एक जादूगर
लेखक: विजय शर्मा एरी
शहर के बीचोंबीच खड़ा था एक पुराना स्कूल—सरस्वती विद्या मंदिर। दीवारें धूसर, छत पर बारिश की बूँदें रिसती हुई, और गलियारे इतने लंबे कि शाम को उनमें अँधेरा घुल जाता था। बच्चे कहते थे कि रात में यहाँ कोई घूमता है। अध्यापक कहते थे कि बस पुरानी इमारत की आवाज़ें हैं। लेकिन एक लड़का था—आरव—जिसने उस गलियारे में जादू देखा था।
आरव बारह साल का था। माँ की मृत्यु के बाद पिता ने उसे इस स्कूल में दाखिल कराया था। पिता दिन-रात फैक्ट्री में काम करते थे, घर में सिर्फ दादी रहती थीं। आरव चुपचाप रहता था। कक्षा में पीछे की बेंच पर बैठता, किताबें खोलता, लेकिन मन कहीं और भटकता। दोस्त नहीं थे। खेल के मैदान में भी वह किनारे खड़ा रहता।
एक दिन बारिश हो रही थी। स्कूल का अंतिम घंटा खत्म हुआ। बच्चे भाग गए। आरव अपनी थैली उठाए गलियारे से गुज़र रहा था। अचानक उसके कदम रुक गए। गलियारे के अंत में, जहाँ रोशनी कम पड़ती थी, एक आदमी खड़ा था। काला कोट, सफेद बाल, हाथ में एक पुरानी लकड़ी की छड़ी। आँखें ऐसी चमक रही थीं जैसे रात के आसमान में दो तारे।
“तुम देर तक रुक गए, बेटे,” आदमी ने धीरे से कहा। आवाज़ में न डर था, न धमकी—बस एक अजीब सी गर्माहट।
आरव चौंक गया। “आप… आप कौन हैं?”
“मैं गलियारे का जादूगर हूँ,” आदमी मुस्कुराया। “नाम? नाम की ज़रूरत नहीं। लोग मुझे याद रखें, नाम से नहीं, काम से।”
आरव पीछे हटने लगा। “जादूगर? यहाँ स्कूल में?”
“स्कूल ही तो सबसे बड़ा जादूघर है,” जादूगर ने छड़ी घुमाई। छड़ी से हल्की सी चमक निकली। गलियारे की दीवारों पर पुरानी तस्वीरें जीवित हो गईं—बच्चे हँसते हुए, अध्यापक पढ़ाते हुए, और एक छोटी सी लड़की जो गुमशुदा सी लग रही थी।
“यह क्या है?” आरव की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“स्मृतियों का जादू,” जादूगर बोला। “हर गलियारा कहानियाँ छुपाता है। तुम्हारे स्कूल का यह गलियारा भी। तुम अकेले क्यों रहते हो, आरव?”
आरव चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “माँ चली गईं… दोस्त नहीं बनते… पिता हमेशा थके रहते हैं।”
जादूगर ने सिर हिलाया। “दुख भी एक जादू है। अगर उसे समझो तो ताकत बन जाता है। आओ, मैं तुम्हें तीन जादू सिखाता हूँ।”
उस दिन से आरव हर शाम गलियारे में रुकने लगा। जादूगर हमेशा वहाँ मिल जाता। कभी दीवारों पर सितारे जगा देता, कभी पुरानी बेंचों से हँसी की आवाज़ें निकाल देता। लेकिन असली जादू छड़ी में नहीं, शब्दों में था।
पहला जादू था—सुनने का जादू।
जादूगर ने एक दिन आरव को कक्षा के सबसे शरारती लड़के राजू के पास भेजा। राजू हमेशा लड़ता रहता था। आरव ने हिम्मत करके पूछा, “तू इतना गुस्सा क्यों करता है?”
राजू पहले झल्लाया, फिर बोला, “बाप रोज़ पीकर मारते हैं… माँ रोती रहती है। मैं बाहर आकर ही गुस्सा निकालता हूँ।”
आरव ने सिर्फ सुना। कुछ नहीं कहा। अगले दिन राजू ने खुद आरव के पास आकर बैठा। धीरे-धीरे दोनों दोस्त बन गए। जादूगर ने कहा, “सुनना सबसे बड़ा जादू है। लोग बोलते हैं, लेकिन सुनने वाला कम मिलता है।”
दूसरा जादू था—देखने का जादू।
जादूगर ने आरव को स्कूल के पिछवाड़े ले जाकर एक पुरानी झाड़ी दिखाई। “क्या देखता है?”
“झाड़ी… काँटे…”
“फिर से देख।”
आरव ने ध्यान से देखा। झाड़ी के नीचे एक छोटी सी चिड़िया का घोंसला था। अंडे। माँ चिड़िया इंतज़ार कर रही थी। आरव ने समझा—हर जगह जीवन छुपा होता है, बस देखने वाली आँख चाहिए। उसने कक्षा में एक चुप लड़की नेहा को देखा, जो हमेशा कोने में बैठती थी। पता चला उसकी माँ बीमार हैं। आरव ने अपनी टिफिन की रोटी बाँटनी शुरू की। नेहा मुस्कुराई। पहली बार।
तीसरा जादू था—देने का जादू।
एक दिन जादूगर ने कहा, “अब तुम्हें खुद जादू करना होगा।”
स्कूल में वार्षिक उत्सव आ रहा था। गरीब बच्चों के लिए पोशाक नहीं थी। आरव ने अपनी पुरानी कमीजें इकट्ठा कीं, दादी से सिलाई करवाई, और चुपचाप कुछ बच्चों को दे दीं। जब उत्सव में वे बच्चे मंच पर मुस्कुराए, तो आरव को लगा जैसे उसके अंदर कोई रोशनी जल उठी हो।
दिन बीतते गए। आरव बदल गया। कक्षा में आगे बैठने लगा। अध्यापकों की तारीफ सुनने लगा। पिता ने एक दिन पूछा, “बेटा, तुम इतने खुश क्यों रहते हो?”
आरव मुस्कुराया, “गलियारे का जादूगर सिखा रहा है।”
पिता ने सिर हिलाया, समझे नहीं। लेकिन खुश हुए।
फिर एक शाम जादूगर नहीं मिला। आरव ने गलियारे में आवाज़ लगाई। कोई जवाब नहीं। अगले दिन भी नहीं। तीसरे दिन दीवार पर एक संदेश लिखा मिला—पुरानी स्याही से:
“जादूगर कभी नहीं जाता, बेटे। वह तुम्हारे अंदर बस जाता है। अब तुम खुद गलियारे के जादूगर हो। दूसरों को सिखाओ। सुनो, देखो, दो। यही असली जादू है।”
आरव ने दीवार को छुआ। ठंडी थी। लेकिन दिल गर्म था।
साल बीत गए। आरव बड़ा हुआ। कॉलेज गया, फिर शिक्षक बना। उसी स्कूल में। अब वह खुद गलियारे में खड़ा रहता। बच्चों को देखता। एक दिन एक छोटा सा लड़का रोता हुआ आया। माँ बीमार, पिता बेरोजगार।
आरव ने उसकी पीठ थपथपाई। “आओ, मैं तुम्हें एक जादू सिखाता हूँ।”
लड़के ने आँखें उठाईं। “क्या जादू?”
आरव मुस्कुराया। “सुनने का… देखने का… और देने का।”
गलियारे में फिर रोशनी फैल गई। दीवारें पुरानी थीं, लेकिन उनमें नई कहानियाँ बसने लगीं। बच्चे फुसफुसाते—“सर को गलियारे का जादूगर कहते हैं।”
आरव कभी इनकार नहीं करता। कभी हाँ भी नहीं कहता। बस मुस्कुरा देता। क्योंकि वह जानता था—जादू छड़ी में नहीं होता। जादू उन आँखों में होता है जो दर्द देखती हैं, उन कानों में जो चुप्पी सुनते हैं, और उन हाथों में जो बिना माँगे देते हैं।
एक दिन बहुत पुराना अध्यापक मिला। उसने आरव का हाथ पकड़ा। “तुम्हें याद है? तुम्हारे समय में भी एक जादूगर आता था गलियारे में। मैंने भी देखा था… जब मैं तुम्हारी उम्र का था।”
आरव चौंका। “आपने भी?”
अध्यापक ने सिर हिलाया। “हर पीढ़ी में कोई न कोई गलियारे का जादूगर बनता है। स्कूल की आत्मा शायद यही है।”
आरव ने गलियारे की ओर देखा। शाम ढल रही थी। रोशनी कम हो रही थी। लेकिन कहीं दूर, कोने में, एक छाया सी मुस्कुरा रही थी। काला कोट, सफेद बाल, लकड़ी की छड़ी।
आरव ने धीरे से कहा, “धन्यवाद… गुरुदेव।”
छाया गायब हो गई। लेकिन जादू रह गया।
आज भी सरस्वती विद्या मंदिर के गलियारे में बच्चे दौड़ते हैं, हँसते हैं, कभी रोते हैं। और जब कोई अकेला पड़ता है, तो कोई न कोई आकर कहता है—“आओ, मैं तुम्हें एक जादू सिखाता हूँ।”
क्योंकि गलियारे का जादूगर कभी मरता नहीं। वह सिर्फ रूप बदलता है। कभी बच्चे में, कभी शिक्षक में, कभी एक साधारण से आदमी में जो रुककर सुन लेता है।
और यही सबसे बड़ा जादू है—
कि इंसान अपने दुख को दूसरों के सुख में बदल दे।
— विजय शर्मा एरी
(शब्द संख्या लगभग 2000)