हुक्म और हसरत - 23 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत - 23

💗💗💗 हुक्म और हसरत 💗💗💗
#Arsia

"अब आगे…”


एपिसोड 23 — 

"दुश्मन बाहर नहीं है..."

अर्जुन की आँखें महल की तरफ़ उठीं।

उसकी मुट्ठी फोन पर कस गई।

"वो हमारे बीच है।" 😠🔥

विवेक ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था कि अर्जुन के फोन पर वीर का एक और मैसेज आया।

"बॉस... एक और चीज़ मिली है।"

अर्जुन ने तुरंत स्क्रीन खोली।

एक सीसीटीवी फुटेज थी।

फुटेज में सिया के कमरे के बाहर का गलियारा दिखाई दे रहा था।

समय था—

रात 11:47। 

अर्जुन की भौंहें सिकुड़ गईं।

"ज़ूम करो।"

वीर ने फुटेज ज़ूम की।

कुछ सेकंड बाद स्क्रीन पर एक धुँधली-सी परछाईं दिखाई दी।

एक आदमी...

सिया के कमरे के बाहर।

अर्जुन की आँखें उसी पर टिक गईं।

"ये कौन है?"

वीर की आवाज़ आई—

"चेहरा साफ़ नहीं है, बॉस। लेकिन..."

"लेकिन?"

"वो करीब दो मिनट तक सिया के कमरे के बाहर था।"

अर्जुन का चेहरा कठोर हो गया।

दो मिनट...

इतना समय किसी को सिर्फ़ वहाँ खड़े रहने के लिए नहीं चाहिए था।

वो आगे बढ़ा।

"उस समय कमरे में कौन-कौन था?"

वीर ने रिकॉर्ड देखकर जवाब दिया—

"सिया की माँ, रोशनी, काव्या और रानी माँ अंदर थीं। आप करीब कुछ मिनट के लिए कमरे से बाहर गए थे।"

अर्जुन कुछ पल बिल्कुल शांत रहा।

फिर उसकी आँखों में एक अजीब-सी चमक आई।

"मतलब... सिया ने उसे देखा होगा।"

विवेक ने धीरे से कहा—

"लेकिन अगर उसने देखा है तो उसने पहले बताया क्यों नहीं?"

अर्जुन ने उसकी तरफ़ देखा।

"क्योंकि उस वक्त उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वो कुछ समझ पाती।"

वो तुरंत सिया के कमरे की तरफ़ बढ़ गया।

---

कुछ घंटे पहले... 

सिया के कमरे में हल्की रोशनी थी।दवाइयों की हल्की गंध पूरे कमरे में फैली हुई थी।सिया बिस्तर पर लेटी हुई थी।
उसकी आँखें बंद थीं...लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी।
उसके सिर में हल्का दर्द अब भी था।

पास ही उसकी माँ उसके सिर पर धीरे-धीरे हाथ फेर रही थीं। ❤️

रोशनी पानी का गिलास और दवाइयाँ व्यवस्थित कर रही थी।

काव्या डॉक्टर की बताई हुई बातें अपनी नोटबुक में लिख रही थी।

रानी माँ डॉक्टर से धीमी आवाज़ में बात कर रही थीं।

"दवा कितने अंतराल पर देनी होगी?"

डॉक्टर ने कुछ समझाया।

उधर सिया के पिता कमरे के बाहर खड़े होकर फोन पर किसी से बात कर रहे थे।

और अर्जुन...

कुछ देर पहले ही विवेक के साथ security update लेने कमरे से बाहर गया था।

सिया ने धीरे से आँखें खोलीं।

उसकी नज़र कमरे की छत पर टिक गई।

सब कुछ धुँधला-सा लग रहा था।

तभी...

ठक... ठक... ठक...

गलियारे से किसी के जूतों की धीमी आवाज़ सुनाई दी। 

सिया की आँखें दरवाज़े की तरफ़ उठ गईं।

आवाज़ करीब आती जा रही थी।

ठक... ठक...

फिर...

दरवाज़ा थोड़ा-सा खुला।

सिया ने आँखें सिकोड़कर देखने की कोशिश की।

दरवाज़े के बाहर एक आदमी खड़ा था।

चेहरा अँधेरे में था।

सिया उसे पहचान नहीं पा रही थी।

उसकी साँस थोड़ी तेज़ हो गई।

"क... कौन...?"

उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि कमरे में किसी और ने नहीं सुना।वो आदमी अंदर नहीं आया।बस दरवाज़े के पास खड़ा रहा।फिर उसने अपना हाथ थोड़ा आगे किया।

सिया की नज़र उसकी कलाई पर गई।

उसके हाथ में...एक छोटी-सी नीली शीशी थी। 
सिया की आँखें फैल गईं।उसे अचानक कुछ याद आया।
वही नीली शीशी...वही चमक...वही डर।

उसने बोलने की कोशिश की—

"आप..."

लेकिन उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

उसी समय खिड़की से तेज़ हवा आई।

पर्दा अचानक उड़कर बीच में आ गया।

कुछ सेकंड के लिए कमरे की रोशनी भी उसके चेहरे से हट गई।

सिया ने आँखें मिचमिचाकर देखने की कोशिश की।

लेकिन चेहरा फिर अँधेरे में छिप गया।

वो आदमी धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

सिया ने कमजोर हाथ उठाने की कोशिश की।

"रुकिए..."

लेकिन तभी—

बाहर से अर्जुन की आवाज़ आई।

"सिया?"

आदमी तुरंत मुड़ा।

और अगले ही पल...

वो गलियारे से गायब हो चुका था।

अर्जुन कमरे में वापस आया।

उसने सिया की तरफ़ देखा।

"क्या हुआ, राजकुमारी?"

सिया ने दरवाज़े की तरफ़ देखा।

फिर अर्जुन की तरफ़।

उसकी आँखें आधी बंद हो चुकी थीं।

वो कुछ कह नहीं पाई।

और अगले ही पल फिर बेहोशी में चली गई।

---


वर्तमान में...

अर्जुन वापस सिया के कमरे में पहुँचा।

सिया की माँ उसके पास बैठी थीं।

रोशनी अब भी उसका हाथ पकड़े हुए थी।

काव्या कमरे के कोने में खड़ी थी।

अर्जुन ने धीरे से पूछा—

"सिया को कब से कुछ याद आने लगा?"

सिया की माँ ने उसकी तरफ़ देखा।

"अभी कुछ देर पहले उसने कहा था कि उसने किसी को देखा है..."

अर्जुन तुरंत सिया के पास बैठ गया।

इस बार उसने उसके हाथ को छूने से पहले एक पल रुककर उसकी तरफ़ देखा।

फिर बहुत धीरे से उसकी उँगलियाँ अपने हाथ में ले लीं। ❤️

सिया की आँखें खुलीं।

उसने अर्जुन को देखा।

उसकी आँखों में राहत उतर आई।

"तुम... आ गए।"

अर्जुन की आवाज़ नरम हो गई।

"हाँ, राजकुमारी। मैं यहीं हूँ।"

सिया ने उसकी उँगलियाँ पकड़ लीं।

"मैंने... उसे देखा था।"

अर्जुन की आँखें गंभीर हो गईं।

"किसे?"

सिया ने आँखें बंद कर लीं।

जैसे वो उस पल को फिर से याद करने की कोशिश कर रही हो।

"एक आदमी..."

रोशनी और काव्या भी उसकी तरफ़ देखने लगीं।

सिया की माँ ने उसके बालों पर हाथ फेरा।

"धीरे-धीरे याद करो बेटा। जल्दी मत करो।"

सिया ने गहरी साँस ली।

"वो... मेरे कमरे के बाहर था।"

अर्जुन की उँगलियाँ उसके हाथ पर कस गईं।

"उसका चेहरा देखा?"

सिया ने सिर हिलाया।

"नहीं..."

कुछ पल की खामोशी।

फिर उसने कहा—

"लेकिन... उसके हाथ में कुछ था।"

अर्जुन तुरंत बोला—

"क्या?"

सिया की आँखें खुलीं।

"नीली... शीशी।" 😨

अर्जुन का चेहरा बदल गया।

वही नीली शीशी...

जिसे CCTV में आकाश के पास देखा गया था।

लेकिन सिया ने तुरंत उसकी तरफ़ देखा।

उसकी आवाज़ बेहद धीमी थी—

"लेकिन वो आकाश नहीं था।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।

"तुम्हें यकीन है?"

सिया ने धीरे से सिर हिलाया।

"हाँ..."

फिर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"उसकी चाल अलग थी..."

अर्जुन ध्यान से सुनता रहा।

"और..."

सिया अचानक रुक गई।

उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो गईं।

"उसकी कलाई पर कुछ था।"

अर्जुन झुककर उसके करीब आया।

"क्या?"

सिया ने याद करने की कोशिश की।

लेकिन सिर में तेज़ दर्द उठा।

उसने अपना माथा पकड़ लिया।

"आह..." 🥺

अर्जुन तुरंत चिंतित हो गया।

"बस... अब और मत सोचो।"

डॉक्टर ने भी उसे आराम करने को कहा।

लेकिन सिया ने अर्जुन की कलाई पकड़ ली।

"नहीं..."

उसकी आँखों में डर था।

"मुझे याद करना होगा।"

अर्जुन कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर धीरे से बोला—

"तुम्हें कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है। मैं उसे ढूँढ लूँगा।"

सिया ने सिर हिलाया।

"लेकिन अर्जुन..."

उसकी आवाज़ काँप गई।

"वो... हमारे बहुत करीब है।" 😨

---



कुछ देर बाद सिया सो गई।

रानी माँ ने सबको कमरे से थोड़ा बाहर आने का इशारा किया।

गलियारे में अर्जुन, विवेक, सिया के पिता, रोशनी और काव्या खड़े थे।

विवेक ने धीमी आवाज़ में कहा—

"अगर सिया ने सही देखा है, तो आकाश सिर्फ़ एक मोहरा हो सकता है।"

अर्जुन ने सिर हिलाया।

"और हमें उस आदमी तक पहुँचना होगा।"

सिया के पिता ने गंभीर स्वर में कहा—

"लेकिन सिया को दोबारा खतरे में डालकर नहीं।"

अर्जुन ने उनकी तरफ़ देखा।

"मैं उसे कुछ नहीं होने दूँगा।"

तभी अंदर से सिया की आवाज़ आई—

"अर्जुन..."

सबकी नज़र कमरे की तरफ़ गई।

अर्जुन तुरंत अंदर गया।

सिया आधी नींद में थी।

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

अर्जुन ने तुरंत उसे थाम लिया।

"क्या हुआ?"

सिया ने उसकी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में अचानक डर उतर आया।

"मुझे... कुछ याद आया है।"

अर्जुन का दिल तेज़ धड़कने लगा।

"क्या?"

सिया ने मुश्किल से कहा—

"उसकी कलाई..."

अर्जुन थोड़ा और झुक गया।

"क्या था उसकी कलाई पर?"

सिया ने आँखें बंद कर लीं।

फिर धीरे-धीरे बोली—

"एक निशान..."

अर्जुन की भौंहें सिकुड़ गईं।

"कैसा निशान?"

सिया ने आँखें खोलीं।

उसकी आँखों में अब सिर्फ़ डर था।

"वही निशान..."

वो काँप गई।

"जो मैंने..."

अर्जुन की साँस रुक गई।

"जो तुमने किसके हाथ पर देखा था?"

सिया ने उसकी तरफ़ देखा।

कुछ सेकंड तक उसके होंठ काँपते रहे।

फिर उसने बेहद धीमी आवाज़ में कहा—

"अर्जुन... मैंने वो निशान..."

वो अचानक चुप हो गई।

उसकी आँखें कमरे के दरवाज़े पर टिक गईं।

अर्जुन ने पलटकर दरवाज़े की तरफ़ देखा।

वहाँ कोई नहीं था।

लेकिन सिया की आँखों में डर बढ़ता जा रहा था।

उसने अर्जुन का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

"मैंने वो निशान... तुम्हारे बहुत करीब वाले इंसान के हाथ पर देखा था।" 😨

अर्जुन की आँखों में एक पल के लिए अविश्वास उभरा।

"मेरे... करीब?"

सिया ने धीरे से सिर हिलाया।

और उसी वक्त...

गलियारे में किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

ठक... ठक... ठक... 

अर्जुन की नज़र दरवाज़े पर टिक गई।

उसकी आँखों में अब सिर्फ़ एक सवाल था—

आखिर वो निशान किसके हाथ पर था? 😠🔥

जारी रहेगा... 💗

© Diksha 

प्रिय पाठकों,

यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

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✨ मेरी रचनाएँ ✨

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 2. वो जो चुपके से देखा करता था — ✅ Completed

3. अनचाही मोहब्बत (Anchahi Mohabbat) — ✅ Completed

4. हुक्म और हसरत (Hukm Aur Hasarat) — ✍️ 
Running... 🌸