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शैल के शब्दों ने दोनों को चौंकाया। क्षणभर दोनों अवाक होकर परस्पर देखते रहे।
“ऐसा नहीं है, शैल।” निहारिका ने नम्र होकर कहा।
“तो क्या चाहते हो? इस प्रकार हमारे मार्ग में बार बार आकर क्या सिद्ध करना चाहते हो?” सरिता ने उग्रता से कहा।
“हम तो आप दोनों की दीक्षा चाहते हैं।” निहारिका ने मीठे स्वर में कहा।
“दीक्षा? कैसी दीक्षा?”
“सन्यास लेने का मेरा कोई आयोजन नहीं है। न ही कोई प्रयोजन है मेरा।”
“नहीं शैल, आपके धर्म की सन्यास वाली वह दीक्षा नहीं।”
“तो कौन सी दीक्षा?”
“हमारे मिशन की दीक्षा, हमारे अभियान की दीक्षा, सरिता जी।”
“वह क्या है?”
“दीक्षा लेते ही हमारा मिशन आपको समझ आ जाएगा।” सपन ने कहा।
“अभी तो यह जान लो कि दीक्षा लेने से धन, समृद्धि आदि का लाभ होता रहेगा। आपकी सभी कामनायें पूर्ण होती रहेगी।” निहारिका ने समझाया।
“आपको स्मरण तो होगा कि आप के पास कल और परसों के केवल दो दिन ही शेष हैं। पश्चात पाकिस्तान लौटना होगा। दीक्षा से आपको जीवनभर पाकिस्तान नहीं लौटना पड़ेगा। भारत में ही रह सकोगी।” सपन ने लालच दिया।
“वह कैसे संभव होगा?”
“सरिता जी, हम आपको नया नाम, नया परिचय देंगे। इस नए नाम अनुसार भारत के पहचान पत्र जैसे -पान कार्ड, चुनाव कार्ड, आधार कार्ड आदि आपको मिल जाएंगे। पश्चात आप को भारत से कोई नहीं निकाल सकता।” निहारिका ने कहा।
“आपके नए परिचय पत्र इस नए नाम – सरिता के नाम से बनवा दें? या कोई अन्य नाम चाहती हैं?”
“मैं तो विदेशी हूँ। शत्रु देश से हूँ। मेरे परिचय पत्र कैसे बन सकते हैं?”
“सरिता जी, वह सब चिंता छोड़ दो।”
“भारत में प्रतिदिन सैंकड़ों की संख्या में बांग्लादेश, म्यांमार और शत्रु देश पाकिस्तान से भी मुस्लिम लोग घुसपैठ करते हैं। उन सब के परिचय जैसे बन जाते हैं वैसे ही आपके भी बन जाएंगे।”
“कैसे बन जाते हैं?”
“हम हैं न। हम बता तो चुके कि हमारे सदस्यों का जाल सभी कार्यालयों में है। सारा तंत्र हमारा ही है।” पुन: अट्टहास किया दोनों ने। इस बार पंखियों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। शैल सरिता ने भी प्रतिक्रिया नहीं दी। इससे सपन निहारिका विचलित हो गए।
“तो आप दीक्षा के लिए सज्ज हो?”
“मैं कल प्रात: काल बताऊँगी।”
“नहीं सरिता जी, अभी बताना होगा। दीक्षा के लिए अभी उचित समय है।”
“निहारिका जी, दीक्षा का उत्तम समय तो प्रात:काल स्नान आदि के पश्चात ही होता है। तो प्रात: काल तक प्रतीक्षा करने में क्या समस्या है?” सरिता ने कहा।
“सरिता जी, हमारे यहाँ दीक्षा रात्री को ही होती है।”
“वह कैसे?”
“अभी रात्री है। आप अभी हमारे साथ चलेंगी। आपकी आँखों पर पट्टी बंद जाएगी। वहाँ हमारे क्षेत्रीय नेता के सम्मुख आपको प्रस्तुत किया जाएगा।”
“ठीक है। पश्चात?” शैल ने पूछा।
“हमारे नेता सरिता जी को अपने कक्ष में ले जाएंगे। वहाँ उन्हें रात्री भर दीक्षा दी जाएगी। प्रात:काल होते ही सरिता जी, आप हमारी सदस्य बन जाओगी।”
“और शैल का क्या होगा?”
“उसे मैं अपने कक्ष में रात्री भर दीक्षा दूँगी। प्रात:काल वह भी सदस्य बन जाएगा।”
“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि निहारिका जी मुझे दीक्षा दें और आपके नेता शैल को?”
“हमारे यहाँ नियम है कि पुरुष को दीक्षा स्त्री देती है और स्त्री को पुरुष। वह भी बंद कक्ष में। इसका अर्थ न समझ सको इतनी भोली तो आप नहीं हो।”
“ओह, मैं अब समझी। यह तो बड़ी रोचक दीक्षा है। हैं न सपन जी?”
“यही तो। दीक्षा में आपको अत्यंत आनंद आएगा।” सपन ने कहा।
“तो चलें?”
“नहीं।” नहीं।” शैल और सरिता ने बड़ी दृढ़ता से उत्तर दिया।
उत्तर सुनकर सपन – निहारिका स्तब्ध हो गए। ऐसे नकार की उन्हें अपेक्षा न थी।
कुछ क्षण आघात में बीतने पर निहारिका बोली, “सरिता जी। शैल की बात भिन्न है। उसे छोड़ो। आप अपने भविष्य का विचार करो। अन्यथा पाकिस्तान लौटना पड़ेगा। वहाँ आपकी क्या स्थिति है उससे हम अपरिचित नहीं हैं। तो सोच लो।”
सरिता ने उत्तर नहीं दिया।
“चलो हम दूसरा विकल्प देते हैं।” शैल और सरिता ने प्रश्न भरी दृष्टि से सपन को देखा।
“दो दिन में सरिता जी को हम यहाँ की नागरिकता दिलवा देते हैं। क्या यह स्वीकार्य है?”
“उसका क्या मूल्य चुकाना होगा मुझे?”
“बस, एक रात्री नदीम के साथ और ...।”
“और क्या?”
“एक रात्री मेरे साथ।” सपन के मुख पर कुटिल स्मित उभर आया।
सपन के प्रस्ताव पर सरिता क्रुद्ध हो गई। वह कुछ कहना चाहती थी किन्तु शैल ने रोका। दोनों मौन ही रहे।
“इस मौन को हम सम्मति मान लेते हैं, सरिता जी।”
“प्रत्येक मौन का अर्थ सम्मति मानने की भूल मत करना, निहारिका।” शैल ने कहा।
“आप मेरे शरीर के पीछे क्यों पड़े हो? क्यों मेरा नश्वर देह भ्रष्ट करना चाहते हो?”
“तुम्हारा यह शरीर तो पाकिस्तान में ही भ्रष्ट हो चुका है तब ऐसी बातों का कोई अर्थ नहीं रहा गया है, सारा जी।” सपन ने कहा।
“सरिता हूँ मैं अब।”
“नाम बदलने से, धर्म बदलने से, माथे पर बिंदिया लगा लेने से शरीर नहीं बदल जाता। सारा कहूँ या सरिता?”
“आपका यह शरीर पूर्व से ही भ्रष्ट हो चुका है। एक बार भ्रष्ट हो या बार बार, शरीर भ्रष्ट ही रहता है। वह पवित्र नहीं हो जाता।”
सपन और निहारिका की बातों से सरिता विचलित हो गई, व्यथित भी। तथापि उसने स्वयं के भावों को नियंत्रित किया, विचार किया, गहन श्वास लेकर बोली, “मुझे आज रात्री तक विचार करने का समय दें। मेरी इतनी बात तो मान सकते हो न? अंतत: मैं आपसे जुड़ गई तो आपकी ही साथी बन जाऊँगी। साथी पर इतनी कृपा तो कर सकते हो। हैं न कॉमरेड?”
सरिता की बात सुनकर उन दोनों ने परस्पर देखा। उनकी आँखों में चमक आ गई। संकेतों से परस्पर वार्तालाप कर लिया।
“हमारी भावी साथी सरिता जी, हम आपके इस प्रस्ताव का स्वागत करते हैं। कल प्रात: आठ बजे हम लौट आएंगे। तब आपको हमारे साथ चलना होगा।” निहारिका ने कहा।
“ठीक है।”
“किन्तु, सरिता जी, यह ...।”शैल के शब्द नदी तरंगों की ध्वनि में विलीन हो गए।
“अब आप निश्चिंत होकर रात्री व्यतीत करें। हाँ, आप चाहो तो आपको गाँव में आश्रय मिल सकता है।”
“और शैल को?”
“यदि वह दीक्षित होना चाहे तो उसका भी गाँव के आश्रय स्थान में स्वागत है।”
“नहीं। मैं यहीं ठीक हूँ। सरिता जी आप जा सकती हैं।” शैल नदी के प्रवाह की तरफ चलने लगा।
“आज रात्री तो मैं यहीं रहूँगी। चलो, कल मिलते हैं।” सरिता ने दोनों को विदा करने के लिए कहा।
“स्मरण रहे, प्रात: आठ बजे।” सपन – निहारिका गाँव की तरफ चल पड़े।