बोया पेड़ बबूल का
कही ऐसा तो नहीं तुम ही सिखा रहे हो लोभ लालच, ईर्ष्या ,अहंकार अपने बच्चों को , उसकी गलतियों की अनदेखी कर रहे हो , ये सब वह बड़ा होकर तुम्हे ही लौटने वाला है, तुम्हे बुजुर्गों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होता , कल को तुम्हारे बच्चे तुम्हे भी बर्दाश्त नहीं करेंगे | बृद्धावस्था में पछताने से अच्छा है अभी अच्छे संस्कार दे डालो ऐसे ही कहानी है रामसरन की, ऊँची शिक्षा, मंहगे सामान उपहार , कभी न झुकने की सीख, बड़े बाप का होने का अहंकार कूट कूट कर भर दिया ,अब तो बड़ा होकर रामसरन को ही आइना दिखा रहा है बेटा रोहन खर्चे अनाप शनाप , फरमाइशें आसमान छूतीं , स्कूल कॉलेज अध्यापक तो पैरो की धूल नौकर हैं सब...... यही तो सिखाया तुमने रामसरन ?
रामसरन शहर का एक बहुत बड़ा व्यापारी था। धन-दौलत की उसके पास कोई कमी नहीं थी और अपने इकलौते बेटे रोहन को वह दुनिया की हर खुशी देना चाहता था। उसका मानना था कि उसका बेटा किसी से कम नहीं होना चाहिए। रोहन बचपन से ही महंगे स्कूल में पढ़ा, महंगे कपड़े पहने, महंगे खिलौनों से खेला और उसकी हर फरमाइश पूरी हुई। दादा-दादी जब कभी उसकी किसी गलती पर उसे समझाते तो रामसरन तुरंत कह देता, “बच्चा है, जाने दीजिए, आजकल के बच्चों को ज्यादा रोक-टोक पसंद नहीं।” धीरे-धीरे रोहन को अपनी हर गलती के लिए पिता का संरक्षण मिलने लगा। एक दिन दादाजी ने उसे नौकर से बदतमीजी करते हुए देखा तो बोले, “बेटा, किसी इंसान को उसके काम से छोटा मत समझो, सम्मान सबका करना चाहिए।” रोहन ने पलटकर कहा, “आप पुराने जमाने की बातें मत किया कीजिए।” रामसरन ने बेटे को डांटने के बजाय अपने पिता से ही कहा, “बाबा, आप हर बात में हस्तक्षेप मत किया कीजिए, बच्चे को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने दीजिए।” उस दिन दादाजी चुप हो गए, लेकिन जाते-जाते उन्होंने रामसरन से सिर्फ इतना कहा, “बेटा, याद रखना, बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं।” समय बीतता गया। रोहन बड़ा हुआ तो उसकी फरमाइशें भी बड़ी होती गईं। पहले महंगा मोबाइल, फिर कार, फिर विदेश की यात्रा और उसके बाद व्यापार में लाखों रुपये लगाने की मांग। रामसरन हर बार बिना सवाल किए पैसे देता रहा। उसे लगता था कि बेटे पर खर्च करना ही पिता का प्यार है। रोहन ने कॉलेज में भी अध्यापकों का सम्मान नहीं किया। वह कहता, “मेरे पिता के पास इतना पैसा है कि मुझे किसी की जरूरत नहीं।” नौकरों को वह पैरों की धूल समझता और छोटे लोगों से बात करना अपनी शान के खिलाफ मानता। आखिर वही हुआ जिसका डर कभी दादाजी को था। रोहन ने पिता के पैसों से अपना कारोबार शुरू किया, लेकिन खर्चे इतने बढ़ा दिए कि लाखों रुपये कुछ ही महीनों में खत्म हो गए। जब रामसरन ने पहली बार उससे हिसाब पूछा तो रोहन भड़क गया और बोला, “आपको मुझ पर शक करने की जरूरत नहीं है। आखिर मैं आपका बेटा हूं।” रामसरन ने कहा, “बेटा, पैसा मेहनत से कमाया जाता है, यूं बर्बाद नहीं किया जाता।” रोहन हंस पड़ा और बोला, “पापा, आपने ही तो सिखाया था कि हम बड़े लोगों के बच्चे हैं, किसी के सामने झुकना नहीं है। आज आप ही मुझे हिसाब-किताब सिखा रहे हैं?” यह सुनकर रामसरन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे अपने पिता की कही बात याद आ गई। उसकी आंखों के सामने रोहन का बचपन घूमने लगा—हर गलती पर उसका बचाव करना, बुजुर्गों की बात को रोकना, बेटे को महंगे उपहार देना और यह सिखाना कि पैसा और हैसियत इंसान से बड़ी है। रामसरन की आंखों से आंसू निकल पड़े। उसने धीमे स्वर में कहा, “कहीं ऐसा तो नहीं कि लोभ, लालच, ईर्ष्या और अहंकार मैंने ही तुम्हारे भीतर भर दिया? तुम्हारी हर गलती को अनदेखा करके मैंने तुम्हें यही सिखाया कि तुम्हें किसी की जरूरत नहीं। आज तुम मुझे वही लौटा रहे हो, जो मैंने तुम्हें दिया था।” रोहन कुछ बोल नहीं पाया। रामसरन ने आगे कहा, “बेटा, ऊंची शिक्षा देना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी अच्छे संस्कार देना है। धन कमाना सिखाना जरूरी है, लेकिन धन के साथ विनम्र रहना सिखाना उससे भी जरूरी है। बुजुर्गों की बात आज तुम्हें हस्तक्षेप लगती थी, कल तुम्हारे बच्चे भी तुम्हें यही कहेंगे।” रोहन की आंखें झुक गईं। उसे पहली बार समझ आया कि पिता ने उसे सफल बनाने की कोशिश में इंसान बनना सिखाना ही भूल गए थे। रामसरन ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “बुढ़ापे में पछताने से अच्छा है कि बच्चों को समय रहते अच्छे संस्कार दे दिए जाएं।” उस दिन रोहन ने पहली बार अपने पिता को नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार को आईना दिखाया।