पूर्णिमा का नशा Manoj yadav द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

पूर्णिमा का नशा

वो पूर्णिमा की रात थी। चाँद कुछ ज़्यादा ही पास लग रहा था। आसमान भी बिल्कुल साफ़ था—जैसे किसी ने उसको धोकर रख दिया हो। मैं बालकनी में बैठा था न जाने कितनी देर से। उसकी "हाँ" और "ना" के बीच अटका हुआ।

उँगलियों के बीच सुलगता धुआँ, धीरे-धीरे हवा में घुल चुका था।
एक तरफ नशा था— जो रगों में चढ़ कर, हर सोच को नरम कर रहा था। दूसरी तरफ वो थी—मेरे इतने करीब कि दूरी का एहसास और तेज़ हो रहा था।

मुझे लगा, वो कुछ कहने वाली है। पर वो एक पल के लिए रुकी... जैसे कुछ सोच रही हो, फिर धीरे से मेरे सामने आ कर बैठ गई। "तुम समझते क्यों नहीं—ये संभव नहीं है," उसने धीरे से कहा। उसके होंठ मना कर रहे थे, पर आँखें हाँ बोल रही थीं।
उस एक नज़र में जो था, वो किसी भी जवाब से ज़्यादा सच लग रहा था।

मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसका हाथ थाम लेना चाहता था। पर उसी पल... हवा का स्वाद बदल गया। जैसे उसमें कोई मीठी सी कड़वाहट घुल गई हो। मैंने एक गहरी साँस ली... पर अंदर सिर्फ धुआँ ही गया।

ऊपर आसमान में हल्का सा कंपन हुआ।
पहली आवाज़ तब आई।
"यह मिलन नियम के विरुद्ध है।"
मैंने सर उठाया। इंद्र खड़े थे—वैसे ही जैसे ग्रंथों में पढ़े थे। वज्र हाथ में, आँखों में गुस्सा नहीं... फैसला था।

कितना अजीब था। अगर हम दोनों बस दो इंसान होते, शायद किसी को कोई ऐतराज़ नहीं होता। पर उसका दूसरी दुनिया का होना... और मेरा यहाँ का... जैसे कुदरत ने हमारे बीच पहले ही एक दीवार खड़ी कर रखी थी। औकात की दीवार।

इंद्र के आस-पास और भी चेहरे उभर रहे थे—तेज, कठोर और निश्चित। "अलग हो जाओ," वरुण देव की आवाज़ गहरी थी—पर उसमें लहरों का शोर नहीं, बल्कि वो सन्नाटा था जहाँ सब कुछ डूब जाता है।

एक खौफ की लहर सी दौड़ गई उसके बदन में। वो मेरे और करीब खिसक आई। साँसें गर्म थीं उसकी, ज़रूरत से ज़्यादा।
मैंने अपनी उँगलियाँ उसकी उँगलियों में फँसा दीं। धीरे से। आज पीछे नहीं हटना था। किसी फैसले का डर नहीं था अब।

"अंतिम बार कह रहे हैं," इंद्र ने कदम बढ़ाया।
पर मेरी आँखों में... ना संकोच था
ना डर। जिन्हें देख इंद्र ने वज्र पर हाथ कसा।

फिर क्या... आसमान फट गया।
बिजली नीचे उतर आई—इस बार सीधी। ज़मीन पर कुछ गिरा। शायद मेरा फोन। स्क्रीन जल कर बुझ गई।

उसके बाद सब कुछ एक पल के लिए ठहर सा गया। मंत्र गूँजे—पर आवाज़ें सिर्फ बाहर से नहीं आ रही थीं। कोई दरवाज़ा भी पीट रहा था शायद। पर मुझसे हिला भी नहीं गया।

एक धुंध सी आ गई चारों तरफ। नीली बर्फ सी - जैसे हवा में कोई ठंडक तैर रही हो। साँस लेना तक मुश्किल हो गया।
पर अब भी एक उम्मीद ने मुझे थाम रखा था।
जानता था, अगर वो सिर्फ एक बार मेरा हाथ पकड़ कर कह दे कुदरत से - कि मैं उसके लायक हूँ। तो वो प्रवेश-द्वार खुल जाएगा। जिसका डर देवताओं को यहाँ तक खींच लाया था।

तभी किसी ने ज़ोर से आवाज़ दी।
"भाई… क्या कर रहा है?"
"गेट खोल"
पर कैसे खोलता प्रवेश-द्वार? ये मेरे हाथ में नहीं था। इंसान ये नहीं कर सकते। जो कर सकती थी वो दुनिया के डर से मोम की गुड़िया बन चुकी थी।

एक-एक पल भारी हो गया। हिम्मत टूटने लगी। कब तक लड़ता ये इकतरफा लड़ाई। अब तो शरीर भी साथ छोड़ने लगा। पलकें बंद होने लगीं। मुझे मेरा अंत नज़दीक दिख गया।

आँखें शायद मुँद भी गई थीं कुछ देर के लिए। पर जब होश आया तो वो पास बैठी थी।
उसका हाथ मेरी छाती पर था।

उस एक स्पर्श में सब कुछ बदलने लगा। लोगों की आवाज़ें खिंच कर लंबी होने लगीं। आसमान में चेहरे टेढ़े होने लगे। समय रुका नहीं था, पर सीधा चलना छोड़ रहा था।

बस प्रवेश-द्वार कहीं नज़र नहीं आ रहा था।

ये सब समझना बहुत मुश्किल था। कैसे मेरी छाती पर उसका वो हाथ मुझे मेरा लगने लगा। गर्म। ज़िंदा। दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो गई कि बाकी सब पीछे छूटने लगा।
शायद जो मैं बाहर ढूँढ रहा था वो मेरे अंदर खुलने लगा।

देवता अब उग्र हो गए।
मंत्र तेज़ होते जा रहे थे, पर मुझ तक पहुँचते-पहुँचते धीमे पड़ जाते। जैसे समय उनका साथ छोड़ रहा हो।
इंद्र ने पहली बार ठहर कर देखा। वज्र हाथ में था, पर कदम रुक गए थे। उनकी आँखों में प्रश्न था—यह कैसे?

"कोई फोन लगाओ उसको?"
"अरे यार.... स्विच ऑफ आ रहा है"
आवाज़ें करीब थीं… बिल्कुल पास।
मैंने मुड़ कर देखा। कोई नहीं था। बस धुआँ था—गहरा, चिपकता हुआ।

जल्द ही देवता समझ गए जो मुझे तब तक समझ नहीं आया था। जब भी वो एक कदम मेरी तरफ बढ़ाती।
तो उस एक कदम के साथ… सब कुछ और धीमा पड़ जाता। आवाज़ें लंबी हो कर टूटने लगतीं। मंत्र अधूरे रह जाते। सब कुछ खिंच जाता।

उस लम्हे मुझे महसूस हुआ— मैं उसके पास नहीं जा रहा। वक्त खुद सिमट कर मेरे पास आ रहा है। काल का घमंड… जो अब तक हर चीज़ पर भारी था…टूट गया। जैसे किसी ने उसे याद दिला दिया हो कि वो भी सीमित है।

वो अब बिल्कुल पास थी—उसकी मौजूदगी इतनी करीब कि बीच की जगह खत्म सी हो गई। उसने अपना माथा मेरे माथे से लगा दिया। एक तेज़ आँच सी अंदर उतरने लगी। जैसे बदन अपनी हद भूल कर एहसास बन गया हो।
दर्द नहीं हुआ। पर कुछ पिघला… जैसे अंदर जमा हुआ कुछ बहने लगा हो। मेरा बदन अपने आप ऊपर उठने लगा।

"रुको!" ऊपर से आवाज़ आई—तेज़, और बेचैन।
लेकिन अब देर हो चुकी थी।
हम एक हो रहे थे… या शायद मैं ही उसे अपने अंदर समेट रहा था।

आसमान का रंग बदलने लगा। तेज़ सफेद से गहरा लाल। फिर काला। फिर कुछ बीच का, जिसका नाम नहीं होता।

"शरीर… एक हो चुके—"
"कहीं रूह भी—" किसी ने घबरा कर कहा।
"रोको इन्हें" दूसरी आवाज़ आई।
पर कैसे रोकते?
ऐसे रोकना अब मेरे या उनके हाथ में नहीं था।

एक पल के लिए मुझे लगा मैं दो जगह हूँ—एक यहाँ, उनके साथ… और एक वहाँ, जहाँ लोग दरवाज़ा तोड़ रहे थे।
"किसी पर हथौड़ा है क्या?"
"जल्दी दरवाज़ा तोड़ो"

इंद्र रुक गए।
उन्होंने आसमान की तरफ देखा… फिर मुझे।
पहली बार उनकी आँखों में डर था।
"यह… गलत है, मैं ऐसा कैसे होने दे सकता हूँ?" उन्होंने धीरे से कहा। नारद की हल्की सी हँसी गूँज उठी।
"नाग का ज़हर पीने वाले पर बिच्छू का डंक असर नहीं करता, इंद्र…"
सब चुप हो गए।
जैसे किसी ने सच बोल दिया हो।

पहली बार मुझे लगा... शायद मैं कभी इतना कमज़ोर नहीं था जितना दुनिया ने मुझे एहसास करवाया था।
मैंने उसका हाथ और कस लिया। खुद को पूरा समर्पित कर दिया। अब कोई डर नहीं था।
सिर्फ एक जुनून।
जैसे मैं वही बन रहा था जो हमेशा से था।

आसमान धीरे-धीरे साफ़ होने लगा।
आवाज़ें कम हो गईं।
देवता पीछे हटने लगे।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
जैसे फैसला हो चुका हो।
मेरी भारी पलकें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।
और पूर्णिमा की वो रात ढल गई।

सीधा सुबह मैंने आँखें खोलीं।
मैं ज़मीन पर था।
फोन साइड में पड़ा था—स्क्रीन टूटी हुई।

दरवाज़ा टूट चुका था।
बालकनी में लोग खड़े थे।
"ये सब कैसे हुआ?"
"तू अंदर किस से बात कर रहा था?"

क्या बोलता? कैसे समझाता उन्हें, जिनकी नज़र में मैं बस एक नशेड़ी था?

मैंने धीरे से अपनी छाती पर हाथ रखा।
वहाँ अब भी हल्की गर्माहट थी।
जैसे कोई हाथ अभी-अभी हटा हो।

"तू ठीक है ना?" किसी ने पूछा।
मैं बस मुस्कुरा दिया।
क्योंकि जानता था कि…
अब शायद मौत ही मुझे उससे अलग कर सकती है।