पंचब्रह्मोषनिषद GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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पंचब्रह्मोषनिषद

---- : पञ्चब्रह्मोपनिषद्:---पञ्चब्रह्मोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध शैव उपनिषद् है। इसमें भगवान् शिव के पाँच ब्रह्मस्वरूप—सद्योजात, अघोर, वामदेव, तत्पुरुष और ईशान—का निरूपण किया गया है और अन्ततः इन्हीं पाँच ---- : पञ्चब्रह्मोपनिषद्:---पञ्चब्रह्मोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध शैव उपनिषद् है। इसमें भगवान् शिव के पाँच ब्रह्मस्वरूप—सद्योजात, अघोर, वामदेव, तत्पुरुष और ईशान—का निरूपण किया गया है और अन्ततः इन्हीं पाँच रूपों के आधारभूत अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है। उपलब्ध पाठ में श्लोकों की संख्या विभिन्न संस्करणों में कुछ भिन्न मिलती है।नीचे मैं मूल संस्कृत श्लोक और सरल हिन्दी अर्थ क्रम से दे रहा हूँ। ॥ पञ्चब्रह्मोपनिषत् ॥मंगलाचरणब्रह्मादिपञ्चब्रह्माणो यत्र विश्रान्तिमाप्नुयुः ।तदखण्डसुखाकारं रामचन्द्रपदं भजे ॥अर्थ:जिस परम पद में ब्रह्मा आदि पाँच ब्रह्मस्वरूप विश्रान्ति प्राप्त करते हैं, उस अखण्ड आनन्दस्वरूप परम पद का मैं ध्यान करता हूँ।शान्तिपाठॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे परमात्मन्! हम दोनों—गुरु और शिष्य—की रक्षा करें, हम दोनों का पालन करें, हम दोनों को साथ मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन करने की शक्ति दें। हमारा अध्ययन तेजस्वी और फलदायी हो तथा हम परस्पर द्वेष न करें। शान्ति, शान्ति, शान्ति।पाँच ब्रह्मों का परिचय--अथ पैप्पलादो भगवान्भो किमादौ किं जातमिति ।सद्योजातमिति ।किं भगव इति । अघोर इति ।किं भगव इति । वामदेव इति ।किं वा पुनरिमे भगव इति । तत्पुरुष इति ।किं वा पुनरिमे भगव इति ।सर्वेषां दिव्यानां प्रेरयिता ईशान इति ।ईशानो भूतभव्यस्य सर्वेषां देवयोगिनाम् ॥अर्थ:भगवान् पैप्पलाद से पूछा गया—“आरम्भ में क्या उत्पन्न हुआ?”उत्तर मिला—सद्योजात।“भगवन्! वह क्या है?”—अघोर।“भगवन्! फिर वह क्या है?”—वामदेव।“फिर ये क्या हैं?”—तत्पुरुष।“और फिर यह कौन है?”—सभी दिव्य शक्तियों को प्रेरणा देने वाला ईशान है। ईशान भूत और भविष्य का स्वामी त समस्त देवों और योगियों का अधिष्ठाता है। १. सद्योजात ब्रह्मसद्योजातं मही पूषा रमा ब्रह्मः त्रिवृत्स्वरः ॥ १ ॥अर्थ:सद्योजात ब्रह्म का सम्बन्ध पृथ्वी, पोषण-शक्ति, श्री/रमा और ब्रह्मा आदि तत्त्वों से बताया गया है। यह सृष्टि के प्रकट होने वाले पक्ष का द्योतक है।२-ऋग्वेदो गार्हपत्यं च मन्त्राः सप्तस्वरास्तथा ।वर्णं पीतं क्रिया शक्तिः सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥ २ ॥अर्थ:सद्योजात का सम्बन्ध ऋग्वेद, गार्हपत्य अग्नि, मन्त्रों तथा सप्तस्वरों से बताया गया है। इसका वर्ण पीला और इसकी शक्ति क्रियाशक्ति है। यह साधक के अभीष्ट फल की प्राप्ति कराने वाला कहा गया है। ३. अघोर ब्रह्मअघोरं सलिलं चन्द्रं गौरी वेदद्वितीयकम् ।नीर्दाभं स्वरं सान्द्रं दक्षिणाग्निरुदाहृतम् ॥ ३ ॥अर्थ:अघोर का सम्बन्ध जल, चन्द्रमा, गौरी तथा वेद के दूसरे पक्ष से बताया गया है। इसका स्वरूप मेघ के समान गम्भीर और इसका सम्बन्ध दक्षिणाग्नि से कहा गया है।४. पञ्चाशद्वर्णसंयुक्तं स्थितिरिच्छक्रियान्वितम् ।शक्तिरक्षणसंयुक्तं सर्वाघौघविनाशनम् ॥ ४ ॥अर्थ:अघोर पचास वर्णों से युक्त, स्थिति-शक्ति, इच्छा और क्रिया से सम्बद्ध तथा रक्षा-शक्ति से सम्पन्न है। यह समस्त पापों और दोषों का नाश करने वाला कहा गया है।सर्वदुष्टप्रशमनं सर्वैश्वर्यफलप्रदम् ॥ ५ ॥अर्थ:यह सभी दुष्ट प्रवृत्तियों को शान्त करने वाला और समस्त ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है। ५. वामदेव ब्रह्मवामदेव महाबोधदायकं पावनात्मकम् ।विद्यालोकसमायुक्तं भानुकोटिसमप्रभम् ॥ ६ ॥अर्थ:वामदेव महान् ज्ञान प्रदान करने वाला और पवित्र स्वरूप है। वह विद्या के प्रकाश से युक्त तथा करोड़ों सूर्य के समान प्रकाशमान है।७. प्रसन्नं सामवेदाख्यं नानाष्टकसमन्वितम् ।धीरस्वरमधीनं चावहनीयमनुत्तमम् ॥ ७ ॥अर्थ:वामदेव प्रसन्न स्वरूप, सामवेद से सम्बद्ध और विभिन्न शक्तियों से युक्त है। इसका सम्बन्ध गम्भीर स्वर तथा आहवनीय अग्नि से बताया गया है।८. ज्ञानसंहारसंयुक्तं शक्तिद्वयसमन्वितम् ।वर्णं शुक्लं तमोमिश्रं पूर्णबोधकरं स्वयम् ॥ ८ ॥अर्थ:यह ज्ञान और संहार-तत्त्व से सम्बद्ध तथा दो शक्तियों से युक्त है। इसका वर्ण श्वेत कहा गया है और यह पूर्ण ज्ञान प्रदान करने वाला है।९.धामत्रयनियन्तारं धामत्रयसमन्वितम् ।सर्वसौभाग्यदं नॄणां सर्वकर्मफलप्रदम् ॥ ९ ॥अर्थ:यह तीनों धामों का नियन्ता और तीनों धामों से सम्बद्ध है। मनुष्यों को सौभाग्य प्रदान करता है तथा कर्मों के फल की प्राप्ति कराता है। १०. तत्पुरुष ब्रह्मअष्टाक्षरसमायुक्तमष्टपत्रान्तरस्थितम् ।यत्तत्पुरुषं प्रोक्तं वायुमण्डलसंवृतम् ॥ १० ॥अर्थ:तत्पुरुष अष्टाक्षर से सम्बद्ध और अष्टदल कमल के मध्य स्थित बताया गया है। इसका सम्बन्ध वायुमण्डल से है।११.पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम् ।पञ्चाशत्स्वरवर्णाख्यमथर्ववेदस्वरूपकम् ॥ ११ ॥अर्थ:तत्पुरुष पाँच अग्नियों से युक्त तथा मन्त्रशक्ति का नियामक है। यह पचास वर्णों से सम्बद्ध और अथर्ववेद के स्वरूप वाला कहा गया है।१२. कोटिकोटिगणाध्यक्षं ब्रह्माण्डाखण्डविग्रहम् ।वर्णं रक्तं कामदं च सर्वाधिव्याधिभेषजम् ॥ १२ ॥अर्थ:यह असंख्य गणों का अधिपति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने स्वरूप में धारण करने वाला है। इसका वर्ण लाल कहा गया है। यह इच्छाओं की पूर्ति करने वाला तथा सभी आधि-व्याधियों के लिए औषधि के समान है।१३. सृष्टिस्थितिलयादीनां कारणं सर्वशक्तिधृक् ।अवस्थात्रितयातीतं तुरीयं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ १३ ॥अर्थ:यह सृष्टि, स्थिति और लय आदि का कारण तथा समस्त शक्तियों को धारण करने वाला है। यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीन अवस्थाओं से परे तुरीय ब्रह्म है।ब्रह्मविष्ण्वादिभिः सेव्यं सर्वेषां जनकं परम् ॥अर्थ:जिसकी उपासना ब्रह्मा, विष्णु आदि भी करते हैं, वही सबका परम जनक है। १४. ईशान ब्रह्म ईशानं परमं विद्यात्प्रेरकं बुद्धिसाक्षिणम् ।आकाशात्मकमव्यक्तमोङ्कारस्वरभूषितम् ॥ १४ ॥अर्थ:ईशान को परम तत्त्व जानना चाहिए। वह सबको प्रेरणा देने वाला और बुद्धि का साक्षी है। उसका स्वरूप आकाश के समान सर्वव्यापक और अव्यक्त है तथा वह ॐकार के स्वर से विभूषित है।१५. सर्वदेवमयं शान्तं शान्त्यतीतं स्वराद्बहिः ।अकारादिस्वराध्यक्षमाकाशमयविग्रहम् ॥ १५ ॥अर्थ:ईशान सभी देवताओं के स्वरूप वाला, पूर्ण शान्त और शान्ति से भी परे है। वह शब्द और स्वर से परे है, अकार आदि स्वरों का अधिष्ठाता तथा आकाशमय व्यापक स्वरूप वाला है।१६–२० : परम ब्रह्म का निरूपण--पञ्चकृत्यनियन्तारं पञ्चब्रह्मात्मकं बृहत् ।पञ्चब्रह्मोपसंहारं कृत्वा स्वात्मनि संस्थितः ॥ १६ ॥अर्थ:वह पाँचों ब्रह्मों और पाँचों कृत्यों का नियन्ता है। पाँच ब्रह्मों का लय करके वह अपने ही आत्मस्वरूप में स्थित रहता है।स्वमायावैभवान्सर्वान्संहृत्य स्वात्मनि स्थितः ।पञ्चब्रह्मात्मकातीतो भासते स्वस्वतेजसा ॥ १७ ॥अर्थ:अपनी माया के समस्त वैभव को समेटकर वह अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है। वह पाँच ब्रह्मों से भी परे होकर अपने ही प्रकाश से प्रकाशित होता है।आदावन्ते च मध्ये च भाससे नान्यहेतुना ।मायया मोहिताः शम्भोर्महादेवं जगद्गुरुम् ॥ १८ ॥अर्थ:वह आदि, मध्य और अन्त—तीनों में स्वयं प्रकाशित है; उसके प्रकाश के लिए कोई दूसरा कारण नहीं है। किन्तु माया से मोहित लोग उस जगद्गुरु महादेव को नहीं पहचान पाते।न जानन्ति सुराः सर्वे सर्वकारणकारणम् ।न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य परात्परं पुरुषं विश्वधाम ॥ १९ ॥अर्थ:देवता भी उस समस्त कारणों के कारण को पूर्णतः नहीं जान पाते। उसका वास्तविक रूप इन्द्रियों से दिखाई नहीं देता। वह परात्पर पुरुष और सम्पूर्ण विश्व का परम धाम है।येन प्रकाशते विश्वं यत्रैव प्रविलीयते ।तद्ब्रह्म परमं शान्तं तद्ब्रह्मास्मि परमं पदम् ॥ २० ॥अर्थ:जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित होता है और जिसमें अन्ततः यह विश्व विलीन हो जाता है—वही परम शान्त ब्रह्म है। वही ब्रह्म मेरा परम पद है। २१–२६ : पञ्चब्रह्म और आत्मज्ञान--पञ्चब्रह्म परं विद्यात्सद्योजातादिपूर्वकम् ।दृश्यते श्रूयते यच्च पञ्चब्रह्मात्मकं स्वयम् ॥ २१ ॥अर्थ:सद्योजात आदि पाँच स्वरूपों को पञ्चब्रह्म का परम तत्त्व जानना चाहिए। जो कुछ दिखाई देता या सुनाई देता है, वह भी पञ्चब्रह्मात्मक ही है।पञ्चधा वर्तमानं तं ब्रह्मकार्यमिति स्मृतम् ।ब्रह्मकार्यमिति ज्ञात्वा ईशानं प्रतिपद्यते ॥ २२ ॥अर्थ: जो ब्रह्म पाँच प्रकार से प्रकट होता है, उसे ब्रह्म का कार्य कहा गया है। उसे ब्रह्म का कार्य जानकर साधक ईशान—परम तत्त्व—को प्राप्त करता है।पञ्चब्रह्मात्मकं सर्वं स्वात्मनि प्रविलाप्य च ।सोऽहमस्मीति जानीयाद्विद्वान्ब्रह्माऽमृतो भवेत् ॥ २३ ॥अर्थ: समस्त पञ्चब्रह्मात्मक जगत् को अपने आत्मस्वरूप में लीन करके ज्ञानी को जानना चाहिए—“सोऽहम्, मैं वही हूँ।” ऐसा जानने वाला ब्रह्मस्वरूप और अमृत हो जाता है।इत्येतद्ब्रह्म जानीयाद्यः स मुक्तो न संशयः ।पञ्चाक्षरमयं शम्भुं परब्रह्मस्वरूपिणम् ॥ २४ ॥अर्थ:जो इस ब्रह्मतत्त्व को जान लेता है, वह निःसन्देह मुक्त हो जाता है। पाँच अक्षरों वाले मन्त्रस्वरूप शम्भु को परब्रह्म का स्वरूप जानना चाहिए।नकारादियकारान्तं ज्ञात्वा पञ्चाक्षरं जपेत् ।सर्वं पञ्चात्मकं विद्यात्पञ्चब्रह्मात्मतत्त्वतः ॥ २५ अर्थ: ‘न’ से ‘य’ तक के पाँच अक्षरों वाले मन्त्र—नमः शिवाय—का ज्ञानपूर्वक जप करना चाहिए। पञ्चब्रह्म के आत्मतत्त्व से सम्पूर्ण जगत् को पंचात्मक जानना चाहिए।पञ्चब्रह्मात्मिकीं विद्यां योऽधीते भक्तिभावितः ।स पञ्चात्मकतामेत्य भासते पञ्चधा स्वयम् ॥ २६ ॥अर्थ:जो व्यक्ति भक्ति-भाव से पञ्चब्रह्मात्मक विद्या का अध्ययन करता है, वह उस पाँचf ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त होकर स्वयं पाँच प्रकार से प्रकाशित होता है।उपसंहारएवमुक्त्वा महादेवो गालवस्य महात्मनः ।कृपां चकार तत्रैव स्वान्तर्धिमगमत्स्वयम् ॥ २७ ॥अर्थ:इस प्रकार महादेव ने महात्मा गालव को उपदेश देकर उन पर कृपा की और वहीं अन्तर्धान हो गए।यस्य श्रवणमात्रेणाश्रुतमेव श्रुतं भवेत् ।अमतं च मतं ज्ञातमविज्ञातं च शाकल ॥ २८ ॥अर्थ:हे शाकल! इस ज्ञान को सुनने मात्र से वह भी सुना हुआ माना जाता है जो पहले नहीं सुना गया; जो समझ में नहीं आया था वह समझ में आने लगता है और जो अज्ञात था उसका ज्ञान हो जाता है।हृदयस्थ ब्रह्म--उपनिषद् के अन्तिम भाग में बाहरी जगत् के कारण की खोज को हृदयस्थ शुद्ध चैतन्य की ओर मोड़ा गया है—अत्र कारणमद्वैतं शुद्धचैतन्यमेव हि ।अस्मिन्ब्रह्मपुरे वेश्म दहरं यदिदं मुने ॥पुण्डरीकं तु तन्मध्ये आकाशो दहरोऽस्ति तत् ।स शिवः सच्चिदानन्दः सोऽन्वेष्टव्यो मुमुक्षिभिः ॥अयं हृदि स्थितः साक्षी सर्वेषामविशेषतः ।तेनायं हृदयं प्रोक्तः शिवः संसारमोचकः ॥अर्थ:यहाँ परम कारण अद्वैत और शुद्ध चैतन्य ही है। इस शरीररूपी ब्रह्मपुर में हृदय का एक सूक्ष्म आकाश है। उसके मध्य कमल है और उसके भीतर स्थित वह सूक्ष्म आकाश सच्चिदानन्द शिव है। मोक्ष की इच्छा रखने वालों को उसी का अनुसंधान करना चाहिए। वह सभी के हृदय में समान रूप से स्थित साक्षी है; इसी कारण हृदयस्थ शिव संसार से मुक्ति देने वाला कहा गया है। सार--पञ्चब्रह्मोपनिषद् का मूल संदेश यह है कि सद्योजात, अघोर, वामदेव, तत्पुरुष और ईशान—ये पाँच शिवस्वरूप अन्ततः एक ही परम ब्रह्म के पाँच आयाम हैं। साधक जब इन पाँचों को अपने आत्मस्वरूप में लीन करके “सोऽहम्” का आत्मज्ञान प्राप्त करता है, तब वह ब्रह्मस्वरूप और अमृत हो जाता है।------×--------×-------×------ के आधारभूत अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है। उपलब्ध पाठ में श्लोकों की संख्या विभिन्न संस्करणों में कुछ भिन्न मिलती है।नीचे मैं मूल संस्कृत श्लोक और सरल हिन्दी अर्थ क्रम से दे रहा हूँ। ॥ पञ्चब्रह्मोपनिषत् ॥मंगलाचरणब्रह्मादिपञ्चब्रह्माणो यत्र विश्रान्तिमाप्नुयुः ।तदखण्डसुखाकारं रामचन्द्रपदं भजे ॥अर्थ:जिस परम पद में ब्रह्मा आदि पाँच ब्रह्मस्वरूप विश्रान्ति प्राप्त करते हैं, उस अखण्ड आनन्दस्वरूप परम पद का मैं ध्यान करता हूँ।शान्तिपाठॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे परमात्मन्! हम दोनों—गुरु और शिष्य—की रक्षा करें, हम दोनों का पालन करें, हम दोनों को साथ मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन करने की शक्ति दें। हमारा अध्ययन तेजस्वी और फलदायी हो तथा हम परस्पर द्वेष न करें। शान्ति, शान्ति, शान्ति।पाँच ब्रह्मों का परिचय--अथ पैप्पलादो भगवान्भो किमादौ किं जातमिति ।सद्योजातमिति ।किं भगव इति । अघोर इति ।किं भगव इति । वामदेव इति ।किं वा पुनरिमे भगव इति । तत्पुरुष इति ।किं वा पुनरिमे भगव इति ।सर्वेषां दिव्यानां प्रेरयिता ईशान इति ।ईशानो भूतभव्यस्य सर्वेषां देवयोगिनाम् ॥अर्थ:भगवान् पैप्पलाद से पूछा गया—“आरम्भ में क्या उत्पन्न हुआ?”उत्तर मिला—सद्योजात।“भगवन्! वह क्या है?”—अघोर।“भगवन्! फिर वह क्या है?”—वामदेव।“फिर ये क्या हैं?”—तत्पुरुष।“और फिर यह कौन है?”—सभी दिव्य शक्तियों को प्रेरणा देने वाला ईशान है। ईशान भूत और भविष्य का स्वामी त समस्त देवों और योगियों का अधिष्ठाता है। १. सद्योजात ब्रह्मसद्योजातं मही पूषा रमा ब्रह्मः त्रिवृत्स्वरः ॥ १ ॥अर्थ:सद्योजात ब्रह्म का सम्बन्ध पृथ्वी, पोषण-शक्ति, श्री/रमा और ब्रह्मा आदि तत्त्वों से बताया गया है। यह सृष्टि के प्रकट होने वाले पक्ष का द्योतक है।२-ऋग्वेदो गार्हपत्यं च मन्त्राः सप्तस्वरास्तथा ।वर्णं पीतं क्रिया शक्तिः सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥ २ ॥अर्थ:सद्योजात का सम्बन्ध ऋग्वेद, गार्हपत्य अग्नि, मन्त्रों तथा सप्तस्वरों से बताया गया है। इसका वर्ण पीला और इसकी शक्ति क्रियाशक्ति है। यह साधक के अभीष्ट फल की प्राप्ति कराने वाला कहा गया है। ३. अघोर ब्रह्मअघोरं सलिलं चन्द्रं गौरी वेदद्वितीयकम् ।नीर्दाभं स्वरं सान्द्रं दक्षिणाग्निरुदाहृतम् ॥ ३ ॥अर्थ:अघोर का सम्बन्ध जल, चन्द्रमा, गौरी तथा वेद के दूसरे पक्ष से बताया गया है। इसका स्वरूप मेघ के समान गम्भीर और इसका सम्बन्ध दक्षिणाग्नि से कहा गया है।४. पञ्चाशद्वर्णसंयुक्तं स्थितिरिच्छक्रियान्वितम् ।शक्तिरक्षणसंयुक्तं सर्वाघौघविनाशनम् ॥ ४ ॥अर्थ:अघोर पचास वर्णों से युक्त, स्थिति-शक्ति, इच्छा और क्रिया से सम्बद्ध तथा रक्षा-शक्ति से सम्पन्न है। यह समस्त पापों और दोषों का नाश करने वाला कहा गया है।सर्वदुष्टप्रशमनं सर्वैश्वर्यफलप्रदम् ॥ ५ ॥अर्थ:यह सभी दुष्ट प्रवृत्तियों को शान्त करने वाला और समस्त ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है। ५. वामदेव ब्रह्मवामदेव महाबोधदायकं पावनात्मकम् ।विद्यालोकसमायुक्तं भानुकोटिसमप्रभम् ॥ ६ ॥अर्थ:वामदेव महान् ज्ञान प्रदान करने वाला और पवित्र स्वरूप है। वह विद्या के प्रकाश से युक्त तथा करोड़ों सूर्य के समान प्रकाशमान है।७. प्रसन्नं सामवेदाख्यं नानाष्टकसमन्वितम् ।धीरस्वरमधीनं चावहनीयमनुत्तमम् ॥ ७ ॥अर्थ:वामदेव प्रसन्न स्वरूप, सामवेद से सम्बद्ध और विभिन्न शक्तियों से युक्त है। इसका सम्बन्ध गम्भीर स्वर तथा आहवनीय अग्नि से बताया गया है।८. ज्ञानसंहारसंयुक्तं शक्तिद्वयसमन्वितम् ।वर्णं शुक्लं तमोमिश्रं पूर्णबोधकरं स्वयम् ॥ ८ ॥अर्थ:यह ज्ञान और संहार-तत्त्व से सम्बद्ध तथा दो शक्तियों से युक्त है। इसका वर्ण श्वेत कहा गया है और यह पूर्ण ज्ञान प्रदान करने वाला है।९.धामत्रयनियन्तारं धामत्रयसमन्वितम् ।सर्वसौभाग्यदं नॄणां सर्वकर्मफलप्रदम् ॥ ९ ॥अर्थ:यह तीनों धामों का नियन्ता और तीनों धामों से सम्बद्ध है। मनुष्यों को सौभाग्य प्रदान करता है तथा कर्मों के फल की प्राप्ति कराता है। १०. तत्पुरुष ब्रह्मअष्टाक्षरसमायुक्तमष्टपत्रान्तरस्थितम् ।यत्तत्पुरुषं प्रोक्तं वायुमण्डलसंवृतम् ॥ १० ॥अर्थ:तत्पुरुष अष्टाक्षर से सम्बद्ध और अष्टदल कमल के मध्य स्थित बताया गया है। इसका सम्बन्ध वायुमण्डल से है।११.पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम् ।पञ्चाशत्स्वरवर्णाख्यमथर्ववेदस्वरूपकम् ॥ ११ ॥अर्थ:तत्पुरुष पाँच अग्नियों से युक्त तथा मन्त्रशक्ति का नियामक है। यह पचास वर्णों से सम्बद्ध और अथर्ववेद के स्वरूप वाला कहा गया है।१२. कोटिकोटिगणाध्यक्षं ब्रह्माण्डाखण्डविग्रहम् ।वर्णं रक्तं कामदं च सर्वाधिव्याधिभेषजम् ॥ १२ ॥अर्थ:यह असंख्य गणों का अधिपति और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने स्वरूप में धारण करने वाला है। इसका वर्ण लाल कहा गया है। यह इच्छाओं की पूर्ति करने वाला तथा सभी आधि-व्याधियों के लिए औषधि के समान है।१३. सृष्टिस्थितिलयादीनां कारणं सर्वशक्तिधृक् ।अवस्थात्रितयातीतं तुरीयं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥ १३ ॥अर्थ:यह सृष्टि, स्थिति और लय आदि का कारण तथा समस्त शक्तियों को धारण करने वाला है। यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीन अवस्थाओं से परे तुरीय ब्रह्म है।ब्रह्मविष्ण्वादिभिः सेव्यं सर्वेषां जनकं परम् ॥अर्थ:जिसकी उपासना ब्रह्मा, विष्णु आदि भी करते हैं, वही सबका परम जनक है। १४. ईशान ब्रह्म ईशानं परमं विद्यात्प्रेरकं बुद्धिसाक्षिणम् ।आकाशात्मकमव्यक्तमोङ्कारस्वरभूषितम् ॥ १४ ॥अर्थ:ईशान को परम तत्त्व जानना चाहिए। वह सबको प्रेरणा देने वाला और बुद्धि का साक्षी है। उसका स्वरूप आकाश के समान सर्वव्यापक और अव्यक्त है तथा वह ॐकार के स्वर से विभूषित है।१५. सर्वदेवमयं शान्तं शान्त्यतीतं स्वराद्बहिः ।अकारादिस्वराध्यक्षमाकाशमयविग्रहम् ॥ १५ ॥अर्थ:ईशान सभी देवताओं के स्वरूप वाला, पूर्ण शान्त और शान्ति से भी परे है। वह शब्द और स्वर से परे है, अकार आदि स्वरों का अधिष्ठाता तथा आकाशमय व्यापक स्वरूप वाला है।१६–२० : परम ब्रह्म का निरूपण--पञ्चकृत्यनियन्तारं पञ्चब्रह्मात्मकं बृहत् ।पञ्चब्रह्मोपसंहारं कृत्वा स्वात्मनि संस्थितः ॥ १६ ॥अर्थ:वह पाँचों ब्रह्मों और पाँचों कृत्यों का नियन्ता है। पाँच ब्रह्मों का लय करके वह अपने ही आत्मस्वरूप में स्थित रहता है।स्वमायावैभवान्सर्वान्संहृत्य स्वात्मनि स्थितः ।पञ्चब्रह्मात्मकातीतो भासते स्वस्वतेजसा ॥ १७ ॥अर्थ:अपनी माया के समस्त वैभव को समेटकर वह अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहता है। वह पाँच ब्रह्मों से भी परे होकर अपने ही प्रकाश से प्रकाशित होता है।आदावन्ते च मध्ये च भाससे नान्यहेतुना ।मायया मोहिताः शम्भोर्महादेवं जगद्गुरुम् ॥ १८ ॥अर्थ:वह आदि, मध्य और अन्त—तीनों में स्वयं प्रकाशित है; उसके प्रकाश के लिए कोई दूसरा कारण नहीं है। किन्तु माया से मोहित लोग उस जगद्गुरु महादेव को नहीं पहचान पाते।न जानन्ति सुराः सर्वे सर्वकारणकारणम् ।न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य परात्परं पुरुषं विश्वधाम ॥ १९ ॥अर्थ:देवता भी उस समस्त कारणों के कारण को पूर्णतः नहीं जान पाते। उसका वास्तविक रूप इन्द्रियों से दिखाई नहीं देता। वह परात्पर पुरुष और सम्पूर्ण विश्व का परम धाम है।येन प्रकाशते विश्वं यत्रैव प्रविलीयते ।तद्ब्रह्म परमं शान्तं तद्ब्रह्मास्मि परमं पदम् ॥ २० ॥अर्थ:जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित होता है और जिसमें अन्ततः यह विश्व विलीन हो जाता है—वही परम शान्त ब्रह्म है। वही ब्रह्म मेरा परम पद है। २१–२६ : पञ्चब्रह्म और आत्मज्ञान--पञ्चब्रह्म परं विद्यात्सद्योजातादिपूर्वकम् ।दृश्यते श्रूयते यच्च पञ्चब्रह्मात्मकं स्वयम् ॥ २१ ॥अर्थ:सद्योजात आदि पाँच स्वरूपों को पञ्चब्रह्म का परम तत्त्व जानना चाहिए। जो कुछ दिखाई देता या सुनाई देता है, वह भी पञ्चब्रह्मात्मक ही है।पञ्चधा वर्तमानं तं ब्रह्मकार्यमिति स्मृतम् ।ब्रह्मकार्यमिति ज्ञात्वा ईशानं प्रतिपद्यते ॥ २२ ॥अर्थ: जो ब्रह्म पाँच प्रकार से प्रकट होता है, उसे ब्रह्म का कार्य कहा गया है। उसे ब्रह्म का कार्य जानकर साधक ईशान—परम तत्त्व—को प्राप्त करता है।पञ्चब्रह्मात्मकं सर्वं स्वात्मनि प्रविलाप्य च ।सोऽहमस्मीति जानीयाद्विद्वान्ब्रह्माऽमृतो भवेत् ॥ २३ ॥अर्थ: समस्त पञ्चब्रह्मात्मक जगत् को अपने आत्मस्वरूप में लीन करके ज्ञानी को जानना चाहिए—“सोऽहम्, मैं वही हूँ।” ऐसा जानने वाला ब्रह्मस्वरूप और अमृत हो जाता है।इत्येतद्ब्रह्म जानीयाद्यः स मुक्तो न संशयः ।पञ्चाक्षरमयं शम्भुं परब्रह्मस्वरूपिणम् ॥ २४ ॥अर्थ:जो इस ब्रह्मतत्त्व को जान लेता है, वह निःसन्देह मुक्त हो जाता है। पाँच अक्षरों वाले मन्त्रस्वरूप शम्भु को परब्रह्म का स्वरूप जानना चाहिए।नकारादियकारान्तं ज्ञात्वा पञ्चाक्षरं जपेत् ।सर्वं पञ्चात्मकं विद्यात्पञ्चब्रह्मात्मतत्त्वतः ॥ २५ अर्थ: ‘न’ से ‘य’ तक के पाँच अक्षरों वाले मन्त्र—नमः शिवाय—का ज्ञानपूर्वक जप करना चाहिए। पञ्चब्रह्म के आत्मतत्त्व से सम्पूर्ण जगत् को पंचात्मक जानना चाहिए।पञ्चब्रह्मात्मिकीं विद्यां योऽधीते भक्तिभावितः ।स पञ्चात्मकतामेत्य भासते पञ्चधा स्वयम् ॥ २६ ॥अर्थ:जो व्यक्ति भक्ति-भाव से पञ्चब्रह्मात्मक विद्या का अध्ययन करता है, वह उस पाँचf ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त होकर स्वयं पाँच प्रकार से प्रकाशित होता है।उपसंहारएवमुक्त्वा महादेवो गालवस्य महात्मनः ।कृपां चकार तत्रैव स्वान्तर्धिमगमत्स्वयम् ॥ २७ ॥अर्थ:इस प्रकार महादेव ने महात्मा गालव को उपदेश देकर उन पर कृपा की और वहीं अन्तर्धान हो गए।यस्य श्रवणमात्रेणाश्रुतमेव श्रुतं भवेत् ।अमतं च मतं ज्ञातमविज्ञातं च शाकल ॥ २८ ॥अर्थ:हे शाकल! इस ज्ञान को सुनने मात्र से वह भी सुना हुआ माना जाता है जो पहले नहीं सुना गया; जो समझ में नहीं आया था वह समझ में आने लगता है और जो अज्ञात था उसका ज्ञान हो जाता है।हृदयस्थ ब्रह्म--उपनिषद् के अन्तिम भाग में बाहरी जगत् के कारण की खोज को हृदयस्थ शुद्ध चैतन्य की ओर मोड़ा गया है—अत्र कारणमद्वैतं शुद्धचैतन्यमेव हि ।अस्मिन्ब्रह्मपुरे वेश्म दहरं यदिदं मुने ॥पुण्डरीकं तु तन्मध्ये आकाशो दहरोऽस्ति तत् ।स शिवः सच्चिदानन्दः सोऽन्वेष्टव्यो मुमुक्षिभिः ॥अयं हृदि स्थितः साक्षी सर्वेषामविशेषतः ।तेनायं हृदयं प्रोक्तः शिवः संसारमोचकः ॥अर्थ:यहाँ परम कारण अद्वैत और शुद्ध चैतन्य ही है। इस शरीररूपी ब्रह्मपुर में हृदय का एक सूक्ष्म आकाश है। उसके मध्य कमल है और उसके भीतर स्थित वह सूक्ष्म आकाश सच्चिदानन्द शिव है। मोक्ष की इच्छा रखने वालों को उसी का अनुसंधान करना चाहिए। वह सभी के हृदय में समान रूप से स्थित साक्षी है; इसी कारण हृदयस्थ शिव संसार से मुक्ति देने वाला कहा गया है। सार--पञ्चब्रह्मोपनिषद् का मूल संदेश यह है कि सद्योजात, अघोर, वामदेव, तत्पुरुष और ईशान—ये पाँच शिवस्वरूप अन्ततः एक ही परम ब्रह्म के पाँच आयाम हैं। साधक जब इन पाँचों को अपने आत्मस्वरूप में लीन करके “सोऽहम्” का आत्मज्ञान प्राप्त करता है, तब वह ब्रह्मस्वरूप और अमृत हो जाता है।------×--------×-------×------