बंद कमरे की खिड़की
शहर के पुराने मोहल्ले में एक छोटा-सा मकान था। उस मकान की दूसरी मंज़िल पर एक कमरा हमेशा बंद रहता था।
उस कमरे के बारे में पड़ोस में तरह-तरह की बातें होती थीं। कोई कहता था कि वहाँ पुराना सामान रखा है, तो कोई कहता था कि उस कमरे में किसी की यादें कैद हैं।
उसी घर में सोलह साल की रिया अपनी माँ के साथ रहती थी।
रिया को बचपन से उस बंद कमरे के बारे में जानने की इच्छा थी।
एक दिन उसने माँ से पूछ ही लिया, “माँ, ऊपर वाला कमरा हमेशा बंद क्यों रहता है?”
माँ कुछ पल चुप रही।
फिर बोली, “उस कमरे के बारे में मुझसे कभी मत पूछना।”
रिया को माँ का जवाब और भी अजीब लगा।
एक रात तेज़ बारिश हो रही थी। अचानक घर की बिजली चली गई। रिया मोमबत्ती लेने ऊपर गई तो उसकी नजर उस बंद कमरे के दरवाजे पर पड़ी।
दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं था।
रिया ने धीरे से उसे धक्का दिया।
दरवाजा खुल गया।
कमरे के अंदर धूल जमी थी। एक पुरानी मेज, कुछ किताबें और दीवार पर लगी तस्वीरें थीं।
रिया ने एक तस्वीर उठाई।
उसमें उसकी माँ एक छोटे बच्चे के साथ मुस्कुरा रही थी।
लेकिन वह बच्चा रिया नहीं था।
तभी पीछे से माँ की आवाज आई—
“तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
रिया डरकर पलटी।
माँ की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि गहरा दुख था।
रिया ने तस्वीर आगे करते हुए पूछा, “माँ… ये कौन है?”
माँ की आँखों से आँसू निकल आए।
“तुम्हारा बड़ा भाई।”
रिया हैरान रह गई।
“मेरा भाई?”
माँ ने धीरे-धीरे सारी बात बताई।
रिया का एक बड़ा भाई था—आरव। वह उससे बहुत प्यार करता था। बचपन में दोनों साथ खेलते थे। लेकिन एक दिन आरव को शहर से बाहर पढ़ने का मौका मिला और वह चला गया।
जाने से पहले उसने रिया के लिए एक छोटी-सी डायरी खरीदी थी।
उसने कहा था, “जब तुम बड़ी हो जाओगी, इसमें अपने सारे सपने लिखना।”
लेकिन आरव वापस नहीं आया।
उसके साथ रास्ते में एक गंभीर दुर्घटना हुई थी और उसकी मृत्यु हो गई थी।
उसके बाद माँ ने उस कमरे को बंद कर दिया था, क्योंकि वहाँ आरव की सारी चीजें रखी थीं।
रिया चुपचाप रोने लगी।
माँ ने मेज की दराज खोली और एक पुरानी डायरी निकाली।
“ये तुम्हारे लिए छोड़ गया था।”
रिया ने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“मेरी छोटी बहन रिया के लिए।”
आगे लिखा था—
“जब तुम यह पढ़ोगी, तब शायद मैं तुम्हारे पास न रहूँ। लेकिन मेरी एक बात हमेशा याद रखना—डर की वजह से अपने सपनों को कभी छोटा मत करना।”
रिया की आँखों से आँसू गिरने लगे।
डायरी के आखिरी पन्ने पर आरव ने लिखा था—
“रिया एक दिन अपनी माँ को बहुत गर्व महसूस करवाएगी।”
उस दिन रिया ने पहली बार समझा कि उसकी माँ उस कमरे को क्यों बंद रखती थी।
वह कमरा सिर्फ चार दीवारों का नहीं था।
उसमें एक माँ का दर्द और एक भाई के अधूरे सपने रखे थे।
रिया ने माँ का हाथ पकड़ा और कहा, “माँ, अब ये कमरा बंद मत करना।”
माँ ने पूछा, “क्यों?”
रिया मुस्कुराई और बोली—
“क्योंकि आरव भैया की यादों को कैद नहीं रखना चाहिए। उन्हें हमारे साथ जीना चाहिए।”
माँ ने पहली बार कई साल बाद उस कमरे की खिड़की खोल दी।
बारिश रुक चुकी थी।
खिड़की से सुबह की हल्की रोशनी कमरे में आई।
रिया ने डायरी अपने सीने से लगा ली।
उसे लगा जैसे आरव कहीं दूर से कह रहा हो—
“अब तुम्हारी बारी है, रिया।”