बाबूजी की विपरीत सीख Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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बाबूजी की विपरीत सीख

               जीजी की शादी के बाद जीजी से ज़्यादा बदलाव बाबूजी में आया।

               कहां तो वह जीजी के प्रति की गई पुंजातीय वर्ग की छोटी से छोटी हिमाकत की भनक पाते ही जीजी को महिला वर्ग के समानाधिकारों का हवाला दे कर उन्हें आक्रामक व स्वाग्रही बनने की सीख दिया करते थे और कहां अब वह जीजी को जीजा के बड़े- से- बड़े दोष को भी अनदेखा करने की विपरीत सीख देने लगे : भारतवर्ष में किसी भी पत्नी को बराबरी का दर्जा पाने की इच्छा रखनी ही नहीं चाहिए। सुरेश के आगे झुकने ही में तुम्हारी बढ़ाई है। जिस भी माप से तुम सुरेश के सम्मुख विनम्रता, आज्ञाकारिता व श्रद्धा अर्पित करोगी, बदले में वह उसी अनुपात से तुम्हें अपना विश्वास व सम्मान देगा।

               और दूसरी तरफ़ वही जीजी जो अपनी सुविधा व साज-सज्जा के प्रति शुरू ही से लापरवाह रही थीं, अब दोनों हाथों से हमारा घर लूटने लगीं।

               कभी मां के बक्सों से अपने लिए उनकी पुरानी भारी साड़ियां छांटतीं, तो कभी हमारी बैठक की आलमारी के शो- केस में सजे चांदी के गिलास उनके मग समेत उठा ले जातीं, तो कभी हमारी रसोई के भंडार से पीछे की ओर सरकाए गए पीतल के बड़े देग और भगौने चिहुंट ले जातीं, जिन्हें उन के जटिल रखरखाव के झंझट से बचने के लिए मां ने वर्षों पहले रोज़मर्रा के बर्तनों से अलग धर रखे थे।

               हर बार मैं सोचता,इस बार बाबूजी ज़रूर जीजी पर बरसेंगे। 

             परंतु हर बार जितनी ही देर जीजी यहां का सामान अपने साथ ले जाने के लिए नापने- जोखने में लगातीं, वह उतनी ही देर अपनी पहिएदार कुर्सी पिछले बरामदे में टिका कर अखबार पढ़ने का नाटक जारी रखते और पसंद आया सामान बटोर कर जीजी जब बाबूजी को अपनी लूट दिखातीं, बाबूजी ज़रूर पूछते, “तुम कहो तो कोई चेक काट दूं, लड़की?”

             अपने लाड़ अथवा भावावेग में बाबूजी जीजी को ‘लड़की’ के नाम ही से संबोधित करते।

             “नहीं, बाबूजी!” हर बार जीजी सिर हिलातीं, “नहीं, अभी नहीं। अभी ऐसे ही चला कर देखते हैं….”

             जीजी के जाने के बाद जब भी मैं बाबूजी से उलझता, वह मुझे चुप करा देते।

             “उस की शादी के बाद से अपनी बहन को तुम बेगानी क्यों समझने लगे हो? इस  घर पर उस का भी उतना ही अधिकार है

जितना तुम्हारा। और फिर जो चीज़ें वह यहां से ले कर जाती है, वह हमारे किस काम की हैं? उन्हें देखने- भालने वाला यहां है ही कौन? बल्कि हमें तो खुश होना चाहिए। जो चीज़ें यहां नाकारा धरी रखीं हैं, वे अब लिप- पुत कर नलिनी के काम आ रही हैं….”

             “वह कोरे उस्तरे की धार से हमें मूंड रही है और आप जश्न मना रहे हैं।”

             “तुम अभी छोटे हो। तुम समझते नहीं आज के ज़माने में दामाद क्या- क्या नहीं कर गुज़रते? सुरेश तो हमारा फिर भी हज़ारों मे एक है। वह चाहता तो मेरा पूरा पी.पी. एफ़. अपने नाम करा लेता।”

 

(2)

 

              सुरेश से हमारी पहली भेंट आठ महीने पहले हुई थी। रूखी और स्पष्टवादी। जिन वैवाहिक विज्ञापनों के उत्तर में बाबूजी ने जीजी के विवरण भेजे थे उन में सरकारी बीमा एजेंसी का यह तीस- वर्षीय पदाधिकारी, सुरेश, उन्हें सर्वोपयुक्त लगा था।

              जीजी की शादी की बाबूजी को बहुत जल्दी थी। पिछले वर्ष अपनी स्कूटी से हुई एक सड़क दुर्घटना में उन की रीढ़ की निचली, श्रोणीय हड्डी लचक गई थी। जिस से चलने- फिरने की उन की क्षमता जाती रही थी। और बाबूजी वाले विषय, रसायन शास्त्र,में एम.ए. कर चुकी जीजी को बाबूजी के इंटर कालेज में उन की प्रवक्ता की नौकरी देते समय कालेज प्रिंसीपल ने एक शर्त रखी थी : लड़कों के उस कालेज में नलिनी को और सुदृढ़ व सुग्राह्य बनाने की खातिर उस की शादी जल्दी हो जानी चाहिए।

             “मैं सुरेश हूं,” अपने बैठने के लिए उस ने हमारी बैठक का बड़ा सोफ़ा चुना था, “आपने मुझे पांच बजे बुलाया था और देखिए, मैं एकदम नियत समय पर आ पहुंचा हूं। न एक मिनट पहले। एक मिनट पीछे….”

             “मैं नहीं समझता देखने-दिखाने से कोई खास फ़ायदा होता है,” बाबूजी ने अपनी बेआरामी जतलाई थी, “मगर आपने शर्त रख ली, लड़की देख कर ही ‘हां’ या ‘न’ में जवाब देंगे।”

              “आप इसे अन्यथा न लें,” सुरेश ने अथाह धीरज दिखलाया था, “मेरी मां की समझ में यही रहा कि उनकी बहू मेरे लिए नितांत अजनबी नहीं होनी चाहिए।” 

              “लेकिन आपको यहां अपनी मां को साथ ले कर आना चाहिए था,” बाबूजी की झल्लाहट बढ़ ली थी, “बात पक्की होनी होती तो आज ही हो जाती।”

              “मेरी मां मुझ पर पूरा भरोसा रखती हैं,” सुरेश ने कहा था, “मेरी ‘हां’ को वह ‘न’ में बदल ही नहीं सकतीं।आप नलिनी जी को बुलाइए।”

              “अपनी- अपनी समझ की बात है,” बाबूजी निरुत्साहित बने रहे थे।

              “आइए, नलिनी जी,” जीजी के बैठक में प्रवेश करते ही सुरेश आदरपूर्वक खड़ा हो लिया था। और जब तक जीजी ने अपने छोटे सोफ़े पर अपना स्थान ग्रहण नहीं किया था, सुरेश उन के सम्मान में खड़ा ही रहा था, “आइए और बताइए पढ़ने- पढ़ाने के इलावा आप और क्या रुचि रखती हैं? संगीत? फ़िल्म? साहित्य?”

              “नलिनी कुल जमा बारह की थी, जब इस की मां परलोक सिधारी थीं,” उत्तर बाबूजी ने दिया था, “घर के कामकाज के साथ इसने बी.एड. की है। एम.ए. की है। और मेरे एक्सीडेंट के बाद से आजकल मेरे वाले इंटर कालेज में मेरी जगह रसायन शास्त्र पढ़ा रही है।। ऐसे में बाकी चीज़ों के लिए इस के पास समय कहां बचा?”

              “खाना बहुत अच्छा बनाती हैं क्या?” सुरेश की गर्मजोशी में तब भी तनिक कमी नहीं हुई थी।

              “मालूम नहीं, आप कैसा खाना पसंद करते हैं?” इस बार भी बाबूजी ही बोले थे, “हम लोग तो एकदम सादा भोजन लेते हैं।दाल,चावल,लौकी,  तुरई, आलू….”

              “दाल- चावल को आप सादा भोजन मत कहिए,”  सुरेश ने जीजी की ओर देखा था, “स्वादिष्ट भोजन कहिए।” 

              जीजी हंस पड़ी थीं।

              “जाओ, नलिनी,” बाबूजी ने जीजी को उठने का संकेत दिया था, “तुम जाकर चाय तैयार करो।”

               “बात स्पष्ट करना मेरे लिए बहुत ज़रूरी रहता है,” जीजी के उठते ही बाबूजी ने अपना स्वर कड़ा कर लिया था, “आपको फ़ोन पर भी मैं ने स्पष्ट बताया था। आपका उत्तर ‘हां’ या ‘न’ में मुझे आज ही चाहिए।”

               “मैं शादी के लिए तैयार हूं,” सुरेश हंसने लगा था।

               “फिर आगा- पीछा और हीला- हवाला क्या?” बाबूजी खिल उठे थे, “विवाह की औपचारिकताएं तय करने के लिए मैं कल ही आपकी मां के पास अपने छोटे भाई को भेज दूंगा।”

               अपने परिवार में चाचा को छोड़कर बाबूजी का किसी से विशेष संपर्क न रहा था।

हमारे दादा- दादी तो जीवित थे नहीं। ताऊ हमारे दूर कोलकोता में रहते थे और दोनों बुआ लोग अपने- अपने परिवारों में मस्त रहतीं थीं।

               “लड़के की कद- काठी मज़बूत है और शक्ल- सूरत भी अच्छी है,” सुरेश व उस के परिवार से मिलने के बाद चाचा प्रसन्न हुए थे, “दिमाग भी उसका तेज़ चलता है। उत्सवादि पर फ़िज़ूलखर्ची से पूरी तरह बचने के लिए उस ने अपना एक प्रस्ताव रखा है : बारात के नाम पर वह अपनी बड़ी बहन व उसके पति के इलावा अपनी दो छोटी बहनों के साथ यहां आएगा। पिता उस के हैं नहीं और मां उस की कहीं आती- जाती नहीं। पंडित के एक सादे मंत्रोच्चारण के उपरांत नलिनी उन पांच लोगों के साथ विदा ले लेगी और शादी में जो भी आपको लेना- देना हो, वह भी आप एकमुश्त रकम की सूरत में दे दें। सामान खरीदने और ढोने की क्या ज़रूरत है?”

              “एकमुश्त रकम?” बाबूजी चौंके थे, “कितनी रकम? उधर मेरे एक्सीडेंट ने मेरे प्रोविडेंट फंड को पहले ही लील लिया है। फिर आलोक की पढ़ाई अभी बाकी है और मेरे पी.पी. एफ़ में कुल जमा साढ़े पांच लाख है….”

              “अभी हम उसे तीन लाख ही देते हैं,” चाचा बोले थे, “फिर टोह लेंगे वह इस से कम- ज़्यादा में तैयार होगा या इसी रकम से संतोष कर लेगा।”

              “यही सही रहेगा,” बाबूजी ने अपनी सहमति प्रकट कर दी थी।

               बाबूजी का उत्तर सुनने सुरेश स्वंय आया था। इस बार भी जीजी को मिलने की उस की इच्छा को बाबूजी ने निराकृत कर दिया था, “शादी से पहले ज़्यादा हुलक- पुलक हमें पसंद नहीं। आपको जो भी पूछना हो, आप मेरे छोटे भाई से पूछिए। हम लोग से नहीं।”

 

(3)

 

               फिर एक रविवार को जीजी आईं और बाबूजी को प्रणाम करने के बाद वहीं जम लीं।

              उत्सुकतावश मैं भी वहीं पसर लिया।

              “चेक चाहिए,लड़की?” बाबूजी ने संकेत से अपनी पहिएदार कुर्सी मंगवाई और अपने बिस्तर से उठ कर उस कुर्सी पर बैठ लिए।

               “नहीं बाबूजी,” जीजी रोआंसी हो लीं, “यह सब टेंपो वालों की हड़ताल की वजह से हो रहा है….”

               “क्या हो रहा है?” मैं ने पूछा।

               “उन की हड़ताल के कारण मेरा अपने कालेज जाना समस्या बन गया है। रिक्शे पर रोज़ साठ- सत्तर रुपया खर्च हो जाता है।”

                सुरेश का घर जीजी के इंटर कालेज से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर था और सुरेश का दफ़्तर उसके घर से पांच किलोमीटर पर। मगर था वह जीजी के इंटर कालेज की विपरीत दिशा में।

               “तो?” मैं ने ताना छोड़ा, “अब तुम लोग को मारुति चाहिए क्या?”

               “मारुति नहीं,” जीजी रोआंसीं बनी रहीं, “बाबूजी वाली स्कूटी….”

               वह स्कूटी पिछली सर्दियों में बाबूजी ने अपने कालेज से ॠण ले कर खरीदी  थी और उन के एक्सीडेंट के बाद से मैं उसे अपने इंजीनियरिंग कालेज जाने- आने के लिए अपने प्रयोग में ला रहा था। जिस की हमारे घर से दूरी कम से कम पंद्रह किलोमीटर तो थी ही।

               “सुरेश कहते हैं,” जीजी बोलीं, “चूंकि मैं साइकल चलाना जानती हूं, इसलिए मुझे स्कूटी सीखने में अधिक समय नहीं लगेगा।”

               “वही समतोल बराबर रखने वाला नियम याद रखना है,” बाबूजी ने जीजी से कहा— जीजी ने साइकल चलाना बाबूजी से सीखा था— “देखना ऊपर की तरफ़ है,मगर हाथ नीचे ब्रेक पर टिकाए रखने हैं….”

               “फिर भी, बाबूजी, आप तो उस की वजह से भारी चोट खा गए न!” मैं फिर उलझ लिया, “जीजी को उस स्कूटी से कोई खतरा नहीं मोल लेना चाहिए….”

               ‘स्कूटी तो मैं भली- भांति सीख ही लूंगी और उसे चलाऊंगी भी बहुत ध्यान से। मगर तुम्हें अपने इंजीनियरिंग कालेज जाने- आने के लिए दिक्कत ज़रूर रहेगी….”

               “तुम घबराओ नहीं,” बाबूजी ने मेरी ओर देखा, “तुम जवान हो। लड़के हो। कैसे भी अपना आने- जाने का प्रबंध कर सकते हो। सुरेश ने स्कूटी की यह बात जो सुझाई है तो ठीक ही सुझाई है। यों भी उस स्कूटी के ऋण की किश्तें अब नलिनी की ही तनख्वाह से काटी जा रहीं हैं।”

 

                लौटते समय जीजी मेरे साथ उस स्कूटी पर सवार हुईं और उन के घर पहुंचने पर सुरेश हमें देखते ही हमारे पास चला आया।

               “आइए, भैय्या, चाय पीजिए!” खिडक़ी में खड़ी सुरेश की सब से छोटी बहन चिल्लाई। वह अभी इंटर से आगे नहीं बढ़ी थी।

               “आ जाओ,” जीजी अकस्मात रोने लगीं, “चाय पीकर चले जाना।”

               “अब तुम रोने क्यों लगी?” मैं अपना गुस्सा काबू न कर सका।

               “यह ऐसे ही करती है,” सुरेश ने कहा, “सब कुछ ठीक क्रम में चल रहा होता है। तरतीबवार। विधि और व्यवस्था के अंदर। लेकिन जाने किस बात पर यह आंसू छलकाने लगती है। एकाएक। अचानक। एकदम बेवजह। बिल्कुल बेसबब।”

              “क्यों?” मैं ने जीजी की ओर देखा।

              “मैं तुम्हारे लिए चाय लाती हूं,” जीजी अपने आवेग से तुरंत बाहर आ गईं, “तुम चाय पी कर जाना।”

              “नहीं,” मैं ने कहा। और स्कूटी वहीं खड़ी करने के बाद उन की गली से बाहर लपक लिया।

              मुझे डर था, मेरी रुलाई छूट जाएगी। जाने कैसे एक अजीब डर ने मुझे दबोच लिया था।

              गली से बाहर पहुंचते ही उस रुलाई ने मुझ पर ऐसा जादू फेरा कि मुझे एक अनजानी सड़क के एक अनजाने पेड़ की शरण लेनी ही पड़ी। और सड़क की ओर पीठ कर मैं ने अपने आपको अपनी रुलाई के सुपुर्द कर दिया।

 

               कुछ ही दिन बीते होंगे जब एक सुबह- सवेरे बाबूजी के कालेज के एक बूढ़े चपरासी ने हमारे घर की घंटी बजाई और हमें देखते ही रोने लगा, “हमारी बिटिया का आज एक्सीडेंट हो गया।”

              “कैसे?” बाबूजी चिल्लाए। 

              “वह अपनी स्कूटी पर आ रहीं थीं कि सामने से एक ट्रक आया और उन्हें कुचल कर चलता बना।”

              “क्या मतलब?” बाबूजी फिर चिल्लाए। 

              “क्या बताएं, सर,” चपरासी ने आकाश की ओर देखा, “दुश्मन उस आसमान की क्या कहें? पहले उस स्कूटी के एक्सीडेंट में आप पर कहर बरपाया और अब इस एक्सीडेंट ने बिटिया को ही अपने पास बुला लिया।”

 

              क्या वह मात्र एक्सीडेंट था?

              परिणाम नहीं था बाबूजी की विपरीत सीख का? कालग्रस्त सोच का?

             सुरेश के चील- झपट्टे का?

जिस के सहारे अब वह जीजी के नाम से अपनी बीमा एजेंसी से एक भारी रकम ऐंठने वाला था?

              बाबूजी की कंपकंपाहट देख कर मेरे लिए अपना गुस्सा काबू करना ज़रूरी हो गया।