हुक्म और हसरत -33 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत -33

🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️

#Arsia
एपिसोड 33 — भरोसे के पीछे 🌸

पिछले कुछ दिनों में सिया के काम करने का तरीका काफी बदल गया था।

अब वह किसी भी फाइल पर बिना सोचे हस्ताक्षर नहीं करती थी।

हर निर्णय से पहले सवाल पूछती।

हर प्रस्ताव को समझती।

और सबसे जरूरी…

अब वह सिर्फ कागज़ों में लिखी बातों पर भरोसा नहीं करती थी।

उसे लोगों की बात भी सुननी आती जा रही थी।

उस सुबह भी सिया अपने कक्ष में बैठी कुछ दस्तावेज़ देख रही थी।

सामने काव्या खड़ी थी।

“ये बाज़ार समिति की रिपोर्ट है।”

सिया ने फाइल लेते हुए पूछा—

“पिछली बैठक कब हुई थी?”

“तीन दिन पहले।”

“और इसमें दुकानदारों की शिकायतें कहाँ हैं?”

काव्या कुछ पल चुप रही।

“शिकायतें अलग से आई हैं।”

सिया ने तुरंत हाथ बढ़ाया।

“मुझे वो भी चाहिए।”

काव्या ने दूसरी फाइल उसके सामने रख दी।

सिया ने दोनों फाइलों को साथ रखकर पढ़ना शुरू किया।

कुछ देर बाद उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

“यहाँ कुछ ठीक नहीं है।”

“क्या?”

सिया ने एक पन्ना आगे किया।

“समिति की रिपोर्ट में लिखा है कि ज्यादातर दुकानदार नए नियमों से सहमत हैं।”

“हाँ।”

“लेकिन इन शिकायतों में तो कई दुकानदार इसके खिलाफ हैं।”

काव्या ने भी कागज़ देखा।

“शायद दोनों अलग-अलग समूहों की बात हो।”

सिया ने सिर हिलाया।

“शायद।”

वह कुर्सी से उठी।

“लेकिन अनुमान के आधार पर फैसला नहीं लूँगी।”

“आप क्या करेंगी?”

“खुद जाकर बात करूँगी।”

काव्या मुस्कुराई।

“अर्जुन को पता है?”

सिया ने उसे देखा।

“क्यों?”

“क्योंकि अगर उन्हें नहीं पता होगा तो…”

वह बात अधूरी छोड़कर मुस्कुरा दी।

सिया ने आँखें घुमाईं।

“उन्हें बताने की जरूरत नहीं है कि मैं हर काम उनसे पूछकर करती हूँ।”

काव्या हँस पड़ी।

“मैंने ऐसा कब कहा?”

“आपके चेहरे ने।”

तभी दरवाज़ा खुला।

अर्जुन अंदर आया।

“किसका चेहरा क्या कह रहा है?”

सिया और काव्या दोनों चुप हो गईं।

काव्या ने तुरंत कहा—

“कुछ नहीं।”

अर्जुन ने सिया की तरफ देखा।

“क्या हुआ?”

सिया ने फाइल उठाई।

“बाज़ार की शिकायतें हैं। मैं वहाँ जा रही हूँ।”

“कब?”

“अभी।”

अर्जुन ने एक पल उसे देखा।

“मैं साथ चलूँगा।”

सिया ने तुरंत कहा—

“मुझे पता था।”

“क्यों?”

“क्योंकि आप मुझे अकेले कहीं जाने ही नहीं देते।”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा—

“आपको शिकायत है?”

सिया ने मुस्कुराकर कहा—

“नहीं।”

फिर वह काव्या की तरफ मुड़ी।

“चलो।”

काव्या ने सिर हिलाया।

---

कुछ देर बाद…

सिया, काव्या और अर्जुन बाज़ार पहुँच गए।

दुकानदारों को पहले से खबर मिल चुकी थी कि राजकुमारी खुद उनसे मिलने आ रही हैं।

कई लोग अपनी दुकानों के बाहर खड़े थे।

सिया ने किसी औपचारिक सभा की तरह बात करने के बजाय सीधे लोगों के बीच जाकर उनसे बातचीत शुरू कर दी।

“आपकी सबसे बड़ी परेशानी क्या है?”

एक बुजुर्ग दुकानदार आगे आए।

“राजकुमारी जी, परेशानी सिर्फ नियमों की नहीं है। हमें डर है कि नए बदलाव के नाम पर हमारी दुकानें कहीं बंद न करवा दी जाएँ।”

सिया ने उनकी बात ध्यान से सुनी।

“ऐसा कोई फैसला आपकी बात सुने बिना नहीं होगा।”

एक महिला दुकानदार बोली—

“लेकिन समिति की रिपोर्ट में तो लिखा है कि हम सब सहमत हैं।”

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“क्या आपने सहमति दी थी?”

महिला ने तुरंत सिर हिला दिया।

“नहीं।”

सिया कुछ पल चुप रही।

फिर उसने काव्या की तरफ देखा।

“इन सभी दुकानदारों के बयान अलग से दर्ज करो।”

काव्या ने तुरंत सिर हिलाया।

“जी।”

अर्जुन कुछ दूरी पर खड़ा सब देख रहा था।

सिया ने एक-एक करके कई दुकानदारों से बात की।

हर व्यक्ति की समस्या अलग थी।

किसी को दुकान बंद होने का डर था।

किसी को किराए की चिंता थी।

किसी को नए नियमों की जानकारी ही नहीं थी।

सिया ने सबकी बातें लिखवाईं।

फिर बोली—

“जब तक पूरी जानकारी नहीं मिलेगी, कोई भी फैसला जल्दबाजी में नहीं होगा।”

भीड़ में खड़े लोगों के चेहरों पर राहत दिखाई दी।

एक दुकानदार ने हाथ जोड़ दिए।

“धन्यवाद, राजकुमारी जी।”

सिया ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“धन्यवाद बाद में दीजिएगा। पहले देखिए कि मैं आपकी परेशानी सच में हल कर पाती हूँ या नहीं।”

अर्जुन के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।

सिया की नज़र उस पर पड़ गई।

“क्या?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“कुछ नहीं।”

“आप मुस्कुरा रहे थे।”

“नहीं।”

सिया ने आँखें छोटी कीं।

“फिर वही?”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा—

“काम पूरा कीजिए।”

सिया ने मुस्कुराते हुए कहा—

“जी, श्रीमान गंभीर।”

काव्या ने धीरे से सिर झुका लिया ताकि उसकी हँसी किसी को दिखाई न दे।

---

शाम तक सिया कार्यालय वापस लौट आई।

वह अभी अपनी कुर्सी पर बैठी ही थी कि काव्या अंदर आई।

“एक व्यक्ति आपसे मिलने आए हैं।”

“कौन?”

“उन्होंने कहा कि वे परिवार की तरफ से आए हैं।”

सिया ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“नाम?”

काव्या ने बताया।

सिया के चेहरे पर तुरंत पहचान की मुस्कान आ गई।

“उन्हें अंदर भेजो।”

कुछ ही पल बाद कमरे का दरवाज़ा खुला।

सिया के चचेरे भाई के पिता अंदर आए।

चेहरे पर हमेशा जैसी शांत मुस्कान थी।

“कैसी हैं, राजकुमारी?”

सिया खड़ी हो गई।

“मैं ठीक हूँ। आप बताइए?”

“मैं भी ठीक हूँ।”

उन्होंने उसके सामने बैठते हुए कहा—

“आपके बारे में सुना कि आप इन दिनों बहुत काम कर रही हैं।”

सिया हल्का-सा मुस्कुराई।

“कोशिश कर रही हूँ।”

“कोशिश नहीं। आप अच्छा कर रही हैं।”

सिया ने उनकी तरफ देखा।

“सच?”

“बिल्कुल।”

उन्होंने मेज़ पर रखी कुछ फाइलों की तरफ देखा।

“शुरुआत में जिम्मेदारी मुश्किल लगती है। लेकिन आपने जिस तरह लोगों की बात सुनना शुरू किया है, वो अच्छी बात है।”

सिया के चेहरे पर संतोष दिखाई दिया।

“मैं चाहती हूँ कि लोग महसूस करें कि उनकी बात सुनी जा रही है।”

“और यही होना भी चाहिए।”

उन्होंने कुछ पल रुककर कहा—

“अगर कभी आपको किसी मदद की जरूरत हो तो मुझे बताइएगा।”

सिया ने सहजता से कहा—

“ज़रूर।”

उसी समय अर्जुन कमरे में आया।

उसकी नज़र सबसे पहले सिया पर गई।

फिर सामने बैठे व्यक्ति पर।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस कमरे के एक तरफ जाकर खड़ा हो गया।

सिया ने उसकी तरफ देखकर कहा—

“अर्जुन, आप इन्हें जानते हैं।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“जी।”

सिया के चचेरे भाई के पिता मुस्कुराए।

“आपसे मिलना तो अक्सर होता रहता है।”

अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा—

“जी।”

कमरे में कुछ पल की खामोशी रही।

फिर उन्होंने सिया की तरफ देखा।

“वैसे आज बाज़ार में आपने जो फैसला लिया, उसके बारे में सुना।”

सिया थोड़ी हैरान हुई।

“आपको इतनी जल्दी पता चल गया?”

उन्होंने हँसते हुए कहा—

“रायगढ़ में खबरें देर से कहाँ पहुँचती हैं?”

सिया भी मुस्कुरा दी।

“सही कहा।”

उन्होंने उठते हुए कहा—

“आप अपना काम जारी रखिए। और अगर कोई आपको ये कहे कि आप नई हैं, अनुभव कम है…”

वह हल्का-सा मुस्कुराए।

“…तो उसे याद दिलाइए कि सीखने की इच्छा अनुभव से कम नहीं होती।”

सिया ने उनकी बात सुनकर मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।

“धन्यवाद।”

“हमेशा खुश रहिए।”

वह कमरे से बाहर चले गए।

दरवाज़ा बंद हुआ।

सिया कुछ पल तक उसी तरफ देखती रही।

फिर अर्जुन की तरफ मुड़ी।

“बहुत अच्छे हैं ना?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“कौन?”

“आपने सुना नहीं?”

“सुना।”

“तो?”

अर्जुन ने कोई जल्दबाजी नहीं की।

“उन्होंने आपकी हिम्मत बढ़ाई।”

“हाँ।”

सिया मुस्कुराई।

“मुझे अच्छा लगा।”

अर्जुन ने बस सिर हिलाया।

“अच्छा है।”

सिया ने उसे गौर से देखा।

“आपको उन पर भरोसा नहीं है?”

अर्जुन की आँखें एक पल के लिए सिया के चेहरे पर ठहरीं।

फिर उसने शांत स्वर में कहा—

“भरोसा करने या न करने का फैसला जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए।”

सिया ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“आप हर बात को इतना गंभीर क्यों बना देते हैं?”

अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“क्योंकि आप हर बात पर जल्दी भरोसा कर लेती हैं।”

सिया ने तुरंत विरोध किया—

“ऐसा नहीं है।”

“अच्छा?”

“हाँ।”

“ठीक है।”

“बस?”

“हाँ।”

सिया उसे घूरती रही।

फिर हँस पड़ी।

“आपसे बहस करना बेकार है।”

अर्जुन ने फाइल उठाई।

“अच्छा है।”

सिया ने मुस्कुराते हुए कहा—

“लेकिन एक बात माननी पड़ेगी।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“आप जब चिंता करते हैं ना…”

वह शरारत से मुस्कुराई।

“…तब और भी ज्यादा गंभीर लगते हैं।”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस फाइल उसके सामने रख दी।

“इसे देख लीजिए।”

सिया ने फाइल ली।

“आप फिर काम पर आ गए।”

“काम बाकी है।”

सिया मुस्कुराई।

“श्रीमान गंभीर।”

---

उधर…

कार्यालय से कुछ दूर एक गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

गाड़ी में बैठे वही व्यक्ति शांत चेहरे के साथ बाहर देख रहे थे।

उनके चेहरे पर वही सहज मुस्कान थी।

उन्होंने अपना फोन उठाया।

कुछ क्षण स्क्रीन देखने के बाद बोले—

“काम शुरू हो गया है।”

दूसरी तरफ से कुछ कहा गया।

उन्होंने शांत स्वर में जवाब दिया—

“अभी जल्दी मत कीजिए।”

कुछ पल की खामोशी।

फिर उन्होंने धीमे से कहा—

“उसे अपना काम करने दीजिए।”

फोन कट गया।

उनके चेहरे पर अब भी वही शांत मुस्कान थी।

और रायगढ़ में…

सिया को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि जिस व्यक्ति को वह अपने परिवार का भरोसेमंद और शुभचिंतक समझती है…

वही आने वाले दिनों में उसके सामने खड़ी होने वाली सबसे बड़ी चुनौती का हिस्सा बनने वाला है।

लेकिन अभी…

उसके लिए वह सिर्फ एक अपना था।

एक ऐसा व्यक्ति…

जिसकी बातों में उसे अपनापन महसूस होता था।

और यही भरोसा…

आगे चलकर सबसे बड़ा मोड़ बनने वाला था।

— एपिसोड 33 समाप्त 


—जारी रहेगा... 💗✨
© Diksha 

प्रिय पाठकों,

यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

Follow me for the next episode…

✨ मेरी रचनाएँ ✨

 1. अनुबंध (Anubandh) — ✅ Completed

 2. वो जो चुपके से देखा करता था — ✅ Completed

3. अनचाही मोहब्बत (Anchahi Mohabbat) — ✅ Completed

4. हुक्म और हसरत (Hukm Aur Hasarat) — ✍️ 
Running... 🌸