हिमाचल के सुदूर पहाड़ों में बसा ‘कुफरी-वैली’ का वह हिस्सा हर साल नवंबर आते-आते बाकी दुनिया से पूरी तरह कट जाता था। सुबह चार बजे से ही पूरी घाटी को सफेद, घनी धुंध अपने आगोष में ले लेती थी। शाम ढलते ही तापमान शून्य से नीचे गिर जाता और हवा में एक अजीब सा सन्नाटा तैरने लगता।
इन्हीं पहाड़ियों की सबसे ऊंची चोटी पर स्थित था 'रोज़वुड मैनर'—180 साल पुराना एक विक्टोरियन शैली का बंगला। लकड़ी की नक्काशीदार दीवारों, ढलानदार छतों और बड़ी-बड़ी मेहराबदार खिड़कियों वाला यह बंगला बाहर से जितना भव्य दिखता था, अंदर से उतना ही वीरान था। आसपास के गांव वाले इस बंगले के करीब जाने से भी कतराते थे। उनका मानना था कि इस बंगले में वक्त ठहर चुका है और यहां हवाओं के साथ कुछ ऐसी यादें भटकती हैं जो कभी खत्म नहीं होतीं।
मीरा पिछले दो सालों से इस विशाल बंगले में बिल्कुल अकेली रह रही थी।
अठारह साल की उम्र में एक दर्दनाक कार हादसे में उसने अपने माता-पिता को खो दिया था। उस हादसे के झटके ने मीरा से उसकी आवाज़ छीन ली थी—वह बोल नहीं सकती थी। सदमे और अवसाद में डूबी मीरा को उसके दूर के चाचा ने संभालने के बजाय इस दूरदराज के बंगले में भेज दिया और खुद उसकी जायदाद की देखभाल के नाम पर शहर में आराम की जिंदगी जीने लगे। बंगले में मीरा के अलावा सिर्फ एक बूढ़ी देखभाल करने वाली 'काकी' थी, जो दिन में खाना बनाकर अपने गांव लौट जाती थी।
मीरा के लिए यह बंगला एक खूबसूरत जेल की तरह था। उसकी पूरी दुनिया उस बंगले की चार दीवारों, किताबों और स्केचबुक तक सीमित होकर रह गई थी।
बंगले के सबसे पिछले हिस्से में एक लंबा, अंधेरा गलियारा था जो एक छोटे से कोने वाले कमरे पर जाकर खत्म होता था। उस कमरे में फर्श से लेकर छत तक फैली एक पुरानी, भारी शीशम की खिड़की थी। उस खिड़की का कांच बेहद मोटा, थोड़ा धुंधला और पुराने जमाने का था। मीरा अपना ज्यादातर वक्त उसी खिड़की के पास एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठकर बिताती थी। वहां से बाहर सिर्फ बांझ और चीड़ के लंबे पेड़, गहरी खाइयां और अंतहीन धुंध नजर आती थी।
वह 14 नवंबर की शाम थी।
पहाड़ों पर आज ठंड कुछ ज्यादा ही तीखी थी। शाम के ठीक पांच बजे थे और बाहर धुंध इतनी गहरी हो चुकी थी कि खिड़की के ठीक बाहर लगे चीड़ के पेड़ भी गायब हो चुके थे। कमरे में सिर्फ अंगीठी की हल्की पीली रोशनी जल रही थी, जो कांच पर आकृतियां बना रही थी।
मीरा कुर्सी से उठी और खिड़की के बिल्कुल करीब जाकर खड़ी हो गई। उसने शीशे पर अपना चेहरा करीब लाया और एक लंबी, गरम सांस छोड़ी।
शूाााा...
उसकी सांस की गर्माहट से ठंडे कांच पर दूधिया धुंध की एक मोटी परत जम गई। मीरा ने हमेशा की तरह अपनी उंगली उठाई। वह अक्सर उस धुंध पर कभी कोई फूल तो कभी कोई परिंदा बना दिया करती थी, जो कुछ ही सेकंडों में पिघलकर पानी की बूंदों में बदल जाता था।
आज उसने अपनी कांपती उंगली से धुंध पर एक छोटी सी उदास आंख बनाई।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी उंगली हटाई, उसके जिस्म में एक सिहरन दौड़ गई। उसका दिल एक पल के लिए मानो धड़कना भूल गया।
कांच के दूसरी तरफ से—जहाँ बाहर शून्य से नीचे का तापमान था और सैकड़ों फीट गहरी खाई थी—धुंध पर उंगलियों के निशान उभरने लगे थे!
ऐसा लग रहा था जैसे कोई बाहर खड़ा होकर उसी कांच पर अपनी तरफ से उंगली चला रहा हो।
मीरा कांपते कदमों से दो कदम पीछे हट गई। उसका हाथ अपने सीने पर चला गया, जहां दिल किसी जंगली परिंदे की तरह पसलियों से टकरा रहा था। "यह... यह सिर्फ मेरा वहम है," उसने मन ही मन खुद को समझाया। "अकेलेपन की वजह से अब मुझे चीज़ें दिखाई देने लगी हैं।"
उसने अपनी आंखें कसकर बंद कीं, तीन तक गिनती गिनी और फिर आंखें खोलीं।
लेकिन वह वहम नहीं था।
कांच की धुंध पर बिल्कुल साफ, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा हुआ था:
“क्या तुम हो?”
अध्याय 2: कांच के पार
मीरा का सांस लेना भारी हो गया। वह गूंगी जरूर थी, लेकिन बेवकूफ नहीं। उसने बचपन से उस बंगले के नक्शे को देखा था। इस खिड़की के बाहर कोई छज्जा नहीं था, कोई बालकनी नहीं थी। सीधे तीन सौ फीट गहरी पथरीली खाई थी। अगर कोई बाहर खड़ा होता, तो वह हवा में तैर रहा होता।
क्या वह कोई साया था? कोई आत्मा?
मीरा के पैर मारे डर के कांप रहे थे। उसका पहला विचार था कि वह भागकर अपने कमरे में जाए, दरवाजा अंदर से बंद कर ले और रजाई में मुंह छुपा ले। लेकिन फिर, उस जमते हुए सन्नाटे में, उसे उस लिखे हुए शब्द में एक अजीब सी तड़प महसूस हुई। वह कोई डरावना संदेश नहीं था, वह एक सवाल था—एक ऐसा सवाल जो कोई बहुत अकेला इंसान ही पूछ सकता था।
मीरा ने गहरी सांस ली। उसने अपने कांपते हाथों को संभाला और धीरे-धीरे खिड़की के करीब आई।
उसने दोबारा कांच पर अपनी गर्म सांस छोड़ी। नई धुंध जमी।
मीरा ने अपनी उंगली उठाई और कांपते हुए लिखा:
“हां। तुम कौन हो? भूत?”
कांच के दूसरी तरफ कुछ सेकंड की खामोशी छा गई। मीरा खिड़की से सटकर बाहर अंधेरे में देखने की कोशिश करने लगी, लेकिन घने कोहरे और पीली धुंध के सिवा कुछ नज़र नहीं आ रहा था।
तभी, दूसरी तरफ से कांच पर फिर से उंगली चलने की रगड़ जैसी हल्की सी आवाज़ आई—सरर... सरर...
धुंध पर लिखा गया:
“भूत नहीं हूँ। इंसान हूँ। डरो मत।”
मीरा ने झट से अपनी सांस से कांच को फिर धुंधला किया और लिखा:
“झूठ! इस खिड़की के बाहर खाई है। तुम हवा में कैसे खड़े हो सकते हो?”
दूसरी तरफ से तुरंत जवाब आया, इस बार शब्द थोड़े जल्दी-जल्दी लिखे गए थे:
“तुम्हें लगता है कि तुम अकेली हो, लेकिन तुम अकेली नहीं हो। तुम्हारी खिड़की के ठीक सामने, लगभग आठ फीट की दूरी पर एक और इमारत है—'द एनेक्स'। वह इस बंगले का पुराना हिस्सा है जो सालों पहले मुख्य हवेली से अलग हो गया था। बीच में सिर्फ एक संकरी दरार जैसी खाई है, जो इस कोहरे में दिखाई नहीं देती। मेरी खिड़की तुम्हारी खिड़की के ठीक आमने-सामने है।”
मीरा ने अपनी आंखें फाड़कर देखने की कोशिश की। उसने कांच पर अपना माथा टिका दिया। जब उसने ध्यान से देखा, तो कोहरे के उस पार, महज आठ फीट दूर, उसे एक हल्की सी, धुंधली सी चौकोर परछाईं दिखाई दी—एक और खिड़की!
कोहरे का घनत्व इतना ज्यादा था कि दिन में भी वह दूसरी इमारत नज़र नहीं आती थी, लेकिन इस वक्त, दोनों खिड़कियों पर जमी धुंध और अंदर जलती रोशनी ने दो इंसानों के बीच का रास्ता बना दिया था।
मीरा के सीने से एक भारी बोझ उतर गया। वह आत्मा नहीं थी। वह कोई इंसान था।
उसने लिखा: “तुम वहां क्या कर रहे हो? इतने अंधेरे और ठंड में?”
दूसरी तरफ से इस बार जवाब आने में थोड़ा वक्त लगा। ऐसा लगा जैसे दूसरी तरफ खड़ा इंसान शब्द चुनने में हिचकिचा रहा हो।
फिर लिखा हुआ उभरा:
“मैं बाहर नहीं आ सकता। मुझे एक बीमारी है—Xeroderma Pigmentosum। धूप का एक कतरा या बाहर की सीधी हवा मेरी त्वचा को जला सकती है। मैं पिछले छह सालों से इस कमरे से बाहर नहीं निकला हूँ। यह कमरा ही मेरी पूरी दुनिया है।”
मीरा का दिल अचानक एक अजीब से दर्द से भर गया। वह खुद को इस घर में कैद समझती थी, लेकिन वह कम से कम बालकनी में टहल सकती थी, खिड़की खोलकर ताजी हवा में सांस ले सकती थी। लेकिन जो इंसान उस पार खड़ा था, उसके लिए तो सूरज की रोशनी भी जहर थी।
मीरा ने लिखा: “तुम्हारा नाम क्या है?”
“रोहन।”
मीरा ने अपनी उंगली से लिखा: “मैं मीरा हूँ।”
रोहन ने लिखा: “मुझे पता है। मैं तुम्हें रोज शाम को इस खिड़की के पास बैठा देखता हूँ। तुम अक्सर किताबें पढ़ती हो और बाहर देखती रहती हो। मैं सालों से तुम्हें लिखना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं होती थी। आज ठंड इतनी थी कि मेरी सांसों की धुंध कांच पर जम गई... और मैं खुद को रोक नहीं पाया।”
मीरा के होठों पर महीनों बाद एक हल्की, सच्ची मुस्कान तैर गई। उसने कांच पर लिखा:
“अच्छा किया जो तुमने लिख दिया।”
अध्याय 3: दो दुनिया, एक भाषा
उस शाम के बाद, कुफरी-वैली की वह भयानक ठंड मीरा के लिए खूबसूरत बनने लगी।
हर शाम ठीक पांच बजे, जब सूरज ढल जाता और पहाड़ों पर कोहरा अपनी सफेद चादर बिछा देता, मीरा उस कोने वाले कमरे में पहुंच जाती। उधर, दूसरी तरफ रोहन भी अपनी खिड़की के पास तैयार रहता।
वे दोनों बोल नहीं सकते थे—मीरा अपनी आवाज़ खो चुकी थी, और रोहन दो कांच की मोटी परतों और आठ फीट की खाई के पार था जहाँ आवाज़ें हवा के शोर में दब जाती थीं।
लेकिन उन्हें आवाज़ की जरूरत भी नहीं थी। उनकी भाषा थी—उनकी सांसें और कांच पर लिखी उंगलियों की इबारत।
वे दोनों कांच के अपने-अपने तरफ खड़े होते, गहरी सांस लेते, कांच पर धुंध जमाते और घंटों बातें करते।
रोहन ने मीरा को बताया कि वह एक मशहूर चित्रकार का बेटा था। बचपन में जब बीमारी का पता चला, तो उसके पिता ने उसे इस पहाड़ी एनेक्स में शिफ्ट कर दिया ताकि वह प्रदूषण और धूप से दूर रह सके। रोहन के पास दुनिया भर की किताबें थीं। वह रात को खगोलशास्त्र (Astronomy) पढ़ता था और खिड़की से तारों को देखता था।
"तुमने कभी रात में आसमान देखा है?" रोहन ने एक शाम लिखा।
मीरा ने लिखा: "हाँ, लेकिन मुझे तारे बहुत दूर और ठंडे लगते हैं।"
रोहन ने जवाब दिया: "वे दूर जरूर हैं, मीरा, लेकिन वे अरबों साल पहले खत्म हो चुकी रोशनी को हम तक पहुंचाते हैं। वे उम्मीद की तरह हैं—भले ही स्रोत चला जाए, रोशनी सफर करती रहती है।"
बदले में, मीरा रोहन को उन चीज़ों के बारे में बताती जो वह नहीं देख सकता था। वह लिखती कि बारिश के बाद पहाड़ी मिट्टी की खुशबू कैसी होती है, चीड़ के पत्तों पर जब ओस जमती है तो वे कैसे चमकते हैं, और जब घाटी में नीलकंठ पक्षी उड़ता है तो आसमान का रंग कैसा लगता है।
रोहन मीरा के लिखे हर शब्द को ऐसे पढ़ता मानो वह कोई पवित्र ग्रंथ हो।
एक दिन, रोहन ने लिखा: “मीरा, क्या तुम कभी मुस्कुराती भी हो? मैंने तुम्हें हमेशा उदास देखा है।”
मीरा ने थोड़ी देर सोचा, फिर लिखा: “मैं बोल नहीं सकती, रोहन। एक हादसे में मेरे मम्मी-पापा चले गए और मेरी आवाज़ भी। इस वीरान हवेली में मुस्कुराने की कोई वजह ही नहीं थी... जब तक कि तुम नहीं मिले।”
कांच के उस पार सन्नाटा छा गया।
फिर रोहन की तरफ से जो शब्द लिखे गए, उन्होंने मीरा के दिल को अंदर तक छू लिया:
“तुम बोल नहीं सकतीं, तो क्या हुआ? तुम्हारी सांसें मुझसे बात करती हैं, मीरा। और मेरे लिए यह दुनिया की किसी भी आवाज़ से ज्यादा खूबसूरत है।”
अध्याय 4: खामोश मोहब्बत
दिन हफ्ते में बदले और हफ्ते महीनों में। कुफरी-वैली में बर्फबारी का मौसम शुरू हो चुका था। खिड़की के बाहर का तापमान अब माइनस आठ डिग्री तक गिर गया था, लेकिन उस कोने वाले कमरे में एक अनोखी गर्माहट थी—दो दिलों की गर्माहट, जो सिर्फ अपनी सांसों के जरिए एक-दूसरे को छू रहे थे।
रोहन और मीरा के बीच अब शब्दों की भी कम जरूरत पड़ने लगी थी। कभी-कभी वे सिर्फ कांच पर अपनी हथेली रख देते।
एक तरफ मीरा की हथेली होती, दूसरी तरफ रोहन की। कांच के बीच की वो दो इंच की मोटाई और बीच की आठ फीट की खाई जैसे मिट जाती थी। मीरा को लगता कि वह रोहन की उंगलियों की गर्माहट को अपनी हथेली पर महसूस कर सकती है।
एक शाम, जब बाहर हल्की बर्फबारी हो रही थी, रोहन ने कांच पर लिखा:
“मीरा, आज मैंने तुम्हारे लिए कुछ बनाया है।”
मीरा ने उत्सुकता से अपनी सांस छोड़ी और लिखा: “क्या?”
रोहन ने अपनी खिड़की के अंदर एक छोटी सी मोमबत्ती जलाई। उसने कांच के बहुत करीब एक कैनवास रखा। वह मीरा की एक पेंटिंग थी—कांच पर हाथ रखे हुए, आंखों में एक हल्की सी उम्मीद की चमक लिए। भले ही रोहन ने मीरा का चेहरा कोहरे के पार से धुंधला ही देखा था, लेकिन उसने मीरा की रूह को बिल्कुल सही उकेरा था।
मीरा की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने अपनी उंगली से लिखा: “यह बहुत खूबसूरत है, रोहन... लेकिन तुमने मुझे इतना उदास क्यों नहीं बनाया?”
रोहन ने जवाब लिखा: “क्योंकि मेरी नजरों में तुम उदास नहीं हो, मीरा। तुम इस जमती हुई घाटी की पहली किरण हो।”
उस रात मीरा काफी देर तक अपनी खिड़की के पास बैठी रही। उसे पहली बार एहसास हुआ कि प्यार करने के लिए ना तो छूने की जरूरत होती है, ना ही आवाज़ की। दो सांसों का एक ही हवा में घुल जाना ही काफी होता है।
अध्याय 5: गिरता हुआ पारा
दिसंबर का आखिरी हफ्ता आया और पहाड़ों में सालों का सबसे भयानक बर्फानी तूफान (Blizzard) टकराया। तेज बर्फीली हवाएं बंगले की छतों और खिड़कियों से टकराकर सिसकियां लेने लगीं। बिजली के खंभे गिर जाने की वजह से पूरे इलाके की बत्ती गुल हो गई थी।
मीरा के कमरे में अंगीठी बुझने लगी थी। ठंड इतनी बढ़ गई थी कि कमरे के अंदर रखी पानी की सुराही भी जम चुकी थी।
मीरा कांपते हुए अपनी भारी शॉल लपेटकर खिड़की के पास पहुंची। उसने कांच पर सांस छोड़ी।
कांच पर जमी बर्फ की परत इतनी मोटी थी कि उसे पिघलाने के लिए मीरा को कई बार अपनी सांसें छोड़नी पड़ीं।
दूसरी तरफ से रोहन भी खिड़की पर था। लेकिन मीरा ने गौर किया कि इस बार रोहन की तरफ से कांच पर धुंध जमने में बहुत वक्त लग रहा था। उसकी सांसें भारी थीं।
रोहन ने धीमी गति से लिखा: “मीरा... आज बहुत ठंड है। मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही।”
मीरा का दिल घबराहट से भर गया। उसने जल्दी-जल्दी लिखा: “क्या हुआ रोहन? क्या तुम्हारे पास हीटर नहीं है? क्या कोई देखभाल करने वाला है?”
“तूफान की वजह से रास्ते बंद हैं... एनेक्स का केयरटेकर नीचे गांव गया था और वहीं फंस गया। रूम हीटर बिजली न होने की वजह से बंद है।”
मीरा का चेहरा पीला पड़ गया। Xeroderma के मरीजों के लिए अत्यधिक ठंड और सही तापमान का न होना बहुत खतरनाक हो सकता था। वह तड़प उठी। वह चाहती थी कि दौड़कर उस पार जाए, रोहन के लिए आग जलाए, उसे अपनी बाहों में समेट ले। लेकिन बीच में आठ फीट की वो काली, गहरी खाई और भयानक तूफान था।
मीरा ने कांच पर जोर-जोर से हाथ मारा, अपनी बेबसी पर आंसू बहाए। वह बोलना चाहती थी, चिल्लाना चाहती थी—"रोहन! हिम्मत रखो!"—लेकिन उसकी आवाज़ गले में ही घुटकर रह गई।
रोहन ने देखा कि मीरा रो रही है। उसने कांपते हाथों से लिखा:
“रो मत, मीरा। जब तक तुम्हारी सांसें इस कांच पर जम रही हैं, मैं ठीक रहूंगा। बस तुम यहीं रहो... मेरी नजरों के सामने।”
उस पूरी रात, -12 डिग्री तापमान में, मीरा खिड़की के सामने से एक इंच भी नहीं हटी। वह हर दो मिनट में कांच पर अपनी गर्म सांस छोड़ती ताकि रोहन को पता रहे कि वह वहां है। रोहन भी दूसरी तरफ कांच पर अपनी हथेली टिकाए बैठा रहा।
वह रात सिर्फ दो इंसानों के ज़िंदा रहने की लड़ाई नहीं थी, वह प्यार की सांसों से ठंड को हराने की कोशिश थी।
अध्याय 6: टूटा हुआ कांच
सुबह के चार बजे तूफान थोड़ा थमा। पूर्व में हल्की सी नीली रोशनी फूटने लगी थी।
मीरा की आंखें ठंड और थकावट से मुंद रही थीं, लेकिन उसने खुद को सोने नहीं दिया। उसने अपनी आखिरी ताकत जुटाकर कांच पर अपनी सांस छोड़ी।
शूाााा...
धुंध जमी। मीरा ने लिखा: “रोहन? सुबह हो गई। तुम ठीक हो?”
दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया।
मीरा का दिल बैठा जा रहा था। उसने दोबारा सांस ली, फिर लिखा: “रोहन! जवाब दो!”
कांच बिल्कुल साफ रहा। उस पार से कोई उंगली नहीं चली।
कोहरा थोड़ा छंटने लगा था। मीरा ने कांच से चिपककर सामने एनेक्स की खिड़की की तरफ देखा।
वहां... एनेक्स की खिड़की का कांच टूटा हुआ था!
तूफान की तेज हवाओं ने शायद रात के किसी पहर रोहन की खिड़की के शीशे को तोड़ दिया था। बर्फीली हवा सीधे कमरे के अंदर जा रही थी—वही हवा जो रोहन के लिए जहर थी।
मीरा के मुंह से एक बेआवाज़ चीख निकली—"रोहन!"
वह पागलों की तरह कमरे से बाहर भागी। वह गलियारे से होती हुई, मुख्य दरवाजे को लांघकर बाहर बर्फ में नंगे पांव भागने लगी। बर्फ उसके पैरों में सुइयों की तरह चुभ रही थी, लेकिन उसे कोई होश नहीं था। वह बंगले के पीछे एनेक्स की तरफ जाने वाले पुराने, बंद पड़े रास्ते की तरफ भागी।
वहां एक भारी लोहे का जंग लगा दरवाजा था जो एनेक्स को जोड़ता था, जिस पर मोटा ताला लटका था। मीरा ने एक भारी पत्थर उठाया और पागलों की तरह उस ताले पर मारने लगी।
छन! छन! छन!
दस मिनट की अमानवीय कोशिश के बाद ताला टूट गया। मीरा नंगे पैर, जमती बर्फ पर भागती हुई एनेक्स के उस ठंडे कमरे में घुसी।
कमरे का नजारा देखकर मीरा की रूह कांप गई।
खिड़की का शीशा टूटा हुआ था और फर्श पर बर्फ की चादर बिछ चुकी थी। व्हीलचेयर के पास, फर्श पर रोहन पड़ा हुआ था। उसका शरीर एकदम सफेद और ठंडा पड़ चुका था। उसकी आंखें अधखुली थीं, जो सीधी टूटी हुई खिड़की से आती उस हवा की तरफ थीं... जहाँ से मीरा की सांसें आती थीं।
मीरा उसके पास घुटनों के बल गिर पड़ी। उसने रोहन का सिर अपनी गोद में रखा। उसने उसके ठंडे गालों को चूमा, अपनी हथेलियों से उसकी छाती को रगड़ने लगी।
उसने रोहन के होठों के पास अपना कान लगाया।
वहां कोई हलचल नहीं थी। कोई आहट नहीं थी।
रोहन की सांसें थम चुकी थीं।
अध्याय 7: अमर सांसें
उस हादसे के बाद कुफरी-वैली का मौसम बदल गया, लेकिन मीरा के लिए सब कुछ वहीं थम गया।
रोहन के जाने के बाद उसके केयरटेकर ने मीरा को एक लिफाफा सौंपा, जो रोहन ने तूफान वाले हफ्ते की शुरुआत में लिखकर अपने दराज में रखा था। शायद उसे अपनी गिरती सेहत का अहसास हो गया था।
मीरा ने कांपते हाथों से खत खोला। अंदर रोहन की खूबसूरत लिखावट में लिखा था:
"प्रिय मीरा,
जब तुम यह खत पढ़ रही होगी, शायद मैं अपनी खिड़की के उस पार नहीं हूँगा। लेकिन मैं तुमसे एक वादा करना चाहता हूँ—उदास मत होना।
तुमसे मिलने से पहले, मैं सिर्फ एक जिंदा लाश था जो अंधेरे में अपनी मौत का इंतजार कर रहा था। तुमने मुझे जीना सिखाया। तुमने अपनी सांसों से मुझे वो दुनिया दिखाई जो मैं कभी नहीं देख सकता था। तुमने मेरी खामोशी को अपनी रूह से सुना।
अगर मेरी सांसें रुक भी जाएं, तो यह मत सोचना कि मैं चला गया। जब भी पहाड़ों पर ठंड बढ़ेगी, जब भी इस खिड़की के कांच पर धुंध जमेगी... समझना कि मैं वहीं हूँ। मैं तुम्हारी हर सांस के साथ इस हवा में मौजूद रहूँगा।
अपनी मुस्कान कभी मत खोना, मेरी पहली और आखिरी किरण।
— तुम्हारा रोहन"
उपसंहार (Epilogue)
कई साल बीत चुके हैं।
मीरा अब अकेली नहीं रहती। उसने उस एनेक्स को एक आर्ट गैलरी और अनाथ बच्चों के लिए एक छोटा सा स्कूल बना दिया है। वह बोल नहीं सकती, लेकिन उसकी आंखें और उसकी पेंटिंग्स बच्चों से बातें करती हैं।
लेकिन हर साल, 14 नवंबर की शाम को, जब पहाड़ों पर पहला तूफान आता है और तापमान शून्य से नीचे गिरता है... मीरा सब कुछ छोड़कर उस कोने वाले कमरे में जाती है।
वहां की खिड़की आज भी वैसी ही है।
मीरा खिड़की के करीब जाती है। वह अपनी आंखें बंद करती है और कांच पर एक लंबी, गरम सांस छोड़ती है...
शूाााा...
कांच पर सफेद, दूधिया धुंध की एक मोटी परत जम जाती है।
मीरा अब उस पर कोई उदास चेहरा नहीं बनाती, ना ही कोई सवाल लिखती है। वह मुस्कुराती है और अपनी उंगली से धुंध पर एक खूबसूरत सा दिल बनाती है।
और खिड़की के उस पार, हवा में चीड़ के पत्तों की सरसराहट होती है—मानो कोई दूसरी तरफ से अपनी उंगली चलाकर उस दिल को पूरा कर रहा हो।
क्योंकि कुछ रिश्ते जिस्मों के मोहताज नहीं होते... वे सांसों में घुलकर अमर हो जाते हैं।
(समाप्त)