एक विचित्र डायरी
लेखक: विजय शर्मा एरी
(लगभग २००० शब्द)
१५ मार्च २०१९
आज रात फिर वही सन्नाटा है। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज़ और मेरी साँसों की आवाज़। डायरी खोलते हुए हाथ काँप रहे हैं। नहीं जानता कि इसे क्यों लिख रहा हूँ। शायद इसलिए कि कोई तो सुन ले, भले ही कागज़ ही क्यों न हो।
मेरा नाम नहीं बताऊँगा। नाम तो सिर्फ एक लेबल है जो लोग देते हैं। मैं वही हूँ जो रात में सड़कों पर घूमता है, और सुबह अखबार में कोई नया नाम छपता है। लोग कहते हैं सीरियल किलर। मैं खुद को सिर्फ “वह” कहता हूँ।
आज फिर वो सपना आया। वही गली, वही रोशनी, वही आवाज़ जो पीछे से आती है और फिर अचानक खामोश हो जाती है। मैं जाग जाता हूँ। पसीना, साँस फूलना, और वो खालीपन जो कभी भरता नहीं।
२२ मार्च २०१९
आज ऑफिस गया। सब सामान्य। कॉफी, मीटिंग, हँसी-मज़ाक। कोई नहीं जानता कि मेरे अंदर क्या चल रहा है। यही तो सबसे आसान है। सामान्य दिखना। मुस्कान लगाना। “हाँ भाई, सब ठीक है” कहना।
रात को घर आकर आईना देखा। आँखों में कुछ नहीं दिखता। खाली। जैसे कोई और ही देख रहा हो। कभी-कभी लगता है कि मैं खुद नहीं हूँ। कोई और मुझमें रह रहा है।
डायरी में लिखना अजीब लगता है। जैसे खुद से बात कर रहा हूँ। लेकिन अगर नहीं लिखूँगा तो दिमाग फट जाएगा।
५ अप्रैल २०१९
आज बहुत देर तक बारिश हुई। सड़कें खाली थीं। मैं बस घूमता रहा। कोई मकसद नहीं। सिर्फ चलना। कभी-कभी लगता है कि अगर मैं रुक जाऊँ तो सब खत्म हो जाएगा। लेकिन रुक नहीं पाता।
लोग सोचते होंगे कि ऐसे लोगों के मन में क्या चलता है। मैं बता दूँ—कुछ नहीं। बस एक भारीपन। जैसे सीने पर पत्थर रखा हो। कभी-कभी गुस्सा आता है, कभी उदासी, कभी कुछ भी नहीं। सबसे खतरनाक वही “कुछ नहीं” वाला पल होता है।
१८ अप्रैल २०१९
आज माँ का फोन आया। पूछा कब आ रहा हूँ। मैंने कहा जल्दी। झूठ बोला। माँ को क्या पता कि उनका बेटा रात को कहाँ-कहाँ भटकता है। अगर पता चल जाए तो… नहीं सोचना चाहता।
कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या मैं कभी सामान्य हो सकता हूँ। शादी, बच्चे, घर—वही सामान्य जिंदगी। लेकिन फिर वो आवाज़ आती है। अंदर से। कहती है—“तू वैसा नहीं है।”
३ मई २०१९
आज बहुत थकान है। नींद नहीं आ रही। डायरी में लिख रहा हूँ ताकि दिमाग शांत हो।
मैंने कई बार सोचा है कि सब खत्म कर दूँ। खुद को। लेकिन हिम्मत नहीं होती। या फिर वो आवाज़ नहीं मानती। वो कहती है—“अभी और बाकी है।”
लोग कहते हैं कि ऐसे लोग जानवर होते हैं। शायद सही कहते हैं। लेकिन जानवर भी तो भूख लगने पर ही हमला करते हैं। मेरी भूख अलग है। वो भूख जो कभी संतुष्ट नहीं होती।
१२ मई २०१९
आज पार्क में बैठा था। बच्चे खेल रहे थे। हँसी की आवाज़ें आ रही थीं। एक पल के लिए लगा कि मैं भी कभी ऐसा ही था। फिर याद आया—नहीं। मैं कभी वैसा नहीं था। बचपन से ही अलग था। अकेला। कोने में बैठा सोचता रहता।
स्कूल में भी कोई दोस्त नहीं था। सब कहते—“ये अजीब है।” शायद तब से ही ये सब शुरू हो गया था।
२५ मई २०१९
रात बहुत लंबी हो गई। खिड़की से बाहर देखा। शहर सो रहा था। मैं जाग रहा था। फिर वही सवाल—क्यों?
जवाब नहीं मिलता। कभी लगता है कि बदला ले रहा हूँ। किससे? दुनिया से? खुद से? पता नहीं।
डायरी के पन्ने पलटते हुए लगता है कि ये सब किसी और की कहानी है। मैं सिर्फ लिख रहा हूँ।
८ जून २०१९
आज बहुत गुस्सा आया। trifling सी बात पर। ऑफिस में किसी ने कुछ कह दिया। मैंने मुस्कुरा दिया। अंदर से आग लग गई थी। बाद में अकेले में बैठकर साँस ली। धीरे-धीरे शांत हुआ।
अगर उस वक्त नियंत्रण नहीं रख पाता तो… नहीं। सोचना नहीं।
मैं नियंत्रण रखना सीख गया हूँ। कम से कम दिन में। रात अलग बात है।
२० जून २०१९
आज बारिश फिर आई। ठंडी हवा। सड़क पर पानी जमा था। मैं छतरी लेकर निकला। कोई मकसद नहीं। सिर्फ चलना।
एक मोड़ पर रुक गया। वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ अंधेरा और बारिश की आवाज़। उस पल लगा कि मैं गायब हो सकता हूँ। कोई याद नहीं रखेगा। अच्छा भी है।
४ जुलाई २०१९
आज टीवी पर खबर आई। कोई नया मामला। मैंने देखा और चैनल बदल दिया। दिल की धड़कन तेज हो गई थी।
लोग डरते हैं। मैं भी डरता हूँ। खुद से।
कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर कोई मुझे पकड़ ले तो क्या होगा। जेल? फाँसी? या फिर पागलखाना? सब एक जैसे लगते हैं। अंदर से मैं पहले से ही बंद हूँ।
१५ जुलाई २०१९
माँ फिर फोन पर रोई। कहा कि तुम बहुत बदल गए हो। मैं चुप रहा। क्या बोलता? सच तो मैं खुद नहीं जानता।
कभी लगता है कि ये सब एक सपना है। लंबा, बुरा सपना। जागने का इंतजार कर रहा हूँ। लेकिन जागता नहीं।
२८ जुलाई २०१९
आज बहुत देर तक लिखा। हाथ थक गए। लेकिन मन हल्का नहीं हुआ।
मैंने कई बार कोशिश की कि बदल जाऊँ। किताबें पढ़ीं, सलाह ली, अकेले बैठकर सोचा। कुछ नहीं बदला। वो आवाज़ हमेशा वहीं रहती है। धीमी, लेकिन साफ।
१० अगस्त २०१९
आज शहर में घूमते हुए एक पुरानी गली में पहुँच गया। वहाँ एक बेंच थी। बैठा। याद आया कि बचपन में यहाँ आता था। तब भी अकेला।
समय बदल गया, लेकिन मैं नहीं। या शायद मैं और गहरा हो गया।
२२ अगस्त २०१९
रात को नींद में चिल्लाया। पड़ोसी ने दरवाजा खटखटाया। मैंने कहा—“सपना आ गया था।” वो चले गए।
सपने अब और साफ हो गए हैं। चेहरे, आवाज़ें, सब। सुबह उठकर लगता है कि सच में हुआ हो। फिर समझ आता है—नहीं। सिर्फ दिमाग खेल रहा है।
५ सितंबर २०१९
आज ऑफिस में प्रमोशन की बात चली। सब बधाई दे रहे थे। मैं मुस्कुरा रहा था। अंदर से खाली।
सफलता का कोई मतलब नहीं जब अंदर अंधेरा हो।
१८ सितंबर २०१९
डायरी खत्म होने वाली है। पन्ने कम रह गए हैं। नए की जरूरत पड़ेगी।
लिखते-लिखते लगता है कि ये मेरी अंतिम डायरी हो सकती है। पता नहीं क्यों। बस लग रहा है।
३० सितंबर २०१९
आज बहुत शांत दिन था। कोई सपना नहीं, कोई आवाज़ नहीं। सिर्फ सन्नाटा। अजीब लगा। जैसे तूफान से पहले की शांति।
मैंने खिड़की खोली। ठंडी हवा आई। साँस ली। एक पल के लिए लगा कि सब ठीक हो सकता है। फिर वो खालीपन लौट आया।
१२ अक्टूबर २०१९
आज माँ से मिला। उन्होंने हाथ पकड़कर कहा—“बेटा, कुछ गड़बड़ है तुझमें। बता।” मैंने सिर झुका लिया। कुछ नहीं बोला।
माँ की आँखों में डर था। मुझे भी डर लग रहा था। कि कहीं सच न बता दूँ।
२५ अक्टूबर २०१९
रात बहुत लंबी थी। डायरी में लिखते-लिखते थक गया।
मैं अब थक चुका हूँ। इस बोझ से। इस जिंदगी से। इस खुद से।
कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर कोई मुझे समझ ले तो शायद हल्का हो जाऊँ। लेकिन कौन समझेगा? लोग तो सिर्फ डरते हैं।
८ नवंबर २०१९
आज बारिश फिर आई। मैं छत पर खड़ा रहा। पानी में भीगता रहा। ठंड लग रही थी, लेकिन अच्छा लग रहा था। जैसे कुछ धुल रहा हो।
लेकिन कुछ नहीं धुलता। दाग अंदर हैं।
२० नवंबर २०१९
डायरी के आखिरी पन्ने। लिखते हुए हाथ काँप रहे हैं।
मैं नहीं जानता कि आगे क्या होगा। शायद सब खत्म हो जाएगा। शायद और लंबा चलेगा।
बस इतना कहना चाहता हूँ—जो भी मैं हूँ, मैंने कभी चाहा नहीं था। ये सब खुद हो गया। धीरे-धीरे। बिना बताए।
अगर कोई कभी ये डायरी पढ़े, तो समझ लेना कि अंदर कोई राक्षस नहीं था। बस एक आदमी था जो खो गया था। और वापस नहीं आ सका।
अंत।
— विजय शर्मा एरी
(यह एक काल्पनिक डायरी है। इसमें किसी भी हिंसा के तरीकों या विवरण का वर्णन नहीं किया गया है। यह केवल एक व्यथित मन की आंतरिक अशांति, अकेलापन और मनोवैज्ञानिक संघर्ष को दर्शाती है।)