सर्द दिसंबर की उस तेरहवीं तारीख को विलंब के कारण हिमगिरि एक्सप्रेस पठानकोट से लखनऊ रात में नौ पैंतीस पर पहुंची।
लखनऊ में हो रही नंदिता की बेटी की शादी पर मैं अकेली गई थी। संयोग से उन दिनों मेरे पति विदेश में थे, मेरी विवाहिता बेटी अपनी गर्भावस्था के आठवें महीने में थी और डाक्टरी कर रहा मेरा बेटा अपनी पढ़ाई में व्यस्त था।
“क्या आप सुधा आंटी हैं? नंदिता आंटी की स्कूल की सहपाठिन?”
स्टेशन पर मुझे लिवाने हेतु एक अजनबी युवक आया था।
अपने कस्बापुर के स्कूल में नंदिता और मैं पहली कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक सहपाठिनें रहीं थीं।किंतु बारहवीं कक्षा में नंदिता के फ़ेल हो जाने के कारण हमारे रास्ते अलग हो लिए थे। मुझे अमृतसर के मेडिकल कालेज में एडमिशन मिल गई थी और नंदिता की शादी कर दी गई थी। एक बड़े व्यवसायी घराने में। किंतु आपस में हमारा संपर्क कभी न टूटा था। पिछले वर्ष हुई मेरी बेटी की शादी में नंदिता अपने पति रोहित के साथ पठानकोट आई थी और मेरी बेटी को दी गई उस की भेंट इतनी वज़नदार रही थी कि अब उस की बेटी की शादी में मेरा सम्मिलित होना अनिवार्य हो गया था।
रास्ते की धुंध और हमारी उम्र के बीच के फ़ासले ने उस अजनबी युवक के संग मेरी बतकही को अल्पतम रखा था और उस ने मुझे मेरे सामान समेत नंदिता के एक नौकर को सौंपने में चुस्ती दिखाई थी, “पुत्तीलाल, यह आंटी पठानकोट से आई हैं। इन्हें इन के कमरे में पहुंचा दो। जब तक मैं नंदिता आंटी को इन के आने की सूचना दे दूं। वह उधर बारातियों को खाना खिला रही होंगी….”
“आप का कमरा उधर ऊपर है,” पुत्तीलाल सीढ़ियों की ओर लपक लिया।
“इधर नीचे का कोई कमरा दिखाओ, घुटनों का मेरा दर्द सीढ़ियों पर मेरे पहुंचते ही लौट आता है।”
“इधर नीचे बैठक है,खाने का कमरा है, किचन है और अम्मा जी का कमरा है, जहां किसी को भी ले जाने की हमें सख्त मनाही है….”
“तुम मुझे उन्हीं के कमरे में ले चलो। तुम्हारी अम्मा जी को मैं जानती हूं….”
“नहीं। वह बेचारी बहुत बीमार चल रही हैं। हमें साहब, मेम साहब दोनों ने कह रखा है वहां कोई न जाएगा….”
“मैं एक डाक्टर हूं,” मैं अड़ गई, “तुम्हारी अम्माजी का इलाज भी कर चुकी हूं। दमे की उन की बीमारी मेरी जानी हुई है….”
ब्रौंकियल उन के एस्मा से मेरा परिचय नंदिता की सगाई के अवसर पर हुआ था।
फूलों की टोकरी जैसे ही कमरे में लाई गई थी उन की नाक और आंखें बहने लगी थीं।और उन के हाथ अपने कान खुजलाने में व्यस्त होने लगे थे।
“इन्हें अवश्य पोलन से एलर्जी है,” अविलंब मैं उन्हें दूसरे कमरे में ले गई थी।
लेकिन जब टप- टप टपक रही उन की नाक और घर-घर घरघरा रही उन की सांस के साथ-साथ उन की देह पसीने से तर- ब- तर हो उठी थी तो एंटी- हिस्टेमाइन की खुराक तैयार कर रहे मेरे हाथ वहीं रुक गए थे। उन्हें पोलनौसिस न था, सीधा स्टेटस एस्थेमैटिकस था।
बाज़ार से फिर उन के लिए मैं ने थियोफ़िलाइन का टीका मंगवाया था जिसे उन की श्वसन क्रिया को सामान्य करने में लगभग एक घंटा लग गया था।
(2)
अपने उस कमरे में रोहित की अम्माजी बेसुध पड़ीं थीं। नीले होठों के साथ।
मेरे हाथ उन की छाती की ओर बढ़ लिए।
अंतःश्वस्न की स्थिति में उन की छाती जकड़ी हुई थी। उन के कपड़ों के नीचे ढोलाकार उन का धड़ देख कर मुझे एम्फ़ीसिमा के मरीज़ की बैरल- चेस्ट का ध्यान हो आया।
तो क्या उन का दमा एम्फ़ीसिमा का रूप धारण कर चुका था? क्या इसीलिए पहले की तुलना में उन का शरीर भी दो- तिहाई सिकुड़ लिया था?
“अपनी मेम साहब को फ़ौरन बुला कर लाओ। एमरजेंसी है यहां,” पुत्तीलाल को नंदिनी के पास भगा कर मैं ने अपने हाथों का सहारा दे कर उन की छाती ऊपर उठा दी और उन का तकिया उन की पीठ से जा सटाया, ताकि उन के सिर की ऊंचाई उन की छाती से नीचे रहे।
“सुधा,” नंदिता ने आते ही मेरी पीठ पर अपने हाथ चिपका दिए।
“इन की दवाइयां कहां हैं?”सुधा से मिलने की बजाए मुझे रोगिणी को बचाने की ज़्यादा जल्दी रही।
“यह देखो,” टीन का एक डिब्बा नंदिता ने मेरी ओर बढ़ाया, “इस में सब हैं….इनहेलर….एरोसोल….ब्रौंकोडाएलेटर….”
नेबुलाइज़र की सहायता से डिब्बे में रखे इनटौल का एक फुहारा मैं ने अम्माजी के मुंह में छोड़ा मगर दमघुट्ट उन की नाक में से रेण्ट की एक भी परत न सरकी।
केवल उन की आंखें झपक लीं।
“इन्हें आक्सीजन चाहिए,” मैं घबरा गई, “फ़ौरन। अब या तो तुम इन्हें किसी अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था करो या किसी को भेज कर इन के लिए आक्सीजन यहीं मंगवा दो….फ़ौरन….बिना एक भी पल गंवाए….”
“देखती हूं….अभी देखती हूं….”
“अजीब,भोली बात करती हो, सुधा,” इस बार आने वाली नंदिता की जगह उस की मां,खत्री आंटी थीं, “उधर हमें अपने दम मारने की फ़ुर्सत नहीं और इधर तुम अपना हो- हल्ला ले बैठी हो….”
मैं हैरान हुई। खत्री आंटी मुझे पूरे छब्बीस साल बाद मिल रहीं थीं, लेकिन मेरे लिए उन की मुंहज़ोरी अपनी जगह पर अभी भी कायम थी।उन्हें बताना चाहा मैं ने, वर्षों पहले कालेज प्राध्यापक रहे मेरे पिता की आय इंजीनियर खत्री अंकल से ज़रूर कम रही होगी किंतु अब तो मेरी और मेरे डाक्टर पति की आय जुड़ कर नंदिता की पारिवारिक आय से यदि अधिक नहीं थी तो बराबर के जोड़ की तो थी ही….
“इन्हें आक्सीजन दिलाना बहुत ज़रूरी है, आंटी। देखिए इन के होंठ कैसे नीले से गहरे नीले पड़ रहे हैं….”
“कैसी बेवक्त की बात करती हो, सुधा?” खत्री आंटी ने थुलथुले अपने हाथ नचाए, “जानती नहीं किया? इस वक्त क्या ज़रूरी है और क्या गैर- ज़रूरी?”
“मेरे ख्याल में इन्हें बचाना सब से ज़्यादा ज़रूरी है….”
“तेरे ख्याल से?” खत्री आंटी ने मेरा कंधा झकझोर दिया, “तू कौन है इस की? तू क्या लगती है इस की? न! तू यह बता इस के परिवार में से किसी ने कुछ कहा तुझ से? इसे ज़िंदा रखो? इस का इलाज करो?”
“आप कैसी बात कर रही हैं? आंटी? क्या चाहती हैं? इन्हें ऐसे जा लेने दूं?” अपने कंधे से उन का हाथ मैं ने अलग करने की चेष्टा की ।
खत्री आंटी ने अपने को तुरंत संभाल लिया और अपना पैंतरा बदल लीं, “हां। तेरी भलाई ही के लिए तुझ से ऐसा कह रही हूं….इन्हें इन की कैसी भी हालत में तुझे इन्हें हाथ तक न लगाना चाहिए। खैरख्वाही दिखाते -दिखाते तुझे ही कहीं लेने के देने न पड़ जाएं। इस का इकलौता,वह रोहित,तुझ से ही लेखा न मांग बैठे….”
“आप को मेरी योग्यता पर ज़रूर संदेह है,आंटी।लेकिन उधर पठानकोट में मेरे मरीज़ मुझे पूजते हैं….”
“न! यहां तू अपने पुजारियों की गिनती बढ़ाने आई हो या शादी में शामिल होने?”
“आप जाना चाहें तो बेशक चली जाइए,आंटी। मगर नंदिता को यहां ज़रूर भेज दीजिए। बस, एक बार और….”
“ठीक है, मैं जाती हूं। मगर मेरी एक बात का ध्यान ज़रूर रखना। अगर तुझ से कोई ऊंच- नीच हो गई तो बाहर आ कर उस का बखान न करने लग जाना। शादी में शामिल लोगों का ध्यान बंटना नहीं चाहिए। अपशगुनी हो जाएगी….”
(3)
“सौरी सुधा,मुझे आने में समय लग गया,” जब तक नंदिता आई,रुग्णा की दशा बिगड़ चुकी थी।
“इन के प्राण छूट रहे हैं,” मैं ने अपना सिर हिलाया, “इन की आंखों की फड़फड़ाहट लुप्त हो रही है। इन्हें आक्सीजन मिलनी चाहिए थी। वक्त पर। उसी समय जब मैं ने पुत्तीलाल को तुम्हारे पास भेजा था….”
“रोहित को इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं होना चाहिए,” नंदिता ने मुझे अपने अंक में भर लिया, “प्लीज़,सुधा। उन्हें कभी नहीं कहना अम्माजी आक्सीजन के न रहते यों चली गईं….”
“क्या… या…या?” मैं चौंकी।
“नहीं, प्लीज़ सुधा। उन्हें कभी नहीं मालूम होना चाहिए कि तुम ने अम्माजी को मरते हुए देखा है….”
“मतलब?मैं उन से कहूंगी कि अम्माजी मेरे आने से पहले स्वर्ग सिधार चुकीं थीं?”
“नहीं। तुम रोहित से कुछ भी नहीं कहोगी। रोहित को इस समय कतई नहीं मालूम होना चाहिए अम्माजी नहीं रहीं। नहीं तो शादी में विघ्न पड़ जाएगा। सारे काज अधूरे रह जाएंगे। कहीं कुछ सवरेंगा नहीं। नया बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। अपशगुनी हो जाएगी…..
स्वीकृति में मैं ने अपना सिर निहुराया।
पाणिग्रहण के बाद लड़की की विदाई अगली सुबह मुंह- अंधेरे कर दी गई। मुहूर्त अनुसार।
“आप सब को रिसेप्शन में ज़रूर आना है,” नंदिता के समधी व समधिन ने बारी- बारी से सभी घरातियों को निमंत्रण दिया, “याद रहे। आज की तारीख में। आठ बजे….”
“ज़रूर, ज़रूर,” खत्री आंटी का उत्तर सब से ज़्यादा ज़ोरदार और श्रवणीय रहा।
नंदिता के सहवर्ती के रूप में समधी की दावत में रोहित भी पूर्ण मनोयोग से सम्मिलित हुए। दावत की स्वागत- समिति के एक सदस्य की हैसियत से नंदिता की भागीदारी में अपनी भूमिका उन्हों ने बखूबी निभाई। सम्पूरित कार्य-परायणता एंव व्यवहारिकता के साथ।
काल- गूदड़ी में वेष्टित अपनी मां की मृत्यु की घोषणा उन्होंने फिर तीसरे दिन ही की। पंद्रह दिसंबर को।
जब तक आधे से ज़्यादा उन के अपने मेहमान शादी की मिठाई के साथ अपने-अपने घरों के लिए प्रस्थान कर चुके थे।
मेरे समेत।
सुबह की नौ चालीस वाली पठानकोट- सियालदह से मेरी वापसी की टिकट जो पंद्रह दिसंबर की थी।