बाबूजी की हिचकी Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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बाबूजी की हिचकी

 

                बाबूजी बिस्तर पर लेटे हुए थे। मुझे देखते ही उठ कर बैठ लिए। 

                अविलंब पहले की तरह खड़े न हुए। 

                मैं उन की बगल पर जा बैठी।

                उन के कंधे थोड़े और झुक लिए थे।

               “कैसे?” वह बोले। अपने आने की मैं ने उन्हें कोई पूर्व सूचना न दी थी।

               “सरकार की एक आवास योजना के अंतर्गत मुकेश एक निजी मकान पंजीकृत कराना चाहते हैं। उसी के पंजीकरण के लिए एक लाख रुपए तत्काल चाहिए हैं। मुकेश ने सोचा आप की निजी जमा राशि से हम उधार ले सकते हैं।”

               “इधर ये दोनों लड़के अपने स्कूटरों से ऊबे बैठे हैं।सोचते हैं इन्हें एक मोटरकार पंजीकृत करा लेनी चाहिए।” 

              “चाय या नींबू का शर्बत?” दोनों भाभियां इधर कमरे में चली आईं। दोनों ही अलग- अलग घरों से आयीं थीं। फिर भी न केवल दिखाव- बनाव में, वरन व्यवहार में भी दोनों जुड़वा बहनों सरीखी दिखाई पड़तीं। 

               “मैं पहले नहाऊंगी,” मैं अपने सूटकेस की ओर बढ़ ली। 

                उधर से भाइयों और बच्चों के लिए मैं कम ही कुछ लाती। अक्सर जो भी लाती, इन्हीं दोनों के लिए लाती।

                “फिर बाबूजी के साथ चाय पिऊंगी। लेकिन पहले आप दोनों ये सलवार- सूट देखिए….”

                दोनों ही भाभियों के लिए इस बार मैं घनी कढ़ाई वाले सलवार- सूट लाई थी।

               “बहुत सुंदर,” दोनों एक साथ उछल पड़ीं। 

               जभी मैं ने बाबूजी को अपनी छड़ी लहराते हुए देखा। उन का एक पैर उन की चप्पल में था और थोड़ी दूर पर पड़ी अपनी दूसरी चप्पल उन्हें दिखाई नहीं दे रही थी। छड़ी वह खाली ज़मीन पर लहराते चले जा रहे थे।

              उनकी मदद करने उन दोनों में से कोई आगे न बढ़ी। दोनों अपने सूट और दुपट्टे खोलने- देखने में व्यस्त थीं।

              बाबूजी की ओर मैं केवल देखती रही थी। बिना उन की चप्पल उन तक पहुंचाने का प्रयास किए। ऐसा मैं अक्सर किया करती। उन के पास मानो मैं एक निरीक्षक की तरह जाती। कोई मरहम, कोई सुख- सुविधा देने नहीं। बल्कि यह देखने कि मेरी अनुपस्थिति में वह कैसे रहा करते हैं।

 

                नहाने के बाद जब मैं कमरे में लौटी, तो बाबूजी हिचकी ले रहे थे।

                “मैं पानी लाती हूं,” मैं रसोई की ओर भाग ली।

                “कुछ चाहिए?” रसोई में उबल रही चाय के साथ दोनों भाभियां ठठा रहीं थीं।

                 “पानी,” मैं ने कहा और ऐक्वागार्ड का स्विच औन कर दिया।

                “फ़्रिज में पानी है तो!” दोनों समवेत स्वर में बोल पड़ीं। 

                “नहीं,” मैं ने कहा, “पानी मुझे बाबूजी के लिए चाहिए। उन्हें हिचकी आ रही है।”

                “वह सीधे नल का पानी पीते हैं,” छोटी भाभी बोली, “ऐक्वागार्ड का नहीं।”

                “आज इसी का पी लेंगे,” ऐक्वागार्ड से गिलास भर कर उस का स्विच मैं ने बंद कर दिया।

                लेकिन पानी से बाबूजी की हिचकी लोप नहीं हुई।

               “नाक बंद कर के तो देखिए,” मैं ने सुझाया।

                मगर उन की हिचकी जारी रही।

               “अपना सांस रोक कर देखिए और फिर छोड़िए।ऐसा तीन बार करें….” 

                मगर बाबूजी की हिचकी गई नहीं।

               “अपनी ज़ुबान बाहर निकाल कर देखिए और फिर सांस खींचिए और छोड़िए….”

               मगर बाबूजी को अब भी हिचकी बराबर आती रही।

              “मैं चीनी ले कर आई,” मै रसोई में दूसरी बार फिर भाग ली।

              बड़ी भाभी ट्रे में चाय रख रहीं थीं। छोटी भाभी एक डिब्बे से बेसन के लड्डू निकाल रहीं थीं।

              दोनों के मुंह भरे थे।

              “बाबूजी को अभी भी हिचकी आ रही है,” मैं ने कहा, “हम दोनों बाद में चाय पिंएगे।  आप दोनों अभी पी लीजिए। अभी तो मैं उन के लिए चीनी ले जा रही हूं….”

               जब चीनी ने भी असर नहीं दिखाया तो मैं ने गप सोचनी शुरू की। मेरी हिचकी भगाने में बाबूजी की गप हमेशा कामयाब हो जाती थी।

      

       ……क्या कहूं बाबूजी से?

             “मां अभी गईं नहीं, बाबूजी। मां अभी जीवित हैं….”

              “मुझे नौकरी मिल रही है, बाबूजी। मैं अब नौकरी करूंगी….”

              “मुकेश आप से मिलने आंएगे। उन्हें बहुत अफ़सोस है मां की पहली बरसी पर भी वह आ न पाए थे और सभी आप से पूछते रहे थे, दामाद अब भी नहीं आए क्या?आप की पत्नी की मृत्यु पर तो,खैर,वह विदेश में थे और उन का न आना हमें समझ में आ गया था लेकिन अब?

               …………

 

             “मालूम है,बाबूजी?” मैं ने गप सोच ली, “सनी को भारतीय टीम में चुन लिया गया है….”

              सनी,मेरे बेटे,ने क्रिकेट के लिए अपना जुनून बाबूजी से विरासत में पाया है और अब अपने अठारहवें साल में वह बस यही एक सपना संजोए है,मुझे भारतीय क्रिकेट टीम में खेलना है….बस….

             अपनी हिचकियों के बीच बाबूजी हंसने लगे।

             “अच्छा रुकिए,” अपने सूटकेस से कागज़ का एक लिफ़ाफ़ा मैं निकाल लायी। इस लिफ़ाफ़े में मैं बाबूजी के लिए गर्म मोज़े लायी थी।

              “बाबूजी,” लिफ़ाफ़ा खोल कर मैं ने उन के मुंह में जा लगाया, “इसे फुलाइए। खूब लंबी- लंबी  सांस खींच कर….”

               किंतु नहीं। लिफ़ाफ़े ने भी कोई दम न दिखाया।

               “डा.मल्होत्रा के पास चलें?” मुझे चिंता हो आई। 

               डा.मल्होत्रा हमारे पुराने डाक्टर थे।

               जवाब में बाबूजी ने सिर हिला दिया।

               “क्या हर्ज है?” मैं ने कहा, “इसी बहाने मैं भी उन से मिल लूंगी।”

               “वह अब है नहीं,” अपनी हिचकियों के बीच बाबूजी बोले। 

               “ऐसा है क्या?” मुझे धक्का लगा। उम्र में डा.मल्होत्रा बाबूजी से दो साल छोटे थे, “कब की बात है?”

               “चार- पांच महीने हो चले हैं,” बाबूजी की आवाज़ रुंध चली।

               “फिर अब आप किस के पास जाते हैं?” मेरी चिंता बढ़ ली।

               “कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी।”

               “आज तो चले ही जाते,” मैं ने कहा।

                “इधर पड़ोस में एक डॉक्टर है तो,” घर की लौबी में बैठीं दोनों भाभियां टी.वी. देखने के साथ-साथ अंगूर खा रहीं थीं, “लेकिन वह रुपया ढेरों ऐंठता है। मुंह में थर्मामीटर लगाने भर का दो सौ रुपया, तिस पर खून,पेशाब और थूक के टेस्ट के पच्चीस सौ…..”

               “तो क्या हुआ?”मैं ने कहा,“चलिए,   बाबूजी को वहां ले चलते हैं….”

               “कोई ख़ज़ाना लाईं हैं उधर से?”

छोटी भाभी हंसने लगी।

               “मेरे पास नहीं है। मगर बाबूजी के पास तो रुपया है ही। इतनी तो उन की पेंशन है….”

               “लेकिन पहले आप के भैय्या तो आ जांए,” बड़ी भाभी ने कहा, “उन की सलाह के बिना ऐसे कैसे बाबूजी को डाक्टर के पास ले जाएंगे? यों भी वह आने वाले ही हैं….”

               “ठीक है,” मैं ने कहा, “उन के लिए थोड़े अंगूर ही ले जाती हूं। शायद यही कोई चमत्कार कर ले जांए….”

 

               “निंदी आप को अंगूर खिला रही है?” स्थानीय कालेज में लेक्चरर बड़े भाई घर लौटे तो सीधे हमारे पास चले आए। 

               “दो घंटे होने को आए,” मैं फूट पड़ी, “बाबूजी की हिचकी जाने का नाम ही नहीं ले रही….”

               “तुम ऐसी ऊलजलूल हरकतें कैसे करती रहती हो?” बड़े भाई मुझे डांट दिए, “मालूम नहीं तुम्हें? अंगूर अम्लीय पदार्थ है। इस की तासीर जठरीय है। और हिचकी के समय तो अंगूर बाबूजी को तनिक लाभ न देगा।बल्कि   उन का पेट ही फुलाएगा।”

               “मुझे मालूम न था,” मैं रोंआंसी हो आई।

               “मालूम होना चाहिए तुम्हें!” भाई की आवाज़ तेज़ हो ली, “हिचकी का संबंध सीधे सीधे हमारे पेट और छाती के बीच की बड़ी मांसपेशी से है। जिसे हम डाएफ़्रैम कहते हैं। और किसी कारण जब उस मांसपेशी में अचानक कोई खिंचाव या ऐंठन आ जाती है तो हमारे फेफड़े तेज़ी से हवा खींचते हैं और हमारे गले में मौजूद वोकल कौर्डज़ व ग्लौटिस बंद हो जाते हैं। हवा के उस तेज़ बहाव के अचानक रुकने से गले से ‘हिच’ की आवाज़ निकलती है।ऐसे में अंगूर उन की तकलीफ़ बढ़ा न देगा?”

              “कब से बाबूजी ने कुछ खाया नहीं था,” मैं ने अपनी सफ़ाई देनी चाही।

              “पूरे घर में एक तुम्हीं सगी हो बाबूजी की!” बड़े भाई का गुस्सा आसमान छू गया, “हम उन के कोई नहीं? एक तुम्हीं समझदार हो? हम सब मूर्ख हैं? जब तुम उधर रहती हो, महीनों के महीने। तब तुम्हारे पीछे उन की देखभाल कौन करता है? हमीं न?”

             “जाओ यहां से,” बाबूजी भी ताव खा गए, “कुछ भी कहने की जरूरत नहीं तुम्हें।उसे भला-बुरा कह रहे हो जो हमारे लिए रोज़ दुआएं मांगती है?”

              “आप की हिचकी कहां गई, बाबूजी?” बड़े भाई एकाएक हंसने लगे।

              उन की हंसी सुन कर दोनों भाभियां भी बाबूजी के कमरे में चली आयीं।

              “देखा?” बड़े भाई ने बड़ी भाभी की ओर देखा, “निंदी की बुराई सुनना बाबूजी को कैसे कबूल नहीं?”

               “हमें तो शुरू से पता है,” दोनों भाभियां एक- दूसरे के बीच बोल पड़ीं, “हमें तो पहले से मालूम है….”

               वे दोनों भी हंस दीं।

               बाबूजी की हिचकी सचमुच गायब हो गई थी।

               मुझे भी हंसना चाहिए था किंतु दबी- दबाई मेरी रुलाई कहां से धमक पड़ी?

अविरल? असह्य?

              मेरी आंखें आंसू टपकाने लगीं।

              बाबूजी मेरे पास चले आए। अपने हाथ से मेरा हाथ ढांप कर वह भी रो पड़े। दब्बो- दब्बो।

              कमरे से पहले बड़े भाई निकले। दनादन। अकेले।

              फिर दोनों भाभियां निकलीं। साथ-साथ। दबे पांव।