PART 3 — आखिरी वादा
शादी की शहनाई अब भी बज रही थी, लेकिन घर के अंदर हर किसी के चेहरे से खुशी गायब हो चुकी थी। हार्दिक जमीन पर बेहोश पड़ा था और प्रियांक उसे अपनी बाँहों में उठाए लगातार कह रहा था, “भैया... आँखें खोलो। आज मेरी शादी है। आपने ही तो कहा था कि मेरी शादी अपनी आँखों से देखोगे। अब ऐसे कैसे चले जाओगे?” यज्ञी एक कोने में खड़ी काँप रही थी। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। कुछ देर बाद एम्बुलेंस आई और हार्दिक को अस्पताल ले जाया गया। प्रियांक उसके साथ था और यज्ञी भी उसके पीछे-पीछे अस्पताल पहुँच गई। अस्पताल के बाहर प्रियांक बेचैनी से चक्कर लगा रहा था। कभी वह भगवान से प्रार्थना करता, कभी डॉक्टर के कमरे की तरफ देखता। आखिरकार डॉक्टर बाहर आए। प्रियांक दौड़कर उनके पास गया और पूछा, “डॉक्टर, मेरे भैया कैसे हैं?” डॉक्टर कुछ पल चुप रहे और फिर बोले, “हमने उन्हें संभाल लिया है, लेकिन उनकी हालत बहुत गंभीर है।” प्रियांक की आँखें भर आईं। “वो ठीक हो जाएंगे ना?” डॉक्टर ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा, “अभी उन्हें आराम की जरूरत है।”
कुछ देर बाद हार्दिक को होश आया। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और सामने प्रियांक को देखा। प्रियांक उसकी तरफ झुक गया। “भैया...” हार्दिक ने हल्की-सी मुस्कान दी। “रो क्यों रहा है?” प्रियांक ने उसके हाथ को पकड़ लिया। “आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि आप बीमार हैं?” हार्दिक कुछ नहीं बोला। उसकी नजर यज्ञी पर गई। यज्ञी दरवाजे के पास खड़ी रो रही थी। हार्दिक ने उसे अंदर आने का इशारा किया। यज्ञी उसके पास आई। हार्दिक ने दोनों का हाथ एक साथ पकड़ लिया। “आज तुम्हारी शादी है,” उसने बहुत मुश्किल से कहा। प्रियांक ने रोते हुए कहा, “मुझे शादी नहीं करनी। पहले आप ठीक हो जाओ।” हार्दिक मुस्कुराया। “अगर तूने मेरी बात नहीं मानी ना... तो मैं सच में नाराज हो जाऊँगा।” प्रियांक ने सिर हिलाया। “मैं कहीं नहीं जा रहा भैया।” हार्दिक ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मैं भी नहीं चाहता कि तू जाए... लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी मर्जी से नहीं चलती।”
उस दिन शादी नहीं हुई। घर की सारी सजावट वैसी ही पड़ी रही। फूल मुरझाने लगे और मेहमान एक-एक करके वापस चले गए। लेकिन प्रियांक अस्पताल से जाने को तैयार नहीं था। यज्ञी भी उसके साथ बैठी रही। रात को जब प्रियांक हार्दिक के कमरे के बाहर बैठा था, यज्ञी उसके पास आई और बोली, “तुमने खाना खाया?” प्रियांक ने सिर हिला दिया। यज्ञी ने कहा, “झूठ मत बोलो।” प्रियांक की आँखों से आँसू निकल आए। “यज्ञी, मैं भैया को खोना नहीं चाहता।” यज्ञी उसके पास बैठ गई। उसने उसका हाथ पकड़कर कहा, “हम उन्हें नहीं खोएँगे।” प्रियांक ने उसकी तरफ देखा। “तुम्हें कैसे पता?” यज्ञी के पास कोई जवाब नहीं था। वह सिर्फ उसका हाथ पकड़े रही। दोनों जानते थे कि कभी-कभी इंसान झूठ नहीं बोलता, बस उम्मीद को जिंदा रखने के लिए कुछ शब्द कह देता है।
अगली सुबह हार्दिक की हालत थोड़ी बेहतर थी। उसने प्रियांक को अपने पास बुलाया। “छोटे...” प्रियांक तुरंत उसके पास बैठ गया। “हाँ भैया।” हार्दिक ने कहा, “दराज में एक खत है।” प्रियांक का चेहरा बदल गया। “कौन सा खत?” हार्दिक ने कहा, “जब मैं चला जाऊँ तब पढ़ना।” प्रियांक की आँखें भर आईं। “ऐसा मत बोलो।” हार्दिक ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मुझे मेरी बात पूरी करने दे।” प्रियांक चुप हो गया। हार्दिक ने कहा, “तूने जिंदगी में बहुत कुछ खोया है। पहले माँ-पापा... अब अगर मुझे भी खो देगा तो खुद को मत खो देना।” प्रियांक रोते हुए बोला, “आप मेरे लिए सब कुछ हो।” हार्दिक मुस्कुराया। “और तू मेरी पूरी दुनिया है।” फिर उसने यज्ञी की तरफ देखा और कहा, “और अब तुम्हारी दुनिया में यज्ञी है।” यज्ञी की आँखों से आँसू बहने लगे। हार्दिक ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “इस लड़की को कभी अकेला मत छोड़ना।” प्रियांक ने सिर हिलाया। “वादा।” हार्दिक ने आँखें बंद कर लीं। शायद उसे यही सुनना था।
कुछ दिनों बाद हार्दिक की हालत में थोड़ा सुधार हुआ। डॉक्टरों ने कहा कि वह घर जा सकता है, लेकिन उसे बहुत सावधानी रखनी होगी। घर लौटते ही प्रियांक ने हार्दिक के कमरे को ठीक किया। यज्ञी रोज उसके लिए खाना बनाकर लाती। हार्दिक कभी उसे चिढ़ाता तो कभी प्रियांक को परेशान करता। कुछ समय के लिए ऐसा लगा जैसे सब ठीक हो गया हो। लेकिन राघव की वापसी ने उस शांति को ज्यादा समय तक टिकने नहीं दिया। एक रात प्रियांक के फोन पर एक अनजान नंबर से संदेश आया—“अगर अपने परिवार का सच जानना है, तो कल रात पुराने पुल के पास अकेले आना।” प्रियांक ने संदेश पढ़ा और तुरंत फोन बंद कर दिया। लेकिन यज्ञी ने उसके चेहरे का रंग बदलते देख लिया। उसने पूछा, “क्या हुआ?” प्रियांक ने कहा, “कुछ नहीं।” यज्ञी ने फोन छीनकर संदेश पढ़ लिया। उसकी आँखों में डर उतर आया। “तुम वहाँ अकेले नहीं जाओगे।” प्रियांक ने कहा, “मुझे जाना होगा।” तभी पीछे से हार्दिक की आवाज आई, “तू कहीं नहीं जाएगा।” दोनों ने पीछे मुड़कर देखा। हार्दिक दरवाजे पर खड़ा था। उसने संदेश पढ़ा और कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “राघव वापस आ गया है।”
उस रात हार्दिक ने पहली बार प्रियांक को पूरा सच बताने का फैसला किया। उसने कहा, “जिस रात हमारे माता-पिता की मौत हुई थी, उस रात वे राघव के खिलाफ सबूत लेकर जा रहे थे। राघव ने उन्हें रोकने की कोशिश की। मैं भी वहाँ पहुँचा था। तुम्हारे पिता ने मुझे एक बैग दिया और कहा कि अगर उन्हें कुछ हो जाए तो मैं तुझे लेकर शहर छोड़ दूँ। उसी रात हादसा हुआ। लेकिन वह हादसा नहीं था।” प्रियांक की आँखें फैल गईं। “तो आपने इतने साल मुझे झूठ क्यों बताया?” हार्दिक ने कहा, “क्योंकि राघव ने मुझे धमकी दी थी कि अगर मैंने सच बताया तो वह तुझे भी खत्म कर देगा।” प्रियांक की मुट्ठियाँ भींच गईं। “और विराज अंकल?” हार्दिक ने कहा, “वो भी वहाँ थे। उन्होंने सब देखा था, लेकिन अपनी बेटी यज्ञी को बचाने के लिए चुप रहे।” प्रियांक कुछ देर तक कुछ नहीं बोल पाया। फिर उसने यज्ञी की तरफ देखा। यज्ञी की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “प्रियांक, मेरे पिता ने गलती की थी... लेकिन उन्होंने तुम्हारे परिवार को नहीं मारा।” प्रियांक ने उसका हाथ पकड़ लिया। “मुझे पता है।”
अगली रात राघव ने फिर संदेश भेजा। इस बार उसने लिखा था, “अगर सच चाहिए तो अपने भाई को लेकर आना।” हार्दिक ने संदेश पढ़ा और कहा, “अब यह सिर्फ हमारे अतीत की बात नहीं रही।” प्रियांक ने कहा, “मैं उसे खत्म कर दूँगा।” हार्दिक ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “नफरत में लिया गया फैसला जिंदगी भर पछतावा देता है।” लेकिन प्रियांक नहीं माना। आखिरकार तीनों पुराने पुल के पास पहुँचे। विराज भी उनके पीछे-पीछे आ गए। वहाँ राघव पहले से खड़ा था। उसने मुस्कुराकर कहा, “आखिर इतने साल बाद पूरा परिवार एक साथ आ ही गया।” प्रियांक आगे बढ़ा। “मेरे माता-पिता के साथ क्या हुआ था?” राघव हँसा। “तुम्हारे पिता बहुत ईमानदार बनने चले थे। उन्हें लगा था कि सच दुनिया बदल देगा।” हार्दिक ने कहा, “तूने उन्हें मारा था।” राघव ने कहा, “मैंने सिर्फ उन्हें चुप कराया था।” यज्ञी काँप गई। विराज ने अचानक कहा, “बस!” राघव ने उसकी तरफ देखा और हँसकर बोला, “तुम्हें अब भी डर लगता है, विराज?”
तभी राघव ने अपनी जेब से एक छोटा-सा रिकॉर्डर निकाला। उसमें यज्ञी के पिता की पुरानी आवाज रिकॉर्ड थी। उस आवाज में वह बता रहे थे कि हादसे की रात क्या हुआ था। रिकॉर्डिंग सुनते ही प्रियांक को सब समझ आने लगा। लेकिन राघव ने अचानक रिकॉर्डर तोड़ दिया और वहाँ से भागने लगा। प्रियांक उसके पीछे दौड़ा। हार्दिक ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। वह जमीन पर गिर पड़ा। यज्ञी चीख उठी, “भैया!” प्रियांक वापस दौड़ा। राघव अंधेरे में गायब हो चुका था। प्रियांक ने हार्दिक को उठाया। हार्दिक ने मुश्किल से आँखें खोलीं और कहा, “उसे... जाने दे।” प्रियांक रोते हुए बोला, “मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।” हार्दिक ने हल्की मुस्कान दी। “यही तो डर है... तू मेरी वजह से अपनी जिंदगी छोड़ देगा।”
कुछ दिनों बाद पुलिस ने राघव को गिरफ्तार कर लिया। विराज ने आखिरकार वर्षों पुराना सच सबके सामने स्वीकार कर लिया। प्रियांक के माता-पिता की मौत का राज खुल चुका था। पहली बार प्रियांक को लगा कि उसके परिवार पर पड़ा पुराना बोझ खत्म हो रहा है। लेकिन हार्दिक की हालत लगातार खराब होती जा रही थी। डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि अब ज्यादा समय नहीं बचा है। हार्दिक ने यह बात सुनकर सिर्फ इतना पूछा, “क्या मैं अपने भाई की शादी देख पाऊँगा?” डॉक्टर चुप रहे। हार्दिक समझ गया।
एक शाम हार्दिक ने प्रियांक और यज्ञी को अपने पास बुलाया। कमरे में हल्की रोशनी थी। हार्दिक ने कहा, “मेरी एक आखिरी इच्छा है।” प्रियांक ने तुरंत कहा, “जो बोलोगे, पूरा करूँगा।” हार्दिक मुस्कुराया। “इस बार अपनी शादी मत रोकना।” प्रियांक की आँखें भर आईं। “भैया...” हार्दिक ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि जब मैं जाऊँ, तो मेरे घर में रोने की आवाज नहीं, शादी की शहनाई हो।” यज्ञी रोते हुए बोली, “आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं?” हार्दिक ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि मुझे पता है कि मेरी जिंदगी का आखिरी पन्ना करीब है।” प्रियांक ने उसका हाथ पकड़ लिया। “मैं आपके बिना शादी नहीं करूँगा।” हार्दिक ने मुस्कुराकर कहा, “तू मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं तुझसे नाराज होकर चला जाऊँगा।” प्रियांक रोते हुए हँस पड़ा। “आप भी ना...” हार्दिक ने दोनों को देखा और कहा, “बस एक वादा करो।” दोनों ने पूछा, “क्या?” हार्दिक ने कहा, “मेरे जाने के बाद एक-दूसरे को कभी मत छोड़ना।”
कुछ दिनों बाद शादी का दिन फिर से आया। इस बार घर पहले से ज्यादा खूबसूरत सजाया गया था। यज्ञी लाल दुपट्टे में दुल्हन बनी बैठी थी। वही लाल दुपट्टा जो हार्दिक ने उसे दिया था। प्रियांक दूल्हे के कपड़ों में उसके सामने खड़ा था। लेकिन उसकी आँखें बार-बार हार्दिक के कमरे की तरफ जा रही थीं। हार्दिक बिस्तर पर लेटा था और डॉक्टर ने उसे ज्यादा चलने से मना किया था। फिर भी उसने जिद की कि वह अपने भाई की शादी अपनी आँखों से देखेगा। जब प्रियांक उसके सामने आया तो हार्दिक ने मुस्कुराकर कहा, “आज मेरा छोटा भाई सच में बड़ा हो गया।” प्रियांक उसके पैरों के पास बैठ गया और रोते हुए बोला, “आप मेरे साथ रहेंगे ना?” हार्दिक ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “जहाँ भी रहूँगा, तेरे साथ रहूँगा।” प्रियांक ने पूछा, “वादा?” हार्दिक ने कहा, “पक्का।”
शादी की रस्में शुरू हुईं। यज्ञी और प्रियांक ने सात फेरे लिए। हर फेरे के साथ दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया। सातवाँ फेरा पूरा होते ही यज्ञी की आँखें हार्दिक को खोजने लगीं। हार्दिक दरवाजे के पास खड़ा था। उसने दोनों को देखकर मुस्कुराया और तालियाँ बजाईं। प्रियांक दौड़कर उसके पास गया और उसे गले लगा लिया। हार्दिक ने उसे कसकर पकड़ लिया। कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे समय रुक गया हो। फिर हार्दिक ने धीरे से कहा, “अब मैं निश्चिंत हूँ।”
उसी रात जब सब लोग खुशियाँ मना रहे थे, हार्दिक अपने कमरे में अकेला बैठा था। उसने मेज की दराज खोली और प्रियांक के नाम लिखा हुआ खत निकाला। उसने उसे हाथ में लिया और मुस्कुराया। तभी उसके सीने में फिर से तेज दर्द उठा। इस बार दर्द पहले से ज्यादा था। उसने दीवार पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ से खत नीचे गिर गया। वह धीरे-धीरे जमीन पर बैठ गया। उसकी नजर सामने लगी तस्वीर पर गई जिसमें वह, प्रियांक और यज्ञी साथ खड़े थे। उसके चेहरे पर आखिरी बार मुस्कान आई। उसने बहुत धीमी आवाज में कहा, “मेरा परिवार... पूरा हो गया।”
कुछ देर बाद यज्ञी कमरे में आई। उसने हार्दिक को जमीन पर देखा तो उसके मुँह से चीख निकल गई। “भैया!” प्रियांक भी दौड़कर आया। उसने हार्दिक को अपनी बाँहों में उठा लिया। “भैया... आँखें खोलो!” हार्दिक ने बहुत मुश्किल से आँखें खोलीं। उसने प्रियांक की तरफ देखा, फिर यज्ञी की तरफ। उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। उसने कहा, “खुश रहना...” प्रियांक रोते हुए बोला, “आप भी रहना।” हार्दिक ने उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज में कहा, “मैं रहूँगा... तुम्हारी यादों में।” उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद हो गईं। प्रियांक चीख पड़ा, “भैया!” यज्ञी भी उसके पास बैठकर रोने लगी। उस रात एक भाई का प्यार हमेशा के लिए खामोश हो गया।
कुछ देर बाद प्रियांक को मेज पर रखा वही खत दिखाई दिया। उसने काँपते हाथों से उसे उठाया और खोला। उसमें लिखा था, “प्रिय प्रियांक, अगर तू यह खत पढ़ रहा है तो शायद मैं तेरे पास नहीं हूँ। लेकिन याद रखना, मौत किसी रिश्ते को खत्म नहीं कर सकती। मैं हमेशा तेरे साथ रहूँगा। यज्ञी को कभी अकेला मत छोड़ना। मैंने उसे सिर्फ तेरी पत्नी के रूप में नहीं चुना, बल्कि इसलिए चुना क्योंकि मुझे पता है कि वह तुझे मेरी तरह संभालेगी। जब भी तुझे मेरी याद आए, उस लाल दुपट्टे को देख लेना। उसमें मेरी आखिरी दुआ है। तू खुश रहेगा तो मैं जहाँ भी रहूँगा, खुश रहूँगा। तेरा भैया, हार्दिक।”
खत पढ़ते-पढ़ते प्रियांक फूट-फूटकर रो पड़ा। यज्ञी ने उसे गले लगा लिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटकर रोते रहे। उस दिन उन्हें समझ आया कि कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते, बल्कि प्यार, भरोसे और त्याग से बनते हैं। हार्दिक उनके बीच नहीं था, लेकिन उसकी मौजूदगी हर जगह थी। घर के उस कमरे में, उस तस्वीर में, उस खत में और सबसे ज्यादा उन दोनों के दिल में।
समय बीतता गया। प्रियांक और यज्ञी ने अपनी जिंदगी आगे बढ़ाई। उन्होंने हार्दिक के नाम से एक छोटा-सा घर बनाया, जहाँ हर साल उनकी शादी की सालगिरह पर वे उसी नीम के पेड़ के नीचे दीपक जलाते थे। यज्ञी हमेशा वही लाल दुपट्टा संभालकर रखती थी। एक दिन प्रियांक ने उससे पूछा, “तुमने इसे आज तक संभालकर क्यों रखा है?” यज्ञी ने दुपट्टे को हाथ में लेते हुए कहा, “क्योंकि ये सिर्फ कपड़ा नहीं है। इसमें तुम्हारे भैया का आखिरी प्यार है।”
प्रियांक ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराया। उसने आसमान की तरफ देखा और कहा, “भैया, आपने वादा किया था कि आप हमारे साथ रहेंगे।”
उसी समय हवा चली और लाल दुपट्टा हल्का-सा लहराने लगा।
यज्ञी मुस्कुराई।
प्रियांक की आँखों में आँसू थे।
लेकिन इस बार वह रोया नहीं।
क्योंकि उसे महसूस हुआ...
हार्दिक गया नहीं था।
वह उनके प्यार में जिंदा था।
उनकी हर खुशी में जिंदा था।
उनके हर आँसू में जिंदा था।
और उस आखिरी वादे में भी...
जो एक भाई ने अपनी जिंदगी देकर पूरा किया था।
“दो धड़कनें, एक वादा” की कहानी यहीं खत्म नहीं होती थी...
क्योंकि कुछ प्यार कहानियाँ खत्म होकर भी खत्म नहीं होतीं।
वे बस...
याद बनकर हमेशा के लिए दिल में रह जाती हैं।