गरुड़ोंपनिषद GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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गरुड़ोंपनिषद

---- : गरुड़ोपनिषद:---गरुड़ोपनिषद अथर्ववेद से संबद्ध वैष्णव उपनिषद् के रूप में सूचीबद्ध है। इसका मुख्य विषय विष-निवारण से संबंधित मंत्र हैं। वास्तविक सर्पदंश या विषाक्तता की स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता आवश्यक है; मंत्र चिकित्सा का विकल्प नहीं हैं।॥ श्रीगरुड़ोपनिषद् ॥मूलपाठ एवं हिन्दी अर्थ१. मंगल-वचनमूल पाठविषं ब्रह्मातिरिक्तं स्यादमृतं ब्रह्ममात्रकम्।ब्रह्मातिरिक्तं विषवद् ब्रह्ममात्रं खगेडहम्॥सरल अर्थजो ब्रह्म से भिन्न है, वह विष के समान माना गया है और जो ब्रह्मस्वरूप है, वही अमृत है। हे खगश्रेष्ठ! मैं उस ब्रह्मस्वरूप तत्त्व को प्रणाम करता हूँ। आरम्भिक वचन में ब्रह्म को अमृतस्वरूप तथा अज्ञान और ब्रह्म-विमुखता को विष के समान बताया गया है।२. शान्तिपाठॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।व्यशेम देवहितं यदायुः॥स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥अर्थहे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी बातें सुनें और अपनी आँखों से शुभ वस्तुओं का दर्शन करें।हम स्वस्थ और स्थिर अंगों से आपकी स्तुति करते हुए देवहित के अनुकूल अपनी पूर्ण आयु व्यतीत करें।इन्द्र हमारा कल्याण करें, सर्वज्ञ पूषा हमारा कल्याण करें, अरिष्टों का नाश करने वाले तार्क्ष्य हमारा कल्याण करें और बृहस्पति हमें मंगल प्रदान करें।तीनों प्रकार की शान्ति हो।३. ब्रह्मविद्या की परम्परामूल पाठहरिः ॐ।गारुडब्रह्मविद्यां प्रवक्ष्यामि यां ब्रह्मा विद्यां नारदाय प्रोवाच।नारदो बृहत्सेनाय, बृहत्सेन इन्द्राय, इन्द्रो भरद्वाजाय, भरद्वाजो जीवत्कामेभ्यः शिष्येभ्यः प्रायच्छत्॥अर्थहरि ॐ। अब मैं उस गारुड़ ब्रह्मविद्या का वर्णन करता हूँ जिसे ब्रह्मा ने नारद को बताया, नारद ने बृहत्सेन को, बृहत्सेन ने इन्द्र को, इन्द्र ने भरद्वाज को और भरद्वाज ने अपने शिष्यों को प्रदान किया।भावार्थयहाँ विद्या की गुरु-शिष्य परम्परा का वर्णन है। ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक परम्परा द्वारा सुरक्षित रखा गया है।.४. ऋषि, छन्द और देवतामूल पाठअस्याः श्रीमहागरुडब्रह्मविद्याया ब्रह्मा ऋषिः।गायत्री छन्दः।श्रीभगवान्महागरुडो देवता।श्रीमहागरुडप्रीत्यर्थे मम सकलविषविनाशनार्थे जपे विनियोगः॥अर्थइस श्रीमहागरुड़ ब्रह्मविद्या के ऋषि ब्रह्मा हैं, इसका छन्द गायत्री है और इसके देवता भगवान् महागरुड़ हैं। इसका जप महागरुड़ की प्रसन्नता तथा सभी प्रकार के विष के नाश की कामना से किया जाता है।५. करन्यास-मंत्रमूल पाठॐ नमो भगवते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।श्रीमहागरुडाय तर्जनीभ्यां स्वाहा।पक्षीन्द्राय मध्यमाभ्यां वषट्।श्रीविष्णुवल्लभाय अनामिकाभ्यां हुम्।त्रैलोक्यपरिपूजिताय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्।उग्रभयङ्करकालानलरूपाय करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्॥अर्थभगवान् को नमस्कार। श्रीमहागरुड़ को नमस्कार। पक्षियों के राजा गरुड़ को नमस्कार। भगवान् विष्णु के प्रिय को नमस्कार। तीनों लोकों में पूजित गरुड़ को नमस्कार। उग्र और भयंकर कालाग्नि के समान तेजस्वी स्वरूप वाले गरुड़ को नमस्कार।टिप्पणीयह मंत्र-भाग न्यास-विधि से संबंधित है, जिसमें शरीर के विभिन्न अंगों का स्मरण किया जाता है।६. दिग्बन्धमूल पाठएवं हृदयादिन्यासः।भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः॥अर्थइस प्रकार हृदय आदि का न्यास किया जाता है।“भूः, भुवः, स्वः” के द्वारा दिशाओं का बन्धन किया जाता है।७. विष-निवारण का मूल मंत्रमूल पाठविषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा॥सरल अर्थइन्द्र के वज्र की शक्ति से विष का विनाश हो—ऐसी प्रार्थना है।भावार्थयहाँ इन्द्र के वज्र को विष-नाशक दैवी शक्ति के प्रतीक के रूप में स्मरण किया गया है।८. शङ्खक-विष सम्बन्धी मंत्रमूल पाठयदि शङ्खकदूतोऽसि यदि वा शङ्खकः स्वयं।सचरति सचरति तत्कारी मत्कारीविषनाशिनी विषदूषिणी।हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं।हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा॥अर्थयदि तुम शङ्खक के दूत हो अथवा स्वयं शङ्खक हो, तो इस मंत्र में विष के नाश और उसके प्रभाव को दूर करने की प्रार्थना की गई है। इन्द्र के वज्र और ब्रह्म की शक्ति द्वारा विष के नष्ट होने की कामना की गई है।९. गुलिक-विष सम्बन्धी मंत्रमूल पाठयदि गुलिकदूतोऽसि यदि वा गुलिकः स्वयं।सचरति सचरति तत्कारी मत्कारीविषनाशिनी विषदूषिणी विषहारिणी।हतं विषं नष्टं विषं हतमिन्द्रस्य वज्रेण विषं।हतं ते ब्रह्मणा विषमिन्द्रस्य वज्रेण स्वाहा॥अर्थयदि विष किसी गुलिक नामक विषैले जीव अथवा उसके प्रभाव से उत्पन्न हुआ हो, तो इस मंत्र में उस विष के नाश की प्रार्थना की गई है।विषनाशिनी — विष का नाश करने वाली।विषदूषिणी — विष के प्रभाव को निष्प्रभावी करने वाली।विषहारिणी — विष को दूर करने वाली।१०. उपनिषद् का समापनमूल पाठॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः।व्यशेम देवहितं यदायुः॥स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥हरिः ॐ तत्सत्॥इति श्रीगारुडोपनिषत्समाप्ता॥अर्थउपनिषद् का समापन पुनः शान्तिपाठ से होता है। इसका उद्देश्य जीवन में—शुभ श्रवण,शुभ दर्शन,स्वस्थ जीवन,देवकृपा,और सर्वत्र शान्तिकी कामना करना है। गरुड़ोपनिषद् का संक्षिप्त सार१. ब्रह्म अमृतस्वरूप है।२. ब्रह्म से विमुखता को विष के समान बताया गया है।३. गरुड़ को दैवी शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है।४. विष से रक्षा के मंत्रात्मक प्रयोगों का वर्णन है।--------×-------×--------*---------