प्यारा भूत Deepak Kumar Tiwari द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्यारा भूत



रामपुर नाम का एक छोटा और बेहद खूबसूरत गाँव था। उस गाँव के किनारे से ही एक बहुत बड़ा और घना जंगल शुरू होता था। 


गाँव के लोग उस जंगल की सीमा पर जाने से भी डरते थे, क्योंकि वहाँ जंगली जानवरों का बसेरा था। इसी गाँव में गोपाल नाम का एक चौदह वर्ष का लड़का रहता था।

गोपाल स्वभाव से बहुत ही सीधा, सरल और स्वाभिमानी था। उसके पिता का साया बचपन में ही उसके सिर से उठ गया था, इसलिए वह अपनी बूढ़ी माँ के साथ एक छोटी सी मिट्टी की झोपड़ी में रहता था। 


घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। गोपाल की माँ गाँव के लोगों के कपड़े धोकर और सिलाई करके जैसे-जैसे घर का गुजारा चलाती थी। गोपाल भी अपनी माँ की मदद करने के लिए उत्सुक रहता था। वह हर सुबह जल्दी उठता था और अपनी कुल्हाड़ी लेकर निकल पड़ता था।

गोपाल का रोज का नियम था कि वह जंगल के बाहरी हिस्सों से सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा करता था। उन लकड़ियों के गट्ठर को वह दोपहर में पास के शहर के बाजार में जाकर बेच आता था।


इससे जो थोड़े-बहुत पैसे मिलते, उससे उनके घर का चूल्हा जलता था। गाँव के कुछ अमीर और घमंडी लोग गोपाल की गरीबी का मजाक उड़ाते थे।


विशेषकर गाँव का जमींदार धनसुख, जो बहुत ही क्रूर और लालची स्वभाव का था, गोपाल को हमेशा नीची नजर से देखता था। धनसुख चाहता था कि गोपाल उसकी बंधुआ मजदूरी करे, लेकिन गोपाल मेहनत करके सम्मान से जीना चाहता था।


एक दिन की बात है, आसमान में काले बादल छाए हुए थे और मौसम थोड़ा ठंडा था। गोपाल हमेशा की तरह अपनी कुल्हाड़ी उठाकर जंगल की तरफ चल दिया। उसे नहीं पता था कि आज का दिन उसकी जिंदगी बदलने वाला है।


जंगल के शुरुआती हिस्से में गोपाल को उस दिन सूखी लकड़ियाँ नहीं मिलीं। गाँव के अन्य लोग भी वहाँ से लकड़ियाँ बीन ले गए थे। 


गोपाल ने सोचा कि अगर वह आज खाली हाथ घर लौटा, तो माँ रात का खाना कैसे बनाएगी? इसी चिंता में वह जंगल के और अंदर जाने लगा। चलते-चलते वह उस रास्ते पर आ गया जहाँ आज तक गाँव का कोई भी व्यक्ति नहीं आया था। 


यहाँ के पेड़ बहुत पुराने, विशाल और डरावने थे। उनकी टहनियाँ इस तरह आपस में गुंथी हुई थीं कि सूरज की रोशनी जमीन तक पहुँच ही नहीं पा रही थी। 


चारों तरफ एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। गोपाल को अब समझ आ गया था कि वह रास्ता भटक चुका है। उसने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन उसे हर तरफ सिर्फ घनी झाड़ियाँ और बड़े-बड़े पत्थर ही दिखाई दे रहे थे।



तभी अचानक मौसम और खराब हो गया और तेज हवाएं चलने लगीं। दिन के समय ही जंगल में पूरी तरह अंधेरा छा गया। गोपाल का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने हिम्मत जुटाई और एक दिशा में चलना शुरू किया, इस उम्मीद में कि शायद उसे गाँव का कोई रास्ता मिल जाए।



लेकिन वह जितना आगे बढ़ता, जंगल उतना ही घना होता जाता। पक्षियों की चहचहाहट बंद हो चुकी थी और जंगली जानवरों की दूर से आती आवाजें गोपाल के रोंगटे खड़े कर रही थीं।

उसने जोर से आवाज लगाई, "कोई है? कृपया मेरी मदद करो!" लेकिन उसकी अपनी ही आवाज गूंजकर उसके पास वापस आ गई। थका-हारा गोपाल एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गया। वह अपनी कुल्हाड़ी को छाती से सटाकर भगवान को याद करने लगा।




अचानक सामने की झाड़ियों में एक तेज सरसराहट हुई। गोपाल चौंक कर खड़ा हो गया। अंधेरे में उसे तीन जोड़ी चमकदार आँखें दिखाई दीं। वे भूखे और आदमखोर जंगली भेड़िये थे। उनके मुँह से लार टपक रही थी और वे गोपाल को अपना शिकार बनाने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। 



गोपाल ने अपनी कुल्हाड़ी कसकर पकड़ ली, लेकिन वह जानता था कि वह अकेला तीन खूंखार भेड़ियों का मुकाबला नहीं कर पाएगा। भेड़ियों ने गुर्राते हुए गोपाल पर हमला करने के लिए हवा में छलांग लगाई। 


डर के मारे गोपाल की आँखों से आँसू निकल आए और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। वह अपनी मौत का इंतजार करने लगा। ठीक उसी पल, जंगल में एक जोरदार और अलौकिक नीली रोशनी चमकी, जिससे पूरा इलाका जगमगा उठा।


उस तेज रोशनी के साथ ही एक ऐसी भयंकर और गूंजती हुई दहाड़ सुनाई दी, जिसे सुनकर भेड़िये हवा में ही ठिठक गए। गोपाल ने डरते-डरते अपनी एक आँख खोली। 


उसने देखा कि उसके और भेड़ियों के बीच एक नीले रंग की, पारदर्शी और धुएं जैसी आकृति खड़ी है। वह आकृति हवा में तैर रही थी। उस आकृति ने अपनी आँखें बड़ी कीं और भेड़ियों की तरफ देखकर एक बार फिर जोर से चिल्लाया।


उस आवाज में इतनी ताकत थी कि तीनों भेड़िये डर के मारे दुम दबाकर पीछे भागे और देखते ही देखते झाड़ियों में गायब हो गए। गोपाल हक्का-बक्का होकर उस आकृति को देखता रहा। उसके पैर कांप रहे थे और वह समझ गया था कि यह कोई इंसान नहीं, बल्कि एक भूत है।


वह आकृति धीरे से मुड़ी और गोपाल के सामने आकर हवा में स्थिर हो गई। गोपाल डर के मारे जमीन पर गिर पड़ा और हाथ जोड़कर कहने लगा, "मुझे मत मारो! मैं एक गरीब लड़का हूँ, मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है?" गोपाल की बात सुनकर वह भूत अजीब तरह से मुस्कुराया। 




उसका चेहरा डरावना नहीं था, बल्कि वह एक गोल-मटोल, मासूम और प्यारे बच्चे जैसा दिख रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें चमक रही थीं। भूत ने बहुत ही कोमल और सुरीली आवाज में कहा, "डरो मत, मेरे दोस्त! मैं तुम्हें नुकसान पहुँचाने नहीं, बल्कि तुम्हारी जान बचाने आया हूँ। मेरा नाम नीलू है, और मैं इस जंगल का रक्षक हूँ।" भूत की इतनी प्यारी आवाज सुनकर गोपाल का डर थोड़ा कम हुआ।


गोपाल ने उठकर अपने कपड़े साफ किए और अचरज से पूछा, "क्या तुम सचमुच भूत हो? मैंने तो सुना था कि भूत बहुत डरावने होते हैं और इंसानों को खा जाते हैं।" नीलू जोर से हंसा, उसकी हंसी से हवा में छोटे-छोटे चमकीले सितारे तैरने लगे।



नीलू ने कहा, "सब भूत बुरे नहीं होते। मैं सदियों से इस जंगल में अकेला रहता हूँ। यहाँ के पेड़-पौधे और जीव-जंतु ही मेरे परिवार हैं। मैंने तुम्हें कई दिनों से जंगल से सूखी लकड़ियाँ ले जाते देखा है। तुम कभी हरे पेड़ों को नुकसान नहीं पहुँचाते, इसलिए मुझे तुम बहुत पसंद हो।" नीलू की बातों की सच्चाई देखकर गोपाल के मन का सारा डर गायब हो गया। दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए और बातें करने लगे।




नीलू ने गोपाल को बताया कि इस जंगल में कई तरह के खतरे हैं, जैसे जादुई दलदल, जहरीले सांप और आदमखोर जानवर। लेकिन अब गोपाल को डरने की जरूरत नहीं थी क्योंकि नीलू उसका दोस्त बन चुका था। बातों ही बातों में सुबह हो गई। नीलू ने गोपाल को जंगल का एक ऐसा गुप्त हिस्सा दिखाया जहाँ चारों तरफ मीठे और रसीले फलों के पेड़ थे। नीलू ने अपनी शक्तियों से पेड़ के सबसे ऊंचे हिस्से से ताजे फल तोड़कर गोपाल को दिए। गोपाल ने इतने मीठे फल अपनी जिंदगी में कभी नहीं खाए थे। इसके बाद नीलू ने पलक झपकते ही जंगल की सबसे अच्छी और सूखी लकड़ियों का एक बड़ा सा गट्ठर तैयार कर दिया, जिसे उठाना गोपाल के लिए बहुत आसान था।




अब गोपाल के घर लौटने का समय हो गया था। नीलू गोपाल को जंगल के उस मुहाने तक छोड़ने आया जहाँ से रामपुर गाँव का रास्ता साफ दिखाई देता था। विदा होते समय नीलू थोड़ा उदास हो गया। 


उसने अपनी धुएं जैसी उंगलियों से हवा में एक आकृति बनाई और देखते ही देखते वह आकृति एक छोटी, सुंदर लकड़ी की बांसुरी में बदल गई। नीलू ने वह बांसुरी गोपाल को देते हुए कहा, "यह हमारी दोस्ती की निशानी है। 


जब भी तुम कभी किसी बड़ी मुसीबत में फँस जाओ और तुम्हें मेरी मदद की जरूरत हो, तो बस इस बांसुरी को निकालकर एक मीठी धुन बजा देना। मैं चाहे जहाँ भी रहूँ, तुम्हारी पुकार सुनकर तुरंत तुम्हारे पास पहुँच जाऊँगा।"


गोपाल ने उस जादुई बांसुरी को बहुत संभालकर अपनी जेब में रख लिया। उसने नीलू को धन्यवाद दिया और अपने गाँव की तरफ चल पड़ा। जब वह घर पहुँचा, तो उसकी माँ बहुत चिंतित थी। 



गोपाल को सुरक्षित देखकर उसकी माँ के जीवन में जान आई। जब गोपाल ने लकड़ियों का गट्ठर खोला, तो माँ हैरान रह गई। वे लकड़ियाँ बहुत ही कीमती चंदन और सूखी सागौन की थीं। उस दिन बाजार में उन लकड़ियों के बहुत अच्छे पैसे मिले। 


गोपाल ने माँ के लिए नए कपड़े और घर के लिए ढेर सारा राशन खरीदा। अब यह गोपाल का रोज का नियम बन गया। वह जंगल जाता, नीलू से मिलता, दोनों खूब खेलते और नीलू उसकी मदद करता।


धीरे-धीरे गोपाल के दिन बदलने लगे। उसकी झोपड़ी की मरम्मत हो गई और उसकी माँ भी अब खुश रहने लगी थी। लेकिन गोपाल की यह तरक्की गाँव के लालची जमींदार धनसुख की आँखों में खटकने लगी। धनसुख को अचरज होता था कि जो लड़का कल तक दाने-दाने को मोहताज था, वह अचानक इतना समृद्ध कैसे हो रहा है? धनसुख ने अपने वफादार मुनीम को गोपाल पर नजर रखने के लिए कहा। 



मुनीम ने कई दिनों तक पीछा किया, लेकिन उसे बस यही समझ आया कि गोपाल जंगल के बहुत अंदर जाता है। जमींदार धनसुख को शक हो गया कि गोपाल को जंगल में कोई पुराना खजाना या गुप्त धन मिल गया है, जिसे वह छुपाकर बेच रहा है।




जमींदार धनसुख ने गोपाल से वह खजाना छीनने की योजना बनाई। उसने गोपाल को अपने महल में बुलाया और कहा, "गोपाल, मुझे पता चला है कि तुम्हें जंगल में कोई खजाना मिला है। वह जंगल मेरी रियासत में आता है, इसलिए उस खजाने पर मेरा हक है। चुपचाप वह खजाना मेरे हवाले कर दो।" 





गोपाल ने पूरी ईमानदारी से कहा, "मालिक, मुझे कोई खजाना नहीं मिला। मैं तो बस मेहनत की कमाई खाता हूँ।" लेकिन लालची जमींदार को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ। गोपाल के मना करने पर धनसुख गुस्से से लाल-पीला हो गया। उसने गोपाल को सबक सिखाने और उसे पूरी तरह बर्बाद करने की एक बेहद घिनौनी साजिश रचने का फैसला किया।




उसी रात, जब पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था, जमींदार धनसुख ने अपने मुनीम को एक काम सौंपा। धनसुख के पास सोने का एक बहुत ही कीमती और पुश्तैनी हार था, जिसमें बड़े-बड़े हीरे जड़े थे। उसने वह हार मुनीम को दिया और कहा, "जाओ, और चुपके से इस हार को गोपाल की झोपड़ी में छिपा दो। ध्यान रहे, किसी को भनक भी नहीं लगनी चाहिए।" 



मुनीम दबे पाँव गोपाल के घर पहुँचा। गोपाल और उसकी माँ आंगन में सो रहे थे। मुनीम ने खिड़की से हाथ डालकर रसोई में रखे अनाज के एक पुराने डिब्बे के अंदर वह कीमती सोने का हार छुपा दिया और बिना कोई आवाज किए वहाँ से भाग निकला।






अगली सुबह होते ही जमींदार के महल से रोने और चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। धनसुख ने पूरे गाँव को इकट्ठा कर लिया और शोर मचाने लगा, "अरे दौड़ो! गजब हो गया! कोई रात में मेरे सोने का पुश्तैनी हार चोरी करके ले गया!" गाँव के लोग इकट्ठा हो गए। 


धनसुख ने सीधे गोपाल की तरफ उंगली उठाई और कहा, "मुझे पूरा यकीन है कि यह चोरी इसी गोपाल ने की है। इसके दिन अचानक बदल गए हैं, यह चोर है!" गोपाल और उसकी माँ भी वहाँ मौजूद थे। यह झूठा आरोप सुनकर गोपाल के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने रोते हुए कहा, "मालिक, मैंने कभी सपने में भी चोरी नहीं की। मैं बेकसूर हूँ।"





लेकिन जमींदार धनसुख ने एक न सुनी। वह गाँव के मुखिया और पुलिस के कुछ सिपाहियों को लेकर सीधे गोपाल की झोपड़ी पर पहुँच गया। धनसुख के आदमियों ने गोपाल के घर का सारा सामान बाहर फेंकना और तलाशी लेना शुरू कर दिया। गोपाल की माँ कोने में खड़ी रो रही थी और भगवान से प्रार्थना कर रही थी।


तभी एक सिपाही रसोई की तरफ गया और उसने अनाज का वह डिब्बा पलटा। डिब्बे से सारा अनाज जमीन पर बिखर गया और उसके साथ ही वह चमचमाता हुआ सोने का हार भी बाहर गिर पड़ा। हार देखते ही जमींदार चिल्लाया, "देखो! चोर रंगे हाथों पकड़ा गया! अब क्या कहोगे गोपाल?"




गोपाल और उसकी माँ यह देखकर स्तब्ध रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वह हार उनके घर में कैसे आया। गाँव के लोग भी गोपाल को थू-थू करने लगे। पुलिस के सिपाहियों ने बिना कोई देर किए गोपाल के हाथों में लोहे की भारी हथकड़ियाँ पहना दीं। गोपाल रोता रहा, चिल्लाता रहा कि वह बेकसूर है, लेकिन कानून को सबूत चाहिए थे और सबूत गोपाल के खिलाफ था। 



सिपाही गोपाल को खींचते हुए गाँव से बाहर ले जाने लगे। जमींदार धनसुख पीछे खड़ा दुष्टता भरी मुस्कान के साथ मूंछों पर ताव दे रहा था। गोपाल को शहर की सबसे बड़ी और सुरक्षित जेल की तरफ ले जाया गया।


शहर की जेल बहुत ही डरावनी और विशाल थी। गोपाल को एक ऐसी कालकोठरी में बंद कर दिया गया जहाँ सूरज की एक किरण भी नहीं आती थी। कोठरी की दीवारें ठंडी और सीलन भरी थीं। पुलिस ने उसे एक अपराधी की तरह फर्श पर धकेल दिया और लोहे का भारी दरवाजा बंद करके ताला लगा दिया। 



गोपाल घुटनों के बल बैठ गया और फूट-फूट कर रोने लगा। उसे अपनी बेगुनाही से ज्यादा अपनी बूढ़ी माँ की चिंता सता रही थी, जो गाँव में अकेली रह गई थी। उसे लगा कि अब उसकी पूरी जिंदगी इसी अंधेरी कोठरी में सड़ते हुए बीत जाएगी और वह कभी अपनी माँ को नहीं देख पाएगा।




रोते-रोते रात के बारह बज गए। अचानक गोपाल को महसूस हुआ कि उसकी फटी हुई जेब में कोई सख्त चीज चुभ रही है। उसने जेब में हाथ डाला तो उसकी उंगलियां उस लकड़ी की बांसुरी से छुईं, जो नीलू ने उसे दी थी। 



जेल के सिपाहियों ने तलाशी लेते समय इसे एक साधारण लकड़ी का टुकड़ा समझकर छोड़ दिया था। गोपाल की आँखों में उम्मीद की एक चमक जागी। उसने बांसुरी को अपने होठों से लगाया और एक बहुत ही दर्दभरी लेकिन मीठी धुन बजानी शुरू की। बांसुरी की आवाज जेल की कोठरी की सलाखों से होते हुए सन्नाटे को चीरती हुई गूंजने लगी।


जैसे ही धुन समाप्त हुई, कालकोठरी की छोटी सी खिड़की से ठंडी हवा का एक तेज झोंका अंदर आया। उस हवा के साथ ही नीले रंग का चमकीला धुआं कोठरी के अंदर भरने लगा। देखते ही देखते वह धुआं इकट्ठा हुआ और गोपाल का प्यारा दोस्त, भूत नीलू, उसके सामने प्रकट हो गया। 


नीलू के चेहरे पर हमेशा रहने वाली मुस्कान गायब थी। अपने प्यारे दोस्त को हथकड़ियों में जकड़े और रोते हुए देखकर नीलू की आँखें गुस्से से लाल हो गईं। उसने भारी आवाज में पूछा, "गोपाल! मेरे भाई! तुम्हारी यह हालत किसने की? मुझे बताओ, मैं इस पूरी जेल को अभी तबाह कर दूँगा!"




गोपाल ने तुरंत नीलू को रोका और कहा, "नहीं नीलू! ऐसा मत करना। अगर तुम जेल तोड़ोगे, तो लोग मुझे सचमुच का अपराधी मान लेंगे। मैं बेकसूर हूँ।" इसके बाद गोपाल ने आदि से अंत तक जमींदार धनसुख की साजिश और हार के घर में मिलने की पूरी कहानी नीलू को सुनाई। 



सब सुनकर नीलू का गुस्सा शांत हुआ और उसकी जगह उसके शातिर दिमाग ने ले ली। उसने मुस्कुराते हुए गोपाल से कहा, "तुम फिक्र मत करो दोस्त। ताकत से ज्यादा बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए। जिसने तुम्हें इस अंधेरे में भेजा है, अब उसे सबक सिखाने की बारी मेरी है। तुम बस सुबह तक का इंतजार करो।"


नीलू उसी समय हवा में गायब हो गया और उड़ता हुआ वापस रामपुर गाँव पहुँचा। रात के करीब दो बज रहे थे और जमींदार धनसुख अपने आलीशान महल के मखमली बिस्तर पर गहरी नींद सो रहा था। वह सपने में देख रहा था कि उसने गोपाल को रास्ते से हटा दिया है और अब वह जंगल का सारा खजाना हड़प लेगा। 




तभी अचानक उसके कमरे का तापमान बहुत कम हो गया, मानो बर्फ पिघल रही हो। कमरे की सभी मोमबत्तियाँ और लालटेन अपने आप बुझ गईं। धनसुख को अचानक बहुत तेज ठंड लगने लगी। उसने कंबल को ऊपर तक ओढ़ लिया, लेकिन तभी उसका पूरा बिस्तर हवा में तीन फीट ऊपर उठ गया।




बिस्तर के हवा में उठते ही धनसुख की आँख खुल गई। उसने जब खुद को हवा में तैरते देखा, तो उसके डर के मारे होश उड़ गए। उसने चिल्लाने की कोशिश की, लेकिन उसके मुँह से आवाज नहीं निकली। तभी कमरे के कोने से एक भयानक नीली रोशनी निकली और नीलू का विशाल रूप धनसुख के सामने आ खड़ा हुआ। 



इस बार नीलू प्यारा नहीं, बल्कि बहुत ही डरावना लग रहा था। उसकी आँखें अंगारे की तरह सुलग रही थीं और उसके डरावने दांत बाहर निकले हुए थे। नीलू ने अपनी आवाज को बिजली की कड़क जैसा भारी बनाया और बोला, "धनसुख! दुष्ट इंसान! तूने एक बेकसूर पर जुल्म किया है!"



जमींदार धनसुख डर के मारे थर-थर कांपने लगा। वह बिस्तर से नीचे गिर पड़ा और नीलू के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा, "मुझे माफ कर दो! तुम कौन हो? मुझे मत मारो!" नीलू ने हवा में कुछ कीमती बर्तनों और झूमरों को उड़ाया और उन्हें दीवार पर मारकर तोड़ दिया। नीलू ने कहा, "मैं गोपाल का रक्षक हूँ! तूने जो सोने का हार चुराकर उसके घर में रखवाया था, उसका सच अगर तूने सुबह तक पूरी दुनिया के सामने नहीं कबूला, तो मैं तेरे इस पूरे महल को मलबे के ढेर में बदल दूँगा और तुझे अपने साथ पाताल लोक ले जाऊँगा!"




नीलू बहुत समझदार था। उसने यह सब ड्रामा करने से पहले ही अपनी जादुई शक्ति से गाँव के मुखिया और शहर के पुलिस कमिश्नर को, जो पास के डाक बंगले में ठहरे हुए थे, अदृश्य रूप से जमींदार के कमरे की खिड़की के बाहर खड़ा कर दिया था।



वे दोनों बाहर खड़े होकर अंदर का सारा नजारा देख रहे थे और सुन रहे थे। मौत को अपने सामने देखकर जमींदार धनसुख का सारा घमंड चूर-चूर हो गया। वह जोर-जोर से रोते हुए चिल्लाया, "हाँ! हाँ! मुझसे गलती हो गई! हार गोपाल ने नहीं चुराया था! मैंने ही अपने मुनीम से कहकर वह हार गोपाल के घर में छिपवाया था ताकि मैं उसे जेल भिजवा सकूँ! मुझे छोड़ दो!"


जैसे ही धनसुख ने अपना जुर्म कबूला, खिड़की का दरवाजा जोर से खुला। पुलिस कमिश्नर और गाँव के मुखिया टॉर्च लेकर कमरे के अंदर दाखिल हुए। पुलिस कमिश्नर को देखकर जमींदार को लगा कि वह बच गया, उसने कहा, "साहब, देखिए यहाँ भूत है!" 




लेकिन नीलू तब तक अदृश्य हो चुका था। पुलिस कमिश्नर ने गुस्से में धनसुख को थप्पड़ मारा और कहा, "कोई भूत नहीं है! हमने अपने कानों से तुम्हारा कबूलनामा सुना है। तुमने एक गरीब और बेकसूर लड़के को फंसाने के लिए कानून का इस्तेमाल किया।" पुलिस ने तुरंत धनसुख और उसके मुनीम को गिरफ्तार कर लिया।




अगली सुबह, शहर की जेल का दरवाजा पूरे सम्मान के साथ गोपाल के लिए खोल दिया गया। पुलिस कमिश्नर ने खुद गोपाल से माफी मांगी और उसकी हथकड़ियाँ खोलीं। जब गोपाल जेल से बाहर आया, तो उसने देखा कि सामने उसकी माँ और गाँव के बहुत से लोग खड़े थे। 



गाँव के मुखिया ने आगे बढ़कर गोपाल को गले लगाया और कहा, "बेटे, हमें माफ कर दो। हमने तुम्हारी ईमानदारी पर शक किया।" मुखिया ने घोषणा की कि जमींदार धनसुख की सजा के तौर पर उसकी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा गोपाल और उसकी माँ को हर्जाने के रूप में दिया जाएगा।


गोपाल अपनी माँ के साथ वापस अपने गाँव रामपुर लौटा। अब वे अमीर हो चुके थे। उन्होंने अपने लिए एक सुंदर और बड़ा घर बनाया, लेकिन गोपाल ने अपनी सादगी नहीं छोड़ी। गाँव वापस आते ही गोपाल सबसे पहले हाथ में अपनी बांसुरी लेकर जंगल की तरफ भागा। 



उसने जंगल के अंदर जाकर बांसुरी बजाई। धुन सुनते ही नीलू मुस्कुराता हुआ प्रकट हुआ। इस बार वह फिर से वही प्यारा और गोल-मटोल भूत बन चुका था। गोपाल ने दौड़कर नीलू को गले लगा लिया। गोपाल की आँखों में आँसू थे, उसने कहा, "नीलू, अगर तुम न होते तो मैं कभी सच साबित नहीं कर पाता।"




नीलू ने गोपाल की पीठ थपथपाई और कहा, "दोस्त ही दोस्त के काम आता है, गोपाल।" गोपाल अपनी माँ को भी जंगल में ले आया और नीलू से मिलवाया। माँ पहले तो थोड़ा झिझकीं, लेकिन नीलू का प्यारा स्वभाव देखकर उन्होंने उसे अपने बेटे जैसा प्यार दिया। 



माँ ने घर से लाकर नीलू को अपने हाथ से बनी हुई स्वादिष्ट चावल की खीर खिलाई। नीलू को खीर इतनी पसंद आई कि वह खुशी से हवा में गुलाटियाँ मारने लगा। अब रामपुर गाँव के लोग भी जान चुके थे कि जंगल में एक रक्षक भूत रहता है, जो केवल बुरे लोगों को सजा देता है।





अब गाँव के लोगों ने जंगल के पेड़ों को काटना और जानवरों का शिकार करना पूरी तरह बंद कर दिया था। प्रकृति और इंसानों के बीच एक बहुत ही सुंदर रिश्ता बन गया था। जमींदार धनसुख को उसके किए की सजा मिल चुकी थी और वह जेल में चक्की पीस रहा था। 


गोपाल और प्यारे भूत नीलू की अनोखी दोस्ती की कहानियाँ पूरे इलाके में मशहूर हो गईं। वे दोनों हर शाम जंगल के मुहाने पर बैठते, गोपाल बांसुरी बजाता और नीलू हवा में तैरते हुए थिरकता। उनकी यह अमर और निस्वार्थ दोस्ती सदियों तक आने वाली पीढ़ियों के लिए प्यार और विश्वास की मिसाल बन गई।