Saarghaa - 1 rakshita pal द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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Saarghaa - 1

घमंड का नाम अभ्यंकर था।

पुणे में उसका नाम सुनते ही लोग फोन काट देते थे।

28 साल का। 6 फुट हाइट। सफेद शर्ट, काली पैंट, आंखों पर महंगा चश्मा। 80 लाख की मर्सिडीज। जेब में 3 फोन। और जुबान पर एक ही लाइन - "मुझे गरीबों से बात करने में एलर्जी है।"

अभ्यंकर बिजनेसमैन था, पर बिजनेस से ज्यादा घमंड बेचता था। मीटिंग में अगर कोई लेट आता तो नौकरी से निकाल देता। नौकर अगर पानी लाने में 2 मिनट लेट करता तो गिलास फेंक देता। उसका बाप गरीब था, लोग हंसते थे। तभी से उसने कसम खाई - इतना पैसा कमाऊंगा कि दुनिया मेरे सामने झुकेगी।

पैसा आ गया, पर इज्जत नहीं आई। क्योंकि घमंडी आदमी से कोई प्यार नहीं करता, सिर्फ डरता है।
 कर्नाटक हाईवे। रात 11 बजे। बारिश। और 80 लाख की गाड़ी बीच हाईवे पर बंद।

फोन डेड। नेटवर्क जीरो। चारों तरफ अंधेरा।

तभी उसे बोर्ड दिखा - सारघा 1 KM

उसने सोचा - गांव में जाऊंगा, पैसा फेंकूंगा, कोई भी मदद कर देगा।

रात के 11 बज रहे थे।



अभ्यंकर बैग उठा कर उस कच्चे रास्ते पर चल दिया। कीचड़, अंधेरा, और तेज बारिश में 20 मिनट चलने के बाद वो सारघा गांव के बाहर पहुंचा।

गांव में 6-7 घर थे। सब बंद। कोई रोशनी नहीं।

अभ्यंकर पहले घर के पास गया। दरवाजा लकड़ी का था। उसने खटखटाया।

ठक ठक ठक।

कोई जवाब नहीं।

उसने फिर खटखटाया, थोड़ा तेज। "कोई है? मेरी गाड़ी खराब हो गई है। मदद चाहिए।"

अंदर से कोई आवाज नहीं आई। घर के अंदर अंधेरा था। ऐसा लग रहा था जैसे घर में कोई है ही नहीं।

अभ्यंकर वहां से हट कर दूसरे घर की तरफ गया। ये घर थोड़ा बड़ा था। मिट्टी का घर, पर दीवारों पर पुताई हुई थी। दरवाजे पर तुलसी का पौधा रखा था।

उसने फिर दरवाजा खटखटाना शुरू किया।

ठक ठक ठक।

"कोई है? सुनिए, मदद चाहिए।"

कोई जवाब नहीं।

बारिश तेज हो रही थी। अभ्यंकर का पूरा सूट भीग चुका था। उसे गुस्सा आ रहा था। उसने और जोर से खटखटाया। लगातार।

ठक ठक ठक ठक ठक।

"अरे कोई है क्या अंदर? दरवाजा खोलिए।"

बहुत देर तक खटखटाने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला तो अभ्यंकर ने सोचा अब यहां से चलना चाहिए। शायद गांव में कोई नहीं रहता। वो वापस मुड़ा। जाने के लिए जैसे ही दो कदम आगे बढ़ा...

चरररर...

पीछे से दरवाजा खुलने की आवाज आई।

अभ्यंकर ने पीछे मुड़ कर देखा।

और वहीं खड़ा रह गया।

दरवाजे पर एक लड़की खड़ी थी।

उसने एक पुरानी पर साफ साड़ी पहनी थी। बाल खुले थे, बारिश की वजह से थोड़े भीगे हुए थे। हाथ में एक छोटी सी लालटेन थी। और वो अभ्यंकर को मुस्कुराती हुई देख रही थी। ऊपर से नीचे तक।

एक अजीब सी मुस्कुराहट। ना दोस्ती वाली, ना अजनबी वाली। ऐसी मुस्कुराहट जैसे वो उसे पहचानने की कोशिश कर रही हो।

अभ्यंकर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। लड़की की उम्र 22-23 साल रही होगी। चेहरा गांव जैसा सादा, पर आंखें बड़ी तेज।

अभ्यंकर ने अपना घमंडी वाला लहजा थोड़ा कम करके पूछा, "सुनो, मेरी गाड़ी हाईवे पर बंद हो गई है। क्या यहां मदद मिलेगी? कोई मैकेनिक? या फोन करने के लिए फोन मिलेगा?"

लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस उसके चेहरे को गौर से देख रही थी। बहुत गौर से। जैसे उसके चेहरे पर कुछ पढ़ रही हो। आंखें, नाक, माथा... एक-एक चीज को ध्यान से देख रही थी।

अभ्यंकर को अजीब लगा।

"क्या हुआ? ऐसे क्या देख रही हो?" उसने पूछा।

लड़की कुछ नहीं बोली। बस मुड़ी और घर के अंदर चली गई। लालटेन की रोशनी भी उसके साथ अंदर चली गई। दरवाजा खुला रह गया।

अभ्यंकर को गुस्सा आ गया। पुणे में कोई उसकी बात को इग्नोर नहीं करता था।

"अरे? मैं तुमसे पूछ रहा हूं। क्या मदद मिलेगी?" उसने गुस्से से कहा। आवाज तेज हो गई। "तुम लोग ऐसे ही करते हो? कोई मुसीबत में है और तुम दरवाजा बंद करके चले जाते हो?"

उसकी आवाज सुन कर लड़की अंदर से वापस आई।

इस बार उसके हाथ में कुछ नहीं था। वो खाली हाथ आई। अभ्यंकर को देखा, फिर घर के कोने में रखा एक छोटा सा लकड़ी का स्टूल उठा कर लाई।

और जमीन पर रख कर बैठने का इशारा किया।

कुछ बोली नहीं। बस इशारे से कहा - बैठ जाओ।

अभ्यंकर ने उस स्टूल को देखा। छोटा सा स्टूल, पुराना, पर साफ।

वो समझ नहीं पाया कि लड़की बोल क्यों नहीं रही। मदद करेगी या नहीं, कुछ तो बोले।

पर बारिश तेज थी। खड़े-खड़े भीगने से अच्छा था बैठ जाना। वो धीरे से उस स्टूल पर बैठ गया।

जैसे ही वो बैठा, लड़की वापस अंदर चली गई।

अब अभ्यंकर अकेला बैठा था। दरवाजे के पास। बाहर बारिश हो रही थी, अंदर लालटेन जल रही थी।

उसने ध्यान से उस घर को देखना शुरू किया।

घर छोटा था, पर बहुत साफ सुथरा। जमीन पर चादर बिछी थी। एक तरफ मिट्टी का चूल्हा था, जिसमें अभी भी राख गरम थी। मतलब अभी खाना बना था। एक तरफ स्टील की थाली और दो कुल्हड़ रखे थे। एक कोने में एक छोटी सी खाट थी, जिस पर एक किताब रखी थी। किताब पर धूल नहीं थी।

दीवार पर एक कैलेंडर टंगा था, पर तारीख 2 महीने पुरानी थी। एक तरफ गेंदे के फूलों की माला टंगी थी, जो सूख गई थी।

और खिड़की के पास... एक बड़ा सा काला धब्बा था दीवार पर। जैसे धुएं का धब्बा हो।

अभ्यंकर को सब कुछ अजीब लग रहा था। घर में कोई तो रहता है, पर इतना सन्नाटा क्यों? लड़की अकेली रहती है क्या? बोलती क्यों नहीं?

तभी अंदर से बर्तन गिरने की आवाज आई।

छन्न...

अभ्यंकर ने अंदर की तरफ देखा। लड़की चूल्हे के पास बैठी थी। और उसकी तरफ पीठ करके कुछ कर रही थी।

अभ्यंकर ने सोचा - पूछूं क्या कर रही है?

पर उससे पहले लड़की ने बिना पीछे देखे कहा, पहला शब्द...

"चाय पियोगे?"

आवाज बहुत धीमी थी। पर साफ थी।

अभ्यंकर ने स्टूल पर बैठे-बैठे ही कहा, "हां, चलेगी।"

लड़की ने चूल्हे में लकड़ी डाली। आग जलने लगी। और पूरे घर में धुआं फैलने लगा।

बाहर बारिश और तेज हो गई। और उस धुएं में बैठा अभ्यंकर उस घर को और ध्यान से देखने लगा,