ममता की अंतिम परीक्षा
लेखक: निशा चौधरी
स्पोर्ट्स डे की उस ऐतिहासिक जीत के बाद रोहन और सुनीता का रिश्ता किसी चट्टान की तरह मजबूत हो चुका था। समाज के ताने अब सुनीता के हौसले के सामने पस्त हो चुके थे।
चार साल बीत गए। रोहन अब तेरह साल का हो चुका था और आठवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा था। घर में चारों तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ थीं। इसी बीच राकेश के घर में एक और बड़ी खुशी ने दस्तक दी—सुनीता गर्भवती थी।
पूरे घर में जश्न का माहौल था। राकेश बेहद खुश थे, लेकिन इस खुशी के बीच सुनीता के मन में एक ही बात चल रही थी—रोहन। वह नहीं चाहती थी कि इस मोड़ पर रोहन खुद को अकेला या उपेक्षित महसूस करे।
जब सुनीता ने एक सुंदर सी बेटी को जन्म दिया, तो अस्पताल में सबसे पहले उसने बच्ची को रोहन की गोद में रखा और मुस्कुराते हुए कहा, "देखो रोहन, तुम्हारी छोटी बहन आई है। अब से इसकी रक्षा करने की जिम्मेदारी तुम्हारी है।"
रोहन ने अपनी नन्हीं बहन को बाहों में लिया, तो उसके चेहरे पर एक अलग ही गर्व और खुशी थी। पुराने सारे डर हवा हो चुके थे।
लेकिन किस्मत को शायद इस परिवार की खुशियों की और परीक्षा लेनी थी।
जब बच्ची छह महीने की हुई, तो उसे अचानक सांस लेने में तकलीफ होने लगी। डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि बच्ची के दिल में एक छोटा सा छेद है और उसका जल्द से जल्द एक बड़ा ऑपरेशन कराना होगा।
राकेश की सारी जमा पूंजी सुनीता की डिलीवरी और शुरुआती इलाज में खर्च हो चुकी थी। ऑपरेशन का खर्च बहुत ज्यादा था। राकेश पूरी तरह टूट गए। घर में उदासी का घना अंधेरा छा गया।
एक तरफ रोहन की आगे की पढ़ाई और कोचिंग की फीस के पैसे जमा थे, जो राकेश ने सालों से जोड़कर रखे थे। राकेश ने भारी मन से सुनीता से कहा, "सुनीता, हमारे पास सिर्फ वही पैसे बचे हैं जो हमने रोहन की पढ़ाई और उसके भविष्य के लिए रखे थे। लेकिन अगर वो पैसे यहाँ लगा दिए, तो रोहन का साल और उसका भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।"
सुनीता ने बिना एक पल सोचे राकेश का हाथ थाम लिया और कहा, "नहीं राकेश, रोहन के भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं होगा। वो पैसे सिर्फ रोहन की पढ़ाई के लिए ही इस्तेमाल होंगे।"
"लेकिन फिर बेटी के इलाज का क्या होगा?" राकेश ने तड़पकर पूछा।
सुनीता उठी और अपने कमरे की अलमारी से एक छोटा सा संदूक ले आई। उसने संदूक से अपने शादी के सारे गहने निकाले और राकेश के हाथों में रख दिए।
"ये मेरे स्त्रीधन के गहने हैं। इन्हें बेचकर बेटी का इलाज कराइए," सुनीता ने दृढ़ता से कहा।
राकेश हैरत से सुनीता को देखने लगे, "सुनीता! ये गहने तुम्हारी माँ ने तुम्हें दिए थे, तुम्हारी आखिरी निशानी हैं। तुम इन्हें बेचोगी?"
सुनीता की आँखों में आँसू थे, लेकिन उसकी आवाज में अडिग विश्वास था, "गहने तो फिर बन जाएँगे, लेकिन अगर आज मेरी बेटी को कुछ हो गया या मेरे बेटे का भविष्य बिगड़ गया, तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी। रोहन मेरा बड़ा बेटा है, उसका हक छीनकर मैं अपनी बेटी की जान नहीं बचा सकती।"
दरवाज़े के पीछे खड़ा रोहन यह सब सुन रहा था। उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसने देखा कि कैसे उसकी 'सौतेली माँ' अपनी सगी बेटी की जान बचाने के लिए अपने गहने कुर्बान कर रही थी, सिर्फ इसलिए ताकि उसके सौतेले बेटे की पढ़ाई पर कोई आंच न आए।
रोहन दौड़ता हुआ अंदर आया और सुनीता के पैरों में बैठ गया, "नहीं माँ! आप अपने गहने नहीं बेचोगी! मेरी पढ़ाई एक साल रुक सकती है, मैं पार्ट-टाइम काम कर लूँगा, लेकिन आप ऐसा मत करो!"
सुनीता ने रोहन को उठाकर अपने गले से लगा लिया, "पागल लड़के! माँ कभी अपने बच्चों के बीच फर्क नहीं करती। तुम दोनों मेरी दो आँखें हो। क्या एक आँख बचाने के लिए दूसरी आँख को फोड़ा जा सकता है?"
अगले ही हफ्ते बेटी का सफल ऑपरेशन हुआ। गहने बिक चुके थे, लेकिन परिवार बच गया था।
समय का पहिया घूमा। दस साल बाद, रोहन एक बड़ा सिविल इंजीनियर बन चुका था। उसने अपनी पहली कमाई से सबसे पहले सोने के वही कंगन खरीदे, जो उसकी माँ ने सालों पहले बेचे थे।
जब रोहन ने घर लौटकर वे कंगन सुनीता के हाथों में पहनाए, तो पूरे घर की आँखें नम हो गईं। रोहन ने सबके सामने सुनीता के पैर छुए और कहा, "लोग कहते हैं कि सौतेली माँ का साया बुरा होता है... लेकिन मेरी माँ का साया वो बरगद की छांव है, जिसने मुझे हर तूफान से बचाया है।"
प्यारे पाठकों!
'सौतेली माँ का साया' की यह संपूर्ण कहानी आपको कैसी लगी? क्या सुनीता ने यह साबित नहीं कर दिया कि माँ का दर्जा कोख से नहीं, बल्कि त्याग और निःस्वार्थ प्रेम से मिलता है?
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