चलो दूर कहीं..! - 27 Arun Gupta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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चलो दूर कहीं..! - 27

चलो दूर कहीं..27

प्रतीक्षा, शिखा को ऐसे घूर रही थी जैसे उसे पहली बार देख रही हो..! वह उसकी बचपन की दोस्त थी, दोनों साथ-साथ खेले कूदे,पढ़े- लिखे और बड़े हुए। दोनों लंगोटिया यार थे । "फिर क्या कोई अपने बचपन के अभिन्न मित्र को भूल सकता है?" प्रतीक्षा को एकटक घूरते देख शिखा के मन में ये प्रश्न कौंधा तो उसने उसे झकझोरते हुए कहा," क्या हुआ प्रतीक्षा.. ऐसे आंखें फाड़े क्यों घूर रही हो..? मुझे पता है मेरे मांग में सिंदूर और इस मंगलसूत्र को देखकर तुम शॉक्ड हो क्यों..?"

"कौन हो तुम..?" प्रतीक्षा ने धीरे से पूछा तो शिखा हंसते हुए बोली,"चल हट अब ये नाटक बंद कर और बता कहां थी इतने दिनों तक.. ? तुम्हारी इस चुप्पी से मेरा दम घुट रहा है यार.. अच्छा अब मान भी जाओ..! तुम मुझसे क्यों नाराज़ हो ये तो मुझे नहीं मालूम लेकिन तुम्हें जिंदा देख कर मुझे कितनी खुशी हो रही है मैं बता नहीं सकती..!"

अभी वह बोल ही रही थी कि मां के कराहने से दोनों का ध्यान उनकी ओर गया और प्रतीक्षा ने उनका चेहरा भींगे कपड़े से पोंछते हुए बेहद करुण स्वर में कहा,"आंखें खोलो मां.. तुम्हें कुछ नहीं होगा, तुम हिम्मत रखो मां..बस एक बार देखो मुझे..!"

अभी वह बोल ही रही थी कि उनकी आंखों के पलकों में हरकत हुई और धंसी हुई आंखें एकाएक खुल गई.. वह आंखें फाड़े चारों ओर घूर रही थी और प्रतीक्षा के आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे, उसे अनाह पर भरोसा था और अनाह के कहे अनुसार वह बोली," मां मैं तुम्हारे लिए एक कप गर्म दुध लेकर आ रही हूं..!"

कहकर वह उठने की कोशिश की तो उसके हाथ को पकड़ कर वह बेहद क्षीण स्वर में बोली,"घर में दुध कहां मिलेगा बेटा..तू चिंता मत कर मैं ठीक हूं..!"

उनकी स्थिति को देखकर शिखा भी काफी दुखी थी, वह उनके समीप गई और उनका हाथ पकड़ कर पूछी," कैसी है आंटी..?"

शिखा के इतना कहते ही उनकी गोल गोल घुमती हुई आंखें उसपर कुछ देर के लिए स्थिर हो गई जैसे वो उस चेहरे को पहचानने की कोशिश कर रही हों.. और याद आते ही उस भीषण पीड़ा और कृशकाय शरीर के बाबजूद उसके मलीन चेहरे पर मुस्कान तैर गई, आंखों में चमक आ गई और उसने थरथराते स्वर में कहा," अरे शिखा बेटी तूने शादी कर ली और हमें बताया तक नहीं..?"

"हां आंटी सबकुछ इतना जल्दी हो गया कि किसी को कुछ बताने का मौका ही नहीं मिला.. एकदम चट मंगनी पट ब्याह जैसा..!देखो न आंटी ये प्रतीक्षा मेरे साथ कैसा नाटक कर रही है..न कुछ बोल रही है और न ही मुझे कोई रिस्पांस दे रही है.. जैसे मैं कोई अजनबी हूं..! " फिर प्रतीक्षा से मुखातिब होते हुए बोली,"देख प्रतीक्षा बहुत हुआ तेरा ये नाटक..अब सीधे मुंह बात करो वर्ना मैं तेरी शिकायत अभी रो..!"

अभी उसकी बात पुरी भी नहीं हुई थी कि बीच में ही अनाह ने जाने कहां से एकाएक प्रकट हुआ और बेहद मज़ाक़िया लहजा में कहा," किसकी शिकायत की जा रही है शिखा जी.. इतने खूबसूरत अधर पर ये शिकायत भरा लहज़ा शोभा नहीं देता..! अरे मां जी को होश आ गया.. प्रतीक्षा दुध दी इन्हें..?"

प्रतीक्षा ने ना में सिर हिलाया तो उसने कहा," जाओ इनके लिए एक कप गर्म दुध ले आओ..!" प्रतीक्षा के जाने के बाद वह शिखा से मुखातिब हुआ और कहा," शिखा जी आप बहुत खूबसूरत लग रही है, बिछड़े यार से मिलने के लिए कोई इतना सज-धजकर थोड़े आता है, बेचारी प्रतीक्षा को कहां पता कि आपने उसके प्यार को हड़प लिया है.. सोचिए जरा जब उसे पता चलेगा तो उसपर क्या गुजरेगी.. इसलिए मेहरबानी करके इसे इसके हाल में छोड़ दिजिए और आप जाइए यहां से..!"

"कौन हो तुम और तुम्हें मेरे बारे में इतना कुछ कैसे पता..?" शिखा ने हकलाते हुए पूछा तो उसने कहा," मैं भी आपके तरह प्रतीक्षा का दोस्त हूं.. लेकिन मैं आपके जैसा उसके पीठ में खंजर नहीं घोंपता.. मुझे आपके बारे में सबकुछ पता है.. इसलिए आपसे विनती है कि उसके याददाश्त वापस आने से पहले चले जाइए यहां से..!"

"क्या हुआ अनाह इसे क्यों जाने के लिए कह रहे हो.. मुझे माफ़ करना बहन मैं तुम्हें नहीं पहचान पा रही हूं..?" प्रतीक्षा ने दुध का कप अपनी मां को पकड़ाते हुए कहा तो शिखा बोली," अच्छा अपना और अपनी मां का ध्यान रखना.. मैं जा रही हूं..!"

कहकर शिखा वहां से निकली तो उसके मन मस्तिष्क में सवालों का बवंडर मचा था, प्रतीक्षा के व्यवहार और अनाह के बातों का उसपर गहरा असर हुआ था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि जिस शख्स से वह न कभी मिली है,न उससे कभी कोई परिचय रहा है,वह उसके बारे में इतना सबकुछ कैसे जानता है..?

प्रतीक्षा दिनभर लोगों के आवभगत में जुटी रही,शाम को वह अपने कमरे में आराम कर रही थी । मां के स्वास्थ्य में बहुत सुधार हुआ था, वह बहुत दिनों बाद चैन की नींद सोई थी।सुमी और रवि एक कमरे में थे। कमलनाथ दरवाजे पर थे और अनाह का कोई अता-पता न था। घर का माहौल शांत था। 

शाम के करीब 8 बजे के आसपास सुमी के पेट में हल्का हल्का दर्द शुरू तो वह उसे गैस समझ कर इग्नोर करती रही लेकिन जब बर्दाश्त से बाहर हो गया तो उसने रवि को बताया और देखते ही देखते उसके कराहने की आवाज सुनकर प्रतीक्षा और कमलनाथ उसके कमरे में आए और उसे दर्द से तड़पते देखकर सोच में पड़ गए कि इसे अचानक से क्या हो गया..रात गहराती जा रही है और इसे जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना जरूरी है.. अनाह भी घर में नहीं है, मैं क्या करूं.. रवि यहां के लिए अनजान हैं और घर पर एक आदमी का रहना भी जरूरी है क्या करूं कुछ समझ नहीं आता..!" सोचते सोचते कमलनाथ बुदबुदाया तो रवि ने कहा," इसकी हालत ख़राब होती जा रही है, इसे जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना जरूरी है अंकल..ऐसा करता हूं मैं ऑटो ले आता हूं..!"

कहकर रवि ऑटो लाने के लिए भागा.. और प्रतीक्षा दर्द से बिलबिलाते सुमी को संभालने में जुटी थी.. और कमलनाथ रवि का दरवाजे पर बेसब्री से इंतजार करते रहे लेकिन रवि का कहीं अता-पता नहीं था..!

क्रमशः...

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