उन दिनों की बात है... Ritu kumari द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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उन दिनों की बात है...

अध्याय 1: धुंध में लिपटा अतीत
"यह उन दिनों की बात है..."
जब कसौली के पहाड़ों पर धुंध इतनी गहरी होती थी कि हाथ को हाथ भी दिखाई नहीं देता था। चिड़ियों के चहकने से बहुत पहले, सुबह की पहली किरण जब देवदार के विशाल पेड़ों से छनकर ज़मीन पर पड़ती, तो ऐसा लगता था मानो प्रकृति ने सोने की चादर बिछा दी हो।
गाँव के किनारे पर बना वह छोटा सा लकड़ी का घर, जिसकी ढलवा छत पर हरी काई जमी हुई थी, देव का आशियाना था। देव उस समय महज़ बारह साल का था। बिना चप्पलों के गीली घास पर दौड़ना, नदी के ठंडे पानी में पत्थर फेंककर लहरें गिनना और शाम होते ही बूढ़े बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर कहानियाँ सुनना—बस यही उसकी दुनिया थी।
लेकिन उस दुनिया की सबसे हसीन बात थी—अनन्या।
अनन्या, गाँव के ज़मींदार की सबसे छोटी पोती थी। नटखट इतनी कि पूरे गाँव के बागों से कच्चे आम और आड़ू चुराना उसका रोज़ का काम था। जब भी वह हंसती, उसकी आँखों के कोने सिकुड़ जाते और गालों में छोटे-छोटे गड्ढे पड़ जाते थे। देव और अनन्या की दोस्ती का कोई नाम नहीं था। वे जब साथ होते, तो घंटों बिना कुछ बोले भी एक-दूसरे की बात समझ जाते थे।
"देव! जल्दी आओ, देखो मुझे क्या मिला!" अनन्या की आवाज़ पहाड़ी हवा में तैरती हुई देव के कानों तक पहुँची।
देव, जो सड़क किनारे बैठकर सूखी पत्तियों से घरौंदा बना रहा था, झटके से उठा और आवाज़ की दिशा में भागा। अनन्या पुरानी हवेली की पिछली दीवार पर बैठी थी। उसके हाथ में एक लोहे का पुराना, जंग लगा डिब्बा था।
"यह क्या है अनन्या? तुम फिर उस पुरानी हवेली में गई थीं? तुम्हें पता है न, वहाँ जाना मना है!" देव ने हाँफते हुए कहा।
"डरपोक कहीं के!" अनन्या ने चिढ़ाते हुए छलांग लगाई और देव के सामने आ खड़ी हुई। "यह कोई मामूली डिब्बा नहीं है। इसके अंदर एक पुरानी डायरी है और कुछ ख़त हैं... यह ख़त उन दिनों के हैं जब यह गाँव बसा भी नहीं था।"
देव ने अचरज से उस डिब्बे को देखा। डिब्बे का ताला टूटा हुआ था। जैसे ही अनन्या ने उसका ढक्कन उठाया, अंदर से पुरानी किताबों और धूल की एक जानी-पहचानी खुशबू आई—अतीत की खुशबू।
उस डायरी का पहला पन्ना खोलते ही अनन्या की आँखें फटी की फटी रह गईं। उस पन्ने पर जो नाम लिखा था, उसने उन दोनों बच्चों की मासूम दुनिया को हमेशा के लिए बदलने की शुरुआत कर दी थी...
अध्याय 2: पुरानी डायरी का पहला पन्ना
डायरी का वह पहला पन्ना पीला पड़ चुका था और उसके किनारे सड़ चुके थे। उस पर नीली स्याही से बड़े ही खूबसूरत अक्षरों में लिखा था—‘रघुवीर और देवकी’।
अनन्या ने कांपती उंगलियों से उस पन्ने को पलटा। उसमें लिखा था:
"कसौली की यह वादियाँ जितनी शांत दिखती हैं, इनके सीने में उतना ही गहरा दर्द छुपा है। अगर यह डायरी किसी को मिले, तो समझ लेना कि हवेली का रहस्य अभी खत्म नहीं हुआ है..."
देव ने डरते हुए अनन्या का हाथ पकड़ा, "अनन्या, इसे वापस रख आओ। हवेली के बड़े ठाकुर साहब को पता चला तो बहुत डांट पड़ेगी।"
"तुम हमेशा डरते क्यों रहते हो देव?" अनन्या ने अपनी आँखें नचाते हुए कहा। "सोचो, अगर इसमें किसी छिपे हुए खजाने का रास्ता हुआ तो? हम पूरे गाँव के सबसे अमीर इंसान बन जाएंगे!"
अनन्या की बचकानी बातों पर देव मुस्कुरा दिए बिना न रह सका। लेकिन उसके दिल के किसी कोने में एक अजीब सा डर घर कर रहा था। उस शाम, सूरज ढलते ही कसौली की पहाड़ियों पर कोहरा और घना हो गया। ठंडी हवाएँ पेड़ों के बीच से गुजरते हुए किसी सीटी जैसी आवाज़ निकाल रही थीं।
दोनों बच्चे बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर डायरी के पन्ने पलटते रहे। डायरी में आगे लिखा था कि कैसे 1947 के दौर में हवेली के चिराग रघुवीर को अपनी ही ज़मीन छोड़नी पड़ी थी और कैसे एक अधूरी प्रेम कहानी इस गाँव की मिट्टी में दफ़न हो गई थी।
रात गहरी हो रही थी। दूर गाँव से रामदीन काका की लालटेन की रोशनी चमकती हुई दिखाई दी। वे आवाज़ लगा रहे थे, "अनन्या बिटिया! देव! कहाँ हो तुम लोग? रात बहुत हो गई है!"
अनन्या ने जल्दी से डायरी को उसी लोहे के डिब्बे में बंद किया और अपने बैग में छुपा लिया। "देव, यह हमारा राज़ है। किसी को मत बताना, रामदीन काका को भी नहीं!"
देव ने चुपचाप सिर हिला दिया। उसे नहीं पता था कि यह राज़ उनकी मासूम दोस्ती पर कितनी भारी पड़ने वाला था।
अध्याय 3: वह आखिरी बारिश और अचानक जुदाई
अगले कुछ दिन बहुत अजीब बीते। गाँव में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। अनन्या स्कूल नहीं आ रही थी। देव रोज़ सुबह उसके घर के बाहर चक्कर काटता, लेकिन हवेली के भारी लोहे के दरवाजे हमेशा बंद मिलते।
चौथे दिन मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। पहाड़ों पर बारिश का मतलब था—घंटों तक बिजली का चले जाना और रास्तों का बंद हो जाना।
देव अपनी छतरी लेकर हवेली की तरफ भागा। वहाँ उसने देखा कि हवेली के बाहर दो बड़ी काले रंग की गाड़ियाँ खड़ी थीं। कुछ लोग सामान गाड़ियों में लोड कर रहे थे।
तभी हवेली का दरवाज़ा खुला और अनन्या बाहर निकली। उसके चेहरे पर हमेशा रहने वाली वह चंचल मुस्कान गायब थी। उसकी आँखें लाल थीं, मानो वह घंटों रोई हो।
"अनन्या!" देव चिल्लाया और पानी से भरे गड्ढों को पार करता हुआ उसकी तरफ भागा।
अनन्या ने पीछे मुड़कर देखा। उसके कदम ठिठक गए।
"देव... हम शहर जा रहे हैं। हमेशा के लिए।" अनन्या की आवाज़ बारिश के शोर में मुश्किल से सुनाई दी।
"क्या? हमेशा के लिए? लेकिन क्यों? और वह डायरी? हमारी दोस्ती?" देव के गले में आंसू अटक गए।
"दादाजी ने कहा है कि हमें तुरंत यह गाँव छोड़ना होगा। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा देव..." अनन्या ने अपने कोट की जेब से वही लोहे का डिब्बा निकाला और देव के हाथों में थमा दिया। "इसे अपने पास रखो। जब हम बड़े होंगे, तब मैं वापस आऊँगी। तुम मेरा इंतज़ार करना!"
इससे पहले कि देव कुछ बोल पाता, अनन्या के पिता ने उसका हाथ पकड़ा और गाड़ी में बैठा दिया। गाड़ी का शीशा नीचे हुआ, अनन्या ने आखिरी बार हाथ हिलाया और गाड़ी धुंधली पहाड़ी सड़क पर ओझल हो गई।
बारिश और तेज़ हो गई थी। 12 साल का देव हाथ में लोहे का डिब्बा लिए बीच सड़क पर अकेला खड़ा रहा। उस दिन कसौली की बारिश ने सिर्फ ज़मीन को नहीं भिगोया था, देव के बचपन को भी हमेशा के लिए बहा दिया था।
अध्याय 4: शहर की दौड़-धूप और 15 सालों का फ़ासला
समय किसी के लिए नहीं रुकता। दिन हफ्तों में बदले, हफ्ते महीनों में, और महीने सालों में।
15 साल बीत चुके थे।
दिल्ली का व्यस्त शहर, जहाँ गाड़ियों का शोर, प्रदूषण और लोगों की भागदौड़ कभी खत्म नहीं होती थी। 27 साल का देव अब एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कंटेंट राइटर था और रात को अपनी कहानियों के उपन्यास लिखता था। उसकी पहली किताब बहुत सफल रही थी, लेकिन उसके हर उपन्यास में एक ही बात खास होती थी—पहाड़ों की धुंध, एक पुरानी हवेली और एक खोई हुई लड़की।
देव की ज़िंदगी ऊपर से बहुत शांत और सफल दिखती थी, लेकिन उसके कमरे की टेबल की दराज़ में आज भी वह जंग लगा लोहे का डिब्बा रखा हुआ था।
एक रात, अपनी घिसी-पिटी नौकरी और शहर की भागदौड़ से तंग आकर देव ने अपनी दराज़ खोली। उसने वह पुरानी डायरी निकाली। इतने सालों में उसने उस डायरी को कई बार पढ़ा था। अब वह बच्चा नहीं था, वह समझ चुका था कि उस डायरी में लिखे राज़ का संबंध केवल रघुवीर और देवकी से नहीं, बल्कि अनन्या के परिवार से भी था।
उसी रात उसने एक फैसला लिया। उसने अपने लैपटॉप पर इस्तीफा (Resignation) टाइप किया और कसौली की एक तरफ की ट्रेन का टिकट बुक कर लिया।
उसे अपनी अगली किताब पूरी करनी थी, और सबसे बढ़कर... उसे अपना बचपन तलाशना था।
अध्याय 5: वापस कसौली की वादियों में
जब ट्रेन कालका स्टेशन पहुँची और वहाँ से देव ने कसौली के लिए टैक्सी ली, तो ठंडी हवा के झोंके ने उसका स्वागत किया। चीड़ और देवदार के पेड़ों की वही महक, वही गीली मिट्टी की खुशबू।
15 सालों में बहुत कुछ बदल गया था। गाँव में अब पक्की सड़कें बन गई थीं, कुछ नए होटल खुल गए थे। लेकिन पहाड़ों की रूह आज भी वही थी।
देव सीधे अपने पुराने घर पहुँचा। घर अब खाली पड़ा था, लेकिन काका (रामदीन) अभी भी गाँव के दूसरे छोर पर अपनी छोटी सी चाय की दुकान चलाते थे।
जब देव रामदीन काका की दुकान पर पहुँचा, तो बूढ़े काका ने अपनी धुंधली आँखों से देव को देखा।
"काका... पहचाना मुझे?" देव ने मुस्कुराते हुए पूछा।
रामदीन काका के हाथ से चाय का कुल्हड़ छूटते-छूटते बचा। "देव बिटवा? तुम... तुम इतने बड़े हो गए!" काका ने देव को गले से लगा लिया। आँखें दोनों की नम थीं।
चाय की चुस्कियों के बीच देव ने आखिरकार वही सवाल पूछा जो उसके दिल में 15 सालों से दबा था।
"काका... अनन्या कहाँ है? उस रात अचानक ऐसा क्या हुआ था कि ठाकुर साहब को पूरा परिवार लेकर रातों-रात गाँव छोड़ना पड़ा?"
रामदीन काका का चेहरा अचानक पीला पड़ गया। उन्होंने घबराकर आसपास देखा, जैसे कोई उनकी बातें सुन रहा हो।
"देव बिटवा, उस पुराने ज़ख्म को मत कुरेदो। उस हवेली और उस घराने पर एक शाप है। अनन्या बिटिया कभी वापस नहीं आई... और जो कोई उस हवेली के राज़ के पीछे गया, वह कभी सही-सलामत नहीं रहा।"
अध्याय 6: पुरानी हवेली की वीरानी
रामदीन काका की बात सुनकर देव के मन की बेचैनी और बढ़ गई। "शाप कैसा काका? आज के दौर में इन सब बातों का क्या मतलब?"
काका ने एक ठंडी सांस ली और चाय का बर्तन साइड में रख दिया। "तुम शहर में रहकर यह सब भूल चुके हो देव, लेकिन यह पहाड़ आज भी पुराने राज़ों को अपने सीने में दफ़नाए बैठे हैं। उस रात जब ठाकुर साहब गाँव छोड़कर गए, तो उसके अगले ही दिन हवेली के पिछले हिस्से में आग लग गई थी। लोग कहते हैं कि वह आग कुदरती नहीं थी।"
देव ने काका की बातों को ध्यान से सुना, लेकिन उसका इरादा डगमगाया नहीं। चाय खत्म करके वह सीधे अपनी पुरानी हवेली की तरफ बढ़ गया।
हवेली का मुख्य गेट अब पूरी तरह से ज़ंग खा चुका था। चारों तरफ ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ उग आई थीं। वही हवेली जहाँ बचपन में अनन्या की हंसी गूँजती थी, आज किसी खामोश भूतहा खंडहर जैसी लग रही थी।
देव ने गेट का भारी ज़ंजीर वाला ताला छुआ, जो टूट चुका था। उसने धीरे से दरवाज़ा धकेला। एक तीखी चरचराहट के साथ दरवाज़ा खुला। अंदर का नज़ारा देखकर देव का दिल दहल गया—चारों तरफ सूखी पत्तियाँ, टूटे हुए झूमर और जली हुई लकड़ी के टुकड़े फैले थे।
वह सीधे उस कमरे की तरफ बढ़ा जहाँ अनन्या को वह लोहे का डिब्बा मिला था।
अध्याय 7: कमरे का गुप्त कोना
कमरे की छत का एक हिस्सा गिर चुका था, जिससे सीधी धूप कमरे के फर्श पर पड़ रही थी। धूल की एक मोटी परत हर चीज़ पर जमी थी।
देव ने फर्श पर बिखरे मलबे को हटाना शुरू किया। अचानक उसकी नज़र लकड़ी के फर्श के एक ढीले तख्ते (floorboard) पर पड़ी। उसने जेब से अपनी कलम निकालने की कोशिश की और तख्ते को ऊपर उठाया।
तख्ते के नीचे एक छोटा सा खोखला स्थान था। वहाँ एक और पुरानी डायरी और एक चमड़े का पर्स पड़ा था।
देव ने धड़कते दिल से उस पर्स को खोला। अंदर अनन्या की बचपन की एक छोटी सी तस्वीर थी—वही चंचल आँखें और गालों के गड्ढे। तस्वीर के पीछे लिखा था:
‘अगर तुम कभी वापस आओ देव, तो समझना कि मैंने अपना वादा निभाया था। - अनन्या’
देव की आँखें भर आईं। इसका मतलब अनन्या यहाँ वापस आई थी! लेकिन कब? और वह अब कहाँ थी?
तभी हवेली के बाहर किसी के भारी कदमों की आहट सुनाई दी। सुखी पत्तियों पर किसी के चलने की आवाज़ साफ़ आ रही थी। देव तुरंत दीवार के पीछे छुप गया।
अध्याय 8: अजनबी का साया
कदमों की आवाज़ कमरे के नज़दीक आती गई। एक लंबा, काले ओवरकोट में लिपटा आदमी कमरे में दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर हैट का साया था, जिससे उसका चेहरा साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था।
वह आदमी सीधे उसी तख्ते की तरफ बढ़ा जहाँ देव ने पर्स और डायरी पाई थी। उसने नीचे झुककर देखा और जब उसे जगह खाली मिली, तो उसके मुँह से एक तीखी गाली निकली।
"कोई यहाँ पहले ही पहुँच चुका है!" वह अजनबी बुदबुदाया।
देव ने अपनी सांसें रोक लीं। उस अजनबी की आवाज़ में एक अजीब सा रौब और ख़ौफ था। अजनबी ने अपनी जेब से एक फोन निकाला और किसी को डायल किया।
"हलो? काम नहीं हुआ। डायरी यहाँ नहीं है। लगता है कसौली में कोई पुराना मेहमान वापस आ गया है... हाँ, मैं देव की बात कर रहा हूँ।"
देव का खून जम गया। वह अजनबी उसका नाम जानता था! इसका मतलब उस पर नज़र रखी जा रही थी।
अजनबी फोन काट कर तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गया। देव कुछ देर वहीं छुपा रहा और जब यकीन हो गया कि हवेली खाली है, तो वह तेज़ी से डायरी और पर्स लेकर बाहर भागा।
अध्याय 9: काका का सच
देव सीधे रामदीन काका की झोपड़ी पर पहुँचा। वह हाँफ रहा था।
"काका! आपने मुझसे झूठ बोला था!" देव ने डायरी टेबल पर पटकते हुए कहा। "अनन्या यहाँ वापस आई थी! और हवेली में आज भी कोई उसकी तलाश कर रहा है। कौन है वह आदमी? और अनन्या के परिवार का सच क्या है?"
रामदीन काका ने देव के हाथ में वह पुरानी डायरी देखी और उनका चेहरा डर से सफ़ेद पड़ गया।
"तुमने उसे छू लिया देव... तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी," काका ने कांपती आवाज़ में कहा। "अब वे तुम्हें भी नहीं छोड़ेंगे।"
"कौन 'वे', काका? मुझे साफ़-साफ़ बताइए!" देव ने चिल्लाकर कहा।
काका ने दुकान का शटर गिराया और अंदर का दीया जलाया।
"ठाकुर साहब का छोटा भाई—विक्रम सिंह। वह इंसान नहीं, भेड़िया है। 15 साल पहले उसने हवेली की ज़मीन और ज़मींदारी हड़पने के लिए अपने ही भाई पर झूठे इल्ज़ाम लगाए थे। रघुवीर और देवकी की जो कहानी उस डायरी में है, वह दरअसल विक्रम सिंह के काले कारनामों की गवाह है। अनन्या के पिता को जब यह पता चला, तो विक्रम ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। इसीलिए उन्हें रातों-रात भागना पड़ा।"
अध्याय 10: सुराग और नया रास्ता
देव ने हैरानी से पूछा, "लेकिन अनन्या वापस क्यों आई थी?"
"आज से तीन साल पहले," काका ने याद करते हुए कहा, "एक लड़की धुंध में लिपटी हुई यहाँ आई थी। उसने अपना चेहरा ढका हुआ था, लेकिन उसकी आँखों को मैं कैसे भूल सकता था? वह अनन्या ही थी। उसने मुझसे कहा था कि वह अपने पिता का खोया हुआ सम्मान वापस दिलाने आई है। वह हवेली में गई और कुछ ढूंढकर वापस शहर चली गई। उसने कहा था कि जब तक विक्रम सिंह को सज़ा नहीं मिलती, वह छुपकर रहेगी।"
"वह अभी कहाँ है काका? क्या आपको कोई अंदाज़ा है?" देव ने उम्मीद भरी नज़रों से पूछा।
काका ने अपनी दराज़ से एक पुराना धुंधला सा पता (Address) निकाला।
"यह पता उसने मुझे दिया था, कहा था कि अगर कभी बहुत ज़रूरत पड़े तो ही इस पर कोई ख़त भेजना। यह शिमला के एक पुराने आश्रम का पता है।"
देव ने उस कागज़ के टुकड़े को कसकर अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
उसकी कसौली की तलाश अब एक नए पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। उसे शिमला जाना था—अपनी अनन्या की तलाश में और उस अतीत के न्याय के लिए जो 15 सालों से अधूरा था।
अध्याय 11: शिमला की ठंडी रात और पहली उम्मीद
कसौली से शिमला की बस जब घुमावदार रास्तों से गुजर रही थी, तो खिड़की से बाहर छाए देवदार के घने पेड़ देव को अतीत के पन्नों की तरह लग रहे थे। रात के लगभग नौ बज रहे थे जब बस शिमला के पुराने स्टैंड पर रुकी।
ठंडी हवा की तीखी चुभन चेहरे पर महसूस हो रही थी। देव ने अपने जैकेट का कॉलर ऊपर किया और जेब से रामदीन काका का दिया वह मोड़ा-तुड़ा कागज़ निकाला। उस पर धुंधले अक्षरों में लिखा था: 'सेंट मैरी आश्रम, जाखू हिल रोड'।
रास्ते में इक्का-दुक्का लोग ही नज़र आ रहे थे। स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में कोहरा तैरता हुआ सा लग रहा था। देव ने एक ढलानदार रास्ते पर चढ़ना शुरू किया।
लगभग आघे घंटे की पैदल चढ़ाई के बाद, घने देवदार के पेड़ों के बीच एक पुरानी पत्थर की इमारत दिखाई दी। लकड़ी के एक पुराने बोर्ड पर धुंधले अक्षरों में लिखा था—'सेंट मैरी आश्रम'।
देव ने धड़कते दिल से लोहे के भारी दरवाज़े पर दस्तक दी। कुछ देर सन्नाटा छाया रहा, फिर एक बूढ़ी नन (Nun) हाथ में मोमबत्ती लिए बाहर निकलीं।
"जी? इतनी देर रात आप किसे ढूंढ रहे हैं?" नन ने आवाज़ में हल्की सी हिचकिचाहट के साथ पूछा।
"सिस्टर, मैं दिल्ली से आया हूँ। मुझे अनन्या ठाकुर से मिलना है। क्या वह यहाँ रहती है?" देव ने उतावली में पूछा।
नन का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। "यहाँ कोई अनन्या नहीं रहती। यह अनाथ और बेसहारा बच्चों का आश्रम है।"
"कृपया सिस्टर, सच बताइए!" देव ने जेब से वही पुरानी तस्वीर निकाली। "वह तीन साल पहले यहाँ आई थी। यह उसकी बचपन की तस्वीर है।"
नन ने मोमबत्ती की रोशनी में उस तस्वीर को देखा और उनकी आँखों में पहचान की एक चमक कौंध गई। उन्होंने एक गहरी सांस ली और दरवाज़ा पूरा खोल दिया। "अंदर आ जाओ बेटा। बाहर ठंड बहुत है।"
अध्याय 12: धुंध से उठता पर्दा
आश्रम के एक छोटे से कमरे में लकड़ी की अंगीठी जल रही थी। नन ने देव को गर्म चाय का एक कप थमाया और उसके सामने बैठ गईं।
"मेरा नाम सिस्टर मैरी है," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया। "तुम जिस लड़की की बात कर रहे हो, वह तीन साल पहले बहुत गंभीर हालत में यहाँ आई थी। उसके शरीर पर चोटों के निशान थे और वह बुरी तरह डरी हुई थी।"
देव का दिल बैठ गया। उसने कसकर कप को थाम लिया, "चोट के निशान? किसने किया था यह सब?"
"विक्रम सिंह के गुर्गों ने," सिस्टर मैरी ने दुख भरे स्वर में बताया। "अनन्या के पिता की मौत के बाद, वह अकेले ही अपने परिवार की सच्चाई साबित करने में लगी थी। वह हवेली से कुछ अहम सबूत ढूंढकर लाई थी, लेकिन शहर पहुँचते ही उस पर हमला हो गया। वह किसी तरह बचकर यहाँ पहुँची।"
"वह अब कहाँ है सिस्टर? क्या वह ठीक है?" देव की आँखों से आंसू छलक पड़े।
"वह यहाँ लगभग छह महीने रही," सिस्टर मैरी ने कहा। "जब वह थोड़ी ठीक हुई, तो उसने मुझसे कहा कि वह अपनी वजह से आश्रम के मासूम बच्चों को खतरे में नहीं डाल सकती। विक्रम सिंह के आदमी उसकी तलाश में शिमला तक पहुँच चुके थे।"
"तो फिर वह कहाँ गई?" देव ने हताश होकर पूछा।
सिस्टर मैरी उठीं और कोने में रखी एक पुरानी अलमारी से एक लिफाफा निकालकर देव को थमा दिया।
"जाने से पहले उसने यह लिफाफा मुझे दिया था। उसने कहा था कि अगर कोई कसौली से 'लोहे का डिब्बा' याद करने वाला इंसान आए, तो ही उसे यह देना। देव... वह तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी।"
अध्याय 13: ख़त और नया मोड़
देव ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। अंदर अनन्या की लिखावट में एक ख़त था:
"प्रिय देव,
अगर यह ख़त तुम्हारे हाथों में है, तो इसका मतलब तुमने कसौली की हवेली का वह तख्ता ढूंढ लिया है। मुझे यकीन था कि तुम आओगे।
देव, 15 साल पहले जो हुआ वह कोई हादसा नहीं था। विक्रम सिंह ने मेरे पिता को ब्लैकमेल करके हवेली से निकाला था क्योंकि पिताजी के पास रघुवीर दादाजी के असली वसीयतनामा और हवेली के गुप्त तहखाने के दस्तावेज़ थे। उस तहखाने में विक्रम सिंह के बेनामी काले धन और गैर-कानूनी कारनामों की पूरी फाइलें दफ़न हैं।
मैं अकेली इस लड़ाई को लड़ रही थी, लेकिन अब मुझे समझ आ गया है कि विक्रम बहुत ताकतवर है। मैं इस वक्त मनाली के पास एक छोटे से गाँव 'नग्गर' में छुपकर रह रही हूँ। लेकिन ध्यान रखना देव, विक्रम का एक गुप्तचर (Spy) लगातार मुझ पर और कसौली पर नज़र रखे हुए है। अगर तुम मुझसे मिलने आओ, तो बहुत संभालकर आना...
तुम्हारी,
अनन्या"
ख़त पढ़ते ही देव के दिमाग में उस काले ओवरकोट वाले आदमी का चेहरा घूम गया जो कसौली की हवेली में आया था। वही विक्रम सिंह का आदमी था!
देव समझ गया कि उसके पास वक्त बहुत कम है। अगर विक्रम के आदमियों को पता चल गया कि देव को अनन्या का पता मिल गया है, तो अनन्या की जान खतरे में पड़ सकती थी।
अध्याय 14: मनाली की ओर सफ़र
अगली ही सुबह, सूरज निकलने से पहले ही देव ने शिमला छोड़ दिया। उसने सीधी टैक्सी न लेकर अलग-अलग लोकल बसों से मनाली का रास्ता चुना ताकि कोई उसका पीछा न कर सके।
पहाड़ों पर मौसम तेज़ी से बदल रहा था। कुल्लू घाटी में प्रवेश करते ही हल्की बर्फबारी शुरू हो गई थी। चारों तरफ बर्फ की सफ़ेद चादर बिछी हुई थी, लेकिन देव के सीने में आग जल रही थी।
15 सालों का लंबा इंतज़ार, बचपन की अधूरी यादें और अब यह जानलेवा साया—सब कुछ एक मोड़ पर आकर मिलने वाला था।
दोपहर ढलते-ढलते देव 'नग्गर' गाँव पहुँचा। यह व्यास नदी के किनारे बसा एक छोटा सा सुंदर गाँव था, जहाँ पुराने लकड़ी और पत्थर के घर बने हुए थे।
गांव की गलियों में घूमते हुए देव ने अनन्या के ख़त में दिए गए पते को खोजना शुरू किया। यह गाँव के आखिरी छोर पर स्थित एक सेब के बागान के बीच बना लकड़ी का कॉटेज था।
देव के कदम धीरे-धीरे कॉटेज की तरफ बढ़े। उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। क्या इतने सालों बाद अनन्या उसे पहचान पाएगी? क्या वह अब भी वही नटखट और चंचल अनन्या होगी या वक्त ने उसे पूरी तरह बदल दिया था?
अध्याय 15: 15 साल बाद मुलाकात
कॉटेज के आँगन में सेब के सूखे पेड़ों पर बर्फ जम रही थी। सामने लकड़ी के बरामदे में एक लड़की खड़ी थी, जो कसौली की तरफ मुंह करके व्यास नदी के बहते पानी को देख रही थी। उसके कंधों पर लाल रंग की शॉल लिपटी थी।
देव के मुंह से धीमी आवाज़ निकली—"अनन्या..."
लड़की के कदम अचानक ठिठक गए। उसने बहुत धीरे से पीछे मुड़कर देखा।
वही आँखें, वही चेहरा—हालाँकि चेहरे पर बचपन की मासूमियत की जगह अब एक ठहराव और उदासी थी, लेकिन आँखों की पहचान वही थी।
"देव...?" अनन्या के मुँह से अविश्वास से एक शब्द निकला। उसके हाथ से चाय का कप छूटकर नीचे गिर गया।
दोनों कुछ पलों के लिए एक-दूसरे को बस देखते रहे। 15 सालों का लंबा फ़ासला, हज़ारों मील की दूरी और अनगिनत दर्द—सब कुछ उस एक पल में पिघल गया।
अनन्या दौड़ती हुई आई और देव के गले से लग गई। इतने सालों का दबा हुआ दर्द आंसू बनकर बह निकला।
"मुझे पता था... मुझे पता था तुम ज़रूर आओगे देव!" अनन्या फूट-फूटकर रोने लगी।
देव ने उसके सिर पर हाथ रखा और उसे खुद में भींच लिया। "अब तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं है अनन्या। मैं आ गया हूँ। अब हम इस लड़ाई को मिलकर लड़ेंगे।"
बर्फबारी तेज़ हो रही थी, लेकिन दो खोए हुए दोस्तों के मिलने से उस बर्फ़ीली घाटी में एक अजीब सी गर्माहट भर गई थी।
अध्याय 16: षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश
नग्गर के उस लकड़ी के कॉटेज में अंगीठी की आग धीमी-धीमी जल रही थी। बाहर बर्फबारी तेज़ हो चुकी थी और हवाएँ खिड़कियों के शीशों से टकराकर सीटी बजा रही थीं।
अनन्या ने देव को गर्म पानी की प्याली थमाई और उसके सामने बैठ गई। 15 सालों बाद दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने थे।
"देव, तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था," अनन्या ने चिंतित लहजे में कहा। "विक्रम सिंह बेहद खतरनाक हो चुका है। उसने कसौली और शिमला के पूरे पुलिस तंत्र को अपने पैसों के दम पर खरीद रखा है।"
देव ने जेब से वह लोहे का डिब्बा और कसौली की हवेली से मिली पुरानी डायरी निकालकर मेज़ पर रख दी। "मैं अब पीछे हटने वाला नहीं हूँ अनन्या। 15 साल पहले मैं बच्चा था और तुम्हें जाते हुए चुपचाप देखता रहा। लेकिन अब नहीं।"
अनन्या की आँखें नम हो गईं। उसने डायरी को छुआ और बोलना शुरू किया, "उस रात जब मेरे पिता को विक्रम ने धमकी दी थी, तो वे डर गए थे। लेकिन मरने से पहले उन्होंने मुझे बताया कि कसौली की पुरानी हवेली के नीचे एक गुप्त तहखाना है। उस तहखाने में एक तिजोरी है, जिसकी चाबी और पासवर्ड उस पुरानी डायरी के पन्नों में ही कहीं छिपा है।"
"पासवर्ड?" देव ने चौंककर पूछा। "मैंने वह डायरी दर्जनों बार पढ़ी है, पर मुझे कोई पासवर्ड नहीं दिखा।"
"क्योंकि वह साधारण स्याही से नहीं लिखा गया है," अनन्या ने कहा। उसने अलमारी से एक मोमबत्ती निकाली और डायरी के आखिरी पन्ने को हल्की सी आँच के ऊपर रखा।
जैसे ही पन्ना गर्म हुआ, पन्ने पर भूरे रंग के कुछ गुप्त अंक और एक नक्शा उभरने लगा—'4-0-8-2' और हवेली की नींव का एक रेखाचित्र।
देव की आँखें अचरज से फटी रह गईं। "तो यह था वो राज़!"
तभी अचानक कॉटेज के बाहर लगे सूखे पत्तों पर किसी के तेज़ कदमों की आवाज़ सुनाई दी। देव और अनन्या तुरंत सतर्क हो गए।
अध्याय 17: नग्गर की रात और हमला
"दीया बुझाओ! अभी!" देव ने फुसफुसाते हुए कहा और मोमबत्ती को एक ही झटके में बुझा दिया। पूरा कमरा अँधेरे में डूब गया।
खिड़की के बाहर से दो टॉर्च की लाल और नीली रोशनी कमरे की दीवारों पर तैरने लगी।
"मुझे पता है तुम अंदर हो अनन्या बिटिया! बाहर आ जाओ, अपने इस नए दोस्त की जान खतरे में मत डालो!"
यह वही भारी और रौबदार आवाज़ थी जो देव ने कसौली की हवेली में सुनी थी—काले ओवरकोट वाला आदमी! विक्रम सिंह का सबसे वफ़ादार गुर्गा, राघव।
"वे यहाँ तक पहुँच गए देव..." अनन्या की सांसें फूलने लगी थीं। "उन्हें हमारा पता कैसे चला?"
"कसौली से मेरा पीछा किया गया था," देव ने अपनी गलती का अहसास करते हुए कहा। "लेकिन चिंता मत करो, यहाँ से निकलने का कोई और रास्ता है?"
"पीछे का दरवाज़ा सेब के बागान की तरफ खुलता है, जहाँ से नदी का रास्ता जाता है," अनन्या ने फुसफुसाकर बताया।
देव ने मेज़ से लोहे का डिब्बा और डायरी अपने बैग में डाली। उसने अनन्या का हाथ कसकर पकड़ा।
तभी सामने का भारी दरवाज़ा एक ज़ोरदार लात के साथ टूटा!
"भागो!" देव चिल्लाया।
दोनों ने पीछे का दरवाज़ा खोला और अँधेरी, बर्फ़ीली रात में बागान की तरफ भागे। पीछे से गोलियों की चलने की आवाज़ें गूँज उठीं। पेड़ों की टहनियों पर लगी बर्फ झड़ने लगी।
अँधेरा और घना कोहरा उनके लिए वरदान साबित हुआ। देव और अनन्या बर्फ में फिसलते हुए नदी के किनारे बनी एक पुरानी लकड़ी की नाव तक पहुँचे। देव ने तुरंत रस्सी काटी और दोनों बहती नदी की धारा के साथ अँधेरे में गायब हो गए।
अध्याय 18: वापस कसौली की ओर
सुबह की पहली किरण जब पहाड़ों पर पड़ी, तो नदी के किनारे नाव एक सुरक्षित स्थान पर रुकी। वे नग्गर से काफी दूर निकल आए थे।
राघव और उसके आदमी उन्हें खो चुके थे, लेकिन देव जानता था कि यह राहत थोड़े समय की ही है।
"अब हमें क्या करना है देव?" अनन्या ने कांपते हुए पूछा। उसके शॉल पर बर्फ की परतें जमी थीं।
"विक्रम सिंह सोच रहा होगा कि हम डरकर कहीं छुप जाएँगे या दिल्ली भाग जाएँगे," देव की आँखों में एक अजीब सा दृढ़ निश्चय था। "लेकिन हम सीधे उसकी मांद में जाएँगे—कसौली।"
"कसौली? पर वहाँ जाना तो सीधे मौत के मुँह में कूदने जैसा है!"
"वही तो वो कभी नहीं सोचेगा," देव ने समझाते हुए कहा। "हमें उस गुप्त तहखाने से वे दस्तावेज़ निकालने होंगे। एक बार असली वसीयतनामा और उसके काले कारनामों के सबूत हमारे हाथ आ गए, तो हम सीधे सीबीआई (CBI) या राज्य के गवर्नर के पास जाएँगे। local पुलिस पर अब भरोसा नहीं किया जा सकता।"
अनन्या ने देव के चेहरे की निडरता को देखा। बचपन का वह भीरू और शर्मीला देव अब एक चट्टान बन चुका था। उसने मुस्कुराकर सहमति में सिर हिलाया।
दोनों ने भेष बदला—देव ने एक स्थानीय पहाड़ी चरवाहे का कंबल ओढ़ लिया और अनन्या ने अपना चेहरा एक बड़े स्कार्फ से ढक लिया। वे चुपचाप बस पकड़कर वापस कसौली के रास्ते पर निकल पड़े।
अध्याय 19: गुप्त तहखाने का दरवाज़ा
रात के बारह बज रहे थे। कसौली गाँव पूरी तरह सो चुका था। चारों तरफ घना कोहरा था और केवल कुत्तों के भौंकने की दूर की आवाज़ें आ रही थीं।
देव और अनन्या हवेली की पिछली दीवार लांघकर अंदर दाखिल हुए।
हवेली का वह जलग्रस्त और जला हुआ हिस्सा रात के अँधेरे में और भी भयानक लग रहा था। देव ने अपनी पॉकेट-टॉर्च जलाई। वे सीधे हवेली के सबसे निचले हिस्से—पुराने गोदाम (Basement) में पहुँचे।
ज़मीन पर चारों तरफ जाले और सीलन की बदबू थी।
डायरी के नक्शे के अनुसार, तहखाने का रास्ता गोदाम की उत्तरी दीवार पर बने माता काली के आला (Niche) के पीछे था।
देव ने आले पर हाथ रखा और उसे ज़ोर से दबोचा। कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ, फिर एक भारी पत्थर के खिसकने की आवाज़ आई। दीवार का एक हिस्सा पीछे हट गया और नीचे जाती हुई संकरी सीढ़ियाँ दिखाई दीं।
"सावधान रहना अनन्या," देव ने टॉर्च की रोशनी नीचे डालते हुए कहा।
सीढ़ियों से उतरते ही वे एक बड़े, पुराने कमरे में पहुँचे। बीचों-बीच एक विशाल लोहे की तिजोरी (Safe) रखी हुई थी।
तिजोरी पर एक घूमता हुआ नंबर डायल (Combination Lock) लगा था।
अनन्या ने आगे बढ़कर कांपती उंगलियों से कोड डायल करना शुरू किया: 4 - 0 - 8 - 2।
एक भारी 'क्लिक' की आवाज़ हुई। तिजोरी का भारी दरवाज़ा धीरे से खुल गया!
अध्याय 20: जाल में फँसे
तिजोरी के अंदर पुराने ज़माने के सोने के सिक्के, ज़मीन के असली कागज़ात और एक काली डायरी रखी थी—जिसमें विक्रम सिंह द्वारा किए गए कत्ल, ज़मीन हड़पने और बेनामी संपत्तियों का पूरा हिसाब-किताब दर्ज था।
"मिल गया! हमें सब कुछ मिल गया देव!" अनन्या की आँखों में जीत की चमक थी।
उसने सारे कागज़ात अपने बैग में भरे। लेकिन जैसे ही वे मुड़े, तहखाने के दरवाज़े पर कई टॉर्चों की तेज़ रोशनी एक साथ चमकी।
एक ठंडी, दुष्ट हंसी पूरे तहखाने में गूँज उठी।
"बहुत बढ़िया! वाकई बहुत बढ़िया! जो काम मेरे बेवकूफ आदमी 15 सालों में नहीं कर सके, वह काम तुम दोनों ने एक रात में कर दिया।"
रोशनी के पीछे से एक अधेड़ उम्र का आदमी बाहर निकला। सफ़ेद बाल, आँखों में क्रूरता और हाथ में सोने की मूंठ वाली छड़ी—ठाकुर विक्रम सिंह!
उसके ठीक पीछे राघव और चार बंदूकधारी गुंडे खड़े थे।
"चाचाजी..." अनन्या के मुँह से नफ़रत से भरा शब्द निकला।
"मुझे चाचा मत कहो लड़की!" विक्रम सिंह ने गरजते हुए कहा। "तुम्हारे पिता ने मेरी बात मान ली होती तो आज ज़िंदा होते। लेकिन तुमने और इस मामूली लेखक ने मेरे काम को आसान कर दिया। तिजोरी का पासवर्ड मुझे कभी नहीं मिलता अगर तुम दोनों यहाँ न आते।"
विक्रम सिंह ने राघव की तरफ इशारा किया, "इन दोनों को मार दो। और इस बार लाशें ऐसी जगह फेंको कि पहाड़ों की चीलें भी न ढूंढ पाएँ!"
राघव ने अपनी पिस्तौल देव के माथे पर तान दी। मौत बिल्कुल सामने खड़ी थी।
अध्याय 21: अँधेरे में चमकती उम्मीद
राघव की पिस्तौल की ठंडी नली देव के माथे को छू रही थी। तहखाने का सन्नाटा इतना गहरा था कि विक्रम सिंह की सांसे भी साफ़ सुनाई दे रही थीं।
"सब कुछ खत्म हो गया, देव..." अनन्या ने टूटी हुई आवाज़ में कहा, उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे।
"अभी नहीं, अनन्या," देव ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। उसकी नज़रें तहखाने की जर्जर छत और पुरानी बिजली की मुख्य केबल (Main Cable) पर टिकी थीं, जो ठीक राघव के सिर के ऊपर से गुज़र रही थी।
देव ने अपनी जेब में पड़े भारी लोहे के डिब्बे पर अपनी ग्रिप कसी। उसने आँख से अनन्या को पीछे हटने का इशारा किया।
"अंतिम इच्छा पूछने का वक्त नहीं है मेरे पास। राघव, ख़त्म करो खेल!" विक्रम सिंह ने चिल्लाकर कहा।
जैसे ही राघव का अंगूठा ट्रिगर पर दबाव बनाने लगा, देव ने अपनी पूरी ताकत लगाकर लोहे का डिब्बा ऊपर से गुज़र रही पुरानी, नंगी बिजली की केबल पर दे मारा। भारी प्रहार से केबल टूटकर सीधे राघव और उसके पास खड़े गुंडों पर गिरी।
धड़ाक!
ज़ोरदार स्पार्क हुआ और नीली चिंगारियों के साथ पूरा तहखाना अँधेरे में डूब गया। गुंडों में चीख-पुकार मच गई जब बिजली का झटका राघव को लगा और उसकी पिस्तौल हाथ से छूटकर दूर जा गिरी।
"भागो अनन्या!" देव चिल्लाया।
देव ने अँधेरे में ही अनन्या का हाथ पकड़ा और पुरानी सीढ़ियों की तरफ भागा। विक्रम सिंह बदहवास होकर चिल्ला रहा था, "उन्हें जाने मत दो! गोली चलाओ!"
अँधेरे में अंधाधुंध गोलियों की आवाज़ें गूँजने लगीं, लेकिन देव और अनन्या सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर हवेली के मुख्य हॉल में पहुँच चुके थे।
अध्याय 22: तूफ़ानी रात का पीछा
हवेली से बाहर निकलते ही मूसलाधार बारिश और तेज़ तूफ़ान ने उनका स्वागत किया। आकाशीय बिजली की कड़क में पूरा कसौली गाँव रह-रहकर चमक उठता था।
देव के पास सोचने का वक्त नहीं था। वे गाँव के मुख्य रास्ते से नहीं भाग सकते थे क्योंकि वहाँ विक्रम के आदमी गाड़ियाँ लेकर तैयार थे।
"जंगल का रास्ता!" अनन्या ने चीखकर कहा, हवा के शोर में अपनी आवाज़ पहुँचाते हुए। "बरगद के पेड़ वाला पुराना रास्ता सीधे मुख्य हाईवे पर निकलता है!"
दोनों भीगते हुए, घने देवदार के जंगल की ढलान पर दौड़ने लगे। पीछे से टॉर्चों की रोशनी और गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ें आ रही थीं। विक्रम के गुंडे कुत्ते लेकर जंगल में उतर चुके थे।
कीचड़ और गीली पत्तियों पर फिसलते हुए देव का पैर एक ज़हरीली झाड़ी में उलझ गया और वह ज़मीन पर गिर पड़ा। उसके घुटने से खून बहने लगा।
"देव! उठो!" अनन्या ने उसे सहारा देकर उठाने की कोशिश की।
"तुम रुको मत अनन्या, कागज़ात लेकर निकलो! अगर यह फाइल विक्रम को मिल गई तो सब बेकार हो जाएगा!" देव ने हाँफते हुए कहा।
"कभी नहीं! 15 साल पहले तुम्हें छोड़कर गई थी, अब दोबारा कभी नहीं जाऊँगी!" अनन्या ने साफ़ इनकार कर दिया। उसने देव का हाथ अपने कंधे पर रखा और दोनों गिरते-संभलते आगे बढ़ने लगे।
तभी सामने से राघव टॉर्च लहराता हुआ प्रकट हुआ। उसके चेहरे पर बिजली की झुलसन के निशान थे और हाथ में रिवाल्वर थी।
"बहुत भाग लिए तुम दोनों..." राघव ने हाँफते हुए कहा और ट्रिगर दबा दिया।
अध्याय 23: रामदीन काका का फ़र्ज़
'ठाँय!'
गोली की आवाज़ के साथ ही एक भारी शरीर राघव के ऊपर आ गिरा।
यह कोई और नहीं, बूढ़े रामदीन काका थे! उन्होंने हाथ में कुल्हाड़ी उठा रखी थी।
"भागो देव बिटवा! भागो!" काका चीखे।
काका ने अपने बूढ़े शरीर की पूरी ताकत से राघव को नीचे गिरा दिया था। राघव की पिस्तौल हाथ से छिटककर ढलान से नीचे खाई में गिर गई।
"काका!" देव रो पड़ा।
"मेरी चिंता मत करो! मैंने ठाकुर साहब का नमक खाया था, आज उनका कर्ज़ चुकाने का दिन है! तुम लोग निकलो!" रामदीन काका ने राघव को दबोचे रखा।
राघव के बाकी साथी पीछे से आ रहे थे। देव ने भारी दिल से काका को देखा, अनन्या का हाथ पकड़ा और अंतिम ढलान की तरफ दौड़ लगा दी। पीछे से राघव की गालियाँ और हाथापाई का शोर बारिश में धीमा पड़ता चला गया।
ढलान खत्म होते ही सामने कसौली का मुख्य हाईवे था। ठीक उसी समय दूर से एक नीली-लाल बत्ती वाली गाड़ी तेज़ रफ़्तार से आती दिखाई दी।
अध्याय 24: इंसाफ की भोर
वह कार किसी और की नहीं, बल्कि शिमला से आई सीबीआई (CBI) की विशेष टीम और राज्य पुलिस के बड़े अधिकारियों की थी।
सिस्टर मैरी ने शिमला से ही पुलिस के एक ईमानदार डीआईजी (DIG) को फोन कर दिया था, जो अनन्या के पिता के पुराने दोस्त थे। अनन्या का ख़त मिलने के बाद से ही वे अलर्ट पर थे।
देव ने हाईवे के बीचों-बीच जाकर गाड़ी को हाथ दिया। गाड़ियाँ चीखते हुए ब्रेक के साथ रुकीं।
डीआईजी कार से बाहर निकले, "तुम लोग अनन्या और देव हो?"
अनन्या ने बिना एक पल गँवाए अपने बैग से विक्रम सिंह की काले कारनामों की डायरी, असली वसीयतनामा और बेनामी जायदाद के सारे दस्तावेज़ डीआईजी के हाथों में थमा दिए।
"सर, विक्रम सिंह और उसके गुंडे जंगल में हैं। उन्होंने 15 साल पहले मेरे पिता को ब्लैकमेल किया और आज कसौली की शांति को ख़त्म कर रहे हैं!" अनन्या ने कांपती आवाज़ में कहा।
डीआईजी ने कागज़ात पर एक नज़र डाली और उनका चेहरा सख्त हो गया। "कमांडो टीम, तुरंत जंगल को घेरो! कोई भी बचना नहीं चाहिए!"
अगले आधे घंटे में पूरे कसौली के जंगल में सायरन की आवाज़ें गूँज उठीं।
विक्रम सिंह, जो खुद को कसौली का राजा समझता था, पुलिस के घेरे में आ चुका था। जब उसने भागने की कोशिश की, तो पुलिस ने उसे और उसके सभी गुंडों को धर दबोचा। राघव को भी हिरासत में ले लिया गया।
जब विक्रम सिंह को हथकड़ी पहनाकर ले जाया जा रहा था, तो उसकी नज़र देव और अनन्या पर पड़ी। उसकी आँखों में हार का ज़हर था, लेकिन देव और अनन्या के चेहरे पर एक शांत संतोष था।
अध्याय 25: नया सवेरा और "उन दिनों की बात है..."
सुबह की पहली किरण कसौली के पहाड़ों पर बिखरी। बारिश थम चुकी थी और आसमान बिल्कुल साफ़ था। देवदार की पत्तियों पर ओस की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं।
रामदीन काका को मामूली चोटें आई थीं, लेकिन वे बिल्कुल ठीक थे। गाँव के लोग, जो सालों से विक्रम सिंह के डर के साए में जी रहे थे, आज हवेली के बाहर इकट्ठा होकर राहत की सांस ले रहे थे।
हवेली का ज़ंग लगा दरवाज़ा अब खुला था, लेकिन अब वहाँ कोई खौफ नहीं था।
देव और अनन्या उस पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे, जहाँ 15 साल पहले उनका बचपन छूटा था।
"अब क्या करोगे देव?" अनन्या ने पहाड़ी हवा का मज़ा लेते हुए पूछा।
"मेरी अगली किताब पूरी हो गई है अनन्या," देव ने मुस्कुराते हुए अपनी पॉकेट से एक डायरी निकाली। "और इस बार इस किताब का अंत अधूरा नहीं होगा।"
"किताब का नाम क्या रखा है?" अनन्या ने उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा।
देव ने अनन्या का हाथ अपने हाथ में लिया और कसौली की वादियों को देखते हुए बोला:
"उन दिनों की बात है..."
दोनों हंस पड़े। धूप और गहरी होती गई, और कसौली की उन सुंदर वादियों ने अपने दो बच्चों को हमेशा के लिए अपने आंचल में समेट लिया।
(समाप्त)