स्कूल में नंबर कम आने का डर था, आज जिंदगी में हार जाने का डर है।
उसने यह वाक्य डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा और देर तक उसे देखता रहा।
सामने मेज पर लैपटॉप खुला था। स्क्रीन पर एक ई-मेल था, जिसे वह पिछले आधे घंटे से पढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। असफलता का संदेश नया नहीं था। पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई संदेश उसकी स्क्रीन पर आ चुके थे।
लेकिन हर असफलता के साथ आदमी थोड़ा-सा टूटता नहीं है।
कभी-कभी वह भीतर से इतना खाली हो जाता है कि टूटने की आवाज भी सुनाई नहीं देती।
राघव के साथ भी शायद यही हो रहा था।
बाहर रात थी।
शहर की सड़कों पर गाड़ियाँ दौड़ रही थीं। खिड़की के शीशे पर बारिश की कुछ बूंदें आकर ठहर जातीं और फिर धीरे-धीरे नीचे उतर जातीं।
राघव उन बूंदों को देख रहा था।
उसे लगा—
शायद इंसान भी ऐसा ही होता है।
किसी ऊँचाई से गिरता है, कुछ देर किसी किनारे पर ठहरता है और फिर धीरे-धीरे नीचे चला जाता है।
उसने आँखें बंद कर लीं।
और तभी उसे स्कूल की घंटी सुनाई दी।
टन्… टन्… टन्…
वह घंटी असल में उसके कमरे में नहीं बजी थी।
वह उसके भीतर बजी थी।
वर्षों पहले की एक सुबह अचानक उसके सामने आ खड़ी हुई।
स्कूल का बड़ा-सा मैदान।
सुबह की प्रार्थना।
धूप में खड़े सैकड़ों बच्चे।
सफेद शर्ट।
नीली पैंट।
किसी के जूते पर धूल।
किसी की शर्ट बाहर।
किसी की टाई टेढ़ी।
और किसी के चेहरे पर बिना वजह की मुस्कान।
राघव ने आँखें खोलीं।
सामने वही कमरा था।
लेकिन अब वह चालीस साल का आदमी था।
उसके सामने स्कूल नहीं, जिंदगी थी।
और जिंदगी की परीक्षा में कोई घंटी नहीं बजती थी।
कोई शिक्षक नहीं आता था यह बताने कि अगला प्रश्न क्या है।
कोई दोस्त बगल से फुसफुसाकर उत्तर नहीं बताता था।
और सबसे कठिन बात—
यहाँ असफल होने पर अगली परीक्षा की तारीख भी निश्चित नहीं होती थी।
राघव उठकर कमरे के कोने में रखे पुराने बक्से के पास गया।
कई वर्षों से वह बक्सा वहीं पड़ा था।
उसने ढक्कन खोला।
सबसे ऊपर एक पुरानी स्कूल टाई रखी थी।
उसने उसे उठाया।
टाई पर अब भी स्कूल का छोटा-सा चिन्ह बना हुआ था।
उसने उसे अपनी हथेली पर रखा।
अचानक उसकी आँखों के सामने वह बच्चा आ गया—
पतला-सा शरीर।
चमकती आँखें।
कंधे पर भारी बैग।
माँ की आवाज—
“राघव, टिफिन ले जा।”
पिता की आवाज—
“परीक्षा में इस बार अच्छे नंबर आने चाहिए।”
और वह बच्चा?
वह सोचता था—
“कब बड़ा होऊँगा?”
उसे लगता था कि बड़ा होना आज़ादी है।
उसे क्या पता था कि बड़ा होना कभी-कभी अपने ही सवालों के जवाबों से डरना भी होता है।
बचपन में उसकी सबसे बड़ी चिंता थी—
गणित में कितने नंबर आएँगे?
आज चिंता थी—
अगले महीने घर का खर्च कैसे चलेगा?
तब डर था कि शिक्षक डाँटेंगे।
आज डर था कि कहीं जिंदगी ही उसे नकार न दे।
तब रिपोर्ट कार्ड देखकर दिल धड़कता था।
आज बैंक का संदेश देखकर धड़कता था।
तब एक नंबर कम होने पर लगता था कि सब खत्म हो गया।
आज पूरी मेहनत के बाद भी जब सफलता नहीं मिलती थी, तो लगता था कि शायद वह ही कम पड़ गया है।
राघव ने धीमे से कहा—
“सच कहूं तो… वो डर भी कितना छोटा था।”
उसने बक्से से एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर में चार लड़के थे।
राघव।
अमन।
समीर।
निखिल।
चारों के चेहरे पर ऐसी हँसी थी, जैसे दुनिया में उनसे ज्यादा खुश कोई नहीं।
तस्वीर देखते ही राघव मुस्कुराया।
उसे याद आया—
उनकी दोस्ती में कोई मतलब नहीं था।
कोई गणना नहीं।
किसने कितनी बार चाय पिलाई।
किसने कितनी बार कॉपी दी।
किसने किसके लिए कितना किया।
कुछ भी नहीं।
बस दोस्ती थी।
साफ।
निष्कलंक।
बचपन जैसी।
अगर अमन के पास नया पेन होता तो चारों का होता।
अगर समीर के पास टिफिन में पराठे होते तो चार हिस्से होते।
अगर निखिल को डाँट पड़ती तो तीनों उसके साथ खड़े होते।
और अगर राघव उदास होता, तो कोई पूछता भी नहीं कि क्यों।
बस उसके पास आकर बैठ जाता।
शायद सच्ची दोस्ती की सबसे खूबसूरत बात यही होती है—
वह हमेशा सवाल नहीं पूछती।
कभी-कभी सिर्फ साथ बैठती है।
एक दिन गणित की परीक्षा के परिणाम आए।
राघव के 62 नंबर थे।
उसकी आँखें भर आई थीं।
उसे लगा था जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।
अमन के 91 नंबर थे।
राघव उससे बात नहीं करना चाहता था।
उसे लग रहा था कि अमन उससे आगे निकल गया है।
छुट्टी के बाद अमन उसके पास आया।
“चल।”
राघव ने मुँह फेर लिया।
“कहाँ?”
“क्रिकेट खेलने।”
“मेरे नंबर कम आए हैं।”
“तो?”
“पापा डाँटेंगे।”
“डाँट बाद में खा लेना।”
राघव चुप रहा।
अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“चल ना।”
वह उठ गया।
उस दिन राघव ने क्रिकेट खेला।
शाम को घर जाकर पिता की डाँट भी खाई।
लेकिन रात में सोते समय उसे एक बात समझ आई—
62 नंबर ने उसे दुख दिया था।
लेकिन अमन ने उसे अकेला नहीं रहने दिया था।
आज इतने वर्षों बाद उसे लगा—
इंसान को जीवन में अच्छे नंबरों से ज्यादा अच्छे लोगों की जरूरत होती है।
राघव तस्वीर को देखते-देखते रो पड़ा।
वह रोना दुख का नहीं था।
वह उन दिनों के लौटकर कभी न आने का रोना था।
उसे वार्षिक समारोह याद आया।
पूरा स्कूल सज रहा था।
रंगीन कागज।
गुब्बारे।
फूल।
मंच।
बच्चों की आवाजें।
शिक्षकों की व्यस्तता।
और चार दोस्त—
जो काम करने से ज्यादा काम बिगाड़ने में लगे थे।
एक लंबी कागज की झालर मंच के पीछे लगाई जा रही थी।
समीर ने उसे गलत जगह बाँध दिया।
निखिल ने ठीक करने की कोशिश की।
झालर नीचे आ गिरी।
कुछ सेकंड के लिए चारों चुप रहे।
फिर अमन हँसा।
समीर हँसा।
निखिल हँसा।
और अंत में राघव भी हँस पड़ा।
चारों जमीन पर बैठे हँसते रहे।
इतना हँसे कि आँखों में आँसू आ गए।
उस समय उन्हें नहीं पता था कि जीवन में एक दिन ऐसी हँसी के लिए भी मन तरसेगा।
आज वजहें बहुत थीं।
लेकिन वह हँसी नहीं थी।
नौकरी थी।
तनख्वाह थी।
बैंक बैलेंस था।
मोबाइल था।
सोशल मीडिया पर सैकड़ों लोग थे।
लेकिन उस हँसी का कोई पता नहीं था।
स्कूल की घड़ी कितनी धीमी चलती थी।
एक पीरियड खत्म होने का नाम नहीं लेता था।
और छुट्टी की घंटी?
वह जैसे पूरे दिन का सबसे बड़ा त्योहार होती थी।
तब लगता था—
बस यह स्कूल खत्म हो जाए।
बस बड़े हो जाएँ।
बस अपने फैसले खुद लेने लगें।
किसी ने नहीं बताया था कि एक दिन यही बच्चा अपने पुराने स्कूल के सामने खड़ा होकर सोचेगा—
“काश… एक दिन फिर वही घंटी बज जाए।”
लेकिन समय लौटकर नहीं आता।
वह केवल यादों में आता है।
राघव ने उसी रात अपने दोस्तों के नंबर खोजे।
अमन का नंबर मिल गया।
उसने फोन किया।
फोन बंद था।
समीर को फोन किया।
घंटी गई।
“हेलो?”
आवाज सुनते ही राघव चुप हो गया।
“हेलो? कौन?”
“समीर…”
दूसरी तरफ कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर अचानक आवाज आई—
“राघव?”
राघव ने आँखें बंद कर लीं।
“हाँ।”
“अबे! तू कहाँ था?”
राघव के पास इस सवाल का कोई उत्तर नहीं था।
वह कहाँ था?
शायद नौकरी के पीछे।
शायद पैसे के पीछे।
शायद सफलता के पीछे।
शायद उस जिंदगी के पीछे जिसे पाने की जल्दी में उसने वह जिंदगी खो दी थी, जिसमें वह कभी सचमुच खुश था।
समीर ने पूछा—
“सब ठीक है?”
राघव ने पहली बार सच कहा—
“नहीं।”
और वर्षों से भीतर जमा हुआ सब कुछ बह निकला।
समीर ने कोई सलाह नहीं दी।
कोई भाषण नहीं दिया।
सिर्फ इतना कहा—
“कल स्कूल चल।”
अगले दिन चारों दोस्त स्कूल के बाहर मिले।
निखिल पहले से वहाँ था।
अमन कुछ देर बाद आया।
चारों एक-दूसरे को देखते रहे।
किसी को समझ नहीं आया कि क्या कहें।
आखिर निखिल ने कहा—
“अबे, सब बूढ़े हो गए।”
समीर ने तुरंत जवाब दिया—
“तू तो स्कूल में भी बूढ़ा लगता था।”
चारों हँस पड़े।
और उसी क्षण जैसे वर्षों की दूरी टूट गई।
वे स्कूल के मैदान में गए।
वही मैदान।
जहाँ कभी वे दौड़े थे।
गिरे थे।
लड़े थे।
जीते थे।
हारे थे।
आज मैदान छोटा लग रहा था।
राघव ने कहा—
“यह मैदान इतना छोटा कब हो गया?”
अमन ने उसकी ओर देखा।
“मैदान छोटा नहीं हुआ।”
“फिर?”
“हम बड़े हो गए।”
कुछ देर चारों चुप रहे।
निखिल ने धीरे से कहा—
“काश, बड़े होने से पहले कोई बता देता कि बचपन कितना कीमती है।”
राघव की आँखें भर आईं।
उन्होंने पुरानी बेंच ढूँढ़ ली।
चारों वहीं बैठ गए।
कुछ देर बाद राघव ने कहा—
“तुम्हें याद है? मुझे 62 नंबर मिले थे।”
समीर हँसा।
“और तूने कहा था कि जिंदगी खत्म हो गई।”
राघव भी हँसा।
“आज सोचता हूँ… कितना मूर्ख था।”
अमन ने कहा—
“हम सब थे।”
“क्यों?”
“क्योंकि हमें लगता था कि एक परीक्षा जिंदगी तय करेगी।”
निखिल ने उसकी बात पूरी की—
“और अब हमें लगता है कि एक असफलता जिंदगी खत्म कर देगी।”
राघव चुप हो गया।
निखिल ने उसकी ओर देखा।
“राघव, तू स्कूल में कितनी बार हारा था?”
“बहुत बार।”
“फिर?”
“फिर कोशिश की।”
“तो अब क्यों नहीं?”
राघव के पास उत्तर नहीं था।
समीर ने उसका कंधा पकड़ लिया।
“याद है मैं दौड़ में गिरा था?”
“हाँ।”
“मैं दौड़ हार गया था।”
“हाँ।”
“लेकिन क्या मैंने दौड़ना छोड़ दिया था?”
राघव ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
समीर मुस्कुराया।
“तो फिर तू नौकरी हार गया, व्यापार हार गया, एक मौका हार गया… लेकिन जिंदगी कैसे हार गया?”
राघव ने पहली बार महसूस किया कि शायद वह अपनी असफलताओं को अपनी पहचान बना चुका था।
उसे लगा था—
मैं असफल हूँ।
लेकिन शायद सच यह था—
वह सिर्फ असफल हुआ था।
दोनों बातें अलग थीं।
बहुत अलग।
उस दिन चारों ने मैदान में क्रिकेट खेला।
उम्र शरीर में उतर चुकी थी।
पहली गेंद पर राघव दौड़ा और दस कदम बाद ही हाँफने लगा।
निखिल चिल्लाया—
“भाग! रन पूरा कर!”
राघव बोला—
“मेरी उम्र देख!”
समीर हँसते हुए बोला—
“उम्र नहीं, दोस्ती देख!”
राघव फिर दौड़ा।
चारों हँस रहे थे।
वही पुरानी हँसी।
बिना वजह।
बिल्कुल वैसी ही।
उस शाम घर लौटते समय राघव को लगा कि उसके पास अभी भी सब कुछ नहीं था।
उसकी समस्याएँ खत्म नहीं हुई थीं।
कर्ज अभी भी था।
नौकरी अभी भी अनिश्चित थी।
भविष्य अभी भी धुंधला था।
लेकिन उसके भीतर एक छोटी-सी रोशनी जल गई थी।
उसे समझ आ गया था—
जिंदगी की परीक्षा में पास होने के लिए हर सवाल का उत्तर पहले से जानना जरूरी नहीं।
कभी-कभी सिर्फ इतना जरूरी होता है कि प्रश्नपत्र हाथ से न छोड़ें।
उस रात उसने लैपटॉप खोला।
वही असफलता वाला ई-मेल सामने था।
उसने उसे बंद कर दिया।
नई फाइल खोली।
ऊपर लिखा—
“फिर से।”
अगले दिन उसने नौकरी के लिए आवेदन किया।
फिर एक और।
फिर तीसरा।
कुछ जगह से जवाब नहीं आया।
कुछ जगह से मना कर दिया गया।
लेकिन इस बार उसने हर असफलता के बाद अपने दोस्तों को फोन किया।
कभी वे उसे हँसाते।
कभी चुपचाप सुनते।
कभी कहते—
“चल, मिलते हैं।”
और धीरे-धीरे राघव फिर खड़ा होने लगा।
उसे कोई चमत्कार नहीं मिला।
जिंदगी अचानक आसान नहीं हुई।
लेकिन उसका नजरिया बदल गया।
कुछ महीनों बाद उसे एक छोटी नौकरी मिली।
वेतन कम था।
पद छोटा था।
लेकिन पहली तनख्वाह हाथ में लेकर वह देर तक उसे देखता रहा।
फिर उसने सबसे पहले अमन को फोन किया।
“मिल गई।”
अमन ने पूछा—
“क्या?”
“नौकरी।”
“बधाई!”
राघव हँसा।
“बहुत बड़ी नहीं है।”
अमन ने कहा—
“हमारे लिए बड़ी है।”
उस रात राघव ने अपनी माँ की पुरानी तस्वीर के सामने पहली तनख्वाह रखी।
उसकी आँखों से आँसू निकल आए।
उसे याद आया—
बचपन में माँ कहती थी—
“बेटा, नंबर कम आएँ तो कोई बात नहीं, बस कोशिश करना मत छोड़ना।”
तब उसे लगता था कि माँ सिर्फ परीक्षा की बात कर रही है।
आज समझ आया—
माँ जिंदगी की बात कर रही थी।
कई साल पहले माँ चली गई थी।
उनकी आवाज अब घर में नहीं थी।
लेकिन उस रात राघव को लगा जैसे वही आवाज फिर सुनाई दी—
“बेटा… बस कोशिश करना मत छोड़ना।”
उसने सिर झुका दिया।
आँसू उसकी हथेली पर गिरते रहे।
कुछ रिश्ते शरीर के चले जाने के बाद खत्म नहीं होते।
वे आवाज बनकर भीतर रह जाते हैं।
राघव ने डायरी खोली।
लिखा—
“आज मुझे नौकरी मिली है।
बहुत बड़ी नहीं।
लेकिन माँ होतीं तो शायद कहतीं—
मुझे तुम पर गर्व है।
क्योंकि जीत बड़ी नहीं होती।
कभी-कभी कोशिश ही सबसे बड़ी जीत होती है।”
कुछ वर्षों बाद राघव अपने बेटे के साथ उसी स्कूल के सामने खड़ा था।
बेटे के हाथ में गणित की उत्तर-पुस्तिका थी।
उसके 58 नंबर आए थे।
उसकी आँखें झुकी हुई थीं।
“पापा…”
“हाँ?”
“मैं हार गया।”
राघव ने उसके हाथ से कॉपी ली।
फिर उसके सामने बैठ गया।
“किसने कहा?”
“मेरे नंबर कम आए।”
राघव मुस्कुराया।
“तुम परीक्षा में हारे हो। जिंदगी में नहीं।”
बेटे ने उसकी ओर देखा।
“फर्क क्या है?”
राघव ने उसका सिर सहलाया।
“बहुत बड़ा फर्क है।”
फिर वह उसे स्कूल के मैदान में ले गया।
उसी बेंच के पास।
जहाँ कुछ वर्ष पहले चार बूढ़े लड़के फिर से बच्चे बन गए थे।
राघव ने कहा—
“यहाँ कभी मैं बैठा करता था।”
“आप?”
“हाँ।”
“आप भी डरते थे?”
राघव हँसा।
“बहुत।”
“किससे?”
“कम नंबरों से।”
“और अब?”
राघव ने दूर आसमान की ओर देखा।
“अब जिंदगी से।”
बेटे ने पूछा—
“जिंदगी से डर क्यों लगता है?”
राघव ने कुछ क्षण सोचा।
“क्योंकि जिंदगी में कभी-कभी हम बहुत मेहनत करते हैं और फिर भी हार जाते हैं।”
बेटा चुप रहा।
“फिर क्या करना चाहिए?”
राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“फिर अगली कोशिश करनी चाहिए।”
“अगर उसमें भी हार गए?”
“फिर अगली।”
“अगर बार-बार हार गए?”
राघव की आँखें नम हो गईं।
“तो बार-बार उठना चाहिए।”
बेटा मुस्कुराया।
“आप मेरे साथ रहोगे?”
राघव ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
“जब तक मैं हूँ।”
उस क्षण राघव को लगा—
शायद यही जिंदगी है।
हम अपने बच्चों को वह सब देना चाहते हैं, जो हमें नहीं मिला।
लेकिन सबसे बड़ी चीज जो हम उन्हें दे सकते हैं, वह है—
हार के बाद उठने का साहस।
बेटे के जाने के बाद राघव कुछ देर अकेला स्कूल के मैदान में बैठा रहा।
शाम उतर रही थी।
मैदान में अब बच्चे नहीं थे।
हवा में पेड़ों की पत्तियाँ सरसराती थीं।
कहीं दूर से स्कूल की घंटी की हल्की आवाज आई।
राघव ने आँखें बंद कर लीं।
उसे लगा जैसे वह फिर वही बच्चा है।
कंधे पर बैग है।
हाथ में टिफिन है।
माँ दरवाजे पर खड़ी है।
दोस्त मैदान में उसका इंतजार कर रहे हैं।
अमन पुकार रहा है—
“चल!”
समीर कह रहा है—
“दौड़!”
निखिल हँस रहा है—
“आज फिर देर से आया!”
और वह बच्चा दौड़ रहा है।
बिना यह जाने कि एक दिन वह इन दिनों को याद करके रोएगा।
राघव ने आँखें खोलीं।
सामने खाली मैदान था।
दोस्त जा चुके थे।
बचपन जा चुका था।
माँ नहीं थीं।
स्कूल की पुरानी दीवारों पर नया रंग चढ़ चुका था।
लेकिन कुछ चीजें अब भी वैसी थीं।
हवा।
घंटी की आवाज।
यादें।
और उसके भीतर बैठा वह बच्चा।
उसने डायरी निकाली।
आखिरी पन्ने पर लिखा—
“स्कूल में नंबर कम आने का डर था, आज जिंदगी में हार जाने का डर है।
सच कहूं तो, वो डर भी कितना छोटा था।
तब लगता था कि एक परीक्षा का परिणाम जिंदगी तय करेगा।
आज समझ आया है कि जिंदगी किसी एक परिणाम का नाम नहीं।
यह उन हजारों छोटी-बड़ी कोशिशों का नाम है, जिन्हें हम हारने के बाद भी करते रहते हैं।
तब दोस्ती का मतलब था—एक टिफिन चार लोगों में बाँटना।
आज दोस्ती का मतलब समझ आया है—एक टूटे हुए इंसान के पास बिना कुछ पूछे बैठ जाना।
तब स्कूल की घड़ी धीरे चलती थी।
आज वक्त भाग रहा है।
तब बड़े होने की जल्दी थी।
आज बचपन में लौटने की ख्वाहिश है।
लेकिन अब समझ आया है—
बचपन में लौटना संभव नहीं।
हाँ, बचपन को अपने भीतर बचाकर रखना संभव है।
उस बच्चे को मरने मत देना जो बिना वजह हँसता था।
उस दोस्त को खोने मत देना जो तुम्हारे आँसू देखकर चुपचाप पास बैठ जाता था।
उस माँ की आवाज को भूलना मत, जो कहती थी—
‘बस कोशिश करना मत छोड़ना।’
और जब जिंदगी तुम्हें बार-बार हराए, तो एक बार अपने पुराने स्कूल की ओर देख लेना।
शायद वहाँ कोई बच्चा अब भी दौड़ रहा होगा।
शायद वह गिरा होगा।
शायद उसके घुटने से खून निकल रहा होगा।
लेकिन उसके दोस्त उसे उठाने दौड़ रहे होंगे।
और वह फिर दौड़ेगा।
क्योंकि बच्चों को हार का अर्थ नहीं पता होता।
वे सिर्फ इतना जानते हैं—
दौड़ खत्म होने से पहले रुकना नहीं है।
शायद बड़े होकर हम यही भूल जाते हैं।”
राघव ने डायरी बंद कर दी।
आँखों से दो आँसू उसके गाल पर उतर आए।
उसने उन्हें पोंछा नहीं।
कुछ आँसू पोंछने के लिए नहीं होते।
वे उन दिनों के लिए होते हैं जो वापस नहीं आएँगे।
उन लोगों के लिए होते हैं जो अब साथ नहीं हैं।
उन हँसियों के लिए होते हैं जिन्हें हम समय की दौड़ में पीछे छोड़ आए।
और उन सपनों के लिए होते हैं, जिन्हें हमने बड़ा होने की जल्दी में कहीं रखकर भूल दिया।
राघव उठकर स्कूल के गेट की ओर चल पड़ा।
कुछ कदम बाद उसने पीछे मुड़कर देखा।
मैदान खाली था।
लेकिन उसे फिर भी लगा—
वहाँ चार बच्चे खड़े हैं।
अमन।
समीर।
निखिल।
और वह खुद।
चारों हँस रहे हैं।
बिना वजह।
बिल्कुल उसी तरह जैसे कभी हँसा करते थे।
राघव ने मुस्कुराकर आँखें बंद कीं।
और पहली बार उसे लगा—
बचपन बीता नहीं है।
वह बस हमारी स्मृतियों में बैठकर हमारा इंतजार कर रहा है।
जब जिंदगी बहुत भारी हो जाए, वह धीरे से आवाज देता है—
“चल… थोड़ा हँस लेते हैं।”
और शायद यही जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य है—
हम बड़े होते-होते बहुत कुछ पा लेते हैं, लेकिन जिस हँसी को खो देते हैं, उसे पाने के लिए पूरी जिंदगी तरसते रहते हैं।
इसलिए अगर आपके पास आज भी कोई ऐसा दोस्त है, जिसके साथ आप बिना वजह हँस सकते हैं—
तो उसे संभालकर रखिए।
क्योंकि बैंक में जमा पैसा कभी न कभी खत्म हो सकता है।
सफलता कभी न कभी छिन सकती है।
पद, प्रतिष्ठा और उपलब्धियाँ समय के साथ धुंधली पड़ सकती हैं।
लेकिन बचपन की एक सच्ची दोस्ती…
कभी बूढ़ी नहीं होती।
और जब जीवन की आखिरी परीक्षा सामने आती है, तब शायद हमें अपने प्रमाणपत्र, अपने अंक, अपनी उपलब्धियाँ कुछ भी याद नहीं रहता।
याद रहता है—
किसने हमारा हाथ पकड़ा था।
किसने हमारे गिरने पर हमें उठाया था।
किसने हमारे आँसू देखकर कहा था—
“रो मत… मैं हूँ।”
और शायद उस दिन हमें समझ आता है—
स्कूल में नंबर कम आने का डर सचमुच बहुत छोटा था।
जिंदगी की असली जीत अच्छे नंबर नहीं, बल्कि ऐसे लोग हैं जिनके सामने हारकर भी हम खुद को हारा हुआ महसूस नहीं करते।
क्योंकि जिंदगी में हारना उतना डरावना नहीं है…
जितना उन लोगों को खो देना, जिनके साथ हम बिना वजह हँस सकते थे।