एक फरिश्ता Vijay Erry द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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एक फरिश्ता

एक फरिश्ता
लेखक: विजय शर्मा एरी
शहर की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में लोग अक्सर इतने व्यस्त हो जाते हैं कि आस-पास के दर्द को देखना भी भूल जाते हैं। दिल्ली के एक पुराने मोहल्ले में, जहाँ गलियाँ संकरी थीं और मकानों की दीवारें सालों की कहानियाँ समेटे खड़ी थीं, एक छोटा-सा किराये का कमरा था। उस कमरे में रहती थी राधा—एक तैंतीस साल की विधवा औरत। पति की अचानक मृत्यु के बाद उसने दो छोटे बच्चों—आठ साल के आर्यन और पाँच साल की अंशु—को अकेले संभाला था। दिन में वह घरों में काम करती, रात को सिलाई करती और बच्चों को स्कूल भेजने के लिए हर संभव कोशिश करती।
राधा की ज़िंदगी में कोई चमक नहीं थी। सुबह चार बजे उठना, बच्चों के लिए रोटी-दाल बनाना, फिर तीन-चार घरों में झाड़ू-पोछा करना, फिर वापस आकर सिलाई मशीन पर बैठना—यही उसका दिन था। कभी-कभी जब थकान बहुत बढ़ जाती तो वह छत पर जाकर आसमान की ओर देखती और फुसफुसाती, “हे भगवान, क्या तुम्हारे पास मेरे लिए कोई फरिश्ता नहीं है?”
एक ठंडी सर्दी की शाम को सब कुछ बदल गया।
आर्यन स्कूल से लौट रहा था। रास्ते में वह एक बुजुर्ग आदमी को फुटपाथ पर बैठा देखता। आदमी की दाढ़ी सफेद थी, कपड़े फटे हुए, और हाथ में एक पुराना थैला। आर्यन ने सोचा, “शायद कोई भिखारी है,” और आगे बढ़ गया। लेकिन जब वह घर पहुँचा तो अंशु रो रही थी। माँ ने बताया कि स्कूल की फीस का पैसा खत्म हो गया है और टीचर ने चेतावनी दी है कि अगर कल तक फीस नहीं आई तो नाम काट दिया जाएगा।
रात को राधा ने बच्चों को सुलाया और खुद सिलाई मशीन पर बैठ गई। आँखों में आँसू थे। तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई।
राधा ने चौंककर दरवाजा खोला। बाहर वही बुजुर्ग आदमी खड़ा था जिसे आर्यन ने फुटपाथ पर देखा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।
“बेटी, मुझे पानी मिलेगा?” आदमी ने धीमी आवाज में पूछा।
राधा ने पानी दिया। आदमी ने पिया और फिर बोला, “आज रात बहुत ठंड है। क्या कोई कोना मिल सकता है जहाँ मैं बैठ सकूँ?”
राधा ने हिचकिचाते हुए कहा, “बाबा, हम गरीब लोग हैं। कमरा छोटा है, लेकिन अगर आप चाहें तो छत पर चटाई बिछा दूँ।”
आदमी मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था कि राधा का दिल हल्का हो गया।
रात भर आदमी छत पर बैठा रहा। सुबह जब राधा उठी तो उसने देखा कि आँगन में साफ-सफाई हो चुकी है, पानी के बर्तन भरे हुए हैं और बच्चों के स्कूल के कपड़े भी धुले हुए रखे हैं। आदमी कहीं नहीं था।
आर्यन ने कहा, “माँ, वह बाबा जादूगर थे क्या?”
राधा ने सिर हिलाया, “नहीं बेटा, शायद कोई अच्छा इंसान।”
लेकिन अगले दिन फिर वही हुआ। राधा काम से लौटी तो देखा कि सिलाई का काम पूरा हो चुका है, बच्चों के लिए खाना बना हुआ है और टेबल पर कुछ पैसे रखे हैं—ठीक उतने जितने स्कूल की फीस के लिए चाहिए थे।
राधा हैरान रह गई। उसने पड़ोसियों से पूछा, किसी ने कुछ नहीं देखा।
तीसरे दिन आदमी फिर आया। इस बार वह सुबह के समय आया। राधा ने पूछा, “बाबा, आप कौन हैं? आप हमारी मदद क्यों कर रहे हैं?”
आदमी ने धीरे से कहा, “बेटी, मैं कोई विशेष नहीं हूँ। बस एक राही हूँ जो रास्ते में थके हुए लोगों को देखकर रुक जाता है। तुम्हारे दिल में बच्चों के लिए जो प्यार है, वही तुम्हारा फरिश्ता है। मैं तो सिर्फ एक माध्यम हूँ।”
उस दिन से आदमी लगभग रोज आता। कभी बच्चों को गणित सिखाता, कभी राधा को सिलाई के नए डिजाइन बताता, कभी बस चुपचाप बैठा रहता। आर्यन और अंशु उसे “बाबा फरिश्ता” कहने लगे।
एक दिन राधा की मालकिन ने काम से निकाल दिया। पैसे की तंगी बढ़ गई। राधा रोने लगी। आदमी ने कहा, “रोओ मत। कल से तुम मेरे साथ एक काम करोगी।”
अगले दिन वह राधा को शहर के एक छोटे से कपड़े के बाजार में ले गया। वहाँ एक दुकानदार से मिलवाया। “यह औरत अच्छी सिलाई करती है। इसे काम दो।” दुकानदार ने राधा का काम देखा और तुरंत ऑर्डर दे दिए।
राधा की जिंदगी बदलने लगी। पैसे आने लगे, बच्चों की पढ़ाई सुधरने लगी। लेकिन आदमी धीरे-धीरे कम आने लगा।
एक शाम राधा ने पूछा, “बाबा, आप कहाँ रहते हैं? आपका परिवार कहाँ है?”
आदमी की आँखों में कुछ गहराई आ गई। “मेरा परिवार बहुत पहले चला गया। अब मेरा परिवार वही है जो रास्ते में मिल जाता है। मैं जहाँ जरूरत देखता हूँ, वहाँ रुक जाता हूँ।”
राधा ने कहा, “आप तो असली फरिश्ता हैं।”
आदमी हँसा, “फरिश्ता तो तुम हो, बेटी। जो मुश्किलों में भी बच्चों को हँसाने का हुनर रखती हो।”
समय बीतता गया। आर्यन दसवीं में आ गया, अंशु आठवीं में। राधा की सिलाई की दुकान छोटी-सी खुल गई। मोहल्ले की औरतें उसके पास सिलाई सीखने आने लगीं। राधा ने कई गरीब औरतों को मुफ्त सिलाई सिखाई।
एक दिन आदमी आया और बोला, “अब मेरा काम यहाँ पूरा हो गया। मुझे आगे बढ़ना है।”
राधा की आँखें भर आईं। “बाबा, आप जाओगे तो हम कैसे रहेंगे?”
आदमी ने आर्यन और अंशु के सिर पर हाथ फेरा। “तुम लोग अब खुद फरिश्ते बन चुके हो। जो तुम्हें मिला, उसे आगे बाँटना। यही असली फरिश्ता होने का मतलब है।”
वह चला गया। राधा ने बहुत खोजा, लेकिन वह फिर नहीं मिला।
साल बीत गए। आर्यन इंजीनियर बन गया। अंशु डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर रही थी। राधा की दुकान अब एक छोटा सा सिलाई केंद्र बन चुकी थी जहाँ गरीब महिलाओं को मुफ्त ट्रेनिंग दी जाती थी।
एक दिन आर्यन घर आया और बोला, “माँ, आज ऑफिस में एक बुजुर्ग आदमी मिला। उसने मुझसे पूछा—‘तेरी माँ राधा है ना? बता देना कि बाबा फरिश्ता अब भी तुम्हें याद करता है।’”
राधा की आँखों में आँसू आ गए। उसने आसमान की ओर देखा और फुसफुसाई, “धन्यवाद… मेरे फरिश्ते।”
उस शाम राधा ने बच्चों को कहानी सुनाई। “बच्चों, फरिश्ता कोई सफेद पंख वाला जीव नहीं होता। फरिश्ता वह होता है जो बिना कुछ माँगे दूसरों के दर्द को अपना बना लेता है। कभी वह एक बुजुर्ग के रूप में आता है, कभी एक बच्चे के रूप में, कभी एक अजनबी के रूप में। असली बात यह है कि हम खुद फरिश्ता बनने की कोशिश करें।”
आर्यन ने पूछा, “माँ, क्या हम कभी उस बाबा से मिल पाएँगे?”
राधा मुस्कुराई, “हर बार जब तुम किसी की मदद करोगे, तब वह तुम्हारे अंदर ही मिलेगा।”
सालों बाद जब आर्यन एक बड़ी कंपनी में मैनेजर बना और अंशु डॉक्टर, तब भी वे हर साल उस पुराने मोहल्ले में जाते। वहाँ एक छोटा सा केंद्र चलाते जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाई और महिलाओं को सिलाई सिखाई जाती। केंद्र का नाम रखा गया—“फरिश्ता केंद्र”।
एक दिन केंद्र में एक छोटी लड़की आई। उसकी माँ बीमार थी, पिता नहीं थे। आर्यन ने उसकी फीस माफ कर दी और किताबें दीं। लड़की ने पूछा, “आप क्यों मेरी मदद कर रहे हैं?”
आर्यन ने वही जवाब दिया जो कभी बाबा ने दिया था—“क्योंकि कभी किसी ने मेरी माँ की मदद की थी। अब बारी मेरी है।”
रात को जब आर्यन छत पर बैठा आसमान देख रहा था, तो उसे लगा जैसे कोई मुस्कुरा रहा हो। हवा में हल्की सी आवाज गूंजी—“अब तुम खुद फरिश्ता हो, बेटा।”
राधा अब बुजुर्ग हो चुकी थी। एक शाम वह बच्चों के साथ बैठी थी। अंशु ने पूछा, “माँ, क्या आप अब भी उस बाबा को याद करती हैं?”
राधा ने आँखें बंद कीं। “हर साँस में। लेकिन अब मुझे लगता है कि फरिश्ता बाहर से नहीं आता। वह हमारे अंदर ही सोया रहता है। जब हम किसी के लिए कुछ करते हैं बिना बदले की उम्मीद के, तब वह जाग जाता है।”
उस रात राधा ने एक छोटी सी प्रार्थना की—“हे भगवान, जहाँ भी मेरा फरिश्ता हो, उसे खुश रखना। और मुझे ताकत देना कि मैं भी किसी और के जीवन में फरिश्ता बन सकूँ।”
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
मोहल्ले में अब कई लोग “फरिश्ता केंद्र” से जुड़े थे। एक विधवा औरत जिसने सिलाई सीखी, अब खुद दूसरों को सिखाती। एक लड़का जिसकी फीस माफ हुई थी, अब स्कॉलरशिप लेकर कॉलेज में पढ़ रहा था। एक बूढ़ा आदमी जो कभी अकेला था, अब बच्चों को कहानियाँ सुनाता।
एक दिन केंद्र में एक नया चेहरा आया—एक साधारण कपड़ों वाला आदमी। उसने राधा से कहा, “आपकी कहानी सुनी है। मैं भी कुछ करना चाहता हूँ।”
राधा ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो शुरू कीजिए। फरिश्ता बनने के लिए कोई खास योग्यता नहीं चाहिए। बस दिल चाहिए।”
उस आदमी ने भी मदद शुरू कर दी। और इस तरह फरिश्तों की कड़ी बढ़ती चली गई।
जीवन में कई बार हम इंतजार करते हैं कि कोई आए और हमारी समस्या हल कर दे। लेकिन सच्चाई यह है कि फरिश्ता अक्सर उन्हीं में छिपा होता है जो हमारे आस-पास होते हैं—कभी माँ के रूप में, कभी बच्चे के रूप में, कभी अजनबी के रूप में। और सबसे बड़ी बात—हम खुद भी फरिश्ता बन सकते हैं।
राधा अब जब भी किसी को परेशान देखती, तो याद करती उस बुजुर्ग की मुस्कान। और फिर बिना कुछ कहे मदद के लिए आगे बढ़ जाती।
एक दिन आर्यन ने अपनी कंपनी में एक स्कीम शुरू की—गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए। अंशु ने अस्पताल में गरीब मरीजों के लिए मुफ्त इलाज का इंतजाम किया। दोनों ने कहा, “यह हमारे बाबा फरिश्ते का कर्ज है।”
और इस तरह एक अजनबी की छोटी सी मदद ने पूरे मोहल्ले, फिर शहर के एक हिस्से को बदल दिया।
कहानी का अंत यहीं नहीं होता, क्योंकि फरिश्तों की कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। वे एक से दूसरे में, एक दिल से दूसरे दिल में हस्तांतरित होती रहती हैं।
अगर आप भी कभी किसी की मदद करते हैं बिना बदले की उम्मीद के, तो याद रखना—उस पल आप भी एक फरिश्ता बन जाते हैं।
और शायद कहीं कोई बुजुर्ग आदमी मुस्कुरा रहा होता है, यह सोचकर कि उसकी छोटी सी मुहब्बत अब कई दिलों में जिंदा है।
— विजय शर्मा एरी
(शब्द संख्या: लगभग २०००)