Part 1 — पहली मुलाकात
शहर में उस दिन सुबह से ही बारिश हो रही थी।
आसमान बादलों से ढका था और कॉलेज की सड़क पर जगह-जगह पानी जमा था।
आरव हमेशा की तरह कॉलेज के बस स्टॉप पर अकेला खड़ा था।
हाथ में किताब थी, लेकिन उसका ध्यान किताब में नहीं था।
वह बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था।
“आज बस भी इतनी देर क्यों कर रही है?”
तभी पीछे से किसी के तेज़ कदमों की आवाज़ आई।
एक लड़की बारिश से बचने की कोशिश करते हुए दौड़ती हुई बस स्टॉप की तरफ आ रही थी।
उसके हाथ में तीन किताबें थीं।
वह शायद बहुत जल्दी में थी।
अचानक उसका पैर पानी में पड़े एक छोटे से गड्ढे में फिसल गया।
किताबें उसके हाथ से छूट गईं।
आरव ने तुरंत आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
लड़की गिरने से बच गई।
कुछ पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
बारिश की आवाज़ के अलावा वहाँ कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
फिर लड़की ने धीरे से कहा,
“थैंक यू…”
आरव ने उसका हाथ छोड़ते हुए कहा,
“कोई बात नहीं। संभलकर चलना चाहिए।”
लड़की ने अपनी किताबें उठाईं।
“तुम हमेशा इतने सीरियस रहते हो?”
आरव थोड़ा हैरान हुआ।
“क्या?”
लड़की मुस्कुराई।
“कुछ नहीं।”
उसी समय बस आ गई।
लड़की बस में चढ़ गई।
बस चलने लगी।
आरव की नजर खिड़की पर गई।
लड़की भी उसे देख रही थी।
दोनों की नजरें कुछ सेकंड के लिए मिलीं।
फिर बस आगे निकल गई।
आरव वहीं खड़ा रहा।
उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वह मुस्कुरा क्यों रहा है।
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अगले दिन।
आरव कॉलेज की कैंटीन में अपने दोस्त कबीर के साथ बैठा था।
कबीर ने पूछा,
“भाई, कल से बड़ा खुश दिख रहा है। क्या बात है?”
आरव ने कहा,
“कुछ नहीं।”
कबीर हँस पड़ा।
“तू और कुछ नहीं? जरूर कोई बात है।”
तभी कैंटीन के दरवाजे की तरफ से एक आवाज आई।
“Excuse me…”
आरव ने अनजाने में पीछे मुड़कर देखा।
वही लड़की।
बारिश वाली लड़की।
आरव अचानक शांत हो गया।
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
फिर लड़की की तरफ देखा।
फिर वापस आरव की तरफ।
“अच्छा…”
आरव ने धीरे से पूछा,
“क्या?”
कबीर मुस्कुराया।
“अब समझ आया कि कल से इतना खुश क्यों है।”
लड़की उनकी टेबल के पास आई।
“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”
कबीर तुरंत उठ गया।
“हाँ, बिल्कुल। मैं तो वैसे भी जा रहा था।”
आरव ने हैरानी से पूछा,
“कहाँ?”
कबीर ने मुस्कुराकर कहा,
“बहुत जरूरी काम है।”
और वह वहाँ से चला गया।
आरव समझ गया कि कबीर जानबूझकर उन्हें अकेला छोड़ रहा था।
लड़की बैठ गई।
“वैसे… मेरा नाम मीरा है।”
आरव ने कहा,
“आरव।”
मीरा ने मुस्कुराकर कहा,
“मुझे याद है।”
“क्या?”
“कल बस स्टॉप पर तुमने अपना नाम बताया था।”
आरव को याद नहीं था कि उसने नाम बताया था।
“मैंने?”
मीरा हँस पड़ी।
“नहीं। तुम्हारे दोस्त ने बताया था।”
दोनों हँसने लगे।
पहली बार आरव को लगा कि किसी अजनबी से बात करना इतना अच्छा भी हो सकता है।
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कुछ दिनों में आरव और मीरा की दोस्ती बढ़ने लगी।
वे साथ पढ़ते।
कैंटीन में बैठते।
कॉलेज के बाद कुछ देर बातें करते।
लेकिन आरव ने अभी तक मीरा से एक सवाल नहीं पूछा था।
वह सवाल—
“उस दिन तुम इतनी जल्दी में क्यों थीं?”
एक शाम कॉलेज खत्म होने के बाद दोनों गेट के पास खड़े थे।
मीरा ने अचानक कहा,
“आरव, अगर मैं तुमसे एक बात पूछूँ तो सच बताना।”
“पूछो।”
“क्या तुम्हें कभी किसी से पहली नजर में प्यार हुआ है?”
आरव कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला,
“शायद…”
मीरा ने पूछा,
“शायद?”
आरव मुस्कुराया।
“क्योंकि मुझे खुद नहीं पता कि उसे क्या नाम दूँ।”
मीरा उसकी तरफ देखने लगी।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर मीरा ने नजरें झुका लीं।
“चलो, कल मिलते हैं।”
वह चली गई।
आरव उसे जाते हुए देखता रहा।
उसे नहीं पता था कि उसी रात मीरा की जिंदगी में कुछ ऐसा होने वाला था, जो उनकी दोस्ती को हमेशा के लिए बदल देगा।
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रात के करीब ग्यारह बजे।
मीरा अपने कमरे में बैठी थी।
उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर एक अनजान नंबर था।
मीरा ने फोन उठाया।
“हैलो?”
दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक कोई आवाज नहीं आई।
फिर एक आदमी की आवाज आई।
“तुमने आरव से दोस्ती क्यों की?”
मीरा का चेहरा अचानक बदल गया।
“आप कौन हैं?”
फोन कट गया।
कुछ सेकंड बाद उसके फोन पर एक मैसेज आया।
“आरव से दूर रहो… वरना तुम्हें अपने अतीत का सच पता चल जाएगा।”
मीरा के हाथ काँपने लगे।
उसने मैसेज को दोबारा पढ़ा।
फिर फोन बंद कर दिया।
लेकिन तभी दरवाजे के नीचे से किसी ने एक लिफाफा अंदर सरका दिया।
मीरा धीरे-धीरे दरवाजे के पास गई।
उसने लिफाफा उठाया।
अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।
तस्वीर में दो छोटे बच्चे थे।
एक लड़की…
और एक लड़का।
मीरा ने तस्वीर देखते ही फुसफुसाकर कहा—
“नहीं…”
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
क्योंकि तस्वीर के पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“तुम आरव को पहले से जानती हो।”
जारी रहेगा…