अर्जुन गलियारे में खड़ा ड्राइवर को कुछ निर्देश दे रहा था।

“गाड़ी समय से तैयार रहनी चाहिए। रास्ते की स्थिति की जानकारी भी ले लेना। हमें निर्धारित समय से पहले निकलना है।”

“जी, सर।”

ड्राइवर वहाँ से चला गया।

अर्जुन ने अपनी घड़ी देखी। अभी निकलने में कुछ समय बाकी था।

तभी सिया अपने कमरे से बाहर आई।

“अर्जुन, हम निकलने के लिए तैयार हैं।”

अर्जुन ने आवाज़ सुनकर उसकी तरफ देखा।

और एक पल के लिए उसकी नजर वहीं ठहर गई।

गुलाबी अनारकली, लंबे झुमके, आँखों में काजल और होंठों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक।

सिया हमेशा की तरह खूबसूरत लग रही थी, लेकिन आज उसके रूप में कुछ अलग था। उसके कपड़ों में एक पारंपरिक सादगी थी, जो उसकी शाही पहचान से मेल खा रही थी।

अर्जुन उसे एक पल तक देखता रह गया।

सिर्फ एक पल।

फिर उसने तुरंत अपनी नजरें हटा लीं।

“गाड़ी तैयार है, राजकुमारी।”

उसकी आवाज़ हमेशा की तरह सपाट थी।

सिया ने उसे देखा।

“बस? कुछ और नहीं?”

अर्जुन ने भौंहें सिकोड़कर पूछा, “क्या कुछ और होना चाहिए?”

सिया ने अपने अनारकली की ओर इशारा किया।

“मैं कैसी लग रही हूँ?”

अर्जुन कुछ क्षण चुप रहा।

उसके मन में पहला जवाब आया—खूबसूरत।

लेकिन उसने वह शब्द अपने होंठों तक आने ही नहीं दिया।

“आप ठीक लग रही हैं, राजकुमारी।”

सिया का चेहरा उतर गया।

“ठीक? बस ठीक?”

“आपने पूछा था, मैंने जवाब दे दिया।”

“आपसे तारीफ की उम्मीद करना भी मेरी गलती है।”

“मैंने आपके पहनावे में कोई कमी नहीं बताई।”

“आपको तारीफ करना आता भी है?”

“जब आवश्यक हो, तब।”

सिया ने अविश्वास से उसकी तरफ देखा।

“तारीफ करने के लिए भी आपको आवश्यकता महसूस होनी चाहिए?”

“राजकुमारी, हमें निकलना चाहिए।”

सिया ने झुंझलाकर अपना दुपट्टा सँभाला।

“आपसे बात करना सच में बेकार है।”

वह आगे बढ़ने लगी, तभी पीछे से काव्या की आवाज़ आई।

“अरे वाह! हमारी राजकुमारी तो आज बहुत खूबसूरत लग रही हैं!”

सिया के चेहरे पर तुरंत मुस्कान लौट आई।

“सच में?”

काव्या उसके पास आई और उसे ऊपर से नीचे तक देखकर बोली, “बिल्कुल! यह गुलाबी रंग आप पर बहुत जँच रहा है। और ये झुमके! एकदम परफेक्ट!”

“थैंक यू!”

काव्या ने फिर अर्जुन की तरफ देखा।

“और हमारे अर्जुन सर तो जैसे पत्थर बनकर खड़े हैं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्या मतलब?”

“मतलब यह कि राजकुमारी इतनी खूबसूरत लग रही हैं और आपने सिर्फ ‘ठीक लग रही हैं’ कहा?”

सिया ने तुरंत शिकायत की, “देखा, काव्या? मैंने भी यही कहा था!”

काव्या हँस पड़ी।

“अर्जुन सर, कम से कम इतना तो कह सकते थे कि राजकुमारी बहुत अच्छी लग रही हैं।”

“यह उनकी निजी पसंद का मामला है,” अर्जुन ने शांत स्वर में कहा।

काव्या ने आँखें बड़ी कर लीं।

“ओह! तो अब राजकुमारी की तारीफ करना आपकी निजी पसंद का मामला हो गया?”

सिया ने हँसी रोकने की कोशिश की।

अर्जुन का चेहरा पहले की तरह गंभीर रहा।

“काव्या, अगर आपके पास कोई जरूरी काम नहीं है, तो कृपया ऑफिस में जाकर रिपोर्ट तैयार कर लीजिए।”

“अरे, मैं तो आपकी मदद कर रही हूँ!”

“मुझे मदद की आवश्यकता नहीं है।”

“यह तो साफ दिख रहा है,” काव्या ने मुस्कुराकर कहा।

सिया ने अर्जुन की तरफ देखा।

“छोड़िए, काव्या। इनसे तारीफ निकलवाना पत्थर से पानी निकालने जैसा है।”

“लेकिन राजकुमारी,” काव्या ने जानबूझकर धीमे स्वर में कहा, “मुझे तो लगता है कि अर्जुन सर ने आपको देखा तो था। बस, तारीफ करने की हिम्मत नहीं हुई।”

अर्जुन की नजर तुरंत काव्या पर गई।

“अपनी कल्पना पर नियंत्रण रखिए।”

काव्या हँस पड़ी।

“जी, सर!”

सिया भी मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गई।

लेकिन अर्जुन वहीं खड़ा रह गया।

उसने एक बार फिर सिया की ओर देखा। वह काव्या के साथ हँसते हुए कुछ कह रही थी और अपने दुपट्टे को सँभाल रही थी।

अर्जुन की नजर अनजाने में उसके लंबे झुमकों पर चली गई।

इतना तैयार होने की क्या जरूरत थी?

उसके मन में अचानक सवाल उठा।

एक औपचारिक मीटिंग ही तो है। गुलाबी अनारकली, लंबे झुमके, काजल…

वह आगे सोचता, उससे पहले ही खुद पर झुंझला उठा।

तुम्हें क्या हो गया है, अर्जुन? वह अपनी पसंद के कपड़े पहनेंगी। तुम्हें इससे क्या लेना-देना?

उसने अपनी घड़ी देखी और तेजी से आगे बढ़ गया।

लेकिन उसके मन में उठी बेचैनी अब भी बनी हुई थी।

---

गाड़ी के पास पहुँचकर सिया ने काव्या को विदा किया।

“तुम ऑफिस संभाल लेना। मैं लौटकर तुम्हें सब बताऊँगी।”

काव्या ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं इंतजार करूँगी, राजकुमारी। और हाँ, उनसे मेरी तरफ से भी एक सवाल पूछ लीजिएगा।”

“अब क्या?”

“उनकी आवाज़ इतनी गहरी क्यों है!”

सिया जोर से हँस पड़ी।

“तुम सच में नहीं सुधरोगी।”

“कभी नहीं!”

काव्या ने हाथ हिलाकर उसे विदा किया।

अर्जुन ने गाड़ी का दरवाजा खोला।

“राजकुमारी।”

सिया अंदर बैठने लगी, फिर अचानक रुककर उसकी तरफ मुड़ी।

“अर्जुन?”

“जी?”

“आपको सच में मेरे कपड़े अच्छे नहीं लगे?”

अर्जुन एक पल के लिए चुप हो गया।

उसकी नजर सिया के चेहरे पर ठहर गई।

वह चाहता तो कह सकता था कि वह खूबसूरत लग रही थी। यह कोई मुश्किल बात नहीं थी। लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इतनी छोटी-सी बात कहने से खुद को क्यों रोक रहा था।

“आपका पहनावा औपचारिक मुलाकात के लिए उपयुक्त है,” उसने अंततः कहा।

सिया ने माथे पर हाथ रख लिया।

“हे भगवान! मैं आपसे पूछ क्या रही हूँ और आप जवाब क्या दे रहे हैं!”

वह गाड़ी में बैठ गई।

अर्जुन ने दरवाजा बंद किया और दूसरी ओर जाकर बैठ गया।

गाड़ी चल पड़ी।

कुछ देर तक दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई।

सिया बाहर के नजारे देख रही थी, जबकि अर्जुन रास्ते और आसपास की गतिविधियों पर ध्यान दे रहा था।

फिर सिया ने अचानक पूछा, “आपको क्या लगता है, मिस्टर एस. कैसे होंगे?”

“मैं उनके बारे में व्यक्तिगत राय नहीं दे सकता, राजकुमारी। मैं उनसे मिला नहीं हूँ।”

“लेकिन आपने उनके बारे में जानकारी तो जुटाई होगी।”

“उनकी कंपनी और बैठक से संबंधित जानकारी जुटाई है। निजी व्यक्तित्व के बारे में अनुमान लगाना मेरे काम का हिस्सा नहीं है।”

सिया ने सिर हिलाया।

“आपसे किसी सवाल का सीधा और मजेदार जवाब मिलना नामुमकिन है।”

“आप चाहें तो सवाल पूछना बंद कर सकती हैं।”

सिया ने उसे घूरा।

“आपको पता है, आप बहुत बदतमीज हैं।”

“जी, राजकुमारी।”

“और आपको इसका कोई अफसोस भी नहीं है!”

“आपको ऐसा लगता है तो मैं क्या कर सकता हूँ?”

सिया ने मुँह फेर लिया।

अर्जुन ने सामने देखते हुए अपनी मुद्रा सामान्य रखी।

लेकिन उसके मन में एक सवाल फिर उठ आया।

राजकुमारी आज इतनी खूबसूरत लग रही हैं। और वह उसी आदमी से मिलने जा रही हैं, जिसके बारे में पिछले कई दिनों से इतनी बातें हो रही हैं।

उसने अपनी उँगलियाँ आपस में बाँध लीं।

यह सिर्फ एक औपचारिक मुलाकात है। मुझे बस अपना काम करना है।

उसने अपने मन को एक बार फिर समझाया।

लेकिन वह इस बात को समझ नहीं पा रहा था कि उसे बार-बार यही समझाने की जरूरत क्यों पड़ रही थी।

---

कुछ देर बाद गाड़ी पैलेस के मुख्य द्वार से बाहर निकलकर शहर की सड़क पर आ गई।

सिया ने अपनी फाइल खोली और प्रस्ताव के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर डाली। उसके चेहरे पर अब उत्साह के साथ-साथ थोड़ी गंभीरता भी थी।

अर्जुन ने उसे देखा।

“घबराहट हो रही है, राजकुमारी?”

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“थोड़ी-सी। आखिर पहली बार मिल रही हूँ उनसे।”

“आपको अपने प्रस्ताव की जानकारी है। उसी पर ध्यान दीजिए। बाकी बातें अपने आप स्पष्ट हो जाएँगी।”

सिया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

“यह हुई न कोई काम की बात।”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

सिया फिर फाइल देखने लगी।

कुछ क्षण बाद उसने धीरे से कहा, “वैसे, अगर वह सच में इतने अच्छे इंसान हुए, जितनी सब तारीफ करते हैं, तो उनके साथ काम करना अच्छा रहेगा।”

अर्जुन की नजर एक पल के लिए उसकी तरफ गई।

फिर उसने सड़क पर ध्यान केंद्रित कर लिया।

“यह फैसला उनकी कंपनी की समीक्षा और आपके प्रस्ताव की शर्तों पर निर्भर करेगा।”

“मुझे पता है। मैं बस कह रही हूँ।”

“जी।”

सिया ने हल्की साँस छोड़ी।

“आपसे बात करते हुए कभी-कभी लगता है कि मैं किसी इंसान से नहीं, किसी नियम-पुस्तिका से बात कर रही हूँ।”

अर्जुन के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन उसने उसे तुरंत दबा लिया।

“कम से कम नियम-पुस्तिका आपको गलत सलाह नहीं देगी, राजकुमारी।”

सिया हँस पड़ी।

“खड़ूस!”

इस बार अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

वह गाड़ी चलाता रहा, लेकिन उसके मन में एक अनचाहा विचार फिर उभरा।

अगर मिस्टर एस. सच में राजकुमारी को प्रभावित कर गए तो?

उसने तुरंत अपने विचार को काट दिया।

यह मेरा विषय नहीं है।

उसने सामने देखा।

मैं उनकी सुरक्षा के लिए जा रहा हूँ। केवल उनकी सुरक्षा के लिए।

गाड़ी आगे बढ़ती रही।

और अर्जुन अपनी ही सोच से अनजान, अपने चेहरे पर वही गंभीरता बनाए बैठा रहा।

उसे अभी यह एहसास नहीं था कि किसी दूसरे आदमी के सामने सिया के खूबसूरत दिखने का ख्याल ही उसके भीतर ऐसी जलन पैदा कर रहा था, जिसे वह किसी भी कीमत पर स्वीकार करने को तैयार नहीं था।

कल तक वह मिस्टर एस. को केवल एक रहस्यमयी बिज़नेसमैन समझता था।

आज पहली बार वह उस आदमी के बारे में सोच रहा था, जो सिया के सामने बैठने वाला था।

और यह सोच उसे बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी।

जारी रहेगा…

सुनते रहिए… ‘हुक्म और हसरत’ ❤️‍🔥

© Diksha 

आपकी लेखिका की ओर से ढेर सारा प्यार! 🫶🏻

अगर एपिसोड पसंद आया हो, तो अपनी राय और प्यार भरे रिव्यू ज़रूर दीजिए। आपकी प्रतिक्रिया मुझे आगे लिखने की प्रेरणा देती है। 💖

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