नाम बदलाई Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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नाम बदलाई

                   उन्हें अपना पहला नाम, हीरालाल, 15 मार्च 1909 को मिला था। जब वह लाला मगनलाल  के घर पैदा हुए थे।

                   उन का दूसरा नाम,माताबदल, उन के चाचा, किशोरीलाल, ने उन्हें अपना दत्तक पुत्र बनाते समय दिया था। उसी वर्ष की तेइस अप्रैल को।

                  दोनों बार उन के नाम सहज में रखे गए थे।

                  चर्चा उन्हें उन के तीसरे या शायद आखिरी नाम ने दिलाई थी।

 

                 “अमृतसर से इधर चूड़ी और मेहंदी भेजी जा रही है,” 19 जून, 1947 की सुबह लाला माताबदल मेरे कमरे में आए थे। रोज़ की तरह उर्दू का अपना अखबार हाथ में लिए। 

                  यह उन का रोज़ का नियम था। उर्दू की अपनी अखबार की खबरें मुझे सुनाते और अंग्रेज़ी के मेरे अखबार की खबरें मुझ से सुनते।

                 “नहीं,” मैं ने कहा, “हमारे लाहौर के ज़िलाधीश यूस्टेस की कल की प्रेस कांफ्रेंस में दिया गया यह ब्यान ठीक नहीं है। बल्कि यहां तो संपादकीय में साफ़ लिखा गया है कि वह ‘पाकिस्तान’ जो हिंदुओं के लिए ‘अफ़वाह’ मात्र रहा, और वह ‘पाकिस्तान’ जो मुसलमानों के लिए मात्र ‘एक हवाई किला’ रहा, वह ‘पाकिस्तान’ अब एक स्थूल नक्शे के रूप में जल्दी ही प्रकाशित होने वाला है।”

                “लेकिन लाहौर तो अपना ही ‘सौलिड ब्लाक’ है। नहीं क्या?”

                “क्या मालूम?” मैं ने आशंका व्यक्त की, “लाहौर का फ़ैसला दो समूहजन के हाथ में है। हमारी पंजाब असेंबली के गैर- मुस्लिम विधायकों के हाथ में और ब्रिटिश सरकार की बाउंड्री कमीशन के अध्यक्ष रेडक्लिफ़ व उस कमीशन के सदस्यों के हाथ में।”

                “दोनों ही समूह फ़ैसला हमारे हक में देंगे,मुझे यकीन है,” माताबदल उत्तेजित हो लिए, “लाहौर का पूरा व्यवसाय हम हिंदुओं के हाथ में है।”

                “लेकिन यह भी तो ध्यान रखिए, लाहौर शहर में इस समय मुसलमानों की संख्या लगभग साढ़े चार लाख बताई जाती है और हिंदुओं की दो लाख और सिक्खों की अड़सठ हज़ार के करीब।”

                “तुम मुझे सलाह दो,” लाला माताबदल गंभीर हो लिए, “अपना यह ‘पीपल अहाता’ बेच दूं क्या? अपना कारोबार भी लपेट लूं क्या?”

                “मैं क्या कह सकता हूं?” मैं असमंजस में पड़ गया। लाहौर मैं अभी सात महीने पहले ही तो आया था। इस के फ़ौर्मन क्रिश्चियन कालेज में भूगोल के प्रवक्ता की नौकरी मिलने पर। कस्बापुर के मेरे एक पड़ोसी, लाला धनीराम, इन लाला माताबदल के अच्छे मित्र थे और उन्हीं के कहने पर मैं लाला माताबदल के ‘पीपल अहाता’ की ऊपर वाली मंज़िल का एक कमरा किराए पर पा लिया था।

                वह कमरा मुझे नापसंद नहीं था और नीचे से जो खाना मुझे नियमपूर्वक ऊपर भेजा जाता था,वह भी बुरा न रहता था। किंतु इस कमरे में मुझे एकांत न उपलब्ध रहा करता। माताबदल की नौ बेटियां थीं जिन में से सब से बड़ी और सब से छोटी को छोड़ कर बाकी सात बेटियों मे से कोई न कोई दिन में दस बार ऊपर मेरे कमरे का फेरा लगाया करतीं। चार- पांच बार तो अष्टमी या चतुर्दशी,अमावस्या या पूर्णिमा, संक्राति या किसी भी दूसरे पर्व के निष्पादन के प्रसंगाधीन अपने- अपने परेषिती उपांग अथवा परिकलन के साथ अपने- अपने हिस्से का प्रसाद बांटने। मेरे पास आने वाली बेटियों में सब से बड़ी ग्यारह या बारह साल की रही होंगी और सब से छोटी अढ़ाई या तीन साल कीं। लेकिन मुझे सभी एक जैसी लगतीं थीं : चपल, असंतुलित व मतिमंद। शायद वे एक दूसरे का अनुकरण करतीं थीं या शायद अपनी मां का। लाला माताबदल की पत्नी को मैं ने पूरी टिकान में एक बार भी न  देखा था मगर लड़कियों को देखते हुए मुझे यही लगता चोचलहाई अवश्य उन की विशिष्टता रही होगी।

                “नहीं,नहीं,” लाला माताबदल ने अपना दाहिना हाथ मेरे कंधे पर टिका दिया, “अगर मैं अपना यह पीपल अहाता बेचूंगा तो तुम्हारी ही मदद से बेचूंगा। अपना कारोबार लपेटूंगा तो तुम्हारे धनीराम की अगुवाई में लपेटूंगा….”

                लाला माताबदल की तरह मेरे वह पड़ोसी,  लाला धनीराम, भी गल्ला व्यापारी थे और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान सरकार द्वारा खाद्य सामग्री के अधिग्रहण और सीलिंग प्राइस लगा देने से दोनों ही ने मुद्रास्फीति और मुनाफ़ाखोरी में अच्छी चांदी काटी थी। गुप्त रूप से एक दूसरे को सहयोग दे कर।

                “इस समय तो किसी मुस्लिम जानकार से बात करना बेहतर रहेगा,” मैं ने कहा, “आप के गल्ले बाज़ार में कोई मुस्लिम व्यापारी तो होगा ही….”

               “अपना कारोबार तो मैं लाला धनीराम की सलाह के बिना लपेटने वाला नहीं। हां,पीपल अहाते की बिक्री के बारे में बात शुरू की जा सकती है। तुम्हारे कालेज का वह अंग्रेज़ी प्रोफ़ेसर, रफ़ीक अब्बास, कैसा रहेगा? वह अच्छा तबीयतदार लड़का है। हर किसी से पहचान रखता है….”

                रफ़ीक अब्बास को लाला माताबदल मेरे कमरे में कई बार मिल चुके थे।

वह मेरा अच्छा दोस्त था।

               “ठीक है।आज ही मैं उस से बात करता हूं।”

 

                “अहाता तो तुम्हारे गल्लाफ़रोश का खासा बड़ा है। चाहें तो उसे टुकड़ों में बेच लें….”

                “और अपने पीपल अहाते के टुकड़ों की चौहद्दी पर निशान किस से पूछ कर लगाएंगे?” मैं हंसने लगा, “नेहरू से? या जिन्ना से?”

                 लाला माताबदल का वह ‘पीपल अहाता’ उस के पिता लाला मगनलाल ने 1901 में खरीदा था : ब्रिटिश सरकार के एलिएनेशन औव लैंड एक्ट, 1900 के मुताबिक शहर में रहने वाले कारोबारी देहात में ज़मीन नहीं खरीद सकते थे और बहुत से शहरी कारोबारी अब शहरों ही में अपनी जायदाद बनाने लगे थे। उसी का लाभ लाला मगनलाल ने उठाया था। ‘पीपल अहाते’ का अगला भाग गल्ला बाज़ार में खुलता था। उस के साथ सटी एक पूरी ड्योढ़ी थी जिस का पिछवाड़ा एक खुली सड़क को मुंह किए था जहां चार दुकानें रही थीं और ड्योढ़ी के ऐन ऊपर लाला माताबदल की तिमंज़िली रिहाइश थी और ड्योढ़ी के अंदर पांच-छः छोटे- बड़े  मकान। मकान और दुकानें लाला माताबदल ने किराए पर चढ़ा रखे थे।

                “देखते हैं,” रफ़ीक अब्बास भी मेरे संग हंस पड़ा। उस समय हम दोनों में से कोई नहीं जानता था ‘पीपल अहाते’ के रास्ते में पड़ने वाली लाहौर की रेलवे वर्कशाप में उसी दिन बम गिरने वाला था।

              “न,” घर पहुंच कर जब लाला माताबदल से मैं ने रफ़ीक अब्बास का सुझाव दोहराया तो उन्हों ने सिर हिलाकर कहा, “अपने पीपल अहाते को मैं बेचूंगा तो समूचे का समूचा बेचूंगा। टुकड़ों में कतई नहीं….”

 

               “आज का अखबार देखा क्या?” अगली भोर लाला माताबदल की मुद्रा संत्रस्त थी, “कल शाम की आगजनी में बाइस इलाके भस्म हो गए हैं….”

               “अब हम यहां सुरक्षित नहीं।मेरी   अखबार की खबरें भी भली नहीं,” मैं ने कहा, “मैं तो सोच रहा हूं आज ही अपने कस्बापुर के लिए निकल लूं। रेडक्लिफ़ लाहौर को जनसंख्या के आधार पर इसे पाकिस्तान में रख सकता है….”

               “फिर बताओ तुम,” लाला माताबदल अधीर हो उठे, “मैं क्या करूं? मेरे पास मेरा गल्ला है। मेरा अहाता है । मेरा परिवार है और मुझे सभी को बचाना ही बचाना है….”

               “अभी तो आप कुछ भी बेच न पाएंगे,”मैं ने कहा, “हर तरफ़ मार- काट है। खून खराबा है। लूट- डकैती है….”

               “बताओ तुम,” लाला माताबदल कांपने लगे, “तुम क्या कहते हो? है कोई तरीका बचने का? बचाने का? कोई रास्ता? मैं तो कहता हूं, रास्ता अगर टेढ़ा- मेढ़ा भी हो, तो भी मैं उस पर चल लूंगा….”

               “अब सोचना पड़ेगा,” मैं ने कहा, “अगर रफ़ीक अब्बास आज भी मुझे मिलता है तो मैं उसे पूछ देखूंगा….”

 

               “आप घबराइए नहीं,लाला जी,” रफ़ीक अब्बास मेरे साथ लाला माताबदल के घर पहुंच लिया, “आप के ‘पीपल अहाते’ के बाहर और आप की दुकानों के बाहर हम उर्दू में बोर्ड लगा देते हैं, ‘यह मुस्लिम प्रॉपर्टी है’। इधर-उधर घूम रहे बवाली जब बोर्ड पर यह लिखा देखेंगे तो दूसरे रुख चले जांएगे।”

                “मगर यह कैसे हो सकता है,” मैं ने हैरानी जतलाई, “पूरा लाहौर जानता है, वे दुकानें लाला माताबदल की हैं। यह ‘पीपल अहाता’ लाला माताबदल का है….”

               “क्यों नहीं हो सकता?” रफ़ीक अब्बास ने कहा, “एक नए नाम के साथ लाला माताबदल मुस्लिम कौम में शामिल नहीं हो सकते क्या? खुलेआम? ऐलानिया?”

               “नहीं हो सकते,” मैं ने लाला माताबदल की ओर देखा।

               “क्यों नहीं हो सकते?” रफ़ीक अब्बास मुस्कराया, “क्या वह जानते नहीं? जान है, तो जहान है? फिर इधर मसला एक ही जान का नहीं। इन की नौ- नौ बेटियों की जान का भी है। इन की….”

               “एक जान और भी है,” लाला माताबदल तनिक झेंपें, “एक नई जान और आने वाली है। सभी को यकीन है,इस बार बेटा ही आएगा….”

                “फिर तो आगे सोचने की गुंजाइश ही नहीं रही,” रफ़ीक अब्बास ने मानो नए अधिकार प्राप्त कर लिए, “आप का बेटा इसी अहाते में किलकारी भरेगा। इसी पीपल के साए में….”

 

                लाला माताबदल के उस तीसरे या शायद उस आखिरी नामांतर के अंतर्गत रखा गया उनका नया नाम मैं किसी भी तरह जान न पाया।

                अपने सामान के साथ उसी दिन अपने कस्बापुर की दिशा में भाग जो निकला।

                उसी कस्बापुर की दिशा में, जो इतिहास की उस बीसवीं सदी के सैतालीसवें वर्ष के नए भौगोलिक नक्शे की नामचढ़ाई में न कहीं नया दाखिल हुआ और न ही नया खारिज।