लंबे समय बाद मिले दोस्त Vijay Erry द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

लंबे समय बाद मिले दोस्त

लंबे समय बाद मिले दोस्त
लेखक: विजय शर्मा एरी
समय की धारा बहती रहती है। लोग बदलते हैं, शहर बदलते हैं, जिम्मेदारियाँ बदलती हैं। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो दिल के सबसे गहरे कोने में छिपे रहते हैं। वे कभी मरते नहीं, बस इंतज़ार करते हैं—एक फोन कॉल का, एक मुलाकात का, एक हँसी का। यह कहानी उन्हीं दो दिलों की है जो बीस साल के फासले के बाद फिर मिले और साबित किया कि सच्ची दोस्ती समय से बड़ी होती है।
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे—मैनपुरी—में दो घर आमने-सामने थे। एक में रहता था रोहित वर्मा और दूसरे में समीर खान। दोनों की उम्र लगभग एक जैसी थी। बचपन से ही दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे लगते थे। स्कूल की एक ही बेंच पर बैठते, एक ही टिiffin बाँटते और शाम को मैदान में क्रिकेट खेलते। जब रोहित का बल्ला टूट जाता तो समीर अपना दे देता। जब समीर की कॉपी गुम हो जाती तो रोहित अपनी में से पेज फाड़कर दे देता। माँ-बाप कहते—“ये दोनों तो जुड़वाँ भाई जैसे हैं, सिर्फ नाम अलग हैं।”
रोहित के पिता एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। समीर के पिता एक छोटी-सी साइकिल रिपेयर की दुकान चलाते थे। दोनों परिवारों की हालत साधारण थी, लेकिन प्यार बहुत था। एक दिन मैदान में खेलते हुए रोहित का पैर मुड़ गया। समीर ने उसे कंधे पर उठाया और तीन किलोमीटर पैदल घर तक पहुँचाया। रोहित रो रहा था, लेकिन समीर हँसते हुए कह रहा था—“यार, अगर तू लंगड़ा हो गया तो मैं भी तेरे साथ लंगड़ाकर चलूँगा।” उस दिन दोनों की आँखों में पानी था, लेकिन दिल और भी करीब आ गए थे।
साल बीतते गए। दसवीं पास करने के बाद रास्ते अलग हो गए। रोहित ने साइंस ली और आगे जाकर इंजीनियरिंग की। समीर ने आर्ट्स लिया और पिता की दुकान संभालने लगा। रोहित मुंबई चला गया। समीर मैनपुरी में ही रहा। पहले तो पत्र आते-जाते रहे, फिर फोन आने लगे। धीरे-धीरे बातें कम होती गईं। शादी हो गई, बच्चे हो गए, जिम्मेदारियाँ बढ़ गईं। जिंदगी की भागदौड़ में पुरानी दोस्ती कहीं पीछे छूट गई।
बीस साल बाद…
रोहित अब मुंबई में एक बड़ी आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर था। पत्नी अंजलि और दो बच्चे—आर्यन और कियारा। घर में सब कुछ था—बड़ी गाड़ी, अच्छा फ्लैट, नौकर-चाकर। लेकिन दिल में एक खालीपन था। रात को जब अकेला बैठता तो पुरानी यादें सतातीं। मैनपुरी की वह गली, समीर की हँसी, स्कूल की वह बेंच, और वह दिन जब समीर ने उसे कंधे पर उठाया था।
एक दिन ऑफिस में बैठे-बैठे अचानक दिल में कुछ हुआ। उसने फोन उठाया और पुराना नंबर डायल किया। तीन बार घंटी बजी। फिर एक परिचित आवाज आई—“हैलो?”
रोहित की आवाज थर्रा गई—“समीर… मैं रोहित बोल रहा हूँ।”
दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया। फिर समीर बोला—“रोहित? यार… इतने साल बाद? कहाँ खो गया था तू?”
दोनों हँस पड़े। आवाज में हँसी के साथ आँसू भी थे। बातें होने लगीं। समीर ने बताया कि दुकान अब अच्छी चल रही है। बेटा कॉलेज में है, बेटी शादीशुदा। पत्नी भी ठीक है। रोहित ने अपने बारे में बताया। फिर समीर बोला—“यार, एक बार मैनपुरी आ जा। गली अभी भी वैसी ही है। तेरा घर अब किराए पर है, लेकिन यादें अभी भी वहीं हैं।”
रोहित ने वादा किया। एक महीने बाद छुट्टी लेकर मैनपुरी पहुँचा। स्टेशन पर समीर खुद खड़ा था। बाल सफेद हो चुके थे, पेट निकल आया था, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक थी। दोनों ने गले लगाया। आसपास के लोग देख रहे थे, लेकिन दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता था। बीस साल का फासला एक पल में मिट गया।
गली पहुँचे। रोहित का पुराना घर अब किसी और का था। दीवारें नई थीं, लेकिन नीम का पेड़ अभी भी खड़ा था। समीर बोला—“याद है, इस पेड़ पर हमने कितने आम खाए थे? और वह दिन जब तू ऊपर से गिर गया था?” रोहित हँसा—“तूने मुझे नीचे से पकड़ा था। वरना हाथ-पैर टूट जाते।”
शाम को समीर के घर चाय पी। पुरानी बातें निकलने लगीं। स्कूल का वह टीचर जो दोनों को रोज पीटता था। वह लड़की जिस पर दोनों को क्रश था। वह बारिश का दिन जब दोनों भीगते हुए घर पहुँचे और माँ ने डांटा। समीर की पत्नी ने कहा—“आप दोनों अभी भी बच्चे जैसे लगते हैं।”
रात को दोनों छत पर बैठे। आसमान में तारे चमक रहे थे। रोहित बोला—“यार, जिंदगी में सब कुछ पा लिया, लेकिन दिल नहीं भरा। कभी-कभी लगता है कि कुछ अधूरा रह गया।”
समीर चुप रहा। फिर बोला—“मेरे साथ भी यही है। दुकान चल रही है, परिवार खुश है, लेकिन जब अकेला होता हूँ तो सोचता हूँ—काश रोहित यहीं होता। हम साथ होते तो शायद जिंदगी और भी रंगीन होती।”
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। आँखों में पानी था।
अगले दिन दोनों ने पुराने स्कूल का दौरा किया। स्कूल अब बहुत बदल चुका था। नई बिल्डिंग, नए टीचर। लेकिन वह बेंच अभी भी वहाँ थी जहाँ दोनों बैठते थे। रोहित ने हाथ फेरा और बोला—“इस बेंच ने कितनी कहानियाँ सुनी होंगी।” समीर ने हँसते हुए कहा—“और कितने डंडे खाए होंगे।”
फिर दोनों ने उस मैदान में घूमने का फैसला किया जहाँ बचपन में क्रिकेट खेलते थे। अब वहाँ नए बच्चे खेल रहे थे। एक छोटे लड़के का पैर मुड़ गया। रोहित ने तुरंत अपना रुमाल निकाला और बाँधने लगा। समीर देख रहा था। अचानक उसने कहा—“यार, याद है वह दिन?” रोहित ने सिर हिलाया। दोनों की आँखें फिर नम हो गईं।
तीन दिन बाद रोहित को मुंबई लौटना था। स्टेशन पर समीर ने एक छोटा पैकेट दिया। रोहित ने खोला—अंदर एक पुराना रुमाल था, जिस पर हल्के खून के निशान अभी भी दिख रहे थे। समीर बोला—“यह वही रुमाल है। मैंने बचा रखा था। सोचता था कभी तुझे दूँगा।”
रोहित का गला रुँध गया। उसने समीर को कसकर गले लगाया—“यार, हम कभी अलग नहीं हुए। सिर्फ दूरी थी। दिल हमेशा साथ था।”
ट्रेन चल पड़ी। समीर प्लेटफॉर्म पर खड़ा हाथ हिलाता रहा जब तक ट्रेन नजर से ओझल नहीं हो गई।
मुंबई लौटकर रोहित ने फैसला किया। हर साल कम से कम एक बार मैनपुरी जरूर आएगा। और समीर को भी मुंबई बुलाएगा। फोन पर बातें नियमित हो गईं। वीडियो कॉल पर बच्चे एक-दूसरे से बात करने लगे। धीरे-धीरे दोनों परिवार भी करीब आ गए।
एक साल बाद समीर मुंबई आया। रोहित ने उसे अपने ऑफिस दिखाया, बच्चों से मिलवाया। शाम को दोनों समुद्र किनारे बैठे। रोहित बोला—“यार, पुराने दोस्त सच में जिंदगी का सबसे बड़ा खजाना होते हैं। पैसा, पद, गाड़ी—सब आते-जाते रहते हैं। लेकिन यह रिश्ता…”
समीर ने मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ। और यह रिश्ता बनाए रखने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। जैसे बचपन में हम एक-दूसरे के लिए करते थे।”
दोनों हँसे। आसमान में सूरज डूब रहा था। सुनहरी रोशनी में दोनों के चेहरे चमक रहे थे—जैसे बीस साल पहले मैनपुरी की गली में चमकते थे।
समय बीतता रहा। रोहित रिटायर हो गया। समीर की दुकान अब बेटा संभालने लगा। दोनों बुजुर्ग हो गए। लेकिन दोस्ती और भी गहरी हो गई। कभी मैनपुरी, कभी मुंबई। कभी फोन पर घंटों बातें। कभी चुपचाप एक-दूसरे की साँस सुनते रहना।
एक दिन रोहित बीमार पड़ा। अस्पताल में था। समीर तुरंत मैनपुरी से मुंबई पहुँच गया। रात-दिन उसके पास बैठा रहा। अंजलि ने कहा—“आपके आने से रोहित को बहुत ताकत मिली है।” समीर ने सिर्फ मुस्कुराकर कहा—“यह तो मेरा फर्ज है। बचपन में उसने भी मेरे लिए यही किया था।”
रोहित ठीक हो गया। अस्पताल से निकलते समय उसने समीर का हाथ पकड़ा और बोला—“यार, जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर भी तू मेरे साथ है। इससे बड़ा कोई तोहफा नहीं हो सकता।”
समीर ने जवाब दिया—“हम हमेशा साथ रहेंगे। चाहे शरीर अलग हो जाए, दिल हमेशा एक रहेंगे।”
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि पुराने दोस्तों की कहानी कभी खत्म नहीं होती। वह पीढ़ियों तक चलती रहती है। रोहित और समीर के बच्चे अब भी उस दोस्ती की बात करते हैं। मैनपुरी की गली में नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है। और जब हवा चलती है तो लगता है जैसे दो पुराने दोस्त अभी भी वहाँ हँस रहे हों, खेल रहे हों, और एक-दूसरे से कह रहे हों—“यार, हम कभी अलग नहीं होंगे।”
जीवन में बहुत कुछ मिलता है और खोता है। लेकिन सच्ची दोस्ती वह प्रकाश है जो अँधेरे में भी रास्ता दिखाती है। पुराने दोस्त हमें याद दिलाते हैं कि हम कहाँ से आए हैं, और हमारा असली रूप क्या है। वे हमारे सबसे बड़े आलोचक भी होते हैं और सबसे बड़े समर्थक भी।
अगर आपके जीवन में भी कोई पुराना दोस्त है जिससे बातें टूट गई हैं, तो आज ही फोन उठाएँ। एक संदेश भेजें। क्योंकि समय कभी किसी का इंतजार नहीं करता। और दोस्ती को जीवित रखने के लिए सिर्फ एक छोटा-सा कदम काफी होता है।
रोहित और समीर की तरह… हमेशा के लिए साथ।
— विजय शर्मा एरी
(लगभग 2000 शब्द)