हुक्म और हसरत -31 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत -31

🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️

#Arsia
एपिसोड 31 — काम के बीच कुछ पल 🌸

अगली सुबह रायगढ़ कार्यालय में बाकी दिनों की तरह ही हलचल थी।

कर्मचारी अपने-अपने काम में व्यस्त थे।

फाइलें इधर से उधर जा रही थीं।

बैठकें चल रही थीं।

और इन सबके बीच सिया अपनी मेज़ पर बैठी एक के बाद एक दस्तावेज़ देख रही थी।

पिछले कुछ दिनों में काम की जिम्मेदारियाँ बढ़ गई थीं।

लेकिन अब सिया उन्हें देखकर घबराती नहीं थी।

वह हर फाइल को ध्यान से पढ़ती…

जरूरी सवाल पूछती…

और फिर अपना फैसला लेती।

उसके सामने रखी आखिरी फाइल बंद हुई।

सिया ने गहरी साँस ली।

“बस… अब नहीं।”

सामने बैठी काव्या ने तुरंत सिर उठाया।

“क्या हुआ?”

“मेरा दिमाग जवाब दे चुका है।”

काव्या हँस पड़ी।

“अभी तो आधा दिन भी नहीं हुआ।”

सिया ने उसे घूरा।

“तुम्हें मेरा दर्द समझ नहीं आएगा।”

“क्योंकि मैं भी सुबह से आपके साथ काम कर रही हूँ।”

“तो फिर तुम्हें समझना चाहिए।”

काव्या ने मुस्कुराकर कहा—

“समझ रही हूँ। लेकिन काम तो करना पड़ेगा।”

सिया ने मेज़ पर सिर रख दिया।

“मुझे राजकुमारी वाली जिंदगी वापस चाहिए।”

काव्या हँसते हुए बोली—

“कल तक तो आप कह रही थीं कि आपको जिम्मेदारी संभालनी है।”

सिया ने सिर उठाया।

“कहा था।”

“तो?”

“तब मुझे पता नहीं था कि जिम्मेदारी के साथ इतनी सारी फाइलें भी आएँगी।”

काव्या फिर हँस पड़ी।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला।

अर्जुन अंदर आया।

उसकी नज़र सबसे पहले सिया पर गई।

फिर मेज़ पर बिखरी फाइलों पर।

फिर वापस सिया पर।

“क्या हुआ?”

सिया ने तुरंत शिकायत की—

“मुझे बहुत काम दिया गया है।”

अर्जुन ने शांत स्वर में पूछा—

“किसने?”

सिया ने काव्या की तरफ उंगली कर दी।

“इसने।”

काव्या ने तुरंत हाथ उठा दिए।

“मैंने सिर्फ फाइलें दी हैं। काम तो आप खुद कर रही हैं।”

अर्जुन ने सिया की तरफ देखा।

“कितनी देर से बैठी हैं?”

सिया ने नजरें चुरा लीं।

“पता नहीं।”

“कितनी देर?”

“शायद… दो घंटे।”

अर्जुन ने घड़ी देखी।

“तीन घंटे।”

सिया चुप।

काव्या ने धीरे से कहा—

“मैंने कहा था बीच में आराम कर लीजिए।”

सिया ने उसे घूरा।

“तुम मेरी तरफ हो या इनके?”

काव्या मुस्कुराई।

“मैं सच की तरफ हूँ।”

अर्जुन ने मेज़ पर रखी एक फाइल उठाई।

“इसे बाद में देखिए।”

सिया ने तुरंत हाथ बढ़ाया।

“नहीं। ये जरूरी है।”

अर्जुन ने फाइल वापस नहीं दी।

“दस मिनट का आराम जरूरी है।”

“मैं ठीक हूँ।”

“पता है।”

“तो?”

“फिर भी।”

सिया कुछ पल उसे देखती रही।

फिर आँखें घुमाकर कुर्सी से उठ गई।

“ठीक है।”

काव्या ने मुस्कुराते हुए दूसरी तरफ देखा।

“वाह…”

सिया ने तुरंत पूछा—

“क्या?”

“कुछ नहीं।”

“तुम दोनों मिलकर मुझे परेशान करते हो।”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा—

“आप खुद भी कम नहीं करतीं।”

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“आपको आजकल जवाब देना बहुत आने लगा है।”

अर्जुन के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

“आपसे सीख रहा हूँ।”

सिया कुछ पल उसे देखती रही।

फिर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“अच्छा?”

“जी।”

“तो फिर एक बात और सीखिए।”

“क्या?”

सिया ने हाथ बाँध लिए।

“जब आपकी राजकुमारी आराम कर रही हो…”

वह एक पल रुकी।

“…तो उसे परेशान नहीं करना चाहिए।”

काव्या ने अपनी हँसी दबा ली।

अर्जुन ने बिना किसी जल्दबाजी के कहा—

“आप आराम कर रही हैं?”

सिया ने तुरंत कुर्सी की तरफ देखा।

“हाँ।”

“तो फिर बैठिए।”

सिया बैठ गई।

काव्या ने सिर झुका लिया ताकि उसकी हँसी दिखाई न दे।

---

कुछ देर बाद…

काव्या किसी जरूरी कागज़ के लिए बाहर चली गई।

कमरे में अब सिर्फ सिया और अर्जुन थे।

सिया कुर्सी पर बैठी थी और सामने रखी मेज़ पर उँगलियों से धीरे-धीरे कुछ बना रही थी।

अर्जुन सामने खड़ा होकर एक फाइल देख रहा था।

सिया कुछ देर उसे देखती रही।

फिर बोली—

“अर्जुन।”

“जी?”

“आप हमेशा काम ही करते रहते हैं?”

“ज्यादातर।”

“आपको थकान नहीं होती?”

“होती है।”

सिया ने हैरानी से पूछा—

“सच?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“मैं इंसान हूँ।”

सिया हँस पड़ी।

“मुझे कभी-कभी शक होता है।”

“क्यों?”

“क्योंकि आप सुबह से रात तक ऐसे रहते हैं जैसे आपको थकान नाम की कोई चीज़ पता ही नहीं।”

अर्जुन ने फाइल बंद कर दी।

“आपको मेरी इतनी चिंता क्यों है?”

सिया कुछ पल चुप रही।

फिर मुस्कुराकर बोली—

“क्योंकि आप मेरे वो .... हैं।” 

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

सिया ने तुरंत नज़रें हटा लीं।

“क्या?”

“कुछ नहीं।”

“फिर ऐसे क्यों देख रहे हैं?”

“बस।”

सिया मुस्कुराई।

“आपको ये ‘बस’ बोलना बहुत पसंद है।”

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

सिया कुर्सी से उठी और उसके पास चली गई।

उसने उसकी फाइल बंद कर दी।

अर्जुन ने भौंह उठाई।

“क्या कर रही हैं?”

“आपको आराम दे रही हूँ।”

“मुझे काम करना है।”

“मुझे भी था।”

“तो?”

“आपने मुझे रोका।”

अर्जुन चुप रहा।

सिया ने मुस्कुराते हुए कहा—

“अब मेरी बारी।”

अर्जुन ने उसे कुछ पल देखा।

फिर बिना कुछ कहे पास की कुर्सी पर बैठ गया।

सिया की आँखों में जीत की चमक आ गई।

“देखा?”

“क्या?”

“मैं भी आपको मना सकती हूँ।”

“बहुत खुश हैं?”

“बहुत।”

अर्जुन के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

सिया उसे देखते ही रुक गई।

“आप मुस्कुराए।”

अर्जुन ने तुरंत सामान्य चेहरा बना लिया।

“नहीं।”

“मैंने देखा।”

“आपको भ्रम हुआ।”

सिया हँस पड़ी।

“नहीं हुआ।”

वह उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

“एक बार फिर मुस्कुराइए।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“मन नहीं है।”

“तो मैं हँसाऊँ?”

“कोशिश कर लीजिए।”

सिया ने कुछ सोचने का नाटक किया।

फिर अचानक उसके बालों को देखकर बोली—

“आपके बाल आज बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

अर्जुन ने उसे देखा।

“बस?”

“नहीं।”

सिया थोड़ा और करीब आई।

“आज आप बहुत अच्छे लग रहे हैं।”

अर्जुन शांत रहा।

सिया ने आँखें सिकोड़ लीं।

“कुछ असर नहीं हुआ?”

“नहीं।”

“झूठ।”

“क्यों?”

“क्योंकि आपकी आँखें सब बता देती हैं।”

अर्जुन कुछ नहीं बोला।

सिया मुस्कुराते हुए उसके बालों की एक लट ठीक करने लगी।

“अब ठीक।”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

सिया रुक गई।

दोनों की नजरें मिलीं।

कुछ पल तक कमरे में खामोशी रही।

अर्जुन ने उसका हाथ धीरे से नीचे किया।

“अब काम करिए।”

सिया ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“आप हर अच्छी बात का अंत काम पर ही क्यों करते हैं?”

“क्योंकि काम बाकी है।”

“बहुत बोरिंग हैं आप।”

“पता है।”

सिया हँस पड़ी।

“और फिर भी…”

वह थोड़ा रुककर बोली—

“मुझे आप अच्छे लगते हैं।”

अर्जुन की आँखें एक पल के लिए उसके चेहरे पर ठहर गईं।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस उसकी मेज़ पर पड़ी पानी की बोतल उठाकर उसकी तरफ बढ़ा दी।

“पानी पीजिए।”

सिया ने बोतल ली और मुस्कुराने लगी।

“आपसे प्यार..... की उम्मीद करना ही बेकार है।”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा—

“आपको शिकायत है?”

“थोड़ी।”

“फिर?”

सिया ने पानी पीते हुए कहा—

“फिर भी ठीक हैं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

इस बार उसके होंठों पर आई हल्की मुस्कान सिया से छिपी नहीं।

सिया की आँखें चमक उठीं।

“पकड़ लिया!”

अर्जुन ने सिर हिला दिया।

“बहुत बोलती हैं आप।”

“और आप…”

सिया ने मुस्कुराकर कहा—

“मेरे लिए मुस्कुराने लगे हैं।”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

लेकिन उसकी आँखों में आई वह हल्की नरमी…

सिया ने साफ देख ली थी।

---

तभी दरवाज़ा खुला।

काव्या वापस अंदर आई।

दोनों को साथ देखकर वह एक पल रुकी।

फिर मुस्कुराई।

“मैं गलत समय पर तो नहीं आ गई?”

सिया तुरंत अपनी जगह पर बैठ गई।

“नहीं!”

अर्जुन ने फिर से फाइल उठा ली।

“काम कीजिए।”

काव्या ने दोनों को देखा।

फिर मुस्कुराते हुए बोली—

“हाँ… बिल्कुल।”

सिया ने उसे घूरा।

“काव्या!”

“जी, राजकुमारी?”

“कुछ मत बोलना।”

काव्या हँस पड़ी।

अर्जुन चुपचाप फाइल पढ़ता रहा।

लेकिन इस बार उसके चेहरे की गंभीरता के पीछे छिपी वह हल्की मुस्कान…

सिया से छिप नहीं सकी।

और शायद…

उसे छिपाने की कोशिश भी नहीं की गई थी।

— एपिसोड 31 समाप्त

 —जारी रहेगा... 💗✨
© Diksha 

प्रिय पाठकों,

यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

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✨ मेरी रचनाएँ ✨

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4. हुक्म और हसरत (Hukm Aur Hasarat) — ✍️ 
Running... 🌸