सौदा RAVINDRA द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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सौदा

गाँव के छोर पर खड़ी वो पुरानी ईंटों की हवेली सिर्फ एक मकान नहीं थी बल्कि तीन पीढ़ियों के खून पसीने और अनगिनत उम्मीदों की एक ऐसी जीवंत दास्तान थी जिसकी हर एक दीवार पर संघर्ष की अनकही कहानियां दर्ज थीं। हवेली के सहन में नीम का वो पुराना पेड़ आज भी वैसे ही शान से खड़ा था जिसके छांव में बैठकर भवानीप्रसाद ने अपने तीनों बेटों को उंगलियों से पकड़कर इस दुनिया में चलना सिखाया था।

उस पेड़ के नीचे बैठकर जाड़े की सर्द रातों में तीनों भाई एक ही फटी हुई पुरानी चादर ओढ़कर आपस में लिपट जाते थे और बड़े अरमानों से अपने आने वाले कल के सुनहरे सपने देखा करते थे। तब किसी ने नहीं सोचा था कि वक्त का यह पहिया एक दिन ऐसा क्रूर फेर लेगा कि अपनों के खून के रिश्ते ही अपनों की जान के दुश्मन बन जाएंगे। वक्त की आंधी ने ऐसी करवट ली कि घर की भीषण तंगी ने बूढ़े भवानीप्रसाद की कमर तोड़ कर रख दी और घर के हालात दिनोंदिन बद से बदतर होने लगे।

घर में चूल्हा जले और सबकी थाली में दो जून की रोटी का सही जुगाड़ हो सके इसके लिए सबसे बड़े बेटे तन्मय और मझले बेटे अनिकेत ने अपनी जवानी की सारी उमंग और खुशियों को खेतों की मिट्टी में हमेशा के लिए गाड़ दिया। दोनों भाइयों ने कभी अपने लिए एक जोड़ी नए कपड़े तक नहीं खरीदे ताकि वे अपनी पाई पाई बचाकर सबसे छोटे भाई करण को शहर भेज सकें। करण पढ़ाई लिखाई में बड़ा तेज था और उसकी आँखों में शहर की बड़ी दुनिया देखने के सपने पलते थे। तन्मय और अनिकेत दिन रात हल चलाते चिलचिलाती धूप में अपनी पीठ झुलसाते और जब शरीर पसीने से पूरी तरह भीग जाता तब भी वे रुकते नहीं थे क्योंकि उन्हें पता था कि उनके परिश्रम पर ही उनके छोटे भाई का भविष्य टिका हुआ है। वे खेत से जो भी चंद पैसे बचाते उन्हें मनीऑर्डर के जरिए तुरंत शहर भेज देते ताकि उनका छोटा भाई किसी भी चीज से महरूम न रहे और बिना किसी आर्थिक संकट के अपनी पढ़ाई पूरी कर सके।

​कल्याणी माँ आँगन की मुंडेर पर बैठकर रोज शाम को ढलते सूरज के साथ भगवान से यही एक दुआ मांगती कि उनका सबसे छोटा बेटा शहर में पढ़ लिखकर कोई बड़ा आदमी बने और पूरे परिवार का नाम रोशन करे। और ठीक वैसा ही हुआ भी। अपनी खुद की खून पसीने की मेहनत और दोनों बड़े भाइयों के अंतहीन त्याग के दम पर करण ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली और शहर में एक बड़ी नौकरी तथा नामी रुतबे वाली जिंदगी में पूरी तरह सेट हो गया। उसके पास अब अपनी शानदार गाड़ियां थीं आलीशान कोठी थी और सूट बूट पहनने वाली एक ऐसी चमकती हुई दुनिया थी जिसके बारे में गाँव के लोग सपने में भी नहीं सोच सकते थे। शुरुआत के कुछ साल तो सब कुछ बहुत अच्छा और सुहाना रहा।

करण साल में एक दो बार त्योहारों पर गाँव आता माँ के हाथ का बना गरमागरम खाना खाता और दोनों भाइयों के गले लगकर खूब बातें करता। लेकिन जैसे जैसे शहर की अंधी चकाचौंध और भौतिक दौलत उसकी रगों में उतरी उसकी भाषा का लहजा और उसकी पूरी सोच ही पूरी तरह बदल गई। उसके लिए अब वो पुराना गाँव वो धूल मिट्टी से भरे रास्ते और वो बुजुर्गों की बनाई टूटी हुई हवेली एक बहुत बड़ा बोझ बन चुकी थी। उसके शहर के नए रईस दोस्तों ने उसके कान भर दिए कि तू क्यों अपनी जवानी और बेशकीमती पैसा उस पुराने खंडहर में अटकाए बैठा है। उस पुश्तैनी जमीन और हवेली का आज बाजार में करोड़ों का भाव चल रहा है। तू अपना हिस्सा तुरंत अलग करवा ले और सारा पैसा शहर के नए व्यापार में निवेश कर दे।

​एक सर्द और उदास शाम को करण जब अचानक गाँव लौटा तो वह अपने साथ भाइयों का कोई पुराना प्यार या अपनापन लेकर नहीं बल्कि वकीलों के तैयार किए हुए कड़े कागजात और बँटवारे का पूरा हिसाब लेकर आया था। उसने सहन में कदम रखते ही बहुत ही कड़क और रूखी आवाज में कहा कि तन्मय भैया अब इस पुरानी हवेली और इन बेकार के खेतों को खींचने का कोई भी मतलब नहीं बनता है। शहर में मुझे मेरे नए बिजनेस प्रोजेक्ट के लिए बहुत पैसों की सख्त जरूरत है। इस हवेली और जमीन का अब सौदा कर लेते हैं। जो हिस्सा कानूनन मेरा बनता है वो मुझे सौंप दो ताकि मेरा काम बने। करण की इस बात को सुनते ही पूरे आँगन में एक मौत जैसा सन्नाटा पसर गया।

चूल्हे के पास बैठी कल्याणी माँ के कांपते हाथों से पानी का भरा हुआ लोटा छूटकर सीधे जमीन पर गिर पड़ा और पानी बिखर गया। तन्मय अछम्भे की हालत में अपने उसी छोटे भाई को एकटक देखता रह गया जिसके भविष्य को संवारने के लिए उसने अपनी पूरी जिंदगी धूप में जला दी थी। मझला भाई अनिकेत पास ही खड़ा सब कुछ सुन रहा था। उसके भीतर का दबा हुआ गुस्सा एक ही झटके में पूरी तरह खौल उठा। अनिकेत ने आगे बढ़कर कड़े शब्दों में कहा कि करण जिस घर की एक एक ईंट को हमने अपने खून और पसीने से सींचा है जिस मिट्टी को हमने माँ का दर्जा देकर पूजा है आज तू उसी का सौदा करने चला है। तुझे जरा भी शर्म या हया नहीं आई यह घटिया बात कहते हुए।

​बात बहुत ज्यादा बढ़ गई और घर का माहौल पूरी तरह जहरीला हो गया। करण अपनी जिद पर पूरी तरह अड़ा रहा कि उसे किसी भी कीमत पर अपना हिस्सा और उन कागजों पर भाइयों के हस्ताक्षर चाहिए ही चाहिए। शहर की अकड़ और अहंकार उसके सिर चढ़कर बोल रहा था। उसने अपने दोनों भाइयों के सालों के अनगिनत त्याग और बलिदान को चंद कागजों के टुकड़ों और नोटों की गड्डियों से तौलकर बहुत छोटा कर दिया। उस रात घर के भीतर जो भयानक तकरार और कलह हुई उसने अंदर से परिवार की नींव को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया।

अगले ही दिन सुबह होते ही उस भयंकर तनाव और मानसिक दबाव के बीच मझला भाई अनिकेत अचानक सीने में उठा असहनीय तेज दर्द सहन नहीं कर पाया। इससे पहले कि उसे गाँव से उठाकर किसी अच्छे अस्पताल ले जाया जाता अनिकेत हमेशा के लिए खामोश होकर इस दुनिया से विदा हो गया। एक ही झटके में उस भरे पूरे घर की मुख्य रीढ़ की हड्डी हमेशा के लिए टूट गई।

​अनिकेत की अर्थी उठने के बाद पूरे गाँव में मातम पसर गया और हर आँख नम हो गई। बड़ा भाई तन्मय अंदर से पूरी तरह बिखर चुका था और उसकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। बूढ़े पिता भवानीप्रसाद और माँ कल्याणी की आँखें लगातार बहते आंसुओं से बिल्कुल पथरा चुकी थीं। उस इतने भयानक और मार्मिक माहौल के बीच भी पत्थर दिल बने करण का एक बार भी दिल नहीं पसीजा। उसने बिना वक्त गंवाए झटपट उन कागजों पर अपने दस्तखत करवा लिए अपना हिस्सा और पुश्तैनी जमीन बेचकर जो भारी रकम मिली उसे अपने बैग में समेटा और बिना एक भी आंसू बहाए वापस अपनी शहर वाली चमकती दुनिया में लौट गया।

​वक्त का पहिया तेजी से घूमता चला गया और समय बीतता गया। करण के बैंक अकाउंट में पैसों के आंकड़े और ज्यादा बढ़ गए। वह शहर के सबसे अमीर और पॉश इलाकों में बड़ी शानो शौकत के साथ अपनी जिंदगी जीने लगा। लेकिन उसके जीवन में एक बहुत अजीब और डरावनी कमी आ गई थी कि उसके पास दुनिया की हर सुख सुविधा थी सिवाय एक अदद सुकून भरी नींद के। जब भी वह रात को अपने आलीशान और महंगे बिस्तर पर सोने के लिए लेटने जाता उसे अपनी उस पुरानी हवेली के सहन का वो नीम का पेड़ बार बार याद आने लगता। उसे हर पल यह याद सताती कि कैसे तन्मय भैया ने अपनी जवानी धूप में जलाकर उसे पढ़ाया था और कैसे अनिकेत ने उसकी जरा सी खुशी के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी थी। उसे बहुत देर से सही पर यह समझ आ गया था कि उसने जिस हवेली और जमीन का सौदा किया था असल में उसने अपने खून के रिश्तों अपनी रूह और अपनी माँ की छांव का बहुत बड़ा सौदा कर लिया था। बैंक में पड़े वो करोड़ों रुपये अब उसके किसी भी काम के नहीं आ रहे थे क्योंकि जब वह रात को बीमार पड़ता या अकेला बैठता तो उसके पास पानी का एक घूंट पूछने वाला भी कोई अपना नहीं होता था।

​एक दिन करण से अकेलेपन का यह बोझ और सहा नहीं गया। उसने अपनी गाड़ी की चाबी उठाई और बेचैन होकर सीधे अपने गाँव की तरफ अपनी गाड़ी भगा दी। गाँव पहुँचकर जब उसने गाड़ी पुश्तैनी घर के बाहर लाकर रोकी तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि घर पहले से कहीं ज्यादा वीरान और खंडहर बन चुका था। बूढ़े पिता भवानीप्रसाद बहुत पहले दुनिया छोड़कर जा चुके थे माँ कल्याणी टूटी हुई खाट पर एकदम बेसुध पड़ी थीं और बड़ा भाई तन्मय घर के एक अंधेरे कोने में गुमसुम बैठकर लगातार आसमान को शून्य की तरफ निहार रहा था। करण से खुद को रोका नहीं गया और वह दौड़कर सीधा तन्मय के पैरों में औंधे मुँह गिर पड़ा और फूट फूटकर दहाड़ मारकर रोने लगा कि भैया मुझे माफ कर दीजिए। मैंने सिर्फ पैसों के लालच में आकर सब कुछ बर्बाद कर दिया लेकिन आज मेरे पास दुनिया की कोई भी खुशी नहीं बची है। मैं अपने कमाए हुए सारे पैसे आपके चरणों में रखता हूँ मुझे बस मेरा वही पुराना घर और आपका पहले जैसा भाई वाला प्यार वापस दे दीजिए।

​तन्मय ने अपनी सूखी हुई और पत्थर जैसी आँखें धीरे से उठाईं और अपने छोटे भाई करण को देखा। उसके चेहरे पर अब कोई भी शिकवा या गुस्सा नहीं बचा था बल्कि वहाँ सिर्फ एक ऐसा गहरा और खामोश सन्नाटा पसरा हुआ था जो सीधे देखने वाले के दिल को चीर कर रख देता था। तन्मय ने बहुत धीमी और भारी आवाज में कहा कि करण कागजों के उस सौदे से जो जमीन तू हमसे छीनकर ले गया था वो तो तू पहले ही बिकवा चुका है लेकिन जो अपनापन और जो पवित्र दिल तू उस शहर के बाजार में बेच आया है उसे खरीदने की ताकत इस दुनिया की किसी भी दौलत में नहीं है। यह सुनकर करण वहीं घर की मिट्टी पर सिर रखकर बच्चों की तरह फूट फूटकर दहाड़ मारकर रोने लगा। उसके पास अब सब कुछ था आलीशान दौलत भी थी और शोहरत की चमक भी थी लेकिन जिंदगी के इस सबसे बड़े और भयानक सौदे में वह सचमुच अपना सब कुछ हमेशा के लिए हार चुका था।

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