देवी उपपनिद GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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देवी उपपनिद

देवी उपनिषद --देवी उपनिषद् (देव्युपनिषत् / देवी अथर्वशीर्ष) अथर्ववेदीय शाक्त उपनिषदों में प्रसिद्ध है। इसमें देवी को केवल किसी एक रूप की देवता न मानकर ब्रह्मस्वरूपिणी, प्रकृति, पुरुष, ज्ञान, अज्ञान तथा सम्पूर्ण जगत् की मूल शक्ति के रूप में प्रतिपादित किया गया है। परम्परागत पाठ में 32 मुख्य मन्त्र माने जाते हैं। ॥ देवी उपनिषद् ॥अथर्ववेदीय शाक्तोपनिषत्॥ अथ देव्युपनिषत् ॥श्रीदेव्युपनिषद्विद्यावेद्यापारसुखाकृति ।त्रैपदं ब्रह्मचैतन्यं रामचन्द्रपदं भजे।।अर्थ— मैं उस परम चैतन्य ब्रह्म का ध्यान करता हूँ, जो देवी-विद्या द्वारा जानने योग्य है और परम आनन्दस्वरूप है।शान्तिपाठॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाँसस्तनूभिः ।व्यशेम देवहितं यदायुः ॥स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ— हे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें और अपनी आँखों से शुभ दृश्य देखें। स्वस्थ अंगों और शरीर के साथ देवताओं द्वारा निर्धारित आयु को पूर्ण करें। इन्द्र, पूषा, गरुड़ और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। तीनों प्रकार के तापों से शान्ति प्राप्त हो।मन्त्र १सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः ।कासि त्वं महादेवि ॥१॥अर्थ— सभी देवता देवी के समीप उपस्थित हुए और उन्होंने पूछा—हे महादेवी! आप कौन हैं?मन्त्र २साब्रवीदहं ब्रह्मस्वरूपिणी ।मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगच्छून्यं चाशून्यं च ।अहमानन्दानानन्दाः विज्ञानाविज्ञानेऽहम् ।ब्रह्मा ब्रह्मणी वेदितव्ये ।इत्याहाथर्वणी श्रुतिः ॥२॥अर्थ— देवी ने कहा—मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ। मुझसे प्रकृति और पुरुष से युक्त यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न होता है। मैं शून्य भी हूँ और अशून्य भी। मैं आनन्द और अनानन्द, विज्ञान और अविज्ञान—सब कुछ हूँ। ब्रह्मा और ब्रह्मणी भी मेरे ही द्वारा जानने योग्य हैं। ऐसा अथर्वण श्रुति कहती है।भावार्थ: देवी यहाँ स्वयं को सम्पूर्ण अस्तित्व के मूल ब्रह्म-चैतन्य के रूप में प्रकट करती हैं।मन्त्र ३अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि ।अहमखिलं जगत् ।वेदोऽहमवेदोऽहम् ।विद्याहमविद्याहम् ।अजाहमनजाहम् ।अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम् ॥३॥अर्थ— मैं पाँचों महाभूत हूँ और उन पाँच महाभूतों से परे भी हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत् हूँ। मैं वेद हूँ और अवेद भी। मैं विद्या हूँ और अविद्या भी। मैं अजन्मा हूँ और जन्मरूप भी हूँ। मैं नीचे, ऊपर और चारों दिशाओं में व्याप्त हूँ।भावार्थ: देवी की सत्ता के लिए संसार में कोई क्षेत्र बाहर नहीं है—स्थूल और सूक्ष्म, ज्ञान और अज्ञान, दृश्य और अदृश्य सभी उसी शक्ति के विभिन्न आयाम हैं।मन्त्र ४अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः ।अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ ॥४॥अर्थ— मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरण करती हूँ। मैं आदित्यों और विश्वेदेवों के साथ भी रहती हूँ। मैं मित्र और वरुण दोनों को धारण करती हूँ। मैं इन्द्र और अग्नि को तथा दोनों अश्विनीकुमारों को भी धारण करती हूँ।मन्त्र ५अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधाम्यहम् ।विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि ॥५॥अर्थ— मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ। मैं व्यापक गति वाले विष्णु को, ब्रह्मा को और प्रजापति को भी धारण करती हूँ।भावार्थ: समस्त देवशक्तियाँ देवी की ही व्यापक शक्ति में स्थित हैं।मन्त्र ६अहं दधामि द्रविणं हविष्मतेसुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ।अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनामहंसुवे पितरमस्य मूर्धन् ॥६॥अर्थ— मैं यज्ञ करने वाले, हवि अर्पित करने वाले और सोम का यज्ञ करने वाले यजमान को धन-सम्पदा प्रदान करती हूँ। मैं राष्ट्र की अधिष्ठात्री हूँ, सम्पत्तियों को एकत्र करने वाली हूँ और इस जगत् के सर्वोच्च स्थान पर स्थित पिता-तत्त्व को भी उत्पन्न करती हूँ।मन्त्र ७मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ।य एवं वेद स देवीपदमाप्नोति ॥७॥अर्थ— मेरा मूल-स्थान जलों में, समुद्र के भीतर है। जो इस रहस्य को जानता है, वह देवी के परम पद को प्राप्त करता है।मन्त्र ८ते देवा अब्रुवन्—नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥८॥अर्थ— तब देवताओं ने कहा—देवी को नमस्कार! महादेवी को नमस्कार! कल्याणस्वरूपिणी शिवा को सदा नमस्कार। प्रकृति को नमस्कार, मंगलमयी भद्रा को नमस्कार। हम नियमपूर्वक उसी देवी को प्रणाम करते हैं।मन्त्र ९तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तींवैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् ।दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्येसुतरां नाशयते तमः ॥९॥अर्थ— मैं उस अग्नि के समान तेजस्विनी, तप से प्रकाशित, दिव्य प्रकाश वाली और कर्मों के फलों को प्रदान करने वाली देवी दुर्गा की शरण ग्रहण करता हूँ। वे हमारे अज्ञानरूपी अन्धकार का पूर्णतः नाश करती हैं।मन्त्र १०देवीं वाचमजनयन्त देवास्तांविश्वはरूपाः पशवो वदन्ति ।सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहानाधेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु ॥१०॥अर्थ— देवताओं ने देवीरूप वाणी को उत्पन्न किया। समस्त प्राणी उसी विश्वरूप वाणी के द्वारा बोलते हैं। वह वाणी हमारे लिए मधुरता, शक्ति और पोषण प्रदान करने वाली कामधेनु के समान होकर हमारे पास आए।मन्त्र ११कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् ।सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥११॥अर्थ— हम कालरात्रि को, ब्रह्मा द्वारा स्तुत देवी को, वैष्णवी शक्ति को, स्कन्द की माता को, सरस्वती को, अदिति को तथा दक्ष की पुत्री उस पवित्र और कल्याणमयी देवी को नमस्कार करते हैं।मन्त्र १२महालक्ष्मीश्च विद्महेसर्वसिद्धिश्च धीमहि ।तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥१२॥अर्थ— हम महालक्ष्मी को जानें, सर्वसिद्धिस्वरूपिणी देवी का ध्यान करें। वह देवी हमारी बुद्धि को सत्य और कल्याण के मार्ग में प्रेरित करें।मन्त्र १३अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव ।तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ॥१३॥अर्थ— हे दक्ष! आपकी पुत्री अदिति उत्पन्न हुई। देवता उसके अनुगामी होकर उत्पन्न हुए—वे मंगलमय और अमृत के सम्बन्धी हैं।मन्त्र १४कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहा हसामातरिश्वाभ्रमिन्द्रः ।पुनर्गुहा सकला मायया चपुरूच्येषा विश्वमाता आदिविद्योम् ॥१४॥अर्थ— काम, योनि, कामकला, वज्रधारी इन्द्र, गुहा, हस, मातरिश्वा, अभ्र और इन्द्र आदि शक्तियाँ उसी देवी के विभिन्न रहस्यमय रूप हैं। वह समस्त विश्व की माता और आदि विद्या है।भावार्थ: यह मन्त्र देवी के तांत्रिक एवं मन्त्रात्मक स्वरूप की ओर संकेत करता है।मन्त्र १५एषात्मशक्तिः । एषा विश्वमोहिनीपाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा ।एषा श्रीमहाविद्या ॥१५॥अर्थ— यही आत्मशक्ति है। यही सम्पूर्ण विश्व को अपनी माया से मोहित करने वाली शक्ति है। यही पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करने वाली देवी है। यही श्रीमहाविद्या है।मन्त्र १६य एवं वेद स शोकं तरति ॥१६॥अर्थ— जो इस देवी-तत्त्व को इस प्रकार जान लेता है, वह शोक के संसार से पार हो जाता है।मन्त्र १७नमस्ते अस्तु भगवतिभवती मातरस्मान्पातु सर्वतः ॥१७॥अर्थ— हे भगवती! आपको नमस्कार है। हे माता! आप हमारी सभी ओर से रक्षा करें।मन्त्र १८सैषाष्टौ वसवः ।सैषैकादश रुद्राः ।सैषा द्वादशादित्याः ।सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च ।सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः ।अर्थ— यही देवी आठ वसु हैं। यही ग्यारह रुद्र हैं। यही बारह आदित्य हैं। यही सोमपान करने वाले और सोमपान न करने वाले विश्वेदेव हैं। यही यातुधान, असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध आदि समस्त शक्तियों में भी विद्यमान हैं।भावार्थ: यहाँ देवी की सर्वव्यापकता का चरम प्रतिपादन है—देवी किसी एक सीमित रूप में बँधी हुई नहीं हैं।आगे के मन्त्रों में देवी की सर्वव्यापकता, मन्त्रशक्ति और साधना-विधि का निरूपण आता है।मन्त्र १८सैषाष्टौ वसवः ।सैषैकादश रुद्राः ।सैषा द्वादशादित्याः ।सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च ।सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः ।अर्थ— यही देवी आठ वसु हैं, यही ग्यारह रुद्र हैं, यही बारह आदित्य हैं। यही सोमपान करने वाले और सोमपान न करने वाले विश्वेदेव हैं। यही यातुधान, असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध आदि समस्त शक्तियाँ हैं।मन्त्र १९सैषा सत्त्व-रजस्तमांसि ।सैषा ब्रह्मविष्णुरुद्ररूपिणी ।सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः ।सैषा ग्रह-नक्षत्र-ज्योतींषि ।कलाकाष्ठादिकालरूपिणी ।अर्थ— यही देवी सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों के रूप में स्थित हैं। यही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूप में हैं। यही प्रजापति, इन्द्र और मनुओं के रूप में हैं। यही ग्रह, नक्षत्र और समस्त ज्योतियों के रूप में हैं। यही कला, काष्ठा आदि समय के समस्त विभागों के रूप में विद्यमान हैं।मन्त्र २०सैषा विद्याविद्यामयी ।सैषा नादबिन्दुकलामयी ।सैषा शून्याशून्यमयी ।सैषा विज्ञानाविज्ञानमयी ।सैषा लक्ष्मीर्-दुर्गा सरस्वती च ।अर्थ— यही देवी विद्या और अविद्या दोनों स्वरूप हैं। यही नाद, बिन्दु और कला से युक्त हैं। यही शून्य और अशून्य दोनों हैं। यही विज्ञान और अविज्ञान दोनों हैं। यही लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती के रूप में प्रकट होती हैं।मन्त्र २१सैषा गौरी ब्रह्माणी च वैष्णवी च ।सैषा कौमारी इन्द्राणी वाराही च ।सैषा चामुण्डा महालक्ष्मीश्च ।सैषा रुद्राणी महेश्वरी च ।अर्थ— यही देवी गौरी, ब्रह्माणी और वैष्णवी हैं। यही कौमारी, इन्द्राणी और वाराही हैं। यही चामुण्डा और महालक्ष्मी हैं। यही रुद्राणी और महेश्वरी हैं।भावार्थ— देवी के विभिन्न शक्तिरूप वास्तव में एक ही परम शक्ति के विविध प्राकट्य हैं।मन्त्र २२सैषा परा शक्तिः ।सैषा परा प्रकृतिः ।सैषा महामाया ।सैषा महाविद्या ।सैषा महास्मृतिः ।सैषा महासम्मोहिनी ।अर्थ— यही परम शक्ति हैं। यही परम प्रकृति हैं। यही महामाया हैं। यही महाविद्या हैं। यही महान् स्मृति हैं और यही महान् मोहिनी शक्ति हैं।मन्त्र २३सैषा मूलप्रकृतिः ।सैषा सर्वभूतात्मा ।सैषा सर्वभूतान्तरात्मा ।सैषा सर्वभूतानां योनि: ।अर्थ— यही मूल प्रकृति हैं। यही सभी प्राणियों की आत्मा हैं। यही सभी प्राणियों के भीतर स्थित अन्तरात्मा हैं और यही समस्त प्राणियों की मूल उत्पत्ति-शक्ति हैं।मन्त्र २४सैषा जातवेदाः ।सैषा वैष्णवी शक्तिः ।सैषा ब्रह्मविद्या ।सैषा प्रणवात्मिका ।सैषा हृदयविद्या ।सैषा श्रीविद्या ।अर्थ— यही जातवेदस् अर्थात् अग्नि-शक्ति हैं। यही वैष्णवी शक्ति हैं। यही ब्रह्मविद्या हैं। यही प्रणव अर्थात् ॐकार का स्वरूप हैं। यही हृदय की विद्या और यही श्रीविद्या हैं।मन्त्र २५सैषा पञ्चकोशान्तर्वर्तिनी ।सैषा कुण्डलिनी ।सैषा मूलाधारस्थितिः ।सैषा योगनिद्रा ।सैषा योगमाया ।अर्थ— यही देवी पाँचों कोशों के भीतर स्थित हैं। यही कुण्डलिनी शक्ति हैं। यही मूलाधार में स्थित शक्ति हैं। यही योगनिद्रा हैं और यही योगमाया हैं।मन्त्र २६सैषा प्राणशक्तिः ।सैषा मनःशक्तिः ।सैषा बुद्धिशक्तिः ।सैषा चित्तशक्तिः ।सैषा अहंकारशक्तिः ।अर्थ— यही प्राण की शक्ति हैं, मन की शक्ति हैं, बुद्धि की शक्ति हैं, चित्त की शक्ति हैं और अहंकार की शक्ति भी यही हैं।मन्त्र २७सैषा सर्वमन्त्रस्वरूपिणी ।सैषा सर्वविद्यास्वरूपिणी ।सैषा सर्वदेवतास्वरूपिणी ।सैषा सर्वशक्तिस्वरूपिणी ।अर्थ— यही सभी मन्त्रों का स्वरूप हैं। यही सभी विद्याओं का स्वरूप हैं। यही सभी देवताओं का स्वरूप हैं और यही समस्त शक्तियों का मूल स्वरूप हैं।मन्त्र २८सैषा पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा ।सैषा श्रीचक्रनिवासिनी ।सैषा त्रिपुरा ।सैषा त्रिपुरसुन्दरी ।अर्थ— यही देवी पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करती हैं। यही श्रीचक्र में निवास करने वाली हैं। यही त्रिपुरा हैं और यही त्रिपुरसुन्दरी हैं।मन्त्र २९य एवं वेद स शोकं तरति ।स पाप्मानं तरति ।स मृत्युम् तरति ।स संसारं तरति ।स सर्वान् कामानवाप्नोति ।स सर्वान् लोकान् जयति ।अर्थ— जो इस देवी-तत्त्व को इस प्रकार जानता है, वह शोक से पार हो जाता है। पाप से पार हो जाता है। मृत्यु से पार हो जाता है। संसार-बन्धन से पार हो जाता है। वह अपने सभी उचित अभिलाषित फल प्राप्त करता है और समस्त लोकों पर विजय प्राप्त करता है।मन्त्र ३०इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् ।यो ददाति स पापीयान् भवति ।सहस्रावर्तनाद्यं काममधीते तं तमनेनासाधयेत् ॥अर्थ— इस अथर्वशीर्ष को अयोग्य अथवा अनधिकारी व्यक्ति को नहीं देना चाहिए। जो इसे अनुचित व्यक्ति को देता है, वह दोष का भागी होता है। इसका एक हजार बार जप करने से साधक अपनी अभीष्ट कामना की सिद्धि प्राप्त कर सकता है।मन्त्र ३१अनेनाभिषिञ्चन् शतं ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा महासौभाग्यवान् भवति ।सूर्याभिमुखे जपन् महाव्याधिभिः प्रमुच्यते ।अर्धरात्रौ जपन् नष्टं लभते ।भौमाश्विन्यां जपन् मृत्युञ्जयति ।अर्थ— इस मन्त्र द्वारा अभिषेक करके और सौ ब्राह्मणों को विधिपूर्वक इसका ग्रहण/पाठ कराने से महान् सौभाग्य प्राप्त होता है। सूर्य के सम्मुख इसका जप करने से बड़ी व्याधियों से मुक्ति मिलती है। अर्धरात्रि में जप करने से खोई हुई वस्तु प्राप्त होती है। मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र में इसका जप करने से मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का फल कहा गया है।मन्त्र ३२नवम्यां जपन् महादेवीं सन्निधौ जपति स वै ।महाकाल्यां महादुर्गां स महापातकं हन्ति ।अष्टम्यां चतुर्दश्यां वा यः पठेन्नित्यशो नरः ।स याति परमं स्थानं यत्र देव्या महेश्वरः ॥अर्थ— नवमी तिथि में देवी की सन्निधि में इसका जप करने वाला साधक देवी की कृपा प्राप्त करता है। महाकाली और महादुर्गा के स्वरूप का स्मरण करते हुए इसका पाठ महापातकों के नाश का फल देने वाला कहा गया है। जो मनुष्य अष्टमी या चतुर्दशी को इसका नियमित पाठ करता है, वह उस परम स्थान को प्राप्त होता है जहाँ देवी और महेश्वर का दिव्य निवास है।फलश्रुतिस एव सर्वं जानाति ।स एव सर्वं लभते ।स एव सर्वान् लोकान् जयति ।स एव सर्वान् कामानवाप्नोति ।स एव ब्रह्मत्वमश्नुते ।अर्थ— वही सब कुछ जानता है, वही सब कुछ प्राप्त करता है, वही समस्त लोकों पर विजय प्राप्त करता है, वही अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है और वही ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।॥ इत्यथर्वणरहस्ये देव्युपनिषत् सम्पूर्णा ॥संक्षिप्त सारदेवी उपनिषद् का मूल संदेश यह है कि देवी कोई सीमित देवता मात्र नहीं, बल्कि वही परम ब्रह्म की शक्ति हैं—प्रकृति भी वही हैं, पुरुष में स्थित चेतना भी वही; विद्या और अविद्या, ज्ञान और अज्ञान, सृष्टि और संहार, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा तथा समस्त देवशक्तियाँ उसी एक परम शक्ति के विविध रूप हैं। इसीलिए उपनिषद् का केन्द्रीय वाक्य है—“अहं ब्रह्मस्वरूपिणी” — मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ।-----×------×------×------×-----