Episode 3 - जैसे बरसों पुराने दोस्त हों
दरवाजे पर जो दस्तक थी, वो अब नहीं थी। बाहर बारिश अब तेज नहीं, बस टप-टप गिर रही थी। जैसे आसमान भी थक गया हो अंदर, मिट्टी के घर में चूल्हे की आंच धीमी हो गई थी। राख में अभी भी हल्की सी गरमाहट थी, लाल-लाल अंगारे चमक रहे थे।
अभ्यंकर और सारघा, दोनों जमीन पर ही बैठ गए थे। बीच में दो कुल्हड़ रखे थे, एक आधा खाली, एक पूरा भरा। बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ बारिश की आवाज और चूल्हे की चिट-चिट।
फिर सारघा ने ही चुप्पी तोड़ी।
"आप पुणे में कहाँ रहते हो?"
अभ्यंकर हँसा, "फिर बाबूजी? देखो, मेरा नाम अभ्यंकर है। पर पुणे में सब मुझे अभि कहते हैं। तुम भी अभि कहो"अभि..." सारघा ने धीरे से नाम दोहराया, जैसे नाम को चख रही हो। "अच्छा नाम है। छोटा सा, अपना सा। मैं पुणे कभी नहीं गई। कैसा होता है पुणे?"
"शोर वाला," अभ्यंकर ने कहा। "बहुत शोर। गाड़ियां, लोग, फोन की घंटियां। यहाँ जैसा नहीं। यहाँ... यहाँ सब कुछ सुनाई देता है। बारिश की बूंद, चूल्हे की आग, और तुम्हारी चूड़ियों की आवाज भी सारघा ने अपनी कलाई की तरफ देखा। दो काली-काली चूड़ियाँ, थोड़ी पुरानी।
"माँ की हैं। माँ कहती थी, चूड़ी पहनने से घर में आवाज बनी रहती है, वरना घर एकदम खाली लगता है। जब से वो गईं, मैं ये उतारती ही नहीं।"
"तुम्हारी माँ कहाँ है अब?"
"चली गईं," सारघा ने बहुत आसान तरीके से कहा, जैसे कोई बहुत पुरानी बात हो। "बाबा के जाने के बाद वो भी चली गईं। फिर ये घर, ये चूल्हा, ये दो कुल्हड़... सब मेरा हो गया। पहले लगता था बोझ है, अब लगता है यही तो मेरे अपने हैं।"
अभ्यंकर को लगा जैसे वो इस लड़की को बहुत पहले से जानता हो। पुणे में उसकी कोई ऐसी दोस्त नहीं थी जो इतने आराम से अपनी उदासी बता दे। वहाँ सबको हमेशा हँसना पड़ता था, अच्छा दिखना पड़ता था। यहाँ कोई दिखावा नहीं था।
"तुमने अपना नाम तो बताया ही नहीं।"
सारघा ने आँखें उठा कर देखा। लालटेन की पीली रोशनी में उसकी आँखें भीग रही थीं, पर वो रो नहीं रही थी।
"सारघा।"
"सारघा? मतलब गाँव के नाम पर?"
"हाँ। माँ ने कहा था, गाँव के नाम पर नाम रखूंगी तो गाँव कभी अकेला नहीं छोड़ेगा। पर देखो, गाँव ने ही तो अकेला कर दिया। सब चले गए शहर, मैं ही रह गई।"
अभ्यंकर ने अपना ठंडा हो चुका कुल्हड़ उसकी तरफ बढ़ाया।
"तो आज से मैं भी सारघा का हुआ? आधी चाय तो पी ही ली है मैंने।"
सारघा हँसी। इस बार खुल कर हँसी। उसकी हँसी में वो सारी खालीपन वाली आवाजें भर गईं, जो अब तक घर में गूंज रही थीं।
"आधी चाय से कुछ नहीं होता बाबूजी... सॉरी, अभि। पूरी पीनी पड़ती है। अधूरी चाय से अधूरी ही बातें होती हैं।"
"तो पिला दो पूरी।"
सारघा उठी, उसने चूल्हे में फिर से दो लकड़ियाँ डालीं। आग फिर से जल उठी, पूरे घर में रोशनी फैल गई। उसने छोटे से बर्तन में फिर से पानी डाला, वही गुड़, वही पत्ती।
बनाते हुए वो बोलती जा रही थी, जैसे बरसों से किसी को ये सब बताना चाहती थी और आज कोई सुनने वाला मिल गया हो।
"पता है अभि, मैं रोज शाम को दो कुल्हड़ में चाय बनाती हूँ। एक अपने लिए, एक... पता नहीं किसके लिए। माँ कहती थी, इंतजार की चाय में ज्यादा मीठा डालना, ताकि जो आए, उसे लगे किसी ने दिल से इंतजार किया है। आज तुम आ गए।"
अभ्यंकर का दिल एकदम से धक से हो गया।
"मेरा इंतजार कर रही थी?"
"तुम्हारा नहीं," सारघा ने चाय छानते हुए कहा, "किसी अपने का इंतजार। जो मुझे बाबूजी न कहे, नाम से बुलाए। जो पूछे, तुम अकेली कैसे रह लेती हो?"
उसने दो गरम-गरम कुल्हड़ अभ्यंकर के सामने रखे। धुएं से पूरे घर में मीठी सी महक।
"लो, अब पूरी चाय पियो। और बताओ, पुणे में बारिश में लोग क्या करते हैं?"
"कुछ नहीं," अभ्यंकर ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "छाता ढूंढते हैं, कैब बुक करते हैं। पर यहाँ... यहाँ बारिश में चाय अच्छी लगती है। और बातें भी।"
"तो रुकोगे?"
दोनों एक दूसरे को देखने लगे। बाहर खंडहर हवेली अब डरावनी नहीं लग रही थी। उसकी खिड़की से एक हल्की सी रोशनी आ रही थी, जैसे किसी ने दिया जलाया हो।
अभ्यंकर ने धीरे से कहा, "गाड़ी कल सुबह तक ठीक होगी। तब तक... एक और चाय और चलेगी?"
सारघा ने सिर हिलाया, "चाय तो पूरी रात चलेगी। और बातें भी। पुणे की बातें, सारघा की बातें।"
अभ्यंकर ने कहा, "पुणे में मेरे पास सब कुछ है, फ्लैट, नौकरी, दोस्त। पर ऐसा कोई नहीं जिसके साथ बिना घड़ी देखे बात कर सकूँ।"
सारघा बोली, "मेरे पास घड़ी ही नहीं है अभि। यहाँ समय चाय से चलता है। एक चाय, दो चाय... बस।"
और उस रात, सारघा के उस छोटे से मिट्टी के घर में, दो अनजान लोग बरसों पुराने दोस्तों की तरह बातें करते रहे। न पुणे की कहानी खत्म हो रही थी, न सारघा की। अभ्यंकर ने पुणे के ट्रैफिक की बात बताई, सारघा ने खेतों में उगने वाले फूलों की।
बीच में बस दो कुल्हड़ थे, जो बार-बार भर रहे थे, खाली हो रहे थे।
*ये अधूरे प्यार की कहानी नहीं थी। ये तो पूरे नश-ए-इश्क की शुरुआत थी। वो नशा जो चाय से नहीं, बातों से चढ़ता है।*
--
*by rakshita*
---