पत्थर तले Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

पत्थर तले

 

                उस बृहस्पतिवार के बाद से मैं अब चौकन्नी रहने लगी हूं। अपने बक्से के प्रति।अपनी आलमारी के प्रति।अपने खाने के प्रति।अपने सोने के प्रति।

               बेटे से कह कर अपना बक्सा मैं ने यहीं चारपाई के नीचे रखवा लिया है। रात बढ़ते ही मैं अपनी पहिएदार कुर्सी पर आ बैठती हूं। जब तक सब सो नहीं जाते मैं वहीं बैठी रहती हूं। रात में भी ज़रा आहट होती है तो मैं बेटे को पुकारने लगती हूं, “राकेश…राकेश…देखो कौन है?”

              अक्सर बेटा ही निकलता है और चीखता है। खूब चीखता है।

              अगली बार मैं फिर पुकारती हूं,“कौन है, देखो राकेश…” 

              ताकि सब लोग जान जांए मैं चौकन्नी रहती हूं। मुझ पर हाथ डालना मुश्किल होगा…

 

              उस बृहस्पतिवार बेटा अभी दफ़्तर के लिए निकला ही था कि नौकरानी मेरे कमरे में मेरे पिछले दिन के कपड़े उठाने चली आई।

               “क्या करना है इन्हें? गुस्से से मैं कांपने लगी।

               “आंटी जी इन्हें धोने के लिए मंगा रही हैं…आज उन्हों ने मशीन लगाई है…”

                घर में धोने की मशीन उसी दिन लगाई जाती जिस दिन घर की चादरें, गिलाफ़ या पर्दे धोने होते थे। वरना रोज़ के कपड़े बाथरूम में बाल्टी से धुलते थे।

              “रेणु को मेरे पास भेजो। मेरे कपड़े आज नहीं धुलेंगे…”

              “क्या बात है?” बहू की बजाए उस की मां मेरे कमरे में चली आई। 

               बहू ने मुझे बिल्कुल त्याग रखा है। बहू आजकल गर्भवती है। 

               मुझे कई बार लगता है मेरी बेटी के तीसरी बार मां बनने की सूचना मिलते ही बहू ने भी अपना परिवार बढ़ाने का बीड़ा उठाया है।अपनी उसी गर्भावस्था का वास्ता दे कर उस ने अपनी मां को अपने पास यहां बुला रखा है और मेरे पुकारने पर उस की मां ही मेरे पास आती- जाती है।

               “मैं ने रेणु को बुलाया था,” मैं ने कहा। बहू की मां मुझे फूटी आंख नहीं सुहाती। एक तो इस घर पर वह मुझ से ज़्यादा अपना हक जताती है तिस पर मेरा हर काम वह बड़ी हिकारत से करती है। मेरे कपड़े भी जब धुलाती है तो सब कपड़ों के बाद वाले घोल में। उस के कपड़ों के बाद वाले घोल में अपने कपड़े धुलवाना मुझे गवारा नहीं…

              “आप जानती हो उसे उठने- बैठने में अब तकलीफ़ शुरू हो जाती है,” बहू की मां तिरछी मुस्कराई। बहू के गर्भ का यह आठवां महीना है।

               फिर भी उसे मेरे पास आना ही होगा …,” मैं अड़ गई।

              “अजीब जीव हो आप,” बहू की मां ने मुंह बिचकाया, “बेचारी आराम कर रही है और आप उसे बुलाए चले जा रहे हो…,”

               “ठीक है,” मैं आगबबूला हो ली, “न आए वह। मैं ही उस के पास चली चलती हूं।”

               अपनी पहिएदार कुर्सी के सहारे मैं घर के अंदर घूम लेती हूं।

                बहू अपने कमरे में बैठी पिस्ता छील- छील कर खा रही थी।

                “रेणु,” मैं ने कहा, “आज मैं एक बार फिर तुम्हें बताने आई हूं। बृहस्पतिवार को तुम्हें कपड़े नहीं धुलाने चाहिए।  हमारे यहां वहम किया जाता है कि एक भाई और एक बहन वाले परिवार में बृहस्पतिवार के दिन कपड़े धुलाना अनिष्ट ला सकता है…”

                “मेरी मां आप के वहम के बारे में क्या जानें?” छिले हुए पिस्ते अपने मुंह में फांक कर बहू हंसी, “उधर अपने घर में वह कपड़े धुला लेती हैं सो बेध्यानी में यहां भी उन्हों ने मशीन खुलवा दी। अब इस में इतना हल्ला करने की है कोई ज़रूरत?” 

                “हल्ला?” मैं चौंकी, “मेरे बात बताने को तुम अब हल्ला कहोगी?”

                “बात ऐसे बताई जाती है क्या?” बहू ने मुंह बिचकाया, “इस रुआब से? मानो मेरी मां यहां आपकी टहल के लिए आईं हों? आप के नाज़- नखरे उठाने के लिए आईं हों?”

                “तुम्हें ऐसे नहीं बोलना चाहिए, रेणु,” मैं तमकी, “खासतौर पर अपनी मां के सामने। वह सोचेंगी इस घर में मेरी इज्ज़तदारी नहीं…,”

               “इज्ज़त तो आप मेरी उतारती हो,” बहू ने अपने हाथ नचाए, “जब देखो, बुलावा भेज देती हो। सब्ज़ी में आज नमक ज़्यादा क्यों? पालक में आलू क्यों पड़े हैं? लुबिया तेल में क्यों छौंकी है?”

               जब से मेरे बांए भाग में फ़ालिज गिरा है, और बढ़े हुए मेरे रक्तचाप को नीचा रखने के वास्ते डाक्टर ने मुझे नमक,आलू और तेल कम करने को बोला है, मुझे हर सब्ज़ी में इन तीनों की मात्रा ज़्यादा दिखाई देने लगी है। खासकर दोपहर के समय, जब बेटा घर पर नहीं रहता। 

               “अपनी बेटी को आप तमीज़ सिखाइए,” बहू की मां को मैं ने आंख दिखाई, “इस का इतना बढ़-चढ़कर बोलना सही नहीं…”

                “और आप बहुत तमीज़ से बोलती हो?” बहू की मां गला फाड़ कर चिल्लाई, “सब की इज्ज़त हर बात पर उतारती हो और ऊपर से तमीज़ की बात करती हो?”

                 मैं सन्न रह गई। बहू तो पहले ही से मुझे बेलिहाज़ी दिखाया करती थी और अब उस की मां ऐसा घमासान करेगी? घर- फोड़ी?

                “ठीक है,आज से आप दोनों से मैं अब बात तक न करूंगी,” अपनी पहिएदार कुर्सी को बाज़ू के रुख में मैं लौटा लाई।

 

                “तुम्हें रेणु की मां से माफ़ी मांगनी चाहिए,मां,” शाम को बेटे ने घर लौटते ही मुझे सुनाया, “रेणु तो प्रसूति के लिए उधर अपने मायके जाना चाहती थी…”

                “झूठ, बिल्कुल झूठ,” मैं आग हो ली, “पहले दोनों बच्चे कहां पैदा हुए? यहीं ना? हमारे कस्बापुर के अस्पताल में ही ना?”

                “लेकिन मां,” बेटा नरम पड़ गया, “तब तुम तगड़ी थीं। तुम्हारे बूते वह यहीं पैदा हुए। यहीं पालने में झूले। यहीं बड़े हुए। तुम्हारी गोद में।तुम्हारे आंचल में…”

                मेरी पोती दस साल की है और बड़ा पोता सात का।

               “तुम्हें सब याद है, राकेश?” मेरी रुलाई छूट ली, “मगर रेणु को कुछ याद नहीं। वह जब भी मुंह खोलती है ,कड़ुवा ही बोलती है…”

               “बोले चाहे जैसा,” बेटे ने मेरा कंधा थाम लिया, “मगर तुम्हारी सेवादारी में तो कोई कोर- कसर नहीं छोड़ती…”

               सेवादारी? मैं ने पूछना चाहा था, या धाय- धपड़? मगर मेरी रुलाई आड़े आ गई। 

              “तुम समझती क्यों नहीं,मां? जो रेणु की मां को मैं यहां लिवा लाया?” बेटे ने अपना स्वर धीमा कर लिया, “रेणु के लिए कम, तुम्हारे लिए ज़्यादा। रेणु उधर चली जाती तो उस का कुछ नहीं बिगड़ता। मगर इधर तुम्हारा ध्यान कौन रखता? घर का ध्यान कौन रखता? मेरे दफ़्तर जाते ही नौकरानी किसी लुटेरे को बुला लेती तो? घर का नुकसान जो होता सो होता मगर तुम्हें भी तो खतरा रहता…”

              “यह नौकरानी ऐसी नहीं,” मैं ने कहा, “अपनी पेंशन में से मैं उसे अक्सर इनाम दिया करती हूं। मेरे पुराने कपड़े भी वही पाती है।”

              “किसी का क्या भरोसा?” बेटे ने मेरा कंधा छोड़ कर मेरा दांया हाथ थाम लिया, “नौकरानी का दिल कब उलट जाए, क्या भरोसा? कम- से- कम रेणु के यहां रहने से ऐसा कोई खतरा तो नहीं ना! इसीलिए मैं कहता हूं तुम रेणु का और उस की मां का एहसान पहचानो। उन की मालकिन बन कर उन्हें धौंसियाओ नहीं…”

             “मैं उन्हें धौंसियाती हूं?” मेरा दिल डूबने लगा। मुझे लगा अपने पिता के जाने के बाद ही से बेटे को भी मेरी पदवी का लिहाज़ नहीं रहा, “ऐसा है तो तुम मुझे उषा के पास भेज दो। जब तक रेणु की मां इस घर में रहेगी, मैं यहां पानी तक न पिऊंगी…”

              “फ़ोन लगा ही दीजिए जीजी को,” कनसुई ले रही बहू फ़ौरन मेरे कमरे में चली आई, “हमें क्या दिक्कत है? ममीजी कुछ महीने वहां रह लेंगी तो अच्छा ही है। इन का हवा- पानी बदल जाए गा…”

 

              “मां तुम से बात करेंगी,जीजी,” बेटे ने उषा का नंबर मिला कर अपना मोबाइल मुझे थमा दिया।

              “हलो,उषा। मैं सोच रही थी यह जो तुम्हारा हमारे यहां आना टलता ही जा रहा है सो मैं ही अपने नए नन्हें- मुन्ने के दर्शन करने तुम्हारे पास बरेली आ जाऊं…”

              तीसरी बार मां बनने के बाद से उषा यहां तीन महीनों से नहीं आई थी वरना मुझे देखने के वास्ते वह हर तीसरे- चौथे हफ़्ते मेरे पास चली आया करती। बल्कि मुझे कई बार ऐसा भी लगता कि उस के पैर में इस तीसरे बच्चे की बेड़ी मेरे दामाद ने जानबूझकर डाली थी। वरना दो बेटों के होते हुए इस तीसरे गर्भ की क्या तुक थी?

              “अभी नहीं, मां!” उषा ने फ़ौरन मुझे टाल दिया, “अभी इधर सबकुछ गड़बड़ चल रहा है। मेरी तबीयत अक्सर बिगड़ी रहती है और ऐसे में मैं तुम्हारी देखभाल तनिक न कर पाऊंगी। अभी दो- एक महीना तो मेरे पास आने की सोचो भी नहीं।मैं आऊंगी ना! रेणु की प्रसूति के वक्त…”

             “ठीक है,” मैं ने फ़ोन काट दिया।

             “कब जांएगी?” बहू हंसने लगी।

             “जाने से पहले बता कर जाऊंगी,” अपना दायां हाथ मैं ने हवा में लहरा दिया।

              “खाना आप को भिजवा दूं?” बहू दोबारा हंस दी।

              “अभी नहीं। एक घंटा रुक कर,” मैं ने कहा और निश्चय किया कि अब मैं चुप रहा करूंगी। और ज़्यादा चुप रहा करूंगी। ताकि जो कहूं उसे फिर वापस न लेना पड़े….