पिता जी - भाग 1 Nisha Choudhary द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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पिता जी - भाग 1

शाम के ढलते ही जब आँगन में पुरानी साइकिल की वही जानी-पहचानी चैन की आवाज़ गूँजती, तो पूरे घर को बिना घड़ी देखे पता चल जाता कि पिता जी घर लौट आए हैं। रामेश्वर जी एक छोटे से कस्बे के दफ़्तर में क्लर्क की मामूली सी नौकरी करते थे। दिन भर की कड़ी धूप, काम का मानसिक तनाव और चेहरे पर पसीने की बूंदें... लेकिन घर के दरवाज़े पर कदम रखते ही उनके चेहरे पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान आ जाती, मानो दिन भर की सारी थकान पल भर में गायब हो गई हो। वे अपने हर दर्द को दरवाज़े के बाहर ही छोड़ आते थे ताकि घर के अंदर सिर्फ खुशियाँ प्रवेश कर सकें।
रामेश्वर जी का अपना जीवन बहुत सादगी भरा था। वे सालों से एक ही पुरानी साइकिल चला रहे थे, जिसकी रंग-रंगत तक उड़ चुकी थी। उनके कपड़े सादे थे और ज़रूरतें बहुत कम। लेकिन उनकी आँखों में अपनी इकलौती बेटी रोशनी के लिए बहुत बड़े-बड़े सपने थे। रोशनी बचपन से ही पढ़ाई में बेहद होशियार थी और उसका एक ही सपना था—एक काबिल डॉक्टर बनकर गरीबों का इलाज करना। रामेश्वर जी हमेशा रोशनी से कहते थे, "बेटा, सपने देखने से कभी मत डरना, उन्हें पूरा करने के लिए तेरे पिता जी हमेशा तेरे साथ हैं।"
एक दिन जब रोशनी बारहवीं कक्षा में पहुँची, तो शहर के एक प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान से ऑल इंडिया मेडिकल एंट्रेंस एग्ज़ाम की तैयारी के लिए फीस का नोटिस आया। जब रोशनी ने उस कागज़ पर लिखी फीस की रकम देखी, तो उसके हाथ कांप गए। वह रकम इतनी बड़ी थी कि रामेश्वर जी की कई महीनों की पूरी तनख्वाह मिलाकर भी पूरी नहीं हो सकती थी। रोशनी के चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। उसने भारी दिल से पिता जी के चेहरे पर उभरती चिंता की लकीरों को देखा।
रोशनी ने धीरे से पिता जी के पास जाकर कागज़ उनके हाथ में थमाया और उदास आवाज़ में कहा, "पिता जी, अगर यह फीस बहुत ज़्यादा है तो कोई बात नहीं... मैं डॉक्टर बनने का ख्याल छोड़ देती हूँ। मैं गाँव के ही किसी सामान्य कॉलेज से बी.एससी. कर लूँगी। डॉक्टर बनना ही सब कुछ तो नहीं होता।"
रामेश्वर जी ने रोशनी की आँखों में छुपी उस निराशा को देख लिया। उन्होंने कागज़ को मेज़ पर रखा, रोशनी के सिर पर बहुत प्यार से हाथ फेरा और मुस्कुराते हुए बोले, "बेटा, तू बस अपने सपनों पर ध्यान दे और अपनी पढ़ाई में कोई कमी मत आने दे। फीस का इंतज़ाम कैसे करना है, यह सोचने के लिए तेरे पिता जी अभी ज़िंदा हैं। जब तक मेरा साया तेरे सिर पर है, तुझे अपने कदम पीछे खींचने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।"
रोशनी को उस समय यह अंदाज़ा भी नहीं था कि उस रात के बाद पिता जी ने उसके सपने को पूरा करने के लिए अपनी कौन सी कुर्बानियों की शुरुआत कर दी थी। रामेश्वर जी ने उस रात अपनी सबसे कीमती पुरानी घड़ी, अपनी सालों की बची-कुची बचत दांव पर लगा दी, और साथ ही अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों पर भी पाबंदी लगा दी ताकि रोशनी की पढ़ाई में कोई बाधा न आए।
(आगे क्या हुआ, रोशनी का सपना कैसे पूरा हुआ... जानने के लिए पढ़ें कल आने वाला अगला भाग!)

✍️ क्या आपके पिता जी ने भी आपके सपनों के लिए कभी कोई त्याग किया है? कमेंट में अपने पिता जी के लिए एक प्यारा सा संदेश ज़रूर लिखें!
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