थोड़ा साथ और kantilal Rathod Badamiya द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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थोड़ा साथ और

🌿थोड़ा साथ और 🌿

📚वह दिन कब आएगा?
एक पति-पत्नी की कहानी… जो सबके लिए जीते-जीते, एक-दूसरे के लिए जीना भूल गए।

✍️ लेखक

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'

---

🌿 भूमिका

ज़िंदगी में हम सबके पास एक सपना होता है—

“बस थोड़ा और कमा लें…
बस बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाए…
बस घर का कर्ज उतर जाए…
बस दुकान थोड़ी और चल जाए…
बस रिटायर हो जाएँ…
फिर आराम से जीएँगे…”

लेकिन उस “फिर” का इंतज़ार करते-करते
कई बार पूरी जिंदगी निकल जाती है।

हम भविष्य को बेहतर बनाने के लिए
आज को खर्च करते रहते हैं।

हम घर बनाते हैं,
लेकिन उस घर में बैठकर अपनों से बातें करने का समय नहीं निकालते।

हम परिवार के लिए पैसा कमाते हैं,
लेकिन परिवार के साथ बैठकर खाना खाने का समय नहीं निकालते।

हम पत्नी के लिए सुविधाएँ जुटाते हैं,
लेकिन उसकी आँखों में छिपी थकान पढ़ना भूल जाते हैं।

हम बच्चों के भविष्य की चिंता करते हैं,
लेकिन उनका बचपन हमारे सामने से कब निकल गया—
हमें पता ही नहीं चलता।

और फिर एक दिन…

हमारे पास सब कुछ होता है—

घर, दुकान, गाड़ी, पैसा, सामान…

लेकिन जिस इंसान के साथ यह सब बाँटना था,
वह हमारे पास बैठा नहीं होता।

तब मन पूछता है—

“मैंने जिंदगी भर किस चीज़ की तैयारी की?”

यह कहानी है अमित और काव्या की।

पच्चीस साल से साथ रहने वाले पति-पत्नी।

एक-दूसरे से बहुत प्रेम करने वाले…

लेकिन जिंदगी की भागदौड़ में
उस प्रेम को जीना भूल चुके थे।

एक दिन अमित अचानक जल्दी घर आया।

उसे लगा—

“आज काव्या के साथ बैठूँगा।
आज पुराने दिनों की तरह बातें करूँगा।
आज उसे बाहर खाना खिलाऊँगा।”

लेकिन उस रात जो हुआ,
उसने अमित को पहली बार यह सोचने पर मजबूर कर दिया—

**“क्या हम सचमुच जिंदगी जी रहे हैं…

या सिर्फ जिंदगी जीने की तैयारी कर रहे हैं?”**

---

🌺 भाग 1

आज थोड़ा जल्दी घर चलते हैं…

अमित की रोज़ की जिंदगी बिल्कुल घड़ी की सुई जैसी थी।

सुबह उठना।

चाय।

मोबाइल।

ई-मेल।

दुकान।

ग्राहक।

फोन।

हिसाब।

शाम।

फिर दुकान।

फिर घर।

और रात को खाना खाकर थककर सो जाना।

काव्या की जिंदगी भी कुछ अलग नहीं थी।

सुबह अमित की चाय।

नाश्ता।

घर की सफाई।

दुकान के लिए खाना तैयार करना।

बच्चों के फोन।

घर का सामान।

रसोई।

बिजली का बिल।

दवाइयाँ।

फिर रात का खाना।

दोनों एक ही घर में रहते थे…

लेकिन कई बार ऐसा लगता था
जैसे दोनों अलग-अलग जिंदगी जी रहे हों।

उस दिन अचानक अमित ने दुकान की घड़ी देखी।

5 बजकर 35 मिनट।

उसने सोचा—

“आज दुकान थोड़ा जल्दी बंद कर देता हूँ।”

सहकर्मी ने पूछा—

“क्या हुआ? आज कोई काम नहीं?”

अमित मुस्कुराया।

“आज घर जल्दी जाना है।”

वास्तव में उसे खुद भी नहीं पता था
कि घर जल्दी जाने की इतनी इच्छा क्यों हुई।

रास्ते में उसे अचानक पच्चीस साल पहले की एक शाम याद आ गई।

काव्या उस समय पीले रंग की साड़ी पहने थी।

बालों में चमेली के फूल।

हाथ में चाय का कप।

वह उससे पूछ रही थी—

“आपको चाय में चीनी कितनी पसंद है?”

अमित ने हँसकर कहा था—

“जितनी तुम्हारी बातों में मिठास है।”

काव्या शरमा गई थी।

अमित मुस्कुराया।

उसने सोचा—

“कहाँ खो गई वह शाम?”

वह रास्ते में मिठाई की छोटी-सी डिब्बी लेकर घर पहुँचा।

घड़ी में छह बजकर दस मिनट थे।

काव्या सोफे पर बैठी टीवी देख रही थी।

अमित दरवाज़े पर खड़ा होकर कुछ क्षण उसे देखता रहा।

वही चेहरा…

बस अब आँखों के किनारे थोड़ी झुर्रियाँ थीं।

बालों में कुछ सफेदी थी।

लेकिन अमित को आज भी उसमें वही पच्चीस साल पुरानी लड़की दिखाई दी।

उसने मन ही मन सोचा—

“आज इससे खूब बातें करूँगा।”

लेकिन फिर उसकी नजर कंप्यूटर पर पड़ी।

टेबल पर कुछ जरूरी ई-मेल थे।

उसने सोचा—

“बस दस मिनट मेल देख लेता हूँ।”

काव्या ने पूछा—

“आज जल्दी आ गए?”

अमित ने मुस्कुराकर कहा—

“हाँ… आज तुम्हारे साथ समय बिताने का मन था।”

काव्या के चेहरे पर तुरंत चमक आ गई।

“सच?”

“हाँ।”

“तो पहले चाय बनाऊँ?”

“हाँ, लेकिन आज चाय साथ बैठकर पीएँगे।”

काव्या रसोई में चली गई।

अमित कंप्यूटर के सामने बैठ गया।

एक मेल आया।

फिर दूसरा।

फिर दुकान के कर्मचारी का फोन।

फिर बैंक का संदेश।

फिर किसी ग्राहक का फोन।

काव्या चाय लेकर आई।

“लीजिए।”

अमित ने कप उठाया।

“वाह… आज भी तुम्हारे हाथ की चाय वैसी ही है।”

काव्या मुस्कुराई।

“और आज भी तुम चाय पीते हुए काम करते हो।”

दोनों हँस पड़े।

लेकिन अमित फिर कंप्यूटर में लग गया।

काव्या कुछ देर वहीं बैठी रही।

शायद वह चाहती थी कि अमित उसकी तरफ देखे।

कुछ बात करे।

पुराने दिनों की तरह पूछे—

“आज तुम्हारा दिन कैसा रहा?”

लेकिन अमित की आँखें स्क्रीन पर थीं।

कुछ देर बाद काव्या उठकर रसोई में चली गई।

अमित ने ध्यान नहीं दिया।

साढ़े सात बज गए।

आठ बज गए।

काव्या ने खाना लगा दिया।

“खाना खा लीजिए।”

अमित ने कहा—

“हाँ, अभी आया।”

कुछ देर बाद वह मेज पर बैठ गया।

काव्या सामने बैठी थी।

दोनों खाना खाने लगे।

अमित को अचानक याद आया—

“काव्या, खाना खाने के बाद नीचे चलेंगे?”

काव्या ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

“कहाँ?”

“बस… थोड़ी देर टहलेंगे।”

उसकी आँखों में वही चमक लौट आई।

“चलेंगे।”

अमित ने मुस्कुराकर कहा—

“आज बहुत दिनों बाद साथ बैठेंगे।”

काव्या ने धीरे से कहा—

“बहुत दिनों बाद नहीं… बहुत सालों बाद।”

अमित कुछ पल चुप रहा।

लेकिन तभी टीवी पर उसका पसंदीदा कार्यक्रम शुरू हो गया।

उसने कहा—

“बस दस मिनट देख लेते हैं।”

काव्या चुपचाप उसके पास बैठ गई।

दस मिनट…

बीस मिनट…

एक घंटा…

फिर अमित सोफे पर ही सो गया।

जब उसकी आँख खुली…

घड़ी में 12 बजकर 47 मिनट थे।

टीवी बंद था।

कमरा शांत था।

काव्या सो चुकी थी।

अमित कुछ देर वहीं बैठा रहा।

उसने धीरे से खुद से पूछा—

“मैं आज जल्दी घर क्यों आया था?”

जवाब सामने था।

वह काव्या के साथ समय बिताने आया था।

लेकिन…

समय फिर भी नहीं दे पाया।

उसने आँखें बंद कर लीं।

उसके भीतर कुछ टूट-सा गया।

🌿 भावुक स्लोगन

“कभी-कभी हम समय बचाते-बचाते
वही पल खो देते हैं, जिनके लिए जिंदगी भर मेहनत करते हैं।”

🌸 दो पंक्तियाँ

वह साथ बैठना चाहती थी,
और वह साथ होने के बावजूद समय तलाशता रहा।

घर में दो लोग थे…
बस उनके बीच बैठने का समय नहीं था।

---

🌺 भाग 2

पच्चीस साल का साथ… और कितने पल साथ जीए?

अमित धीरे से उठा।

चेहरा धोया।

कमरे में आया।

काव्या गहरी नींद में थी।

दिनभर के काम से थकी हुई।

अमित कुछ देर उसे देखता रहा।

उसने पहली बार ध्यान से देखा—

उसके हाथों पर हल्की झुर्रियाँ आ गई थीं।

बालों में सफेदी थी।

पैरों के पास दवाई की छोटी-सी पट्टी रखी थी।

तकिए के पास उसकी पुरानी ऐनक थी।

अमित कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ गया।

और अचानक पच्चीस साल पीछे चला गया।

उसे याद आया—

वह लड़की…

जिससे वह पहली बार मिला था।

नीले रंग का सलवार-सूट।

आँखों में शर्म।

हाथ में चूड़ियाँ।

अमित ने तब उससे कहा था—

“मैं तुम्हें हमेशा खुश रखूँगा।”

वह वादा आज भी याद था।

लेकिन उसने खुद से पूछा—

“क्या मैंने उसे खुश रखा?”

उसने घर बनाया।

गाड़ी खरीदी।

दुकान बढ़ाई।

बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाया।

काव्या को कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी।

लेकिन…

क्या उसने उसे अपना समय दिया?

काव्या कभी शिकायत नहीं करती थी।

कभी नहीं कहती—

“मेरे साथ बैठो।”

कभी नहीं कहती—

“मुझे बाहर ले जाओ।”

कभी नहीं कहती—

“मुझसे बातें करो।”

वह बस चुपचाप सब करती रही।

एक दिन अमित बहुत देर से घर आया था।

काव्या ने खाना गर्म किया था।

अमित ने कहा—

“बहुत थक गया हूँ।”

काव्या ने खाना परोसते हुए कहा—

“ठीक है, पहले खा लो।”

उस दिन भी उसने कुछ नहीं कहा।

दूसरे दिन अमित को तेज बुखार था।

काव्या पूरी रात उसके सिर पर पट्टी रखती रही।

अमित को सुबह याद भी नहीं था।

लेकिन काव्या को याद था।

कितनी बार उसने उसके लिए अपनी नींद छोड़ी थी?

कितनी बार उसने अपनी पसंद का कार्यक्रम छोड़कर उसका मैच देखा था?

कितनी बार उसने अपने लिए खरीदी चीज़ वापस रखकर
बच्चों के लिए कुछ खरीद लिया था?

कितनी बार उसने कहा—

“आप पहले खा लीजिए, मैं बाद में खा लूँगी।”

अमित की आँखें भर आईं।

उसने काव्या के हाथ को देखा।

वही हाथ…

जिसने पच्चीस साल तक उसका घर सँभाला था।

वह धीरे से बोला—

“काव्या… मैंने तुम्हें बहुत कुछ दिया होगा,
लेकिन अपना समय नहीं दिया।”

काव्या सो रही थी।

उसे सुनाई नहीं दिया।

अमित की आँखों से आँसू गिर पड़े।

उसे लगा—

हम अक्सर कहते हैं—

“मैं परिवार के लिए इतना करता हूँ।”

लेकिन परिवार शायद यह नहीं पूछता
कि तुम कितना कमाते हो।

वह पूछता है—

“तुम हमारे साथ कितनी देर बैठते हो?”

अमित ने अपनी जिंदगी के पिछले पच्चीस साल याद किए।

कितनी शामें थीं
जो वह दुकान में छोड़ आया।

कितने रविवार थे
जो हिसाब-किताब में निकल गए।

कितने त्योहार थे
जब फोन पर ग्राहक उससे ज्यादा जरूरी थे।

कितनी बार काव्या ने कहा—

“चलो कहीं घूम आते हैं।”

और उसने जवाब दिया—

“अभी समय कहाँ है?”

वह सोचने लगा—

समय आखिर कब होगा?

जब दुकान नहीं होगी?

जब बच्चे अपने घर चले जाएँगे?

जब शरीर साथ नहीं देगा?

जब काव्या के साथ घूमने की इच्छा तो होगी
लेकिन उसके पैर चलने लायक नहीं होंगे?

उसे अचानक डर लगा।

बहुत गहरा डर।

उसने सोचा—

“कहीं ऐसा न हो कि जिस दिन मेरे पास समय आए,
उस दिन काव्या के पास मेरे लिए समय न हो।”

सुबह होने लगी।

काव्या उठी।

उसने अमित को कुर्सी पर बैठे देखा।

“आप सोए नहीं?”

अमित ने उसकी तरफ देखा।

“नहीं।”

“क्यों?”

अमित कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“काव्या… तुम खुश हो?”

वह मुस्कुराई।

“हाँ।”

“सच?”

“हाँ।”

“मैं तुम्हें समय नहीं दे पाया…”

काव्या कुछ पल उसे देखती रही।

फिर धीरे से बोली—

“मुझे पता है।”

अमित चौंक गया।

“फिर कभी कहा क्यों नहीं?”

काव्या मुस्कुराई।

“क्योंकि मुझे पता था…
आप बुरे नहीं हैं।”

“आप बस जिंदगी को बेहतर बनाने में लगे हुए थे।”

फिर उसने बहुत धीमे से कहा—

“लेकिन अमित…
कभी-कभी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए
उसे जीना भी पड़ता है।”

अमित की आँखें नम हो गईं।

काव्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“कल क्या होगा, कौन जानता है?”

“आज अगर आप मेरे पास बैठे हैं,
तो मेरे लिए यही सबसे बड़ी खुशी है।”

अमित ने पहली बार
उसका हाथ दोनों हाथों में लिया।

🌿 भावुक स्लोगन

“जिस इंसान के लिए आप पूरी जिंदगी मेहनत कर रहे हैं,
कहीं ऐसा न हो कि उसके साथ जीने का समय ही खत्म हो जाए।”

🌸 दो पंक्तियाँ

प्यार हमेशा बड़े उपहार नहीं माँगता,
कभी-कभी वह सिर्फ इतना चाहता है—
‘आज मेरे पास बैठ जाओ।’

समय देना खर्चा नहीं है,
यह रिश्तों में किया गया सबसे अनमोल निवेश है।

---

🌺 भाग 3

आज से… थोड़ा जीते हैं

सुबह की चाय मेज पर रखी थी।

अमित ने मोबाइल उठाया।

फिर कुछ सोचकर उसे उल्टा रख दिया।

काव्या ने पूछा—

“आज फोन नहीं देखोगे?”

अमित मुस्कुराया।

“आज नहीं।”

“क्यों?”

“आज तुम्हें देखना है।”

काव्या हँस पड़ी।

“पच्चीस साल बाद इतनी बातें?”

अमित ने कहा—

“शायद देर से समझ आया है।”

उस दिन दोनों दुकान नहीं गए।

कर्मचारियों को काम सौंप दिया।

अमित ने कहा—

“दुकान हमारे बिना एक दिन चल सकती है।”

काव्या ने पूछा—

“और हम?”

अमित मुस्कुराया—

“हम एक दिन एक-दूसरे के बिना नहीं जीना चाहते।”

दोनों शहर के पुराने पार्क में गए।

वही पार्क जहाँ कभी शादी के बाद दोनों साथ घूमने आते थे।

बेंच पर बैठते ही काव्या ने कहा—

“याद है?”

अमित ने कहा—

“बहुत कुछ याद है।”

“यहाँ आपने पहली बार मेरा हाथ पकड़ा था।”

“और तुमने हाथ छुड़ा लिया था।”

दोनों हँस पड़े।

कितने वर्षों बाद
वह हँसी इतनी खुली थी।

उन्होंने चाय ली।

एक प्लेट में दो समोसे।

काव्या ने आधा अमित को दिया।

अमित ने आधा उसे।

जिंदगी में शायद यही तो चाहिए था—

एक साथ बैठना।

उन्होंने बच्चों की बातें कीं।

पुराने दोस्तों को याद किया।

अपनी पहली मुलाकात याद की।

अपने संघर्ष याद किए।

अपनी पहली कमाई याद की।

पहला किराए का घर।

पहली स्कूटर।

पहला त्योहार।

पहली संतान।

सब कुछ।

शाम को घर लौटते समय
अमित ने कहा—

“काव्या, एक बात समझ में आई।”

“क्या?”

“हमने पच्चीस साल
घर बनाने में लगा दिए।”

काव्या मुस्कुराई।

“हाँ।”

“अब बचे हुए साल
उस घर में जीने हैं।”

काव्या की आँखें भर आईं।

उस दिन से दोनों ने एक छोटा-सा नियम बनाया।

रात का खाना खाते समय
मोबाइल नहीं।

दिन में कम से कम आधा घंटा
सिर्फ एक-दूसरे के लिए।

हर महीने एक दिन
कहीं बाहर।

हर सप्ताह एक शाम
पुरानी यादों के नाम।

और सबसे जरूरी—

“कल” शब्द कम से कम इस्तेमाल करना।

कुछ महीने बीते।

अमित ने दुकान का बहुत-सा काम कर्मचारियों को सौंप दिया।

उसे पहली बार महसूस हुआ—

जिस दुकान के बारे में वह सोचता था
कि उसके बिना नहीं चलेगी…

वह चल रही थी।

क्योंकि दुनिया किसी एक इंसान पर नहीं रुकती।

लेकिन घर…

घर में एक इंसान की कमी
बहुत बड़ी हो सकती है।

एक शाम काव्या ने पूछा—

“अगर उस रात तुम जल्दी घर नहीं आते तो?”

अमित मुस्कुराया।

“तो शायद मुझे यह सब समझने में कुछ और साल लग जाते।”

काव्या ने कहा—

“तो उस रात को धन्यवाद।”

अमित ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं…”

“उस रात को नहीं।”

“तुम्हें धन्यवाद।”

काव्या ने पूछा—

“मुझे क्यों?”

अमित ने कहा—

“क्योंकि तुमने पच्चीस साल इंतज़ार किया…
कि मैं एक दिन तुम्हारे पास बैठूँ।”

काव्या की आँखों से आँसू निकल आए।

अमित ने उन्हें पोंछते हुए कहा—

“अब और इंतज़ार मत करना।”

उस रात दोनों छत पर बैठे थे।

आसमान में चाँद था।

काव्या ने पूछा—

“अमित, जिंदगी कितनी बची है?”

अमित ने उसकी तरफ देखा।

“पता नहीं।”

“फिर?”

“जितनी भी बची है…”

उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

“अब उसे जीते हैं।”

दोनों देर तक चुप बैठे रहे।

उस चुप्पी में कोई शिकायत नहीं थी।

कोई हिसाब नहीं था।

कोई बीता हुआ कल नहीं था।

बस…

दो लोग थे।

और उनके बीच
बहुत वर्षों बाद
वास्तव में जिंदगी थी।

---

🌿 अंतिम भावुक स्लोगन

**“ज़िंदगी जीने के लिए कल का इंतज़ार मत कीजिए…

क्योंकि कल सिर्फ एक तारीख है, गारंटी नहीं।”**

**“घर, पैसा, गाड़ी और सुविधाएँ फिर भी खरीदी जा सकती हैं…

लेकिन बीता हुआ समय कभी वापस नहीं खरीदा जा सकता।”**

🌸 अंतिम दो पंक्तियाँ

जिसे आप सबसे ज्यादा चाहते हैं,
उसे अपना समय दीजिए—क्योंकि समय ही प्रेम का सबसे सच्चा रूप है।

जिंदगी बहुत लंबी लगे तो भी जी लेना आज…
क्योंकि किसी की जिंदगी में ‘कल’ आया ही नहीं करता।

---

💔 लेखक की कलम से

हम सब कहीं न कहीं अमित हैं।

हम सबके पास कोई न कोई काव्या है।

कोई पत्नी…

कोई पति…

कोई माँ…

कोई पिता…

कोई बच्चा…

कोई दोस्त…

जो शायद हमारे समय का इंतज़ार कर रहा है।

हम कहते हैं—

“अभी काम बहुत है।”

“अभी जिम्मेदारियाँ हैं।”

“बाद में बैठेंगे।”

“बाद में घूमेंगे।”

“बाद में बातें करेंगे।”

लेकिन जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा यही है—

हम सोचते हैं कि बाद में समय हमारा इंतज़ार करेगा।

समय किसी का इंतज़ार नहीं करता।

हम अपने प्रियजनों के लिए
पैसा कमाते हैं।

उनके लिए घर बनाते हैं।

उनकी सुविधाएँ बढ़ाते हैं।

लेकिन कभी-कभी यह भूल जाते हैं कि
उन्हें हमारी कमाई से ज्यादा
हमारी मौजूदगी चाहिए।

एक माँ को बेटे की आवाज़ चाहिए।

एक पिता को बेटे के पास बैठने का समय चाहिए।

एक पत्नी को पति की दो मीठी बातें चाहिए।

एक पति को पत्नी की मुस्कान चाहिए।

एक बच्चे को पिता का हाथ चाहिए।

ये चीज़ें बाजार में नहीं मिलतीं।

इनकी कीमत पैसा नहीं…

समय है।

इसलिए आज ही किसी अपने के पास बैठिए।

फोन एक तरफ रखिए।

टीवी बंद कीजिए।

काम कुछ देर रोकिए।

और बस पूछिए—

“तुम सच में कैसे हो?”

शायद उस एक सवाल के जवाब में
आपको किसी अपने की पूरी जिंदगी सुनाई दे जाए।

---

✍️ लेखक परिचय

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया'

कान्तिभाई राठौड़ 'बदामिया' एक संवेदनशील लेखक, उद्यमी और समाजसेवा से जुड़े व्यक्तित्व हैं।

उनकी लेखनी जीवन के उन अनकहे एहसासों को शब्द देती है, जिन्हें इंसान अक्सर अपने भीतर दबाकर रखता है।

रिश्ते, परिवार, माता-पिता, पति-पत्नी का प्रेम, अकेलापन, मानवीय संवेदना और जीवन की सच्चाइयाँ—इन विषयों पर उनकी रचनाएँ पाठक को अपने ही जीवन की ओर देखने के लिए प्रेरित करती हैं।

उनका विश्वास है—

**“लेखनी की सबसे बड़ी सफलता तब होती है,

जब कोई पाठक कहानी पढ़कर सिर्फ भावुक न हो…
बल्कि अपने किसी रिश्ते को समय देने के लिए उठ खड़ा हो।”**

उनकी कोशिश रहती है कि हर कहानी
पाठक के दिल को छुए,
उसे कुछ पल के लिए रोक दे
और जीवन के उन रिश्तों की याद दिलाए
जिन्हें हम अक्सर अपनी व्यस्तता में पीछे छोड़ देते हैं।

---

🌿 अंतिम संदेश

आज ही किसी अपने को फोन कीजिए।

आज ही माँ के पास बैठिए।

आज ही पिता से दो बातें कीजिए।

आज ही पत्नी या पति का हाथ पकड़कर कहिए—

“तुम मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो।”

बच्चों के साथ बैठकर उनका दिन पूछिए।

किसी पुराने दोस्त को याद कीजिए।

क्योंकि…

जिंदगी में सबसे महँगी चीज़ समय है।

और सबसे दुखद बात यह है कि
जब हमें इसकी कीमत समझ आती है…

तब हमारे पास उसे खर्च करने के लिए
शायद बहुत कम समय बचा होता है।

❤️ **“कमाइए जरूर…

लेकिन जीना मत भूलिए।”**

❤️ **“भविष्य के लिए बचाइए जरूर…

लेकिन वर्तमान को मत गँवाइए।”**

❤️ **“अपनों के लिए मेहनत जरूर कीजिए…

लेकिन अपनों के साथ जीना भी सीखिए।”**

**क्योंकि आखिर में इंसान यह नहीं पूछता—

“मैंने कितना कमाया?”**

**वह पूछता है—

“मैंने कितना जिया… और किनके साथ जिया?”**

— कांतिभाई राठौड़ 'बदामिया'