बनने से मिटने तक
कुछ बनने में—या हर क्षण मिटकर फिर बनने में?
प्रकृति रोज मिटती है और रोज नई बनती है।
पेड़ पुराने पत्ते छोड़ता है।
नदी हर क्षण बदलती है।
शरीर हर क्षण बदल रहा है।
अस्तित्व तुम्हें हर क्षण मिटाता है और हर क्षण नया करता है।
लेकिन मनुष्य क्या करता है?
दुनिया उसे सिखाती है—
मजबूत बनो।
धर्म कहता है—धार्मिक बनो।
सत्ता कहती है—अधिकारी बनो।
धन कहता है—धनवान बनो।
त्याग कहता है—महात्यागी बनो।
कथा कहता है—कथावाचक बनो।
राजनीति कहती है—नेता बनो।
और मनुष्य हर जगह एक नया “मैं” बना लेता है।
मैं धनवान हूँ।
मैं धार्मिक हूँ।
मैं त्यागी हूँ।
मैं ज्ञानी हूँ।
मैं गुरु हूँ।
मैं नेता हूँ।
यह तो बनने की यात्रा में खो गया।
शायद जीवन का दूसरा मार्ग है—
बनने का नहीं, मिटने का मार्ग।
अपने बनाए हुए हर परिचय को थोड़ा-थोड़ा छोड़ना।
जो कल थे, उसे आज पकड़े न रहना।
अपने ज्ञान को अपनी पहचान न बनाना।
अपने धर्म को अपना अहंकार न बनाना।
अपने अनुभव को अपनी श्रेष्ठता न बनाना।
जब तुम मिटते हो,
तब भीतर जगह बनती है।
और उस खाली जगह में
जीवन अपने लाखों रंग भर सकता है।
एक रंग की पहचान लेकर मत बैठो।
जीवन इंद्रधनुष है—
तुमने खुद को एक रंग क्यों बना लिया?
तुम हर दिन कुछ और हो सकते हो।
हर अनुभव तुम्हें बदल सकता है।
हर संबंध तुम्हें कुछ दिखा सकता है।
हर पीड़ा कुछ खोल सकती है।
हर आनंद कुछ सिखा सकता है।
इसलिए जीवन को किसी एक पहचान में बंद मत करो।
न हिंदू बनकर रुकना,
न मुसलमान बनकर,
न धार्मिक बनकर,
न त्यागी बनकर,
न ज्ञानी बनकर,
न गुरु बनकर,
न नेता बनकर।
जो बन गया, उसे भी छोड़ते चलो।
क्योंकि बनना सीमा बनाता है;
मिटना संभावना खोलता है।
और शायद जीवन का सबसे बड़ा धन
वह नहीं है जो तुमने अपने भीतर जमा किया—
बल्कि वह है जो तुमने अपने भीतर से हटाया,
जिससे जीवन को तुम्हारे भीतर
अपने लाखों रंग भरने की जगह मिल गई।
“एक पहचान मत बनो।
जीवन को अपने भीतर
लाखों पहचानें आने-जाने दो।
जो हर क्षण मिट सकता है,
वही हर क्षण नया जन्म ले सकता है।”