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“सारा जी। चलें क्या?” शैल ने पूछा। सारा ने कोई उत्तर नहीं दिया। शैल ने सोचा, ‘सारा जी ने सुना नहीं होगा।’ अत: पुन: पूछा, “सारा जी। चलो चलें। सूरज खूब चड चुका है।” सारा ने पुन: कोई उत्तर नहीं दिया। वह दूर कहीं क्षितिज को ताड़ रही थी। शैल समीप गया और बोला, “सारा जी मैं आपसे कुछ पुछ रहा हूँ। आप अनुत्तर हैं। क्या बात है सारा जी?”
सारा शैल की तरफ मुड़ी और बोली, “जी, कौन सारा?”
“आप ही तो हैं सारा जी?”
“मैं?”
“हाँ, आप।”
“जी नहीं, श्रीमान। यहाँ कोई सारा नहीं है।”
“तो आप कौन हैं?”
“तुमने मुझसे पूछा क्या?”
“जी। आपसे ही पुछ रहा हूँ, सारा जी।”
“क्षमा करें, मेरा नाम सारा नहीं है।”
“प्रतीत होता है कि रात्री भर जागने से आपको विस्मरण हो गया है। यहाँ तक की आप अपना नाम तक भूल गई हैं।”
“नहीं शैल। मैं कुछ नहीं भूली हूँ।”
“तो क्या बात है?”
“जिसको त्याग दिया है उसे भूल गई हूँ और जो अपनाया है वही स्मरण में है।”
“क्या कहना चाहती हैं, स्पष्ट कहो। इस समय मैं
किसी पहेली को समझने की स्थित में नहीं हूँ।”
“मैं अब सरिता हूँ। बस इतनी सी बात है। यदि तुम्हें सरिता से कुछ बात करनी हो तो मैं प्रस्तुत हूँ, तत्पर हूँ।”
“ओह, सरिता जी। यह बात है? आपका स्वागत है मूल सनातन धर्म में।”
“धन्यवाद, शैल। चलो अब चलें।”
“चलो, मार्ग लंबा है।”
दोनों चल पड़े। संध्या होने पर दोनों रात्री निवास हेतु समीप के गाँव में पहुंचे। गाँव के मुखिया से मिले।
मुखिया ने कहा, “नहीं। आप लोगों को हम आश्रय नहीं देंगे।”
“क्यों? कुछ समस्या है?” शैल ने पूछा।
“हम तो केवल रात्री के लिए सिर पर छत चाहते हैं। हमें और कुछ नहीं चाहिए।” सरिता ने कहा।
“किन्तु हम आश्रय नहीं दे सकते।”
“आप चाहोगे उतनी राशि हम आपको देंगे। बस हमें आश्रय दे दो।”
“नहीं कहा न? एक बार ना कहा तो समझ में नहीं आ रहा है क्या?”
“ठीक है। सरिता जी, प्रतीत हो रहा है कि मुखिया जी की कोई विवशता होगी।”
“एक रात्री आश्रय देने में क्या विवशता होगी आपकी, मुखिया जी? कोई आपत्ति है क्या?”
“है। हमें आपत्ति है सारा जी। नहीं, नहीं, सरिता जी।” मुखिया के घर से बाहर आते हुए निहारिका ने कहा। पीछे सपन भी आ गया।
उन दोनों को देखकर मुखिया जी की विवशता और उन दोनों का सारा खेल शैल और सरिता को समझ आ गया। उन्होंने मुखीया जी से कुछ नहीं कहा, वहाँ से लौटने लगे। तभी सपन बोला, “यदि आप हमारी बात मन लें तो आपको आश्रय मिल सकता है।”
सरिता रुकी, मुड़ी। शैल ने उसे रोक, “यहाँ से चलो। अब यहाँ रुकना ठीक नहीं है।” दोनों गाँव से बाहर चले गए। नदी के तट पर एक स्थान पर रुक गए।
“सरिता जी, इस स्थान पर हम रात्री व्यतीत कर लेंगे। आप विश्राम कीजिए।”
“और तुम, शैल?”
“आप निश्चिंत रहिए। हमारे साथ साक्षात मैया स्वयं उपस्थित है। वह अपने शरण में आए संतानों की सुरक्षा अवश्य करती है। तथापि मैं सतर्क रहूँगा।”
“मैया ने मीरा की रक्षा क्यों नहीं की? वह भी तो मैया की शरण में ही आई थी।”
“मीरा? मीरा के रहस्य को जानने के लिए तो हम इस मार्ग पर चल पड़े हैं।”
“शैल, मेरा प्रश्न है - मैया ने मीरा की रक्षा क्यों नहीं की?”
“सरिता जी, आप मैया पर संशय कर रही हो?”
“मैं नहीं जानती कि मेरा यह प्रश्न, मेरा यह विचार संशय है या नहीं। यह भी नहीं जानती कि मीरा का विचार इस समय मेरे मन में कैसे आया।”
“कोई बात नहीं। मैया बड़ी दयालु होती है। मैया को प्रणाम कर विश्राम करो।”
सरिता ने मैया के भीतर प्रवेश किया, झुकी, मैया की अंजली भरी, माथे पर अभिषेक किया, प्रणाम किया और लौट आई।
“निश्चिंत होकर विश्राम करें, सरिता जी।”
“विश्राम करने का अवसर नहीं मिलेगा, सारा जी।” निहारिका ने तट पर आते हुए कहा।
शैल और सरिता को इनके यहाँ भी आने की अपेक्षा न थी। शैल के मन को कुछ स्मरण हो आया।
“आप दोनों तो कारावास में थे तो यहाँ कैसे?” शैल ने प्रश्न किया।
उत्तर में दोनों ने अट्टहास किया। नदी की ध्वनि से भी तीव्र अट्टहास! इससे नदी तट का शांत वातावरण तरंगित हो गया। वृक्षों पर शयन कर रहे सेंकड़ों पक्षियों ने तीव्रता से अपने पंख फड़फड़ाए। कुछ इधर उधर उड़ने लगे। कुछेक ने अपने कंठ से चित्र विचित्र ध्वनियाँ निकाली। कुछ समय के पश्चात पंखी शांत होकर अपने घोंसले में स्थिर हो गए। पंखियों की यह क्रिया सभी ने देखि।
“कारावास?” व्यंग करते हुए सपन बोला।
“भारत का कोई भी कारावास हमारे लिए नहीं बना।” निहारिका ने कहा।
“हमें यहाँ देखकर, हमारी बात सुनकर आश्चर्य हो रहा है न?”
“आश्चर्य नहीं, सपन आघात लगा होगा। सीधा – सरल आघात नहीं, कठोर और पीड़ादायक आघात लगा है इन दोनों को।” शैल और सरिता स्तब्ध होकर दोनों की कुटिलता को देख रहे थे।
“हमने एक बार कहा था कि सरकार चाहे किसी की भी हो, तंत्र हमारा ही है। प्रत्येक कार्यालय में हमारे व्यक्तियों की जाल बिछी हुई है। यह कारावास क्या चीज है? बस, हमारे तंत्र ने अपना काम किया और हम कारावास से मुक्त।” सपन ने कहा।
“और एक बात। नदीम भी, कपिल भी कारावास से मुक्त हो गए हैं। तुम्हारी जानकारी के लिए।” निहारिका ने शैल सरिता के मर्म पर घाव करते हुए कहा।
“ठीक है। हम दोनों ने पुलिस की सेवा त्याग दी है यह तो आप जानते ही होंगे, आपका जाल विशाल जो है। अब हमारा मीरा घटना से कोई संबंध नहीं है। और हमारी आपसी कोई शत्रुता भी नहीं है। तो आप हमारे पीछे क्यों पड़े हैं? आप हमसे क्या चाहते हैं?” शैल ने कहा।
“पुलिस सेवा त्याग दी किन्तु मीरा हत्या से संबंध अभी भी है आप दोनों का।”
“वह कैसे?”
“संबंध नहीं होता तो इस समय आप दोनों यहाँ क्या कर रहे हैं? इस निर्जन अंधेरी रात्री में, खुले आकाश के नीचे, जीव जन्तु और पशु पक्षी से भयग्रस्त इस स्थान पर नहीं होते। अपने घरों में सुख की निद्रा करते होते। सरिताजी, मैं ठीक कह रही हूँ न?” निहारिका ने कहा।
“मीरा हत्या का रहस्य जानने के लिए तो इस मार्ग पर आप चल रहे हो तो मीरा हत्या की घटना से आपका संबंध कैसे नहीं हो सकता, शैल? सरिता जी, आप तो वरिष्ठ हैं, शैल को इस बात समझाती क्यों नहीं?” सपन ने कहा।
“हम इस मार्ग पर चल रहे हैं, मीरा हत्या का रहस्य जानने की चेष्टा कर रहे हैं इसमें आपको क्या आपत्ति है?” सरिता ने कहा।
“कहीं ऐसा तो नहीं सपन – निहारिका जी कि आप दोनों ने ही मीरा की हत्या की हो और हमारी इस यात्रा से आपके विरुद्ध कुछ प्रमाण हाथ लग जाए जिससे आप दोनों का भेद खुल जाए? क्या इसी कारण आप हमारी यात्रा में बाधा बनकर आए हो?”