Love love love Vikash Khatawaliya द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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Love love love

Love= हवस=

LOVE = हवस = प्राथमिकता

LOVE = हवस = मानसिक शांति

LOVE = हवस = परवाह

लेखक: विकास खटावलिया  

शुरुआत: तीन हवस और एक कड़वा सच
आज के दौर में 'प्यार' शब्द का मतलब हर किसी के लिए अलग हो चुका है। कोई इसे स्टेटस सिंबल समझता है, कोई सोशल मीडिया की नुमाइश, तो कोई महज़ खाली वक्त का टाइमपास। लेकिन सच कहें तो इस चमक-धमक और झूठी बातों के पीछे आज हर इंसान को जो सबसे शिद्दत से चाहिए, वो है—  
हवस  
हवस  
हवस  
यह शब्द सुनते ही अक्सर लोगों की भौहें तन जाती हैं। क्योंकि हमारे समाज ने इस लफ़्ज़ को सिर्फ जिस्म की चौखट और बंद कमरों तक सीमित कर दिया है। पर मैं जिस हवस की बात कर रहा हूँ, वो जिस्म की नहीं, रूह की भूख है—एक ऐसी तलब जिसके बारे में न कोई खुलकर बोलता है, न आसानी से स्वीकार करता है।  
आज लोग जिसे प्यार कहते हैं, उसे 'सुरक्षा' के नाम पर कैद (Lock) करके रखना चाहते हैं। पहरे बिठा दिए जाते हैं, पासवर्ड माँगे जाते हैं, सवाल-जवाब की अदालतें सजती हैं—सिर्फ इस डर से कि कहीं वो इंसान हाथ से फिसल न जाए। पर सच यह है कि जिसे जाना है, वो हर पहरा, हर ताला तोड़कर जाएगा। रोकने की कोशिश सिवाय घुटन के कुछ नहीं देती।  
इसलिए किसी के जाने का मातम मनाने या खोखले रिश्तों में घुटने से पहले, मैं आपको इन तीन हवस की असलियत समझाना चाहता हूँ:  
प्राथमिकता (Priority): भीड़ भरे इस जहाँ में सिर्फ एक इंसान की पहली पसंद बनने की हवस—जहाँ आप कोई 'ऑप्शन' नहीं, 'ज़रूरत' हों।  
मानसिक शांति (Peace): दिन भर के ड्रामे और दुनिया के शोर के बाद जिसके पास बैठते ही ज़हन शांत हो जाए, उस सुकून की हवस।  
परवाह (Caring): बिना माँगे कोई हाल पूछ ले, बिना कहे कोई दर्द भांप ले, उस देखभाल की हवस।  
अगर आपकी ज़िंदगी में कोई ऐसा है जो आपको ये तीनों दे रहा है, तो समझ लीजिए कि आपको एक बेहतरीन इंसान मिला है।  
लेकिन यहाँ एक कड़वा सच अपनी डायरी में लिख लीजिए—किसी का आपको ये सब देना इस बात की गारंटी बिल्कुल नहीं है कि वो ताउम्र आपके साथ ही रहेगा। लोग बदलते हैं, रास्ते बदलते हैं, और कभी-कभी वक़्त के साथ ज़रूरतें भी बदल जाती हैं।  
प्यार का मतलब किसी को हमेशा के लिए बाँध लेना नहीं, बल्कि जब तक वो साथ है, तब तक उस रिश्ते को इन तीन सच्चाइयों के साथ जीना है।  
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लास्ट वर्ड्स बुक के --

अंतिम शब्द: लेखक की कलम से

कहने को तो इन लफ़्ज़ों को और भी लिख सकता हूँ, कई और पन्ने काले किए जा सकते हैं। पर बात यह है कि जितना ज़्यादा लिखेंगे, उतना ज़्यादा उलझते जाएँगे।  
क्योंकि शब्द बिल्कुल ज़िंदगी की तरह होते हैं—जितना दूर उन्हें लेकर जाओगे और जहाँ तक खींचोगे, वे वहीं तक फैलते चले जाएँगे। अब वो आप पर निर्भर करता है कि आप उन्हें कैसे ले जा रहे हैं, और आपकी समझ उन्हें कहाँ तक थामती है।  
अक्सर दुनिया कहती है कि 'किताबें बोलती हैं'।  
पर मुझे हमेशा से यह लगता है कि किताबें नहीं, असल में कलम बोलती है—क्योंकि किताबों की छाती पर जो कुछ भी दर्ज होता है, वो सब इसी कलम की स्याही से उतरता है।  
मेरी कलम का सफ़र इस किताब के लिए यहीं तक था... अब आगे का सफ़र आपकी ज़िंदगी और आपकी समझ का है।  
— विकास खटावलिया