श्याम का हिसाब kantilal Rathod Badamiya द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

श्याम का हिसाब

📖 श्याम का हिसाब

जहाँ इंसान का हिसाब खत्म होता है… वहाँ श्याम की कृपा शुरू होती है।

✍️ लेखक

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'

---

🌹 भूमिका

कहते हैं—

जब दुनिया साथ छोड़ देती है, तब खाटू वाला हाथ पकड़ लेता है।

जब इंसान अपनी परेशानियों के सामने खड़ा होकर कहता है—

“अब मैं क्या करूँ?”

तभी कहीं से एक अदृश्य आवाज़ आती है—

“तू चिंता मत कर… मैं हूँ ना।”

श्री खाटू श्याम जी को करोड़ों भक्त “हारे का सहारा” कहते हैं।

क्योंकि जब मनुष्य अपनी शक्ति, अपना धन, अपने संबंध और अपनी सारी कोशिशें लगा देने के बाद भी हार जाता है…

तब भी उसकी उम्मीद खत्म नहीं होती।

क्योंकि उसे विश्वास होता है—

“मेरे श्याम मेरे साथ हैं।”

यह कहानी भी ऐसे ही एक भक्त की है।

एक ऐसा व्यापारी जिसके पास कभी धन की कमी नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियों ने उससे सब कुछ छीनना शुरू कर दिया।

व्यापार गया…

धन गया…

स्वास्थ्य गया…

और अंत में उसका अहंकार भी चला गया।

लेकिन जब सब कुछ चला गया, तब उसे एक चीज़ मिली—

श्याम पर अटूट विश्वास।

और फिर उसके जीवन में जो हुआ…

वह उसके लिए केवल चमत्कार नहीं था।

वह उसके लिए एक संदेश था—

“श्याम के दरबार में देर हो सकती है… लेकिन भक्त की सच्ची पुकार कभी अनसुनी नहीं होती।”

---

🌺 भाग 1

जब सब रास्ते बंद हो गए

राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे सूरजगढ़ में धनराज नाम का एक व्यापारी रहता था।

कभी उसकी कपड़े की बहुत बड़ी दुकान हुआ करती थी।

बड़ा मकान था।

गाड़ी थी।

नौकर थे।

लोग सम्मान से उसे “सेठ जी” कहकर बुलाते थे।

धनराज धार्मिक आदमी नहीं था, ऐसा भी नहीं था।

घर में पूजा होती थी।

त्योहारों पर मंदिर जाता था।

लेकिन उसकी भक्ति में वह गहराई नहीं थी, जो दुःख के समय पैदा होती है।

वह अक्सर कहता—

“भगवान अपनी जगह हैं… और व्यापार अपनी जगह।”

उसे अपने धन पर बहुत भरोसा था।

एक दिन बाजार में अचानक कपड़े के भाव गिर गए।

उसने जो माल बड़े दाम पर खरीदा था, वह आधे दाम में भी बिकना मुश्किल हो गया।

लाखों रुपये का नुकसान हुआ।

धनराज ने सोचा—

“कोई बात नहीं। अगली खेप में संभाल लूँगा।”

लेकिन अगली खेप भी घाटे में चली गई।

फिर एक ग्राहक ने बड़ा भुगतान रोक दिया।

एक साझेदार ने धोखा दे दिया।

बैंक की किश्तें बढ़ती गईं।

दुकान के बाहर जो लोग कभी धनराज के साथ चाय पीने के लिए घंटों इंतजार करते थे, वे अब रास्ता बदलकर निकलने लगे।

धीरे-धीरे उसका व्यापार टूटने लगा।

एक रात वह दुकान बंद करके घर आया।

चेहरा बुझा हुआ था।

पत्नी कमला ने पूछा—

“क्या हुआ?”

धनराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

कमला ने फिर पूछा—

“इतने परेशान क्यों हैं?”

धनराज की आँखों में आँसू आ गए।

“सब खत्म हो गया, कमला।”

“दुकान पर कर्ज है।”

“बैंक का पैसा देना है।”

“मजदूरों की तनख्वाह बाकी है।”

“और घर का खर्च अलग।”

कमला चुपचाप उसके पास बैठ गई।

कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा—

“हमारे पास श्याम बाबा हैं।”

धनराज ने थकी हुई हँसी के साथ कहा—

“श्याम बाबा मेरा व्यापार चलाएँगे?”

कमला ने उसकी ओर देखा।

“शायद व्यापार नहीं…”

“लेकिन आपका हाथ जरूर पकड़ेंगे।”

यह बात धनराज के मन में बैठ गई।

अगली सुबह वह पहली बार पूरे मन से श्री खाटू श्याम जी के सामने बैठा।

उसने हाथ जोड़कर कहा—

“बाबा…”

“मैंने जिंदगी भर अपने धन पर भरोसा किया।”

“आज समझ आया कि धन तो हाथ का पानी है।”

“आज मेरे पास कुछ नहीं बचा।”

“अगर मेरी गलती है तो मुझे सजा देना…”

“लेकिन मेरे परिवार को मत टूटने देना।”

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“बाबा…”

“मैं आपसे व्यापार नहीं माँगता।”

“मैं सिर्फ इतना माँगता हूँ…”

“मुझे हारने मत देना।”

कुछ देर तक वह वहीं बैठा रहा।

फिर उसने मन में एक संकल्प लिया—

“अगर मेरा व्यापार कभी ठीक हुआ…”

“तो मैं अपनी कमाई का एक हिस्सा जरूरतमंद लोगों की सेवा में लगाऊँगा।”

वह घर लौट आया।

समस्या खत्म नहीं हुई थी।

कर्ज अभी भी था।

दुकान अभी भी घाटे में थी।

लेकिन धनराज के भीतर कुछ बदल चुका था।

अब वह हर सुबह दुकान खोलने से पहले श्याम बाबा का नाम लेता।

कुछ दिनों बाद एक पुराना ग्राहक दुकान पर आया।

उसने कहा—

“धनराज जी, मुझे आपकी ईमानदारी पर भरोसा है।”

“मेरे पास एक बड़ा ऑर्डर है।”

धनराज ने काम शुरू किया।

उस ऑर्डर से बहुत बड़ा लाभ नहीं हुआ…

लेकिन इतना जरूर हुआ कि उसकी दुकान फिर चलने लगी।

धीरे-धीरे दूसरा ग्राहक आया।

फिर तीसरा।

छह महीने बाद धनराज ने अपनी पहली बड़ी किश्त चुका दी।

उसने उसी दिन श्याम बाबा की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा—

**“बाबा, अब समझ आया…”

“मैं दुकान नहीं चला रहा था…”

“आप चला रहे थे।”**

उस दिन से धनराज की जिंदगी बदल गई।

लेकिन कहानी अभी बाकी थी।

क्योंकि श्याम बाबा ने उसे केवल धन नहीं देना था…

उसे विश्वास का अर्थ समझाना था।

🌿 भाग 1 का भावुक स्लोगन

**“जब सारे सहारे टूट जाएँ,

तब श्याम का नाम पकड़ लेना…
क्योंकि हारा हुआ इंसान नहीं,
हारा हुआ विश्वास खतरनाक होता है।”**

💔 भावुक पंक्तियाँ

जिस दिन धनराज के पास देने को कुछ नहीं बचा,
उस दिन उसने पहली बार दिल से श्याम को पुकारा।

कभी-कभी भगवान हमारी परेशानी तुरंत नहीं मिटाते,
पहले हमारे भीतर उसे सहने की शक्ति पैदा करते हैं।

---

🌺 भाग 2

सेवा का छोटा-सा संकल्प

समय बीतता गया।

धनराज का व्यापार फिर ठीक होने लगा।

पहले जिस दुकान पर सन्नाटा रहता था, वहाँ फिर ग्राहकों की भीड़ दिखाई देने लगी।

लेकिन अब धनराज बदल चुका था।

पहले वह पैसा कमाता था अपने लिए।

अब वह कमाता था तो उसे लगता—

“इसमें मेरा कितना है?”

एक दिन दुकान पर एक बूढ़ा मजदूर आया।

उसके पैरों में टूटी हुई चप्पल थी।

उसने बहुत संकोच से कहा—

“सेठ जी… थोड़ी मदद चाहिए।”

धनराज ने पूछा—

“क्या हुआ?”

बूढ़े ने कहा—

“बेटी की शादी है।”

“घर में राशन तक नहीं है।”

धनराज ने उसकी जरूरत पूरी कर दी।

बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा—

“भगवान आपको सुख दे।”

धनराज मुस्कुराया।

“मुझे नहीं…”

“श्याम बाबा को धन्यवाद देना।”

उस दिन से उसने हर महीने कुछ पैसा जरूरतमंदों की सेवा में लगाना शुरू कर दिया।

एक साल बाद उसने खाटू धाम जाने का निर्णय लिया।

लेकिन यात्रा से कुछ दिन पहले उसकी तबीयत अचानक खराब हो गई।

डॉक्टर ने आराम करने को कहा।

धनराज दुखी हो गया।

उसने श्याम बाबा की तस्वीर के सामने कहा—

“बाबा…”

“इस बार आपके दरबार में नहीं आ पाऊँगा।”

“लेकिन मेरा मन वहीं रहेगा।”

उसी समय उसके पुराने परिचित मोहन का फोन आया।

मोहन बोला—

“सेठ जी, मैं खाटू जा रहा हूँ।”

“आपके लिए कुछ सेवा कर दूँ?”

धनराज की आँखें चमक उठीं।

उसने कहा—

“मोहन, मेरी तरफ से बाबा के लिए एक सुंदर पोशाक बनवा देना।”

“और भोग भी लगवा देना।”

उसने मोहन को 1100 रुपये दिए।

“यह सेवा बाबा के चरणों में अर्पित कर देना।”

मोहन खाटू पहुँचा।

उसने पोशाक बनवाई।

भोग लगवाया।

फूल चढ़ाए।

लेकिन सारी व्यवस्था में 1100 रुपये से कुछ अधिक खर्च हो गए।

मोहन ने हिसाब देखा।

लगभग 318 रुपये अतिरिक्त खर्च हुए थे।

उसने सोचा—

“धनराज जी से क्या लेना?”

“सेवा तो बाबा की हुई है।”

उसने अतिरिक्त पैसे अपनी तरफ से दे दिए।

और किसी को कुछ नहीं बताया।

उधर उसी रात धनराज को एक अद्भुत सपना आया।

उसने देखा—

एक दिव्य प्रकाश के बीच श्याम बाबा खड़े हैं।

धनराज हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

आँखों से आँसू बहने लगे।

उसने कहा—

“बाबा…”

“मैं आपके दर्शन के लिए आ नहीं पाया।”

तभी श्याम बाबा ने मुस्कुराकर कहा—

**“तू नहीं आया…”

“लेकिन तेरा प्रेम तो आया है।”**

धनराज रो पड़ा।

“बाबा, मेरी सेवा स्वीकार हुई?”

बाबा ने कहा—

“सेवा स्वीकार हुई।”

“लेकिन तेरे भक्त मोहन ने अपनी जेब से 318 रुपये अधिक लगाए हैं।”

धनराज चौंक गया।

“बाबा…?”

श्याम बाबा ने कहा—

“उसका हिसाब चुकता कर देना।”

इतना कहकर वह प्रकाश धीरे-धीरे गायब हो गया।

धनराज की आँख खुल गई।

रात के तीन बजे थे।

वह कुछ क्षण बिस्तर पर बैठा रहा।

उसके शरीर में रोमांच हो रहा था।

उसने पत्नी को जगाया।

“कमला…”

“क्या हुआ?”

“श्याम बाबा आए थे।”

कमला ने पूछा—

“सपना था?”

धनराज बोला—

“हो सकता है…”

“लेकिन उन्होंने ऐसी बात बताई है जो सिर्फ मोहन जानता है।”

सुबह होते ही धनराज ने मोहन को फोन किया।

“मोहन, बाबा की सेवा में कुल कितना खर्च हुआ था?”

मोहन चुप हो गया।

“क्यों सेठ जी?”

धनराज ने कहा—

“सच बताओ।”

मोहन ने धीरे से कहा—

“सेठ जी… 1100 रुपये कम पड़ गए थे।”

“318 रुपये मैंने अपनी तरफ से लगा दिए।”

धनराज की आँखों से आँसू निकल आए।

उसने कहा—

“मोहन…”

“मैंने यह बात किसी को नहीं बताई।”

“फिर बाबा को कैसे पता?”

मोहन भी भावुक हो गया।

दोनों कुछ देर तक फोन पर चुप रहे।

फिर मोहन बोला—

**“सेठ जी…

श्याम के दरबार में भक्त का छोटा-सा त्याग भी छिपता नहीं।”**

धनराज ने उसी दिन 318 रुपये मोहन को भेजे।

लेकिन कहानी का सबसे बड़ा चमत्कार पैसे लौटाना नहीं था।

धनराज ने उसी दिन अपनी दुकान के बाहर एक बोर्ड लगवाया—

“यह दुकान श्याम बाबा की कृपा से चलती है।”

और नीचे लिखा—

“जरूरतमंद को खाली हाथ लौटाना नहीं।”

उसके बाद हर दिन कोई न कोई गरीब उसके दरवाजे पर आता।

किसी को राशन मिलता।

किसी को दवा।

किसी को फीस।

किसी को बेटी की शादी के लिए मदद।

धनराज अब समझ चुका था—

श्याम ने उसे धन इसलिए नहीं दिया था कि वह धनवान बने…

बल्कि इसलिए दिया था कि वह किसी और के आँसू पोंछ सके।

🌿 भाग 2 का भावुक स्लोगन

**“श्याम के दरबार में धन का हिसाब नहीं होता…

वहाँ भावना का हिसाब होता है।”**

💔 भावुक पंक्तियाँ

जिस सेवा को इंसान ने छुपाकर किया,
श्याम ने उसे भी अपने दरबार में दर्ज कर लिया।

दुनिया की नजरों से छुपा हुआ दान भी,
श्याम की नजरों से कभी छुपता नहीं।

---

🌺 भाग 3

हारे का सहारा

कई वर्ष बीत गए।

धनराज अब उम्रदराज हो चुका था।

उसका व्यापार पहले से भी बड़ा था।

लेकिन उसके घर में पहले जैसी शानो-शौकत नहीं थी।

अब वहाँ एक अलग ही चीज़ थी—

सेवा।

हर महीने वह कुछ परिवारों की मदद करता।

हर साल खाटू धाम जाता।

और हर बार श्याम बाबा के सामने जाकर सिर्फ एक बात कहता—

“बाबा, मुझे अपने काम का साधन बनाए रखना।”

एक बार धनराज बहुत बीमार पड़ गया।

डॉक्टर ने साफ कहा—

“अब आपको ज्यादा यात्रा नहीं करनी चाहिए।”

धनराज ने पहली बार महसूस किया कि शरीर साथ छोड़ रहा है।

उसने पत्नी से कहा—

“कमला…”

“शायद अब खाटू जाना मुश्किल होगा।”

कमला की आँखें भर आईं।

“आप घर पर रहिए।”

“बाबा तो यहीं हैं।”

धनराज मुस्कुराया।

उसने कमरे में लगी श्याम बाबा की तस्वीर की ओर देखा।

“हाँ…”

“अब समझ आया।”

“दर्शन के लिए हमेशा मंदिर जाना जरूरी नहीं।”

“अगर मन सच्चा हो तो…”

“दरबार दिल के अंदर भी बन जाता है।”

कुछ दिन बाद उसने अपने बेटे आदित्य को बुलाया।

“बेटा…”

“मेरे जाने के बाद इस व्यापार को संभालना।”

“लेकिन एक बात याद रखना।”

आदित्य ने पिता का हाथ पकड़ लिया।

“पिताजी, ऐसी बातें मत कीजिए।”

धनराज मुस्कुराया।

“हर इंसान को एक दिन जाना है।”

“लेकिन जाने से पहले मैं तुझे एक जिम्मेदारी देना चाहता हूँ।”

उसने एक पुरानी डायरी बेटे को दी।

डायरी में वर्षों का हिसाब लिखा था।

लेकिन उसमें व्यापार का हिसाब कम…

सेवा का हिसाब ज्यादा था।

किस परिवार को कितना राशन दिया।

किस बच्चे की फीस भरी।

किस बुजुर्ग की दवा खरीदी।

किस लड़की की शादी में मदद की।

आदित्य की आँखें भर आईं।

“पिताजी…”

“आपने इतना सब किया?”

धनराज ने कहा—

“नहीं बेटा।”

“मैंने कुछ नहीं किया।”

“यह सब श्याम ने करवाया।”

“मैं तो सिर्फ माध्यम था।”

कुछ दिनों बाद धनराज की तबीयत बहुत बिगड़ गई।

उस रात उसने बेटे से कहा—

“मुझे श्याम बाबा की तस्वीर के पास ले चलो।”

बेटे ने उसे सहारा देकर तस्वीर के सामने बैठाया।

धनराज ने हाथ जोड़ दिए।

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

“बाबा…”

“मैंने जिंदगी में बहुत गलतियाँ कीं।”

“कभी धन पर घमंड किया।”

“कभी गरीब को छोटा समझा।”

“कभी सोचा कि मैं अपने दम पर सब कर रहा हूँ।”

“फिर आपने मेरी आँखें खोल दीं।”

वह कुछ क्षण रुका।

फिर बोला—

**“बाबा…”

“अगर मेरी कोई सेवा आपको अच्छी लगी हो…”

“तो बस मेरे परिवार पर अपनी छाया बनाए रखना।”**

उस रात धनराज सो गया।

सुबह उसकी साँसें शांत हो चुकी थीं।

चेहरे पर अद्भुत शांति थी।

आदित्य पिता के पास बैठकर रो रहा था।

उसी समय घर के बाहर एक वृद्ध व्यक्ति आया।

उसने पूछा—

“क्या यह धनराज सेठ का घर है?”

आदित्य ने कहा—

“हाँ।”

वृद्ध ने कहा—

“मैं खाटू से आया हूँ।”

उसने एक छोटा-सा प्रसाद का डिब्बा आदित्य को दिया।

“यह आपके पिता के लिए था।”

आदित्य रो पड़ा।

“लेकिन मेरे पिता तो…”

वृद्ध ने कहा—

“मुझे पता नहीं था।”

“मंदिर के एक सेवक ने मुझे यह प्रसाद देकर कहा था…”

“धनराज तक पहुँचा देना।”

आदित्य ने प्रसाद अपनी आँखों से लगा लिया।

उसकी आँखों के सामने पिता की डायरी खुली थी।

आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

**“श्याम ने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा…

अब मेरी बारी है कि मैं किसी हारे हुए इंसान को अकेला न छोड़ूँ।”**

आदित्य फूट-फूटकर रो पड़ा।

उस दिन उसने पिता की दुकान का नाम बदल दिया।

पुराना नाम हटाकर नया बोर्ड लगाया—

“हारे का सहारा सेवा केंद्र”

नीचे लिखा—

**“जो यहाँ मदद माँगने आएगा,

उसे पहले इंसान समझा जाएगा…
फिर उसकी जरूरत देखी जाएगी।”**

कई वर्षों बाद भी वह दुकान चलती रही।

लेकिन हर महीने कमाई का एक हिस्सा जरूरतमंदों की सेवा में जाता रहा।

और हर साल पूरा परिवार खाटू श्याम जी के दर्शन करने जाता।

आदित्य जब भी बाबा के सामने खड़ा होता…

उसे पिता की आवाज़ सुनाई देती—

**“बेटा…”

“धन कमाना बुरा नहीं है…”

“लेकिन धन को किसी के आँसू पोंछने के काम में लगाना सीख जाना…”

“तो समझना कि श्याम ने तुम्हें अपना बना लिया।”**

शायद यही भक्ति है।

मंदिर में सिर झुकाना ही नहीं…

किसी टूटे हुए इंसान को उठाना भी।

माला फेरना ही नहीं…

किसी की परेशानी में उसके साथ बैठना भी।

भोग लगाना ही नहीं…

किसी भूखे के सामने भोजन रखना भी।

और सबसे बड़ी बात—

जब खुद हार जाओ, तब भी किसी और को उम्मीद देना।

क्योंकि शायद इसी को कहते हैं—

“हारे का सहारा… बाबा श्याम हमारा।”

🌿 भाग 3 का भावुक स्लोगन

**“जिसे श्याम का सहारा मिल जाए,

उसकी राह में मुश्किलें तो रहती हैं…
लेकिन वह अकेला नहीं रहता।”**

💔 अंतिम भावुक पंक्तियाँ

जिस धन को लेकर इंसान दुनिया से जाता है,
वह यहीं रह जाता है…

लेकिन जिस प्रेम और सेवा को बाँटकर जाता है,
वही उसके जाने के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहता है।

---

🙏 कहानी का भाव

हे श्याम बाबा…

जब हम टूट जाएँ, तो हमें संभाल लेना।

जब हम हार जाएँ, तो हमारा हाथ पकड़ लेना।

जब रास्ता दिखाई न दे, तो अपनी ओर बुला लेना।

और जब हमारे पास किसी को देने के लिए कुछ न हो…

तो इतना सामर्थ्य देना कि हम किसी दुखी इंसान के चेहरे पर मुस्कान ला सकें।

क्योंकि—

**“श्याम से माँगने वाला खाली हाथ नहीं लौटता…

कभी उसे परिस्थिति मिलती है, कभी शक्ति, कभी रास्ता और कभी धैर्य।”**

और शायद सबसे बड़ा प्रसाद यही है—

श्याम पर विश्वास।

---

✍️ लेखक की कलम से

हम भगवान के सामने अक्सर अपनी इच्छाओं की लंबी सूची लेकर खड़े हो जाते हैं।

धन चाहिए…

व्यापार चाहिए…

सुख चाहिए…

स्वास्थ्य चाहिए…

सफलता चाहिए…

लेकिन कभी-कभी हमें रुककर यह भी पूछना चाहिए—

**“बाबा, मुझे क्या चाहिए… यह मैं जानता हूँ,

लेकिन मुझे क्या देना है… यह आप मुझसे बेहतर जानते हैं।”**

कई बार हमारी माँगी हुई चीज़ हमें नहीं मिलती।

और हम सोचते हैं—

“श्याम ने मेरी सुनी नहीं।”

लेकिन शायद श्याम ने सुनी होती है…

बस हमारे लिए कोई दूसरा रास्ता चुना होता है।

भक्ति का अर्थ यह नहीं कि जीवन में दुःख नहीं आएगा।

भक्ति का अर्थ है—

दुःख आए तो हम टूटेंगे नहीं।

हार आए तो उम्मीद नहीं छोड़ेंगे।

सुख मिले तो अहंकार नहीं करेंगे।

और सबसे जरूरी—

जो मिला है, उसमें से किसी जरूरतमंद का हिस्सा निकालना सीखेंगे।

क्योंकि श्याम के दरबार में शायद सबसे सुंदर भेंट फूल या सोना नहीं…

एक सच्चा दिल है।

---

👤 लेखक परिचय

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'

संवेदनशील लेखनी के माध्यम से जीवन, रिश्तों, भक्ति, मानवीय संवेदनाओं और समाज के अनकहे भावों को शब्द देने वाले लेखक।

उनकी कहानियों का उद्देश्य केवल पाठक का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि उसके मन में कोई भावना, कोई सवाल या कोई सीख छोड़ जाना है।

कभी उनकी लेखनी माँ-बाप के त्याग को आवाज़ देती है…

कभी टूटते रिश्तों की पीड़ा को…

कभी मानवता और सेवा की भावना को…

और कभी भगवान के प्रति उस विश्वास को, जो कठिन समय में इंसान को भीतर से मजबूत बनाता है।

उनका विश्वास है—

**“कहानी वही नहीं जो पढ़कर खत्म हो जाए…

कहानी वह है जो पढ़ने के बाद भी कुछ देर तक दिल में चलती रहे।”**

उनकी लेखनी में भावनाएँ केवल शब्द नहीं बनतीं…

वे पाठक के जीवन से जुड़कर एक एहसास बन जाती हैं।

— कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'🙏

🙏 जय श्री श्याम।

हारे का सहारा — बाबा श्याम हमारा।