मेरी मंजिल
लेखक: विजय शर्मा एरी
गाँव की धूल भरी सड़क पर सूरज ढल रहा था। आसमान में लाल-नारंगी रंग फैल गए थे। पंद्रह साल का रवि अपने स्कूल का बैग कंधे पर लटकाए, सिर झुकाए चल रहा था। उसके पैरों में घुटनों तक की खाकी पैंट और फटी चप्पलें थीं। बैग में किताबें तो थीं, लेकिन दिल में एक सवाल बार-बार घूम रहा था—“मेरी मंजिल क्या है?”
रवि के पिता रामप्रसाद एक छोटे से खेत में मजदूरी करते थे। माँ सीता घर का काम संभालतीं और कभी-कभी पड़ोस के घरों में बर्तन माँजकर कुछ पैसे कमा लेतीं। तीन भाई-बहनों में रवि सबसे बड़ा था। छोटी बहन रीना और भाई मोहन अभी स्कूल जाने लगे थे। घर में हमेशा कमी रहती। कभी अनाज की, कभी कपड़ों की, कभी दवा की।
उस शाम रवि घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी रोटी सेंक रही थीं। पिता खेत से थके हुए लौटे थे। रवि ने बैग एक तरफ रख दिया और चुपचाप बैठ गया।
“क्या हुआ बेटा? आज उदास क्यों हो?” माँ ने पूछा।
रवि ने सिर उठाया, “माँ, टीचर ने आज कहा कि जो बच्चे पढ़ाई में अच्छे होते हैं, वे शहर जाकर बड़ी-बड़ी नौकरियाँ करते हैं। उनके पास अपना घर होता है, गाड़ी होती है। हमारी तो कोई मंजिल ही नहीं है माँ।”
माँ मुस्कुराईं। उनकी मुस्कान में थकान थी, लेकिन प्यार भी। “मंजिल तो हर किसी की अपनी होती है बेटा। किसी की मंजिल पहाड़ की चोटी होती है, किसी की नदी का किनारा। तुम्हारी मंजिल तुम्हें खुद तय करनी होगी।”
रवि समझ नहीं पाया। रात को वह छत पर लेटा आसमान देखता रहा। तारे टिमटिमा रहे थे। उसने मन ही मन वादा किया—“मैं अपनी मंजिल खुद बनाऊँगा।”
अगले दिन स्कूल में गणित का पीरियड था। टीचर ने बोर्ड पर एक सवाल लिखा। कक्षा के ज्यादातर बच्चे उलझन में थे। रवि ने ध्यान से देखा और सही जवाब दे दिया। टीचर ने उसकी पीठ थपथपाई, “रवि, तुम अगर मेहनत करते रहे तो आगे बहुत दूर जा सकते हो।”
वह दिन रवि के जीवन का मोड़ बन गया। उसने तय किया कि वह सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देगा। घर लौटकर वह खेत में पिता की मदद करता, फिर रात को दीये की रोशनी में किताबें खोलता। कभी-कभी दीया बुझ जाता तो चाँदनी में पढ़ता।
दिन बीतते गए। रवि ने दसवीं कक्षा में जिले में दूसरा स्थान हासिल किया। समाचार अखबार में छपा। गाँव वाले घर आने लगे। किसी ने कहा, “अब शहर जाकर कॉलेज पढ़ो।” किसी ने कहा, “नौकरी लगा लो।” लेकिन रवि के पिता ने साफ कहा, “हमारे पास इतने पैसे नहीं कि शहर भेज सकें।”
रवि चुप रहा। उसने फैसला किया कि वह गाँव में ही रहकर आगे पढ़ेगा। पास के कस्बे में इंटर कॉलेज था। वह रोज़ पंद्रह किलोमीटर पैदल जाता। गर्मी हो या बारिश, वह कभी नहीं रुका। रास्ते में एक पुराना बरगद का पेड़ था। वहाँ वह बैठकर पानी पीता और आगे बढ़ जाता।
इंटर में भी उसने अच्छे नंबर लाए। अब बी.ए. करना था। पैसे की समस्या और बढ़ गई। तभी गाँव के एक बुजुर्ग ने सलाह दी, “बेटा, तुम ट्यूशन पढ़ाया करो। छोटे बच्चों को। इससे कुछ कमाई हो जाएगी।”
रवि ने सोचा और हाँ कह दिया। गाँव के दस-बारह बच्चे उसके पास आने लगे। वह उन्हें गणित और विज्ञान सिखाता। शाम को खेत में काम, रात को अपनी पढ़ाई। धीरे-धीरे उसकी कमाई से घर का खर्च चलने लगा। छोटी बहन रीना की पढ़ाई का खर्च भी वह उठाने लगा।
बी.ए. पूरा होने के बाद रवि ने बी.एड. करने का फैसला किया। अब वह कस्बे में एक छोटे से कमरे में रहने लगा। कमरा किराए का था। दीवारें नम थीं, छत से पानी टपकता था। लेकिन रवि को कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह जानता था कि यह अस्थायी है।
एक दिन कॉलेज में एक सेमिनार हुआ। विषय था—“शिक्षा और ग्रामीण विकास”। रवि ने उसमें भाग लिया। उसका भाषण इतना प्रभावशाली था कि जिला शिक्षा अधिकारी ने उसे बुलाया। “तुम्हें अपने गाँव में प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक की नौकरी दे सकते हैं। क्या तुम तैयार हो?”
रवि के मन में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन साथ ही एक सवाल भी उठा—“क्या यही मेरी मंजिल है?” उसने हाँ कह दिया। नौकरी लग गई। वेतन छोटा था, लेकिन स्थिर था।
गाँव लौटकर रवि ने स्कूल जॉइन किया। वहाँ की हालत बहुत खराब थी। दीवारें टूटी हुईं, बेंचें टूटी हुईं, बच्चे बैठने के लिए फर्श पर बैठते। रवि ने सबसे पहले बच्चों से दोस्ती की। वह उन्हें कहानियाँ सुनाता, खेल खिलाता, और धीरे-धीरे पढ़ाई की ओर ले जाता।
एक साल बाद स्कूल में बदलाव आने लगा। बच्चों की संख्या बढ़ी। गाँव वालों ने मिलकर दीवारें सुधारीं। रवि ने अपनी सैलरी का एक हिस्सा किताबें और स्लेट खरीदने में लगा दिया। धीरे-धीरे स्कूल जिले का मॉडल स्कूल बन गया।
लेकिन रवि के मन में अभी भी अधूरापन था। वह सोचता—“क्या मैं सिर्फ एक शिक्षक बनकर रह जाऊँगा? मेरी अपनी मंजिल इससे आगे होनी चाहिए।”
एक दिन जिला मुख्यालय में एक कार्यक्रम हुआ। वहाँ एक गैर-सरकारी संस्था के लोग आए थे। वे ग्रामीण शिक्षा पर काम करते थे। रवि ने उनसे बात की। उन्होंने उसकी कहानी सुनी और प्रस्ताव रखा—“हमारे साथ काम करो। गाँव-गाँव जाकर स्कूल सुधारो, शिक्षकों को ट्रेनिंग दो।”
रवि ने सोचा। नौकरी छोड़ना जोखिम भरा था। लेकिन माँ की बात याद आई—“मंजिल तुम्हें खुद तय करनी होगी।” उसने इस्तीफा दे दिया।
अब रवि संस्था के साथ काम करने लगा। वह पूरे जिले में घूमता। जहाँ स्कूल बंद पड़ रहे थे, वहाँ उन्हें फिर से शुरू कराता। शिक्षकों को नई विधियाँ सिखाता। बच्चों के लिए मुफ्त किताबें और यूनिफॉर्म का इंतजाम करता। उसकी मेहनत रंग लाई। कई गाँवों में शिक्षा का स्तर सुधरा।
पाँच साल बीत गए। रवि अब एक जाना-माना शिक्षाकर्मी बन चुका था। एक दिन राज्य स्तर पर पुरस्कार समारोह हुआ। मुख्यमंत्री ने उसे “श्रेष्ठ ग्रामीण शिक्षक” का पुरस्कार दिया। मंच पर खड़े होकर रवि ने कहा, “यह पुरस्कार मेरा नहीं, उन सभी बच्चों का है जो धूल भरी सड़कों पर पैदल चलकर स्कूल आते हैं। मेरी मंजिल अभी बाकी है।”
समारोह के बाद एक बड़ी संस्था ने उसे शहर बुलाया। प्रस्ताव था—राज्य स्तर पर शिक्षा नीति बनाने वाली टीम में शामिल होना। वेतन बहुत अच्छा था, सुविधाएँ थीं। लेकिन रवि ने मना कर दिया।
“मेरी मंजिल शहर नहीं है,” उसने कहा। “मेरी मंजिल उन गाँवों में है जहाँ अभी भी बच्चे स्कूल नहीं जाते। मैं वहीं रहूँगा।”
संस्था वाले हैरान रह गए। लेकिन रवि अडिग रहा। वह वापस अपने जिले लौट आया। अब उसने एक नया सपना देखा—गाँव में एक आदर्श विद्यालय बनाना जहाँ गरीब बच्चे मुफ्त में अच्छी शिक्षा पा सकें।
जमीन का इंतजाम हुआ। गाँव वालों ने सहयोग दिया। कुछ पुराने विद्यार्थी जो अब शहर में काम करते थे, उन्होंने पैसा भेजा। रवि ने अपनी सारी जमा पूँजी लगा दी। दो साल की मेहनत के बाद विद्यालय तैयार हुआ। नाम रखा गया—“अपनी मंजिल विद्यालय”।
उद्घाटन के दिन पूरा गाँव जमा था। रवि के माता-पिता आँसू बहा रहे थे। छोटी बहन रीना, जो अब कॉलेज में पढ़ती थी, गर्व से देख रही थी। रवि ने भाषण दिया—
“दोस्तों, जब मैं छोटा था तो सोचता था कि मंजिल कोई दूर का शहर है, कोई बड़ी इमारत है, कोई ऊँची कुर्सी है। लेकिन आज समझ आया कि मंजिल वह जगह है जहाँ तुम दूसरों के जीवन में रोशनी ला सको। मेरी मंजिल यही विद्यालय है, ये बच्चे हैं, और आने वाले समय में सैकड़ों गाँव हैं जहाँ शिक्षा पहुँचानी है।”
विद्यालय चल पड़ा। रवि खुद वहाँ पढ़ाता। सुबह से शाम तक व्यस्त रहता। शाम को वह बरगद के पेड़ के नीचे बैठता—वही पेड़ जहाँ कभी पानी पीकर आगे बढ़ता था। अब वहाँ बैठकर वह सोचता कि कितना सफर तय कर लिया है।
एक दिन एक पत्र आया। दिल्ली से। एक राष्ट्रीय संस्था ने उसे पूरे देश में ग्रामीण शिक्षा के मॉडल पर काम करने के लिए आमंत्रित किया था। रवि ने पत्र पढ़ा और मुस्कुराया। उसने जवाब लिखा—“मैं आभारी हूँ, लेकिन मेरी मंजिल अभी यहीं है। जब मेरे जिले के हर बच्चे को अच्छी शिक्षा मिल जाएगी, तब मैं आगे सोचूँगा।”
साल बीतते गए। रवि की शादी हो गई। उसकी पत्नी भी शिक्षिका बनी और विद्यालय में मदद करने लगी। दो बच्चे हुए। दोनों को उसने वही सिखाया जो माँ ने कभी उसे सिखाया था—“अपनी मंजिल खुद तय करो।”
एक शाम रवि अपने पुराने घर की छत पर बैठा था। आसमान में वही तारे टिमटिमा रहे थे। माँ अब बुजुर्ग हो चुकी थीं। वे पास आकर बैठ गईं।
“बेटा, याद है न? तुमने कभी पूछा था कि हमारी मंजिल क्या है। आज देखो, तुमने अपनी मंजिल खुद बना ली।”
रवि ने माँ का हाथ पकड़ा, “माँ, मंजिल तो अभी बाकी है। जब तक एक भी बच्चा शिक्षा से वंचित है, मेरी मंजिल अधूरी है।”
माँ मुस्कुराईं। उनके आँखों में गर्व था।
आज रवि पचास वर्ष का हो चुका है। उसका विद्यालय जिले का सबसे अच्छा विद्यालय बन चुका है। सैकड़ों बच्चे वहाँ से निकलकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक बन चुके हैं। कुछ तो विदेश तक पहुँच गए हैं। लेकिन सबसे ज्यादा खुशी रवि को तब होती है जब कोई पुराना विद्यार्थी गाँव लौटकर स्कूल सुधारने में मदद करता है।
रवि अक्सर कहता है—“मंजिल कोई जगह नहीं होती। मंजिल एक सफर होती है। और सफर तब खूबसूरत बनता है जब तुम दूसरों को भी साथ ले चलो।”
गाँव की धूल भरी सड़क पर अब पक्की सड़क बन गई है। स्कूल की इमारत चमकती है। बच्चे हँसते-खेलते जाते हैं। और बरगद के पेड़ के नीचे कभी-कभी एक बुजुर्ग आदमी बैठा दिखता है—सिर पर सफेद बाल, आँखों में वही चमक जो कभी पंद्रह साल के रवि की आँखों में थी।
वह आदमी रवि है। और उसकी मंजिल अभी भी आगे बढ़ रही है—गाँव-गाँव, बच्चे-बच्चे, सपना-सपना।
क्योंकि मंजिल कभी खत्म नहीं होती। वह सिर्फ बदलती रहती है। और जो अपनी मंजिल खुद बनाता है, वही सच में पहुँचता है।
समाप्त
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